Tag Archives: alone

दीवारें

सुना है दीवारों के कान होते हैं,
लेकिन मैं कहती हूं
दीवारों की आंखें भी होती हैं,
दीवारें गवाह होती हैं
वीभत्स घटनाओं की
खामोशी की चीखों की,
वे सुनती हैं
उस अंतर्नाद को
जिसे, अपनों के कान नहीं सुनते
उन सिसकियों को,
जिन्हें लोग
कमजोर व्यक्तित्व का ठप्पा लगाकर
छोड़ देते हैं अकेले,
फिर सुनती हैं
उस रुदन को
जिसमें आवाज़ नहींं होती,
ना ही गिरता है, आंख से आंसू
दीवारें गवाह रहती हैं
प्रेमियों की गुफ्तगू की,
तब वे थोड़ा सहम जाती हैं
उनके पकड़े जाने के डर से,
दीवारें, प्रेमपूर्ण व
वीभत्स घटनाओं की सदीयों से रही हैं गवाह।

लेकिन ये दीवारें
चुप रहते रहते
गूंगी हो गई हैं
चींखें सुनते सुनते बहरी
ये दीवारें घरों से लेकर बड़े बंगलों ,
छोटे गांव से लेकर
बड़े शहरों तक उग आई हैं।
लेकिन, एक दिन यकायक
ये चीखकर बिखर जाएंगी
रह जाएंगी बस बिखरी पड़ी ईंटें
जिनको उठा उठा कर
घुटे घुटे लोग
एक दूसरे पर मारेंगें।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१६/०६/२०२०

खंडहर

प्रेम के खंडहरों से आती सिसकियों की आवाज़ सुनी है कभी? चलो आज तुम्हें ले चलती हूं, उस गहरे कुएं की तरफ़, उस नदी के किनारे की तरफ़, उस पहाड़ी की खाई की तरफ या फिर रुद्रप्रयाग के पुल पर झूलते झूले की तरफ़, जहां से ना जाने कितनी बार सोचा था कि कूद जाऊं, यहां से, अपना लूं मौत को, ताकि मैं, यूं सिसक सिसक कर फर्श पर सिर पटकना बंद कर देती। तुम चले गए और पीछे छोड़ गए मुझे तिल तिल मरने के लिए और फिर भी जीवित रहने को विवश। तुम ने अपनी दुनिया को सुरक्षित रखा और परेशानी मेरे हिस्से में छोड़ गए। अवसाद की गहरी खाई में धकेलकर कर कितने खुश रह पाए होगे, ये तो नहीं जानती, लेकिन इतना जानती हूं कि, किसी का दिल तोड़कर अपनी दुनिया आबाद करने वालों ने सिसकती जिंदगी के श्राप के बारे में ठीक से नहीं जाना। प्रेम, वह नहीं था, जो तुमने किया। तुम गुनगुनाते तो बहुत थे, पाकिज़ा फिल्म का गाना,
“प्यार किया तो डरना क्या” लेकिन पहली ही चोट को बर्दाश्त नहीं कर पाए, और  अपने सुरक्षा कवच में घुस कर आंनद मग्न रहे। मेरे ऊपर अंगुली उठाने वाले की अंगुली काट कर रखने का सामर्थ्य नहीं रखते थे, तो प्रेम की आग से खेलना भी नहीं चाहिए था। तुम्हारे जैसे निष्ठुर हृदय ही, प्रेम को बदनाम करते हैं। प्रेम कोई कॉफी का मग तो नहीं कि चुस्की लेते लेते कॉफी खत्म होने पर प्रेम भी खत्म हुआ। मैंने अपना सबकुछ दांव पर लगाकर, तुमसे प्रेम किया था, लेकिन अब उसके खंडहर ही शेष हैं, क्योंकि मेरे सपनों की ईंटों से तो तुमने अपना महल खड़ा कर लिया। खंडहरों का अपना इतिहास होता है। मेरी सिसकियों की हृदयभेदी पुकार, एक दिन तुम्हें  प्रेम के खंडहरों में लेकर आएगी । सम्मोहित से तुम चले आओगे, अप्सरा का तिलिस्म टूट चुका होगा। खंडित पत्थरों को छूने पर  तुम्हें पहले प्रेम की सिसकियां सुनाई देंगी। तुम वहां भटकते रहोगे और बाहर निकलने का रास्ता दिखाई नहीं देगा। यही तुम्हारा श्राप होगा, जन्म जन्मांतर।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १२/०६/२०२०

मछली

रीति रिवाजों
के धागों में उलझी
स्त्री
वैसे ही होती है
जैसे, जाल में फंसी मछली
संस्कारों की तपती भट्टी में
तपाकर
परोस दी जाती है
एक अजनबी शख्स की थाली में
जैसे
परोस दी जाती है
कड़ाही में तली मछली,
फिर वह उसे
छुरी कांटे से खाए,
या साबुत निगल जाए
सवाल कौन करेगा?
जब
सवाल नहीं किए जाते,
तब
मर जाती है एक स्त्री,
जीवित होता है बस,एक मांस का लोथड़ा
पिंजरे में कैद रुह
छटपटाती है,
यंत्रणागृह से ताकती है
विस्तृत आसमान,
लेकिन
मुक्ती भी तो देह छूटने पर ही मिलती है।

©®डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०३/०६/२०२०

रात्री का दूसरा पहर

प्रिय कर्नल

उम्मीद करती हूं  कोरोनावायरस जैसी महामारी के संकटकाल में तुम सपरिवार सुरक्षित होगे। प्रतिदिन मेरी प्रार्थना में तुम विशेष रूप से शामिल रहते हो। दिन के चौबीस घंटो में रात्री का दूसरा पहर हमेशा तुम्हारी यादों की पोटली ले आता है जिसमें कुछ सुखद अहसास और कुछ कड़वे अनुभव के वो घूंट भी हैं, जो हम दोनों को केवल इसलिए पीने पड़े क्योंकि हमारे समाज का ढांचा और उसकी सोच इतनी संकीर्ण है कि, इसकी संकरी गलियों से गुजरते हुए, स्थापित मापदंडों के, पत्थरों से टकरा कर चोट निश्चित ही लगती है, फिर चाहे,आपके विचार ….आपका अंतःकरण कितना ही निर्मल हो… आचरण कितना ही अनुकरणीय हो। ऐसा क्यों होता है? जिंदगी के सबसे हसीन व उर्जावान बीस वर्षों की उठा-पटक के बाद, मैं, एक ही निष्कर्ष पर पहुंची हूं कि, मनुष्य जब किसी व्यक्ति के गुणों की बराबरी नहीं कर सकता है तो वह ऐसे मौके की तलाश में रहता है कि एक, केवल एक, अवसर मिल जाए तो कैसे रुह को लहुलुहान किया जाए… फिर वह गिद्ध की तरह झपटा मारता है और शिकार को अपने पंजों में दबोच उसे तसल्ली से नोचता है।

याद है?… यही तो हुआ था हमारे साथ। अभिमन्यु की तरह, हम दोनों, एक ऐसे चक्रव्यूह में घिरे थे, जहां से निकलना दोनों के लिए अत्यंत मुश्किल था… तुम समझदार थे, रणनीति बनाने में सक्षम थे, आर्मी का तजुर्बा तुम्हारे काम आया…. चक्रव्यूह भेद, तुम कुशलता से बाहर आ गए…. तुम्हारी आंखों में पीड़ा… तुम्हारी वाणी से निकले वो रक्तरंजित शब्द…( जोरू का गुलाम हूं), आज भी बीस वर्षों के बाद मैं स्पष्ट सुन सकती हूं। मुझे ये भी मालूम है कि, ये शब्द तुमने मेरी हिफाजत के लिए ही  बोले थे….। लेकिन मैं चक्रव्यूह में चारों ओर से होने वाले कटाक्षपूर्ण बाणों की बौछार का सामना करती रही….तुम्हारी पत्नी ने वह चिठ्ठी मेरे पति को शायद दे दी थी…मेरी सहेली ने भी आग में घी डाला था, तभी तो उनकी प्रताड़ना सही….. गूंगी हो गई थी… सदमे में थी, कि चिठ्ठी में लिखी एक पंक्ति ने मेरे जीवन में  ऐसा भयानक तूफान कैसे ला दिया? तुम्हें मालूम होगा कि, उसके बंवडर से निकलने में  मुझे दशकों लगे….वह केवल एक पंक्ति नहीं थी, बल्कि मेरी भाग्यशाली रेखा की गहरी काट थी। मेरी सहेली जब भी मेरा हाथ देखती थी तो कहती थी, ” देखो कितनी लम्बी भाग्य-रेखा है!” मैंने उसके बाद से फिर किसी को हाथ नहीं दिखाया, मुझे डर था …. लेकिन नज़र तो लग चुकी थी। तुम्हें  तो पता ही है, उसी सहेली ने मेरे दिल के ताले को खोल,हम दोनों के पवित्र प्रेम की दास्तां सुनी …वे सब राज़ जाने, जो मैंनें वर्षों तक अपने सीने में दफ़न कर रखे थे…. उसका, बार बार , तुम्हारा जिक्र करने , ठिठोली करने पर तुम से मिलने की इच्छा प्रबल होती चली गई क्योंकि मुझे लगता था कि, इतने सालों की मजबूत गृहस्थी में पनपे विश्वास में अविश्वास की कोई जगह नहीं हो सकती…. फिर मेरी खोज़ शुरू हुई…. तुम्हारा पता मिला….मेरी तुम्हारी मुलाकात शादी के सोलह साल बाद हुई और दिल के कोने में सिसकता प्रेम मुखर होने को आतुर था, लेकिन हम दोनों ने ही तो खुद पर नियंत्रण रखा था… पारिवारिक दोस्ती की तरफ बढ़े कदम, एक पंक्ति की वजह से लड़खड़ाए….. इतना ही तो लिखा था, “तुम मेरा पहला प्यार हो”….. बहुत बार सोचती हूं, पति-पत्नी में भेद किसी तीसरे की वजह से कम और खुद की असुरक्षा की भावना…..खोने का डर…..साथी पर अविश्वास….की वजह से होता है। मेरी उसी सहेली ने मेरे को साथियों में हमें बदनाम किया… पता है उसकी इस हरकत की वजह से,अब मेरा, दोस्ती से विश्वास उठ चुका है… दोस्ती इतनी उथली व छिछली कैसे हो सकती है?…मेरे लिए दोस्ती के मायने बदल गए हैं। इस दुनिया में आप खुद ही अपने दोस्त हैं, बाकी जगत के सभी रिश्ते नाते केवल स्वार्थ पर टिके हैं। आजतक मैंने उसे क्षमा नहीं किया है।

सच ही कहा जाता है, ये कलयुग ही है और मनुष्य की, इसी आपाधापी और एक-दूसरे को नीचा दिखाने का परिणाम है कि, सारा विश्व एक श्राप से गुजर रहा है। जब जब धर्म की हानी होती है ऐसी विपदाओं का मनुष्य जाति को सामना करना पड़ता है। जीवन के मूल्यों में सतत गिरावट हमें गहरे संकट में डालती है…… दुनिया भर में प्रकृति के साथ छेड़खानी का गंभीर परिणाम भुगतना पड़ता है….. शायद ये संकटकाल जब बीतेगा तो मानव जाति कुछ समझदार होकर खोए प्रकृति संतुलन और ग्रहण लगे मूल्यों को, संवारने सजाने का कार्य करेगी, ऐसी मेरी आशा ही नहीं विश्वास है।

खैर, मैं भी क्या जिक्र लेकर बैठ गई। महिमा से पता चला था, तुम्हारी बेटी की शादी हो गई है। मेरी तरफ से बहुत बहुत शुभकामनाएं। तुम्हें भी तो जरुर पता चला होगा, मेरे बेटे की शादी पिछले साल नवंबर में हुई थी। बेटी, कॉरपोरेट जगत को सात साल सेवा दे चुकी है। एडलवाइज में चीफ़ मैनेजर का पद त्याग कर अपनी स्टार्टप को बिल्ड कर रही है। अभी उसका शादी का कोई इरादा नहीं है। मैंने भी कह दिया है , ” तुम जो भी करना चाहती हो करो…. शादी के अलावा भी बहुत कुछ है दुनिया में करने के लिए… मनपसंद साथी मिल जाए तब कर लेना…. नहीं तो जिंदगी तुम्हारी है… कुछ सृजनात्मक करो।”

ठीक है कर्नल, अपना ख्याल रखना। बहुत दिनों से सोच रही थी, तुमसे बात की जाए….संकट की घड़ी में अपने सभी की
खैरियत पूछने का दिल होता ही है। शुभकामनाएं।

तुम्हारी प्रेयसी

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”७/०४/२०२०

उधार

उधार
नहीं हैं अब
मेरे ऊपर
तुम्हारे किसी
एहसान का कर्ज
चुका दिया है मोल
एक मकान
जो तूने बना कर दिया
यद्यपि उसमें भी
मेरा रहा था बराबर का योगदान
बिफरकर
नौकरी त्यागने का तुम्हारा कदम
मुझे झटका तो दे गया था
लेकिन
मेरे मजबूत
इरादों को तोड़ ना सका
तुम्हारे बच्चे भी पढ़लिख कर
ऊंचे ओहदे पर पहुंच गए हैं
तुम्हारे बाप द्वारा
कह गए शब्द
मेरे जह़न में
शूल से चुभे पड़े हैं
मेरे दस साल के बेटे का
मनोबल तोड़ते हुए
बच्चों की दादी से उन्होंने कहा था
“ये बच्चे तो भीख मांगेगें”
मेरे मासूम बेटे का सवाल
आज बीस वर्ष बाद भी
मुझे अंदर तक हिला जाता है
बेटे ने पूछा था सहमते हुए
” मां, क्या हम भीख मांगेंगे?”
मैं स्तब्ध रह गई थी
मैंने पूछा था “कौन कह रहा था?”
उसने कहा “दादा जी, दादीजी को कह रहे थे”
आज
सभी शब्दों की मार
व उनके तुच्छ सोच की
सब उधार चुकता हो चुकी है
तुम सभी को
शायद इस बात का भान नहीं था कि
एक महिला/ मां के लिए
उसकी संतान से बढ़कर कुछ नहीं
उनके लिए
वह जीवन की उल्टी धारा को
मोड़ने का अदम्य साहस रखती है
तुम्हारी मां ने भी कहा था
” मेरा बेटा नौकरी करता तो ये बालक अफसर बनते”
उन्हें भी
मेरी जैसी अंतर्मुखी बहु से
उम्मीद नहीं थी
मेरी क्लास वन अफसर की
ईमानदारी की कमाई
किसी को दिखाई नहीं देती थी
डिप्लोमा कोर्स कर
जे ई एन का पद
व उपरी कमाई पर
उन्हें घंमड था
मैंने
उस वक्त
किसी बात का
जवाब नहीं दिया था
लेकिन
एक जिद्द ठान ली थी
किया था
खुद से वादा
बिखरा जो
उसे है समेटना
आज
बीस वर्ष बाद
फक्र से कहती हूं
तुम सभी का
पिछले जन्मों का उधार हुआ चुकता
जैसे सुबह का भूला शाम को घर लौटता है
तुम आए थे
मेरे पास क्षमा मांगने
कहा था ” मेरा गुस्सा मुझे खा गया”
मैंने कहा था
” कोई बात नहीं… पिछले जन्मों का उधार उतार रही हूं”
तुम्हें अपना लिया था फिर से
क्योंकि
अराध्य सा प्रेम किया था तुमसे
मेरी एक भूल को
तुम क्षमा नहीं कर सके थे
मुझे सजा देने के लिए
त्याग दी थी तुमने अपनी “शाही नौकरी ”
ये ” शाही नौकरी” का जुमला भी
तुम्हारे बाप का था
बता देना उन्हें
ईमानदारी की नौकरी ने बहुत बरकत दी
मिली विद्यार्थियों की दुआएं
मुझे कोई घंमड नहीं है
लेकिन
अपने संस्कारों
और
क्षमता पर है अटूट विश्वास और रहेगा।
✍️ ©® डा सन्तोष चाहार ” ज़ोया” १२/०९/२०१९

उधेड़बुन

रिश्तों की
स्वेटर उधड़ती रही,
वह लड़की
कर्तव्यों के धागों
से पेबंद लगाती गई
इसी उधेड़बुन में
दुल्हन से
मां, काकी, ताई
से दादी, नानी
तक का सफर
पूरा हुआ
बुढ़ापे
की दहलीज पर
आभास हुआ
खुद के लिए
जीवन जीया ही नहीं
और
जिंदगी ने
अनंत सफर की
तैयारी कर ली
स्वास
अंदर खिंचा
लेकिन
बाहर नहीं आया
आत्मा
जर्जर देह को त्याग
नया चोला
पहनने की तैयारी में
आंगन के बीच
चहलकदमी कर रही थी
विस्मित हो
दहाड़े मारते
सगे संबधियों को
सुन रही थी
उसके
गुणों के
कसीदे पढ़े जा रहे थे
हर कोई
एक अदद बीबी
मां, काकी ताई को
जर्जर देह में तलाश रहा था
चीखें
सन्नाटें में बदल गई
आंखों के आंसू
सूख चुके थे…
रह गए थे केवल
पश्चाताप व
आत्मग्लानि के अंगारे
अंनत सफ़र पर निकली
सूक्ष्म आत्मा
सबके
दुख से दुखी
उनकी सांत्वना के लिए
फिर
उधेड़बुन में
व्यस्त हो गई।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २०/०७/२०१९

जिद्द

फरवरी माह 1998 की एक शाम सुकृति अपनी डयूटी से घर लौटती है और पति के आने के इंतज़ार में शाम की चाय की तैयारी शुरू करती है।शाम से रात हो जाती है लेकिन पति राजीव का कोई अता पता नहीं चलता।किसी अनहोनी की आंशका से वह कांप उठती है। रात 11 बजे फोन की घंटी बजती है और एक सख्त आवाज का संदेश आता है कि आपके पति को उसके वसूलों की सज़ा हमने दे दी है। राजीव बहुत मिलनसार व्यक्ति थे और सुकृति को समझ नहीं आया कि मामला क्या है।सुकृति ने सुसराल वालों से सम्पर्क किया और इस घटनाक्रम के बारे मे बताया।सुकृति और राजीव बच्चों के साथ शहर में रहते थे और सास ससुर दूसरे बेटे के साथ गांव की जमीन जायदाद सम्भालते थे। सुकृति के बच्चे उस वक्त पांचवी और सातवीं कक्षा में पढते थे। राजीव से कोई सम्पर्क नहीं स्थापित हो रहा था। सुकृति की हालत बहुत खराब हो गई थी क्योंकि वह कुछ दिन पहले ही अवसाद से बाहर आयी थी। घरवालों ने चारों तरफ राजीव को ढूंढने के लिए अलग अलग स्थानों पर रिश्तेदारों को भेजा लेकिन निराशा ही हाथ लगी।

राजीव एक सप्ताह बाद गंगा नदी के किनारे देवप्रयाग में मिल तो गए लेकिन मानसिक संतुलन खो चुके थे।एक सप्ताह के अन्दर ही उनकी आंखों की रोशनी काफी कम हो गई थी और शरीर पर चोट के गहरे निशान थे।वे इस हालत में नहीं थे कि बता सकें कि उनकी इस प्रकार से हालत किसने की।वे खामोश हो चुके थे। घर वाले राजीव को सुकृति को सौप कर गांव वापिस लौट जाते हैं। सुकृति के भाई ने उनका मानसिक चिकित्सा करवाई लेकिन वे कभी पूर्ण रूप से ठीक नहीं हो पाये। नौकरी से त्याग पत्र दे दिया गया क्योंकि नौकरी के नाम से ही उन्हें घबराहट होती थी। बना बनाया महल ताश के पतों की तरह ढह गया। सुकृति भी गहरे अवसाद में फिर वापिस चली गई। लेकिन वह अपनी दवाओं के सहारे अपनी नौकरी पर जाती रही क्योंकि उसने ये जिद ठान ली थी सब कुछ फिर से खडा़ करना है।

जैसे संसार में होता है कष्टों में कोई आपका साथ नहीं देता है सब रिश्तेदार धीरे धीरे दूर होते चले गए। राजीव बहुत ही हिंसात्मक हो चले गए थे और सुकृति और बच्चों पर अपना गुस्सा निकालते थे। कभी कभी बिल्कुल खामोश हो जाते। एक मानसिक रुप से बिमार व्यक्ति को सम्भालना अपने आप मे बहुत बडी चुनौती होती है।और अकेली औरत को सबकुछ सम्भालना पड़े तब डगर और भी कठिन हो जाती है। सुकृति के लिये ये सब किसी युद्ध से कम नहीं था। पांच बार तो बिजली के झटके दिए गये। डाक्टरों का मानना था कि ऐसे मरीज मुश्किल ही बच पातें हैं क्योंकि सुसाइड की आंशका बनी रहती है।बच्चों को स्कूल भेजने के बाद सुकृति अपने पति को दवाई देकर अपनी नौकरी पर चली जाती। राजीव के माता पिता भी एक महीना ठहरने के बाद गांव चले गए।

सुकृति को कठिन दौर से गुजरना पड़ रहा था लेकिन मां बाप के दिए हुए संस्कारों की वजह से वह गृहस्थी की गाड़ी को एक पहिए से खींचने लगी। इस कष्ट के समय मे उसके बच्चों ने भी हौंसला नहीं खोया और लगन से हर कक्षा मे बेहतर प्रदर्शन करते रहे। इस घटनाक्रम में कब सुकृति के गहरे काले बाल बुढापे की झलक लिए दस्तक देने लगे पता ही नहीं चला। बीस साल तक जूझने के बाद सुकृति आज पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है क्योंकि उसकी मेहनत सफल हुई थी और राजीव काफी हद तक ठीक हो चले थे यद्यपि पूर्ण रूप से ठीक होंगे इसकी आशंका बनी रहती है।

आज़ सुकृति के बच्चे सुन्दर युवा बन चुके हैं और अच्छे पदों पर आसीन हैं। जो रिश्तेदार और राजीव के दोस्त दूर हो चुके थे वे अब फिर से आने लगें हैं लेकिन अब राजीव एक औपचारिकता भर निभाते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि कष्ट में सुकृति की बहनों और मायके वालों ने ही हौंसला अफजाई की थी। लेकिन फिर भी सुकृति ने किसी से भी एक पैसे की मदद नही ली क्योंकि उसका भगवान हर क्षण उसके साथ खडा़ था। और ये भगवान और कोई नही उसकी हिम्मत थी, उसकी जिद थी ।कहा भी जाता है कि भगवान उसकी मदद करते हैं जो अपनी मदद खुद करतें हैं। युद्ध हम केवल सरहदों पर ही नहीं करते , गृहस्थ जीवन भी मनुष्य के जीवट को अपनी कसोटी पर आंकता रहता है।

✍️©®”जोया” 20/09/2018

प्रेम के हस्ताक्षर

काया उम्र दराज़ हो चली
झुर्रियां भी अब लगें भली।

जिन्दगी ने लिए खूब इम्तिहान
कुछ सपने नहीं चढ़े परवान।

उगता सूरज़ भी डूबा
शेष नहीं अब कोई मनसूबा।

जीवन एक रंगमंच
रचे जाते अनेकों परपंच।

रिश्ते नातों का खज़ाना
छूटा जाए, यही अब फस़ाना।

मिट्टी के हम सब दीए
जलते रहे जब तक जीए।

एकांत के मौन में
टिमटिमाते जुगनू से क्षणों में।

इश्क था सबसे बेखबर
माशूक दिलों की स्वप्निली डगर।

जीवन की सांझ में
भी गया मुस्करा
प्रीत की डोली उठा
रच गया प्रेम हस्ताक्षर।

© ✍️” जोया” 17/10/2018