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उधार

उधार
नहीं हैं अब
मेरे ऊपर
तुम्हारे किसी
एहसान का कर्ज
चुका दिया है मोल
एक मकान
जो तूने बना कर दिया
यद्यपि उसमें भी
मेरा रहा था बराबर का योगदान
बिफरकर
नौकरी त्यागने का तुम्हारा कदम
मुझे झटका तो दे गया था
लेकिन
मेरे मजबूत
इरादों को तोड़ ना सका
तुम्हारे बच्चे भी पढ़लिख कर
ऊंचे ओहदे पर पहुंच गए हैं
तुम्हारे बाप द्वारा
कह गए शब्द
मेरे जह़न में
शूल से चुभे पड़े हैं
मेरे दस साल के बेटे का
मनोबल तोड़ते हुए
बच्चों की दादी से उन्होंने कहा था
“ये बच्चे तो भीख मांगेगें”
मेरे मासूम बेटे का सवाल
आज बीस वर्ष बाद भी
मुझे अंदर तक हिला जाता है
बेटे ने पूछा था सहमते हुए
” मां, क्या हम भीख मांगेंगे?”
मैं स्तब्ध रह गई थी
मैंने पूछा था “कौन कह रहा था?”
उसने कहा “दादा जी, दादीजी को कह रहे थे”
आज
सभी शब्दों की मार
व उनके तुच्छ सोच की
सब उधार चुकता हो चुकी है
तुम सभी को
शायद इस बात का भान नहीं था कि
एक महिला/ मां के लिए
उसकी संतान से बढ़कर कुछ नहीं
उनके लिए
वह जीवन की उल्टी धारा को
मोड़ने का अदम्य साहस रखती है
तुम्हारी मां ने भी कहा था
” मेरा बेटा नौकरी करता तो ये बालक अफसर बनते”
उन्हें भी
मेरी जैसी अंतर्मुखी बहु से
उम्मीद नहीं थी
मेरी क्लास वन अफसर की
ईमानदारी की कमाई
किसी को दिखाई नहीं देती थी
डिप्लोमा कोर्स कर
जे ई एन का पद
व उपरी कमाई पर
उन्हें घंमड था
मैंने
उस वक्त
किसी बात का
जवाब नहीं दिया था
लेकिन
एक जिद्द ठान ली थी
किया था
खुद से वादा
बिखरा जो
उसे है समेटना
आज
बीस वर्ष बाद
फक्र से कहती हूं
तुम सभी का
पिछले जन्मों का उधार हुआ चुकता
जैसे सुबह का भूला शाम को घर लौटता है
तुम आए थे
मेरे पास क्षमा मांगने
कहा था ” मेरा गुस्सा मुझे खा गया”
मैंने कहा था
” कोई बात नहीं… पिछले जन्मों का उधार उतार रही हूं”
तुम्हें अपना लिया था फिर से
क्योंकि
अराध्य सा प्रेम किया था तुमसे
मेरी एक भूल को
तुम क्षमा नहीं कर सके थे
मुझे सजा देने के लिए
त्याग दी थी तुमने अपनी “शाही नौकरी ”
ये ” शाही नौकरी” का जुमला भी
तुम्हारे बाप का था
बता देना उन्हें
ईमानदारी की नौकरी ने बहुत बरकत दी
मिली विद्यार्थियों की दुआएं
मुझे कोई घंमड नहीं है
लेकिन
अपने संस्कारों
और
क्षमता पर है अटूट विश्वास और रहेगा।
✍️ ©® डा सन्तोष चाहार ” ज़ोया” १२/०९/२०१९

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उधेड़बुन

रिश्तों की
स्वेटर उधड़ती रही,
वह लड़की
कर्तव्यों के धागों
से पेबंद लगाती गई
इसी उधेड़बुन में
दुल्हन से
मां, काकी, ताई
से दादी, नानी
तक का सफर
पूरा हुआ
बुढ़ापे
की दहलीज पर
आभास हुआ
खुद के लिए
जीवन जीया ही नहीं
और
जिंदगी ने
अनंत सफर की
तैयारी कर ली
स्वास
अंदर खिंचा
लेकिन
बाहर नहीं आया
आत्मा
जर्जर देह को त्याग
नया चोला
पहनने की तैयारी में
आंगन के बीच
चहलकदमी कर रही थी
विस्मित हो
दहाड़े मारते
सगे संबधियों को
सुन रही थी
उसके
गुणों के
कसीदे पढ़े जा रहे थे
हर कोई
एक अदद बीबी
मां, काकी ताई को
जर्जर देह में तलाश रहा था
चीखें
सन्नाटें में बदल गई
आंखों के आंसू
सूख चुके थे…
रह गए थे केवल
पश्चाताप व
आत्मग्लानि के अंगारे
अंनत सफ़र पर निकली
सूक्ष्म आत्मा
सबके
दुख से दुखी
उनकी सांत्वना के लिए
फिर
उधेड़बुन में
व्यस्त हो गई।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २०/०७/२०१९

जिद्द

फरवरी माह 1998 की एक शाम सुकृति अपनी डयूटी से घर लौटती है और पति के आने के इंतज़ार में शाम की चाय की तैयारी शुरू करती है।शाम से रात हो जाती है लेकिन पति राजीव का कोई अता पता नहीं चलता।किसी अनहोनी की आंशका से वह कांप उठती है। रात 11 बजे फोन की घंटी बजती है और एक सख्त आवाज का संदेश आता है कि आपके पति को उसके वसूलों की सज़ा हमने दे दी है। राजीव बहुत मिलनसार व्यक्ति थे और सुकृति को समझ नहीं आया कि मामला क्या है।सुकृति ने सुसराल वालों से सम्पर्क किया और इस घटनाक्रम के बारे मे बताया।सुकृति और राजीव बच्चों के साथ शहर में रहते थे और सास ससुर दूसरे बेटे के साथ गांव की जमीन जायदाद सम्भालते थे। सुकृति के बच्चे उस वक्त पांचवी और सातवीं कक्षा में पढते थे। राजीव से कोई सम्पर्क नहीं स्थापित हो रहा था। सुकृति की हालत बहुत खराब हो गई थी क्योंकि वह कुछ दिन पहले ही अवसाद से बाहर आयी थी। घरवालों ने चारों तरफ राजीव को ढूंढने के लिए अलग अलग स्थानों पर रिश्तेदारों को भेजा लेकिन निराशा ही हाथ लगी।

राजीव एक सप्ताह बाद गंगा नदी के किनारे देवप्रयाग में मिल तो गए लेकिन मानसिक संतुलन खो चुके थे।एक सप्ताह के अन्दर ही उनकी आंखों की रोशनी काफी कम हो गई थी और शरीर पर चोट के गहरे निशान थे।वे इस हालत में नहीं थे कि बता सकें कि उनकी इस प्रकार से हालत किसने की।वे खामोश हो चुके थे। घर वाले राजीव को सुकृति को सौप कर गांव वापिस लौट जाते हैं। सुकृति के भाई ने उनका मानसिक चिकित्सा करवाई लेकिन वे कभी पूर्ण रूप से ठीक नहीं हो पाये। नौकरी से त्याग पत्र दे दिया गया क्योंकि नौकरी के नाम से ही उन्हें घबराहट होती थी। बना बनाया महल ताश के पतों की तरह ढह गया। सुकृति भी गहरे अवसाद में फिर वापिस चली गई। लेकिन वह अपनी दवाओं के सहारे अपनी नौकरी पर जाती रही क्योंकि उसने ये जिद ठान ली थी सब कुछ फिर से खडा़ करना है।

जैसे संसार में होता है कष्टों में कोई आपका साथ नहीं देता है सब रिश्तेदार धीरे धीरे दूर होते चले गए। राजीव बहुत ही हिंसात्मक हो चले गए थे और सुकृति और बच्चों पर अपना गुस्सा निकालते थे। कभी कभी बिल्कुल खामोश हो जाते। एक मानसिक रुप से बिमार व्यक्ति को सम्भालना अपने आप मे बहुत बडी चुनौती होती है।और अकेली औरत को सबकुछ सम्भालना पड़े तब डगर और भी कठिन हो जाती है। सुकृति के लिये ये सब किसी युद्ध से कम नहीं था। पांच बार तो बिजली के झटके दिए गये। डाक्टरों का मानना था कि ऐसे मरीज मुश्किल ही बच पातें हैं क्योंकि सुसाइड की आंशका बनी रहती है।बच्चों को स्कूल भेजने के बाद सुकृति अपने पति को दवाई देकर अपनी नौकरी पर चली जाती। राजीव के माता पिता भी एक महीना ठहरने के बाद गांव चले गए।

सुकृति को कठिन दौर से गुजरना पड़ रहा था लेकिन मां बाप के दिए हुए संस्कारों की वजह से वह गृहस्थी की गाड़ी को एक पहिए से खींचने लगी। इस कष्ट के समय मे उसके बच्चों ने भी हौंसला नहीं खोया और लगन से हर कक्षा मे बेहतर प्रदर्शन करते रहे। इस घटनाक्रम में कब सुकृति के गहरे काले बाल बुढापे की झलक लिए दस्तक देने लगे पता ही नहीं चला। बीस साल तक जूझने के बाद सुकृति आज पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है क्योंकि उसकी मेहनत सफल हुई थी और राजीव काफी हद तक ठीक हो चले थे यद्यपि पूर्ण रूप से ठीक होंगे इसकी आशंका बनी रहती है।

आज़ सुकृति के बच्चे सुन्दर युवा बन चुके हैं और अच्छे पदों पर आसीन हैं। जो रिश्तेदार और राजीव के दोस्त दूर हो चुके थे वे अब फिर से आने लगें हैं लेकिन अब राजीव एक औपचारिकता भर निभाते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि कष्ट में सुकृति की बहनों और मायके वालों ने ही हौंसला अफजाई की थी। लेकिन फिर भी सुकृति ने किसी से भी एक पैसे की मदद नही ली क्योंकि उसका भगवान हर क्षण उसके साथ खडा़ था। और ये भगवान और कोई नही उसकी हिम्मत थी, उसकी जिद थी ।कहा भी जाता है कि भगवान उसकी मदद करते हैं जो अपनी मदद खुद करतें हैं। युद्ध हम केवल सरहदों पर ही नहीं करते , गृहस्थ जीवन भी मनुष्य के जीवट को अपनी कसोटी पर आंकता रहता है।

✍️©®”जोया” 20/09/2018

प्रेम के हस्ताक्षर

काया उम्र दराज़ हो चली
झुर्रियां भी अब लगें भली।

जिन्दगी ने लिए खूब इम्तिहान
कुछ सपने नहीं चढ़े परवान।

उगता सूरज़ भी डूबा
शेष नहीं अब कोई मनसूबा।

जीवन एक रंगमंच
रचे जाते अनेकों परपंच।

रिश्ते नातों का खज़ाना
छूटा जाए, यही अब फस़ाना।

मिट्टी के हम सब दीए
जलते रहे जब तक जीए।

एकांत के मौन में
टिमटिमाते जुगनू से क्षणों में।

इश्क था सबसे बेखबर
माशूक दिलों की स्वप्निली डगर।

जीवन की सांझ में
भी गया मुस्करा
प्रीत की डोली उठा
रच गया प्रेम हस्ताक्षर।

© ✍️” जोया” 17/10/2018