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प्रेम के हस्ताक्षर

काया उम्र दराज़ हो चली
झुर्रियां भी अब लगें भली।

जिन्दगी ने लिए खूब इम्तिहान
कुछ सपने नहीं चढ़े परवान।

उगता सूरज़ भी डूबा
शेष नहीं अब कोई मनसूबा।

जीवन एक रंगमंच
रचे जाते अनेकों परपंच।

रिश्ते नातों का खज़ाना
छूटा जाए, यही अब फस़ाना।

मिट्टी के हम सब दीए
जलते रहे जब तक जीए।

एकांत के मौन में
टिमटिमाते जुगनू से क्षणों में।

इश्क था सबसे बेखबर
माशूक दिलों की स्वप्निली डगर।

जीवन की सांझ में
भी गया मुस्करा
प्रीत की डोली उठा
रच गया प्रेम हस्ताक्षर।

© ✍️” जोया” 17/10/2018

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