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निर्णय

सविता अपने पिता की सबसे लाडली बेटी थी। वह स्वभाव से भी बहुत ही विनम्र होने की वजह से अपनी सहेलियों मे भी बहुत लोकप्रिय थी। कालेज मे हमेशा अव्वल रहते हुए स्नातकोत्तर डिग्री हासिल करने के पश्चात वह एक बोर्डिंग स्कूल में शिक्षिका के पद पर चयनित हो गई। गजब की सुंदरता की धनी थी वह। एक से एक बढिय़ा रिश्ते आये उसके लिए लेकिन उसके पिताजी को पंसद नही आते थे। ये 1986 के दशक की कहानी है। विदेश मे स्थापित अच्छे लड़को के रिश्ते भी आये लेकिन सविता के पिताजी उसे अपने से दूर नहीं भेज़ना चाहते थे।

सविता की शादी फिर एक आर्मी अफसर से तय कर दी गई। सभी आश्चर्यचकित थे कि सविता जैसी सुंदर पत्नी मिली है कैप्टन राजेश को। सविता के लिए ये शादी लेकिन अभिशाप बनकर आयी थी क्योंकि सुहागरात वाले दिन से ही राजेश अलग कमरे मे सोता था। राजेश ने सविता को उस सुख से वंचित रखा जिसके लिए लड़की कितने ही हसीन ख्वाब देखती है। सविता ने शर्म की वज़ह से इस के बारे मे किसी से कुछ नही कहा।लेकिन वह एक घुटन में जिंदगी जी रही थी। वह एक ब्याही हुई भी कुवांरी रहने को अभिशप्त थी।

मायके मे किसी से कुछ नही बता पायी क्योंकि अभी उसकी छोटी बहन की शादी होनी थी और उसने सोचा कि यदि वह तलाक लेती है तो बहन की शादी नही हो पायेगी। पिता तो निश्चितं थे कि आर्मी वाले मेडिकल फिट होते हैं।…इस उहापोह की जिन्दगी में उसके तीन साल बीत गए। कभी कभी तो आत्महत्या तक के विचार आते थे। पति साथ होते हुए भी कभी संसर्ग नहीं हो पाता था क्योंकि पति काम से थक कर लौटते और एकदम बिस्तर पर आते ही खराटे लेते हुए नींद के आगोश मे चले जाते।

स्कूल की छुट्टियों में राजेश के साथ सविता आर्मी कल्ब की पार्टियों में भी जाती थी जंहा दूसरे अफसर उसे हसरत भरी निगाहों से देखते थे। सविता इन पार्टियों की जान होती थी और जिस तरह से वह महफिल को सज़ाती थी सब उसके दिवाने होते चले गए। आर्मी आफिसर उसके साथ डांस पर थिरकते थे तो राजेश मन ही मन कुठ़ा से ग्रसित रहते थे क्योंकि अपनी कमजोरी से वाकिफ थे। सविता ने इन तीन सालों में बहुत बार कहा कि सैक्सोलोजिष्ट से मिल लेते हैं। लेकिन राजेश साफ मना कर देते थे क्योंकि यह उसके अहम व पुरूषत्व पर चोट थी।परेशान होकर सविता ने पूछा कि फिर आपने मुझसे शादी ही क्यों की? कैप्टन राजेश का एक ही उत्तर था कि मां बाप की खुशी के लिए।

सविता छुट्टी खत्म होने पर अपने बोर्डिंग स्कूल में अपने निवास पर आ जाती थी। इस बीच छोटी बहन की भी शादी हो गई थी। सविता का धैर्य जवाब देता जा रहा था। उसकी बडी़ बहन दूसरे प्रदेश में नौकरी पर थी। इस शादी मे उनकी मुलाकात हुई तब सविता के सब्र का बांध टूट गया और उसने सारी बातें अपनी बड़ी बहन कविता से सांझा की।कविता हमेशा से ही समाज़ से टक्कर लेती आयी थी। उसने सब बातें अपने पिता से शेयर की । पिता अपनी बेटी के दुःख से बहुत परेशान हुए। वे कविता पर बहुत विश्वास करते थे और मानते थे कि वह कभी झूठ नही बोलेगी। संयुक्त परिवार मे कुछ सदस्यों का ये भी मानना था कि हो सकता है दोनों बहनें कोई और योजना बना रही हों। परिवार के दूसरे बुजुर्गों से सलाह मशवरा किया गया। बड़े ताऊ व पिताजी ने तो तुरंत निर्णय किया कि बेटी को और परेशान नहीं देख सकते।
पंचायत लेकर वे राजेश के घर वालों से मिले। उन दिनों राजेश भी छुट्टी आया हुआ था। उसके माता पिता ये मानने को तैयार ही नहीं थे कि उनके बेटे में कमी है। राजेश भी मां बाप के सामने चुप रहा और राजेश की बहने सविता की ही कमीयां गिनवाने लग गई। कितना आसान होता है बहू को दोषी ठहराना, जबकि राजेश के परिवार वाले जानते थे कि सुहागरात वाले दिन भी राजेश दोस्तों के साथ समय बीता कर भोर के समय लौटा था। और उसकी दुल्हन इंतजार करके आंसू पीकर सो गई थी। लेकिन समाज़ पुरूष प्रधान है और बहुत सी महिलाएं भी जाने अनजाने पित्तरात्मक सता की वाहक बन जाती हैं क्योंकि उन्हें बचपन से ही इस तरह के संस्कारों की घुट्टी पिलाई जाती है।

लेकिन सविता के घर वालों ने तलाक की अर्जी लगा दी थी। कोर्ट में जिस तरह से राजेश के वकील बहस कर रहे थे तो ऐसा लग रहा था जैसे भरी सभा में सविता का चीरहरण हो रहा हो। लेकिन सविता घबराई नहीं और अपने निर्णय पर अडिग रही। राजेश और सविता को छह महीने का समय दिया गया तालमेल बिठाने के लिए। लेकिन यहां तो कभी ताल ही नही मिली थी तो मेल कैसे होता।

छ महीने पश्चात आखिर दोनों को मयूचवल तलाक की इजाज़त मिल गई। सविता ने राहत की सांस ली । उसे ये महसूस हो रहा था जैसे कैद से रिहा हुई हो। अब उसका लक्ष्य था अपने कर्मक्षेत्र में नाम कमाने का। वह बहुत लगन से बोर्डिंग स्कूल मे पढ रहे छात्रों के साथ मेहनत करती रही। पिताजी ने दूसरी शादी के लिए उससे राय ली क्योंकि वह अपनी सबसे लाड़ली बेटी के दुख से टूट चुके थे। उन्होंने ने उस ज़माने में तलाक दिलवाया जब समाज़ तलाकशुदा लड़की को स्वीकार नहीं करता था।

लेकिन अहम बात ये थी सविता शिक्षित होने की वज़ह से आत्मनिर्भर थी और उसने अपने जीवन को शिक्षा के प्रति समर्पित कर दिया। माता पिता की सेवा करके उनके आशीर्वाद की हकदार बनी रही और जीवन के नये आयाम गढे़। आज़ सविता के द्ववारा पढाये हुए बच्चे देश विदेश में नाम कमा रहे हैं। वे हमेशा सविता के संम्पर्क में रहते हैं और आभार प्रकट करते हैं कि उनके जीवन का सही मार्गदर्शन किया। इस तरह सविता का परिवार बहुत बडा़ है जहाँ प्रेम की जलधारा निरन्तर बहती रहती है। एक शिक्षक के लिए इससे बड़ी क्या उपलब्धि हो सकती हे।

✍️©® “जोया” 20/09/2018)

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नियति

एक दूसरे से मिलने की कसमें खाकर रोहित और निशा कालेज खत्म करके अपने अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अलग हो जाते हैं। रोहित को विदेश की आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रवेश मिल गया था और निशा भारत मे ही प्रबंधन की छात्रा बन गई। दोनों का प्यार कालेज मे सभी के लिए मिसाल बन गया था और सभी आश्चर्यचकित रहते थे कि कैसे रोहित निशा पर जान छिड़कता है। निशा खुश थी और गर्वित भी रहती थी कि कोर्स खत्म होने पर दोनों जीवनसाथी बनकर इश्क के सागर में डुबकियां लगाएंगे। समय पंख लगाकर उड़ रहा था।…आज निशा बहुत खुश थी कि रोहित देश लौट रहा है और उसने कितनी ही योजनाएं बनायी थी कि कैसे एक साथ अपने आगामी जीवन की रुपरेखा तैयार करेगें।…
निशा को सुंदर सी साड़ी पहने मां ने देखा तो इस श्रृंगार का कारण पूछा तो निशा ने कहा अभी वह एयरपोर्ट अपने मित्र को लेने जा रही है और वापिस आकर सब बता देगी। मां तो बेटी के इस सुंदर रुप से ही बहुत खुश थी । चूंकि निशा का कोर्स भी खत्म हो गया था तो मां भी उसके लिए रिश्ते ढूंढ रही थी। निशा के पिता तो बहुत पहले ही एक दुर्घटना में चल बसे थे। मां और मामा पर ही अब निशा की शादी की जिम्मेदारी थी। मां ने कितने ही गहने और कीमती चीजें उसकी शादी में देने के लिए तैयार कर रखी थी।…

प्लेन का समय हो गया था और निशा सुंदर फूलों का गुच्छा लेकर रोहित को रिसीव करने लाउंज मे बेसबरी से इंतजार कर रही थी। उसकी दिल की धड़कनें मिलन की उत्सकुता में बढ़ती जा रही थी। एक एक करके यात्री लाउंज की ओर बढ़ रहे थे। निशा की निगाहें रोहित को तलाश रही थीं। थोड़ी देर बाद रोहित हाथ हिलाता हुआ लाउंज की तरफ़ आ रहा था। रोहित को रिसिव करने के लिए उसके परिवार के सदस्य भी आए थे। रोहित के बग़ल में एक सुंदर युवती भी एक छोटे बच्चे को गोद मे लेकर चल रही थी। निशा ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि रोहित से उसकी हर सप्ताह बात होती थी और वही प्यार की कसमें दोहरायी जाती थी। निशा देख रही थी कि रोहित उसकी तरफ़ हाथ हिलाते हुए अपने परिवार की ओर बढ़ जाता है और उस लड़की को इशारा करता है माता पिता के पांव छूने के लिए। वे भी उसे गले से लगा लेते हैं और अपने पोते को गोद मे लेकर एयरपोर्ट से बाहर खड़ी अपनी गाड़ी में बैठ जाते हैं। रोहित जल्दी से निशा के पास आता है और बताता है कि कैसे माता पिताजी की मर्जी के सामने वह झुक गया था। और उन्हें खुश करने
हेतू उसने ये शादी की है.. और कि अब वे अब अच्छे दोस्त बनकर रहेंगे।..
अब बारी निशा की थी। उसने आव देखा न ताव और एक झन्नाटेदार थपड़ रोहित के गालों पर जड़ कर सीधा अपनी गाड़ी में बैठकर वापिस लौट आती है। उसकी दुनिया लुट चुकी थी… मां ने देखा कि निशा बहुत उदास रहने लगी है। बेटी के दर्द को वह अच्छे से समझ सकती थी। मां से ज्यादा कौन अपने बच्चे को जान सकता है। एक नारी भी यदि नारी की व्यथा न समझ पाए तो नारी जीवन धिक्कार है। मां ने निशा को इस दुख से उबरने मे पूरा सहयोग दिया और उसे आगे बढ़कर जीवन को नये आयाम देने के लि प्रेरित किया। निशा ने अब ठान लिया था कि प्रबंधन के क्षेत्र में आगे बढ़कर जीवन की नयी इबारत लिखनी है।…समय अब तेज़ गति से दौड़ रहा था। निशा अपनी कम्पनी की M.D. बन चुकी थी और कार्पोरेट की दुनिया में एक विशिष्ट पहचान बना चुकी थी।… दस साल बाद एक बार फिर रोहित से आमना सामना होता है। लेकिन इस बार निशा उस सभा में मुख्य अतिथि के रूप में सम्मिलित हुई थी और रोहित को उसके उल्लेखनीय कार्य के लिए सम्मानित करने के लिए आमंत्रित किया गया था। दोनों एक क्षण के लिए ठिठक जातें हैं। जलपान के दौरान निशा को मालूम हुआ कि रोहित की पत्नी उसे छोड़कर वापिस विदेश जा चुकी है।…

निशा ने आजीवन अविवाहित रहने का निर्णय ले लिया था। कुछ दिन बाद दरवाज़े पर घंटी बजती है और सामने रोहित को पाती है। कुछ क्षण के लिए वह अनिश्चितता की झिझक में खड़ी रहती है। रोहित के कहने पर कि अन्दर आने को नही कहोगी, तब उसकी तंद्रा टूटती है। टेबल पर चाय परोस दी गई थी… दोनों चुप्पी साधे हुए चाय की घूंट भर रहे थे। फिर रोहित ने ही बात शुरू करते हुए प्रस्ताव रखा कि वह उसे जीवन साथी बनाना चाहता है। लेकिन निशा के लिए जीवन के मायने बदल चुके थे। उसने एक संस्था खोल रखी थी जहां वह जिन्दगी में हताश लड़कियों की हर प्रकार से मदद करती थी और उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए उनकी योग्यता अनुसार कार्य क्षेत्रों में स्थापित करने का काम करती थी। वह इन सब की मार्गदर्शक बन चुकी थी और “दीदी” के रूप में सभी उसे प्यार करती थी।…

निशा ने बड़ी विनम्रता के साथ रोहित का प्रस्ताव ठुकरा दिया। पुराने समय की यादें अभी ताज़ा थी और वह अपने जख्मों के उपर आयी परत को हटाना नहीं चाहती थी। इन scars ने उसे एक बल प्रदान किया था । सचे मन से प्यार करने वाले दुबारा कोई मौका नहीं देते। निशा और रोहित की राहें बहुत पहले अलग हो चुकी थी। नियति ने उन्हें दुबारा भी मिलाया लेकिन निशा का फलसफा स्पष्ट था। उसे प्यार में एकबार धोखा हो चुका था। दूसरा अवसर उसके शब्दकोश मे नहीं था। निशा ने बड़ी दृढतापूर्वक रोहित को बता दिया कि अब कभी उसे उसकी मौत की खबर भी पता लगे तो झूठे आंसू बहाने के लिए भी दो शब्द बोलने का हक नही है…।

✍️©®” जोया” 15/12/2018