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रुह की जमीन

रूह की जमीन पर
रखा जो उसने कदम
क्षण में ही बन गए वो मेरे हमदम।

दिल की पंतग उड़ चली
लिए सपनो की डोर
सुंगधा समीर बही यौवन के भोर।

इश्क लेता रहा अंगड़ाई
मिलकर जीवन किताब जब रचाई
विधाता की कलम भी लड़खड़ाई।

सह्रत्र शूलों की पगडंडी
अफवाहों की सज़ी थी मंडी
रूह से रूह की तपन कभी ना पड़ी ठंडी।

भूगौलिक दूरी
शारिरिक प्रेम की मजबूरी
रूह की जमीन पर सजती संवरती हर वक्त नूरी।

संकीर्ण मानसिकता के घेरे से दूर
इश्क के पुष्प गुच्छ खिले सुदूर
फैली सुंगध दूर दूर तक भरपूर।

बंधनों के कौड़े
रसमय जीवन को निचौड़े
डरपोक यहां पर होते भगौड़े।

रूह की जमीं पर सज़ाया
इश्क ने जब आशियां
महक उठी अंतर्मन की वादियां।

अवचेतन मन ने भी किया सोलह श्रृंगार
रूह की जमीं पर जब हृदय वीणा ने की झंकार।

✍️© “जोया” 23/10/2018

चाह

सीप का मोती बनू

आंसमा का तारा

मन उपवन खिल जाए

जब सारा जहां हो हमारा।

सागर की मछली बन

घूमूं देश- विदेश

बन कर पंछी

लाऊं गगन से संदेश।

मां की प्यारी बिटिया बनू

पिता की दुलारी

करूं मै हरदम

उमंगों की सवारी।

चाह

एक अच्छी लेखिका बनू

पिरोऊं संवदेनाओं की लडी

झकझोर कर तन और मन

कभी ना रहूं मै अकेली खडी।

चाह

समाज को साथ लिए

चलो सफर मे मिलकर जिएं

आएगें क्षण अनेक नये

जला पाएं जब उजालों के दिए।

चाह

बन कल्पना

उड़ान भरूँ गगन में

बाधाओं से जा टकराऊं

कभी ना मैं घबराऊँ।

चाह

शिक्षा की अलख जगाऊं

दुख हर किसी के हर पाऊं

अंधियारे को दूर भगाऊँ

ग्रामीण विकास में योगदान कर पाऊं।

महिला सशक्तीकरण मेरा ध्येय

बन जाएं वे शिक्षित और अजेय।

@जोया-सन्तोष मलिक चाहार- 10/09/2015