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मेरी कलम की स्याही

मेरी कलम की स्याही है ये

जीवन रूपी दवात में खूब डूबाई है ये

कभी लाल,कभी काली व नीली

रही है हरदम जोश की प्याली

अक्षर-अक्षर उकेरती रही है ये।

उबड-खाबड पंथ कंंटीले

नही रोक सके हैं इसको कंठ सुरीले

कह-कशे और व्यंग-बाण से

कभी नही कतराई है ये

मेरी कलम की स्याही है ये

जीवन भर की कमाई है ये।

कोटि-कोटि नमन करती आई है ये

मांं-बाप, संग-साथी और भाई को

लेकिन नहीं भूल पाई है

उन फरिश्तों को

जिन्होने की अब रूसवाई है

मेरी कलम की स्याही है ये।

निशाने पर हैं आज हैं इसके

भारत मांं को छलनी करते दरिदें

ऊंची उड़ान भरते वो परिंदे

जिनकी चोंच में अब ठिठाई है

सावधान, मेरी कलम की स्य़ाही है ये।।

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