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परी

डग़र की ओर बढ़ते कदम

ठिठक कर रूक जाते हैं

और ताकते रहते हैं

कंटीले मार्ग को।

नयन रफ़ता रफ़ता

देखते हैं चहुं ओर

कि कहीं, कोई विषधर

फन फैलाए तो नही बैठा है।

कौंधती बिजली

रूकती हृदयगति

शाम ढलने को़

है अमावस्या की अंधेरी रात

एक कली चटकती है

हवा में खुशबू महकती है

एक परी खन खन कर के

उड़न खटोले पर विराजमान

नभ से उतरती है

और अपनी जादुई छड़ी से

निकाल फैंकती है उस दंश को

जो कहीं अंतर्मन मेंं गड़ा हुआ था

और बिछ़ा देती है सुर्ख

लाल, पीले व हरे नीले फूल।

अब उठ चलते हैं

रूके हुए कदम

अपनी मंजिल की ओर

कभी ना रूकने के लिए।

जानते हो ये परी कौन है?

मेरी बेटी, मेरी लाडली

मेरी जा़न मेरा जीवन

मेरी हमसफर, मेरी राज़दार।

“जोया”

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