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मन के दीए

इस बार दिवाली कुछ नये ढंग से मनाए
कुम्हार के परिवार द्वारा बनाए दीए जलाएं।

खूब सजाएं अपने घरों को, लेकिन
देशी शिल्पकारों की कृति ही घर लाएं।

खादी को घर घर अपनाएं
अपने बुनकरों का मान बढ़ाएं।

मिठाईयों को त्याग कर
घर की बनी हलवा पूरी खाएं।

जब भी हम लक्ष्मी जी को भोग लगाएं
अन्न व दीप दान अनाथ आश्रम में भी कर आएं।

इस बार दिवाली कुछ नये ढंग से मनाए
कुम्हार के परिवार द्वारा बनाए दीए जलाएं।

दीपवाली की बधाई में हृदय की मिठास मिलाएं
आओ इस बार दिवाली पर बुजुर्गों से आशिष ले आएं।

मंदिरों में जब दीए जलाएं
मन के अंधकार को वहीं छोड़ आएं।

अबकी बार जब हम दिवाली मनाएं
एक दीया पूर्वजों के नाम का भी जलाएं।

इस बार दिवाली कुछ नये ढंग से मनाएं
कुम्हार के परिवार द्वारा बनाए दीए जलाएं।

कन्या भ्रूण हत्या, नारी अपमान सरीखी कुरीतियों को भगाएं
सब मिलकर बेटियों को पढ़ाएं व बेटों को भी संस्कारी बनाए।

इस बार दिवाली नये ढंग से मनाएं
गरीब की झोंपडी में भी दीए जलाएं।

आडंबरों से रहित जीवनशैली अपनाएं
इस दिवाली पर सब मन के दिए जलाएं।

इस बार दिवाली कुछ नये ढंग से मनाएं
कुम्हार के परिवार द्वारा बनाए दीए जलाएं।

✍️©®”जोया” 14/10/2018

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बचपन

सावन की बदली
जब जब घिर- घिर कर आती है
तो न जाने क्यों
मेरे अंतर्मन पर
कुछ अनकही य़ादें
एक-एक कर उकेरी जाती हैं।

और
मैं खो जाती हूं
उस बचपन में
जब सफलता की दौड़ नहीं थी
जब पैसा कमाने की होड़ नहीं थी
जब सब जिन्दगी सहज़ भाव से जीते थे
और छल और फरेब से थे रहते सब दूर
हम बालक रहते थे जोश से भरपूर।

जहांं मिलना-जुलना ही महजब था
जहां धर्म, नस्ल व भेद की दीवारें नहीं थी
जहां जात-पात के नारे नहीं थे
जहाँ बेटी सबकी सांझा जिम्मेदारी थी
जहां गिरे हुए को उठाने में मिलता था अपूर्व सन्तोष।

कहां गया वो बचपन
कहां गए वो सितारे
कहां लुप्त हो गया बुजुर्गों का मेला
क्यों हो गया मनुष्य अकेला – अकेला
क्यों नहीं सुलझाते लोग अब किसी का भी झमेला?

कौई मुझे बतलाए जरा
क्यों हो रहे जंगल वीराने
क्यों बदल रही है बयार
क्यों उलझ रहे लोग बनकर सियार।

क्यों नहीं उतरता मनुष्य अब खरा खरा
क्यों डगमगाया चित्त ज़रा ज़रा
क्यों जल रहे अब शमा परवाने
क्यों नहीं लगाता समाज़ उतकृष्ट निशाने
क्यों सज़ते हैं अब हर घर मयखाने।

पूछता है मेरा उद्वेलित हैरान पंसेमा मन
क्यों लौटकर नहीं आ सकते दिन पुराने
जब छोटी छोटी खुशियों का खज़ाना था कण कण
जब भंवरे करते थे मधुर गुंजन
जब उड़ती थी तितलियां वन वन
जब मोर नाचते थे हर घर आंगन
जब खनखनाते थे झोली में कंचे कंचन।

आह! क्या थे वे दिन पुराने
जब बुआ आती थी लेकर देसी घी का चूरमा
खाकर हम बच्चे बन जाते थे सूरमा
जब दादा जाते थे शहर
हम बच्चे मचाते थे हुड़दंग सारी दोपहर
खूब खेलते थे गुल्ली ड़ंडा
और पिठ्ठू में अपनाते थे जीतने का फंडा।

निपटा कर स्कूल का काम
गिट्टे मिलकर खेलती थी सारी सहेलियां
कभी अंका- डंका
कभी लगंड़ी टांग
सावंन में मां उतराती थी मीठी स्वाहलीयां।

निशाना मेरा होता था सटीक
और मैं लड़कों से भी कंचे जाती थी जीत
भर लेती थी अपनी छोटी टोकनी
पिताजी जब परदेश से आते
ढूंढ निकालते थे हमारी शरारतों की निशानी
और फेंक देते थे घर की कुंई मे कंचों से भरी टोकनी
बेटी शिक्षा की लौ गांव मे उन्होंने जलाई
सब को समझाया बेटी नहीं होती पराई।

✍️©®”जोया”17/09/2018.

बोलती आँखे

जब मन हषिर्त होता

तब बोलती आँखे

जब मन हो उदास

तब बोलती आँखे।

जब हृदय वेदना से

कर उठता चीत्कार

तब बोलती आँखे

जब शब्द हो जाए खामोश

तब बोलती आँखे।

अंतर्मन की पीड़ा

जब हंसी की चादर ओढ़े

तब बोलती आँखे

आत्म-सम्मान को

लगती जब चोट

तब बोलती आँखे।

लुटती जब अस्मिता

आहों कराहों का

बन जाता संसार

सब बयां करती

बोलती आंखें।

चीत्कारों का गहरा सागर

अंतर्मन का दंद्व

वागशक्ति होती

पिंजरे में बंद

लेकिन बोलती आँखे।

सहानुभूति की

नहीं दरकार

उठा ली है तलवार

करेगी नारी अब

दुर्जनों पर वार

ये बोलती

मेरी आँखे

तुम्हारी आँखे

सबकी आँखे।

सब मिलकर आओ

रचाएं सुन्दर संसार

ये बोलती हैं

अनगिनत आँखे।

✍️©®” जोया”05/02/2019