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कलाकार की मौत

सुमी पांच बहनों में सबसे छोटी। रंगरुप सब बढिया केवल कद ठिगना रह गया था। लेकिन विधाता ने इस कमी को पूरा किया था कला की कूची देकर। पिता की छोटी से नौकरी। फिर भी सभी बेटियों को पढा़या और विवाह भी करते चले गए। लड़कियां होशियार तो थी हीं 1985 के दशक में भ्रष्टाचार इतना नहीं था।इसलिए एक के बाद एक बेटी नौकरी भी लगती चली गयी। माता व पिताजी की खुशी की सीमा न थी।

सुमी ने भी परास्नातक की डिग्री हासिल की और एक स्कूल में शिक्षिका लग गई।उसके कद की वजह से अभी शादी निश्चित नहीं हुई थी। बहुत सारी पेंटिंग्स बनाई थी सुमी ने शादी से पहले। कोई भी फोटो दिखा दो, उसको हुबहु बना देती थी। पैंसिल स्कैच हो या आयल पैंटिग, हर विधा दी थी भगवान ने। किसी से नहीं सीखा था।स्वयं ही बना लेती थी। भगवान का दिया उपहार था उसके हाथों में।

पांच बेटियों की शिक्षा और शादियों के बाद पिता अब जीवन से थक चुके थे। स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता था। सुमी की शादी एक सुंदर शिक्षक से तय कर दी जिसके पास जमीन भी काफी थी लेकिन साथ मे तीन बहन भाईयों की शादियों की जिम्मेदारी भी। सुमी ने सभी जिम्मेदारी अच्छे से निभाई। लेकिन उसकी कला की परख किसी को न थी। न ही पति ने कोई प्रतोसाहन दिया।

दो बेटों के जन्म के बाद सुमी उन्हीं के लालनपालन में व्यस्त हो गई। बहनों ने उपहार में जो पेंटिंग बोर्ड व रंग दीये थे वे गृहस्थी की चक्की में धूल फांक रहे थे। पति मनमौजी प्रवृत्ति का इंसान था और नाम के अनुरूप कृष्ण की भूमिका में ही रहता था। खासकर जब बहन भाईयों की जिम्मेदारी से मुक्त हो गया। सुमी और गोविंद की अक्सर लडा़ई रहने लगी थी क्योंकि वह गाँव में भाभीयों की समीपता अधिक रखता था व सुमी पर घरेलू हिंसा करता रहता था। एकबार तो चारपाई के नीचे उसके कलाकार हाथों को रखकर उपर बैठ गया था। सुमी के दुख का कोई पारावार नहीं था। लेकिन उसकी आत्मा उसे जरूर धिक्कारती थी। जो हाथ सुंदर तस्वीरों का संकलन कर सकते थे उनकी इस बेकद्री से सुमी के अंतर्मन पर गहरी चोट आयी थी।

सुमी के दुख के बादल छटने का नाम नहींं ले रहे थे। चालीस साल की उम्र में उसके पति को हृदयाघात हुआ और वह सुमी और दो बच्चों को छोड़कर चले गए। अब सुसराल वाले पति की मृत्यु के लिए सुमी को जिम्मेदार ठहराने लगे। उसका पति द्वारा बनाए घर में रहना दुभर हो गया और वह गांव छोड़कर बहनों के सहारे शहर आ गई। सुमी की बड़ी बहन काफी पैसे वाली थी तो वह भी पति से छुपा कर सुमी की मदद करती रही। सुमी ने टयूशन सेंटर खोलकर अपने बच्चों की पढा़ई का खर्च उठाना शुरू किया। हाथों में जो कला थी वह तो गृहस्थी की गाडी खिंचने में दब कर रह गई। पति की पारिवारिक पैंसन जो की मासिक पंद्रह हजार रूपये थी क्या होता उससे। दिल्ली जैसी महंगाई। पति कुछ छोड़कर गए नहीं।

आठ साल बाद पति की जगह नौकरी मिली तो गृहस्थी की गाड़ी अच्छी चल पड़ी। अच्छे प्रोफेशनल कालेज़ म़े दाखिला भी दोनो लड़को को मिला। लेकिन बाप का साया न होने से बेटे बड़े होकर सुमी को परेशान करने लगे। पढा़ई बीच में छोड़कर बैठ गए कि बहुत जमीन है।

सुमी फिर बहुत परेशान रहने लगी। फिर अंत मे सब्र कर के बैठ गई। बहनों ने भी कहा अपने स्वास्थ्य का ध्यान रख। ये भी खो दिया तो कौन संम्भालेगा।

मैं उसकी बहन भावना सोचती रहती हूँ कैसे गृहस्थी की चक्की में आम परिवारों में जो प्रतिभा है वह दम घोट जाती है। सुमी को यदि परिवार व पति का साथ मिला होता तो उसकी प्रतिभा इतनी थी कि बहुत बड़ी बड़ी कला गैलरी का आयोजन कर सकती थी। लेकिन परिवार यदि लीक से हटकर अपने परिवार में कला कौशल से लबरेज व्यक्ति का साथ दे तो किसी कलाकार की कला दम न तोड़े।

✍️©® ” जोया” १५/११/२०१८

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