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रात्री का दूसरा पहर

प्रिय कर्नल

उम्मीद करती हूं  कोरोनावायरस जैसी महामारी के संकटकाल में तुम सपरिवार सुरक्षित होगे। प्रतिदिन मेरी प्रार्थना में तुम विशेष रूप से शामिल रहते हो। दिन के चौबीस घंटो में रात्री का दूसरा पहर हमेशा तुम्हारी यादों की पोटली ले आता है जिसमें कुछ सुखद अहसास और कुछ कड़वे अनुभव के वो घूंट भी हैं, जो हम दोनों को केवल इसलिए पीने पड़े क्योंकि हमारे समाज का ढांचा और उसकी सोच इतनी संकीर्ण है कि, इसकी संकरी गलियों से गुजरते हुए, स्थापित मापदंडों के, पत्थरों से टकरा कर चोट निश्चित ही लगती है, फिर चाहे,आपके विचार ….आपका अंतःकरण कितना ही निर्मल हो… आचरण कितना ही अनुकरणीय हो। ऐसा क्यों होता है? जिंदगी के सबसे हसीन व उर्जावान बीस वर्षों की उठा-पटक के बाद, मैं, एक ही निष्कर्ष पर पहुंची हूं कि, मनुष्य जब किसी व्यक्ति के गुणों की बराबरी नहीं कर सकता है तो वह ऐसे मौके की तलाश में रहता है कि एक, केवल एक, अवसर मिल जाए तो कैसे रुह को लहुलुहान किया जाए… फिर वह गिद्ध की तरह झपटा मारता है और शिकार को अपने पंजों में दबोच उसे तसल्ली से नोचता है।

याद है?… यही तो हुआ था हमारे साथ। अभिमन्यु की तरह, हम दोनों, एक ऐसे चक्रव्यूह में घिरे थे, जहां से निकलना दोनों के लिए अत्यंत मुश्किल था… तुम समझदार थे, रणनीति बनाने में सक्षम थे, आर्मी का तजुर्बा तुम्हारे काम आया…. चक्रव्यूह भेद, तुम कुशलता से बाहर आ गए…. तुम्हारी आंखों में पीड़ा… तुम्हारी वाणी से निकले वो रक्तरंजित शब्द…( जोरू का गुलाम हूं), आज भी बीस वर्षों के बाद मैं स्पष्ट सुन सकती हूं। मुझे ये भी मालूम है कि, ये शब्द तुमने मेरी हिफाजत के लिए ही  बोले थे….। लेकिन मैं चक्रव्यूह में चारों ओर से होने वाले कटाक्षपूर्ण बाणों की बौछार का सामना करती रही….तुम्हारी पत्नी ने वह चिठ्ठी मेरे पति को शायद दे दी थी…मेरी सहेली ने भी आग में घी डाला था, तभी तो उनकी प्रताड़ना सही….. गूंगी हो गई थी… सदमे में थी, कि चिठ्ठी में लिखी एक पंक्ति ने मेरे जीवन में  ऐसा भयानक तूफान कैसे ला दिया? तुम्हें मालूम होगा कि, उसके बंवडर से निकलने में  मुझे दशकों लगे….वह केवल एक पंक्ति नहीं थी, बल्कि मेरी भाग्यशाली रेखा की गहरी काट थी। मेरी सहेली जब भी मेरा हाथ देखती थी तो कहती थी, ” देखो कितनी लम्बी भाग्य-रेखा है!” मैंने उसके बाद से फिर किसी को हाथ नहीं दिखाया, मुझे डर था …. लेकिन नज़र तो लग चुकी थी। तुम्हें  तो पता ही है, उसी सहेली ने मेरे दिल के ताले को खोल,हम दोनों के पवित्र प्रेम की दास्तां सुनी …वे सब राज़ जाने, जो मैंनें वर्षों तक अपने सीने में दफ़न कर रखे थे…. उसका, बार बार , तुम्हारा जिक्र करने , ठिठोली करने पर तुम से मिलने की इच्छा प्रबल होती चली गई क्योंकि मुझे लगता था कि, इतने सालों की मजबूत गृहस्थी में पनपे विश्वास में अविश्वास की कोई जगह नहीं हो सकती…. फिर मेरी खोज़ शुरू हुई…. तुम्हारा पता मिला….मेरी तुम्हारी मुलाकात शादी के सोलह साल बाद हुई और दिल के कोने में सिसकता प्रेम मुखर होने को आतुर था, लेकिन हम दोनों ने ही तो खुद पर नियंत्रण रखा था… पारिवारिक दोस्ती की तरफ बढ़े कदम, एक पंक्ति की वजह से लड़खड़ाए….. इतना ही तो लिखा था, “तुम मेरा पहला प्यार हो”….. बहुत बार सोचती हूं, पति-पत्नी में भेद किसी तीसरे की वजह से कम और खुद की असुरक्षा की भावना…..खोने का डर…..साथी पर अविश्वास….की वजह से होता है। मेरी उसी सहेली ने मेरे को साथियों में हमें बदनाम किया… पता है उसकी इस हरकत की वजह से,अब मेरा, दोस्ती से विश्वास उठ चुका है… दोस्ती इतनी उथली व छिछली कैसे हो सकती है?…मेरे लिए दोस्ती के मायने बदल गए हैं। इस दुनिया में आप खुद ही अपने दोस्त हैं, बाकी जगत के सभी रिश्ते नाते केवल स्वार्थ पर टिके हैं। आजतक मैंने उसे क्षमा नहीं किया है।

सच ही कहा जाता है, ये कलयुग ही है और मनुष्य की, इसी आपाधापी और एक-दूसरे को नीचा दिखाने का परिणाम है कि, सारा विश्व एक श्राप से गुजर रहा है। जब जब धर्म की हानी होती है ऐसी विपदाओं का मनुष्य जाति को सामना करना पड़ता है। जीवन के मूल्यों में सतत गिरावट हमें गहरे संकट में डालती है…… दुनिया भर में प्रकृति के साथ छेड़खानी का गंभीर परिणाम भुगतना पड़ता है….. शायद ये संकटकाल जब बीतेगा तो मानव जाति कुछ समझदार होकर खोए प्रकृति संतुलन और ग्रहण लगे मूल्यों को, संवारने सजाने का कार्य करेगी, ऐसी मेरी आशा ही नहीं विश्वास है।

खैर, मैं भी क्या जिक्र लेकर बैठ गई। महिमा से पता चला था, तुम्हारी बेटी की शादी हो गई है। मेरी तरफ से बहुत बहुत शुभकामनाएं। तुम्हें भी तो जरुर पता चला होगा, मेरे बेटे की शादी पिछले साल नवंबर में हुई थी। बेटी, कॉरपोरेट जगत को सात साल सेवा दे चुकी है। एडलवाइज में चीफ़ मैनेजर का पद त्याग कर अपनी स्टार्टप को बिल्ड कर रही है। अभी उसका शादी का कोई इरादा नहीं है। मैंने भी कह दिया है , ” तुम जो भी करना चाहती हो करो…. शादी के अलावा भी बहुत कुछ है दुनिया में करने के लिए… मनपसंद साथी मिल जाए तब कर लेना…. नहीं तो जिंदगी तुम्हारी है… कुछ सृजनात्मक करो।”

ठीक है कर्नल, अपना ख्याल रखना। बहुत दिनों से सोच रही थी, तुमसे बात की जाए….संकट की घड़ी में अपने सभी की
खैरियत पूछने का दिल होता ही है। शुभकामनाएं।

तुम्हारी प्रेयसी

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”७/०४/२०२०

मंजिल

IMG-20191005-WA0011.jpgआज जब कोर्ट से आई तो बहुत थकी हुई थी। जीवन के लम्बें करियर में खूब नाम और मुकाम हासिल किया था। धन दौलत की भी कोई कभी नहीं रही। एक जाना पहचाना नाम था उसका, वकालत के क्षेत्र में। लेकिन पिछले कुछ दिनों के अपने देश के घटनाक्रम ने उसके दिल को झकझोर कर रख दिया था। निर्भया के बलात्कारियों को जिस तरह से कानून के दांव पेच का उपयोग कर उनकी फांसी की सज़ा को लटकाया जा रहा था उससे अनुभा का मन बहुत आहत था। वह स्वयं से ग्लानि महसूस कर रही थी कि एक अच्छी वकील होने का उसका क्या फायदा, यदि वह समाज में लड़कियों के साथ हो रहे जघन्य अपराध पर लगाम नहीं लगवा सकती…

सिर दर्द से फटा जा रहा था। उसने मेड को चाय बनाने के लिए बोला और बालकनी में जाकर बैठ गई। थोड़ी ही देर में मेड चाय के साथ कुछ नाश्ता लेकर आई। अनुभा अपने फ्लैट में अकेली ही रहती थी। उसे करियर में सफल होने की इतनी लगन थी कि शादी की तरफ कभी उसका ध्यान गया ही नहीं। करियर में सफलता की सीढ़ियां चढ़ना ही उसका मुख्य लक्ष्य रहा था। विदेश में पढ़ाई की और वहीं सेटिल हो गई। लेकिन अपने देश की खबरें जरुर फोलो करती थी, खासकर मामला जब महिला अपराधों से जुड़ा हो।

दूर कनाडा में बसी अनुभा का मन आज बहुत विचलित था। काफी देर रात तक खुद से ही तर्क वितर्क करती रही और अंत में एक ठोस निर्णय पर पहुंच गई। उसने ठान लिया था कि, भारत जाकर उन सभी मुकदमों की पैरवी निःशुल्क करनी है, जो भी बलात्कार से जुड़े हैं और आमजन की बेटियों को न्याय दिलवाना है जो इस तरह के मुकदमों की फीस देने में असमर्थ हैं या कानूनी प्रक्रिया का ज्ञान नहीं है। उसने ये भी ठान लिया था कि पी. आई. एल. लगाकर , कानून का जिस तरह से दुरुपयोग ‘निर्भया’ जैसे मामलों में होता है, उसका हल भी ढूंढ़ना है।

अनुभा ने एक महीने के अंदर ही कनाडा छोड़ दिया और  स्वदेश लौट आई। छः महीने के भीतर ही उन सभी परिवारों का डाटा इकट्ठा किया, जो बेटीयों के साथ हुए ऐसे कुकृत्य की मानसिक पीड़ा झेल रहे थे लेकिन केस लड़ने में आर्थिक रूप से असक्ष्म थे। दो साल के भीतर ही अनुभा एक जाना पहचाना नाम था। न्याय मिलने पर परिवार अपनी मर्जी से फीस का कुछ हिस्सा देने की जिद्द करते थे। उन सब की जिद्द के आगे झुकते हुए, अनुभा उस पैसे को स्वीकार तो कर लेती लेकिन उसका सदुपयोग करते हुए एक कोचिंग सेंटर की शुरुआत की जहां गरीब परिवारों की लड़कियों को वकालत के प्रोफ़ेशन के लिए तैयारी करवाई जाती थी।

आज दस साल बाद, जब ये लड़कियां पूरे आत्मविश्वास के साथ वकालत के पेशे को अपना कर महिला अपराधों पर रोक लगाने में कामयाब हो रहीं थीं, तो अनुभा को गर्व महसूस होता है और आत्मिक शांति भी। अनुभा को अपनी मंजिल मिल चुकी थी। जीवन का उद्देश्य पूर्ण हुआ। समाज के लिए बूंद मात्र भी योगदान करने का सकून उसके चेहरे पर मुस्कान बिखेर रहा था।

✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०५/०२/२०२०

रुहानी चिरमिलन

आंखों की कोर से मोती सा आंसू लुढ़का और कंपकपाते हाथों से जूड़े से सफेद गुलाब निकाल कर शुभ्रा ने शंशाक की बूढ़ी अंगुली में दबा दिया…
शशांक को हार्ट सर्जरी के बाद मेदांता अस्पताल के प्राईवेट वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया था। वहां पर उसका आवसीय विद्यालय का साथी रोहित, सर्जन के रुप में विख्यात था और उसकी ही टीम ने शशांक की सर्जरी की थी, लेकिन अभी थोड़ा खतरा था इसलिए डा. रोहित हर वक्त शशांक की प्रोग्रस मोनीटर कर रहा था। शशांक की दोनों बेटियां अपनी मां को संबल देने के लिए विदेश से लौट चुकी थी। डा. रोहित ने शशांक की पत्नी व बेटियों को आराम करने के लिए उसी शहर में उनके घर भेज दिया था। शशांक के अन्य दो लंगोटिया यारों ने भी मेंदाता में ही जिगरी दोस्त की देखभाल का जिम्मा संभाल रखा था। पांच दिन के बाद शशांक की हालत में थोड़ा सुधार हुआ। परिचित सभी मिलकर जा रहे थे और हर संभव मदद का वायदा शशांक के परिवार वालों से कर रहे थे।
एक दिन रात्रि के दस बजे थे जब शंशाक ने डा. रोहित को पास बुलाया और एक कागज कलम के लिए ईशारा किया। रोहित ने तुरंत जेब से पेन निकाल कर एक कागज शशांक को दे दिया। सर्जरी की वजह से हालत बहुत अच्छी नहीं थी। काफी कमज़ोरी आ चुकी थी लेकिन पेन को संभालते हुए शशांक ने एक नाम उस पर लिख दिया। डा. रोहित ने जैसे ही पढ़ा ,” call Shubhra” तो वह गंभीर हो गया क्योंकि जिसका नाम लिखा था वह शंशाक की पहली “प्रीत” थी जिससे उसका संपर्क सालों पहले एक गलतफहमी की वजह से टूट चुका था… शंशाक की पत्नी शंकालु स्वभाव की थी और शुभ्रा और शशांक ने सालों पहले दूरी बना ली थी यद्यपि दोनों टेक्नोलॉजी में आए बदलाव के बाद कक्षा के समूह “याराना” में मेम्बर थे। शंशाक की सर्जरी की खबर समूह में ही शुभ्रा को भी पता चली थी लेकिन वह अपने वायदे से बंधी थी यद्यपि मन ही मन उसने अपने इष्ट देव से उसके लिए मंगलकामना की थी। डा रोहित जानते थे कि इस वक्त मरीज की मांग को पूरा करना उसके स्वास्थ्य के लिए बहुत अहम है। डा रोहित के पास शुभ्रा का व्यक्तिगत मोबाइल नंबर था तो उसने तुरंत शुभ्रा को वटसप किया।
“शुभ्रा, it’s Rohit here. Please reach hospital tomorrow morning at 11am. It’s urgent…”
” Is everything alright? How is Shshank? I hope nothing serious…”
” Everything in control, but please do come”
” Ok, I will be there in time”
शुभ्रा दूसरे शहर में रहती थी इसलिए रोहित ने सुबह आने के लिए कहा था। शुभ्रा सेवानिवृत्त हो चुकी थी और घर पर अकेली रहती थी। उसके पति दो साल पहले ही उसे छोड़कर दुनिया से अलविदा कह चुके थे।
रातभर, शुभ्रा के दिलोदिमाग पर शंशाक के साथ बिताया समय आंखों के सामने तैर गया… वह पल जब पहली बार इश्क़ ने दस्तक दी थी…वो रुमानी ख्याल जो दोनों का सांझा सपना था… वो पहला चुम्बन जो उसके हृदय को झंकृत कर गया था… समाज की वह संकीर्ण मानसिकता जिसकी वजह से हुई थी जुदाई… वर्षों बाद संपर्क हुआ तो दोस्ती का बढ़ाया हुआ हाथ शंकालु पत्नी की भेंट चढ़ा… वह मानसिक आघात जिसने उसे तोड़कर रख दिया था… पति के साथ हुए झगड़े… निश्छल प्रेम जो वह उसकी पत्नी और बच्चों पर न्यौछावर कर गई थी … उसकी शंशाक से कभी ना मिलने की कसम…क्योंकि उसने इस समाज में रहते ये जाना था कि आधुनिक वस्त्र और खानपान, रहनसहन के आवरण के पीछे जो इंसान जीवित हैं, उनकी सोच अभी भी बहुत संकीर्ण है… एक मासूम रुहानी प्रेम के लिए जहां स्थान नहीं है…शुभ्रा उहापोह में थी कि मेंदाता जाए या ना जाए…वह अंततः ये निर्णय लेकर सो गई कि शंशाक से मिलने जाना ही होगा… क्योंकि शंशाक ही वह शख्स था जिसने “इश्क़” की खुशबू से उसका परिचय करवाया था…नहीं तो इतने खूबसूरत अहसास से वह महरूम ही रहती…।

शुभ्रा ने शौफर को सुबह फोन लगाया और जल्दी पहुंचने के लिए आदेश दिया। ठीक 11 बजे वह रोहित से मिली जो कि बेसब्री से उसका इंतजार कर रहा था। रोहित , शुभ्रा को लेकर शंशाक के कक्ष में गया जो कि अभी छत की तरफ ताक रहा था। रोहित के साथ शुभ्रा को देखकर उसकी आंखों की कोर से मोती समान आंसू लुढ़का, जिसे शुभ्रा ने अपनी अंजुली में लेकर कहा, ” शंशाक, तुम बहुत हैंडसम हो…you are an amazing person” ये वही शब्द थे जो शुभ्रा ने हमेशा उसे कहे थे जब वक्त ने उन्हें जुदा किया। शुभ्रा की आवाज़ सुनते ही शंशाक के होंठों पर मुस्कान तैर गई और आंखों में चमक। शुभ्रा एक घंटे तक शशांक के पास उसका हाथ अपने हाथ में लिए बैठी रही… दोनों की मोहब्बत को कभी शब्दों की बैसाखी की जरुरत नहीं पड़ी थी… एक घंटे की मुलाकात में दोनों ने पूरी जिंदगी जी ली थी। रोहित को धन्यवाद देकर शुभ्रा घर वापिस लौट आयी…।
शाम के समय फिर फोन की घंटी घनघना उठी। उस वक्त वह चाय का प्याला पकड़े टेलीविजन पर भारत पाकिस्तान का मैच देख रही थी और उसकी वफादार “मैड” रात के खाने की तैयारी कर रही थी। रोहित का नम्बर सक्रीन पर शोर कर रहा था। चाय का कप एक तरफ रखते हुए, शुभ्रा ने कांपते हाथों से मोबाइल उठाया। रोहित ने सूचना दी थी कि ” शंशाक is no more”😢😢। शुभ्रा को अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। रोहित ने बताया कि “तुम जब मिलकर गई थी उसके एक घंटे बाद ही शंशाक की तबीयत नासाज़ हो गई। हमारी पूरी कोशिश के बाद भी हमारी टीम उसे बचा नहीं पायी..शायद शंशाक तुमसे मिलने के लिए ही अपने दिल को संभाले हुए था…।”😢😢 शुभ्रा ने अपनी सहेली कविता से बात कि , ” कविता, कल दोनों चलेंगे शंशाक की पत्नी व बेटियों से मिलने”। कविता, शुभ्रा की खास सहेली , उसी शहर में रहती थी। शुभ्रा के लिए रात काटे नहीं कट रही थी …असमंजस में थी कि ,पता नहीं शशांक की पत्नी कैसे रेस्पॉन्स करेगी… घड़ी टिक टिक कर अपने वजूद की ओर इंगित कर रही थी लेकिन शुभ्रा को तो लग रहा था जैसे समय ठहर गया है… तकिया पूरा आंसुओं से भीग चुका था… कब नींद आयी उसे नहीं पता। सुबह उसकी “मैड काकी” चाय देने के लिए उसके शयनकक्ष में गई… आवाज़ लगाई…लेकिन कोई प्रतिक्रिया ना पाकर हाथ से झिंझोड़ा… शुभ्रा की गर्दन एक तरफ लुढ़क गई… “मैड” जो एक काकी समान थी सहम गई और तुरंत शुभ्रा के बेटे को फोन लगाया है… दूसरा फोन उसकी सहेली कविता को किया जो तुरंत अपने पति के साथ शुभ्रा के घर पहुंच गई… शुभ्रा की मुठ्ठी बंद थी। कविता ने खोला तो देखा उसके हाथ में वह सफेद गुलाब था जो शंशाक ने विदा होते समय अपने सिराहने रखे गुलदस्ते से निकाल कर उसे भेंट किया था। “याराना” समूह में खबर आग की तरह फैल गई… एक तरफ शंशाक को मुखाग्नि दी जा रही थी तो दूसरे शहर में शुभ्रा इश्क़ की चादर ओढ़े चिता की लपटों में अंतिम यात्रा की ओर बढ़ गई थी…। दोस्तों में चर्चा का विषय था शुभ्रा और शंशाक का रूहानी चिरमिलन, जो इस समाज व दुनिया के बंधनों से मुक्त हो आसमां में दो चमकते सितारों के रूप में देदीप्यमान हो चुके था।
रुहानी इश्क़ की खुशबू को फैलने से कोई नहीं रोक सकता। ये समाज, दो प्रेमीयों को एक साथ जीवन जीने में अवरोध उत्पन्न कर सकता है लेकिन जिस इश्क़ में रुहानी इत्र की सुंगध है उसे नष्ट करने की ताकत इस धरती पर किसी के पास नहीं है…नापाक हैं वो जिन्हें इश्क़ के सही मायने समझ में नहीं आते।

✍️©® डा सन्तोष चाहार “जोया”१६/०६/२०१९

जाने क्यूं

जाने क्यूं
लड़ती रहती हूं
पंरपरा के घोडों से
निपट मूर्ख निगोड़ों से
स्व का ढ़ोल पीटते भगोड़ों से।

जाने क्यूं
टकर लेती रहती
संकीर्णता के घेरों से
दंभ में चूर पहरों से
अतीत के घाव गहरों से।

जाने क्यूं
उठा लेती हूं
तख्ती कलम दवात
धनुष तीर टंकार
धरा पर नहीं मैं भार।

जाने क्यूं
कर्म की प्रहरी बन
सज़ाती ख़्वाब धुन
ठोकती हूं ताल मैदान
जीतती निज स्वाभिमान।

जाने क्यूं
खोल फेंकती हूं पायल
बंधन जो करते हृदय घायल
होती हूं स्व दृष्टि की कायल
मोड़ना चाहती हूं वक्त का डायल।

जाने क्यूं
चाहती निजता का अंश
उड़ना चाहती गगन बिन दंश
घर बाहर के तालमेल का पंख
सीमाओं की छाती में फूंक शंख।

#नारी शक्ति # नारी स्वाभिमान #देश बने महान

✍️©® डा.सन्तोष चाहार “जोया” 08/03/2019

ब्लॉकड इश्क़

महिमा, नाम के अनुरूप, सुंदर, सुशील व मानवीय मूल्यों से सुसज्जित, सुदृढ़ व्यक्तितव की धनी थी। देहरादून की डिफेंस अकेडमी में जब वह कैडेट के तौर पर आफिसर टैरेनिंग का हिस्सा बनी तो सभी युवा कैडेट्स की नज़रों में उसने एक अलग जगह बना ली थी। शशांक भी इस एकेडमी की शान था। गठीला बदन, छ: फुट का कद , घुंघराले बाल, सुरमयी नयन व उसकी शालीनता किसी को भी सम्मोहित करने के लिए काफी थी। चार साल की सख्त आफिसर टैरेनिंग के साथ साथ हम सब साथी महिमा और शंशाक के बीच अंकुरित होते इश्क़ के साक्षी रह रहे थे। समय के साथ इस प्रेम में रची बची सुगंध दोनों के परिवार वालों तक भी पहुंची।

पासिंग आऊट परेड के बाद शंशाक ने महिमा को अपने माता पिता से मिलवाया। हम सब साथी अलग अलग जगहों पर पोस्टिंग मिलने के बाद अपनी रेजीमेंट का हिस्सा बन चुके थे। मातृभूमि की सुरक्षा अब हमारे नाजुक कंधों पर थी। कारगिल युद्ध छिड़ चुका था। शशांक भी इस युद्ध में अग्रिम पंक्ति में तैनात था। दुश्मन देश की तरफ़ से बम वर्षा लगातार जारी थी। शंशाक के नेतृत्व में बीस जवानों की टुकड़ी पहाड़ी के पीछे छुपे दुश्मन सैनिकों पर टूट पड़ी। दोनों ओर से भयानक गोलाबारी चल रही थी। दुश्मन के छक्के छुड़ा कर टुकड़ी लौट रही थी। शंशाक ने पहले अपने साथियों को कवर फायर देते हुए सुरक्षित स्थान पर पंहुचा दिया। सभी साथी बेस कैंप पहुंच चुके थे और अपने कमांडर शंशाक का इंतजार कर रहे थे। काफी वक्त बीतने के बाद उच्च कंमाडर को सूचना दी गई। दो दिन तक शशांक की कोई खोज़ खबर नहीं थी।

खैर, एक सप्ताह बाद आंतकवादी के चुंगुल से बच कर शशांक भी अपनी यूनिट में पहुंच चुका था। महिमा को ग्राउंड की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। शंशाक के वापिस लौटने का समाचार पाकर उसने राहत की सांस ली थी। एक साल तक शंशाक और महिमा का इश्क़ परवान चढ़ता रहा। महिमा ने दिल से उसे जीवनसाथी के रूप में अपने हृदय में बसा लिया था। अपने प्रेम के प्रति वह आश्वस्त थी। रंगीन सपने उसके आनेवाले कल में अनेकों रंग भर रहे थे। लड़कियां वैसे भी अपनी रिलेशनशिप को लेकर बहुत कमिटेड होती हैं। शशांक एक महीने की छुट्टी पर घर गया था। जब लौटकर आया तो उसकी जीवन संगनी उसके साथ थी जिसके चेहरे से नूर टपक रहा था। तहकीकात की गई तो पता चला नूर, शशांक के कम्पनी कमांडर बिरगेडियर सुबोध की बेटी थी और शशांक ने इस रिश्ते को इसलिए नहीं ठुकराया, क्योंकि वह जल्द ही प्रमोशन चाहता था और बिरगेडियर की छत्रछाया में अपना सुरक्षित भविष्य देख रहा था।

उधर महिमा एक साधारण परिवार से आती थी। महिमा को शंशाक की शादी के बारे में पता चला चुका था। उसका इश्क़ एक उच्च आंकक्षा रखने वाले शंशाक के स्वार्थ की भेंट चढ़ चुका था। अंतस पर लगी इस चोट ने महिमा को गहरे अवसाद में ढकेल दिया। परंतु परिवार और दोस्तों के सबंल से वह जल्द से ही बाहर आ गई थी। अब अपने माता पिता की आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए उसने भी अपनी नयी जिंदगी शुरू करते हुए मेज़र शेखर से शादी कर ली थी। बहुत सालों से महिमा और शंशाक सोशल मीडिया से संपर्क में थे। लेकिन शशांक द्वारा दिए धोखे से आहत होकर, अब उसने शंशाक को ब्लाक कर दिया था क्योंकि वह अपने नये जीवन में उसकी छाया को भी प्रवेश नहीं देना चाहती थी।

जो व्यक्ति किसी भी रिश्ते को लेकर गंम्भीर होते हैं उन्हें चोट भी उतनी ही गहरी लगती है। जिस प्रेम को क्षण क्षण महिमा ने सिंचित किया था उसकी इस तरह की बेवफाई ने उसके हृदय में आक्रोश भर दिया था। रोम रोम में व्यापत इश्क़ की खूशबू अब महिमा के लिए जहर का काम कर रही थी। जो शंशाक अपने प्रेम की कसमें खाते हुए कहता था कि, ” दिल चीर कर देख लो। इस दिल में तुम्हारा ही नाम लिखा है”। जाने उसकी क्या मजबूरी थी कि अपने प्रेम पर दाग लगा गया था। महिमा ने वे सब कैसट भी अग्नि की भेंट चढ़ा दिए जिसमें शशांक के द्वारा गाए नगमें थे, जो महिमा के प्रति समर्पित थे। अब उन गानों को सुनती थी तो हृदय में शूल से चुभते थे। शंशाक और महिमा के बीच जिन पत्रों का आदान प्रदान हुआ था उनको भी महिमा ने अग्नि की भेंट चढ़ा दिया था। अपने इश्क़ को इस तरह अग्नि के हवाले करते महिमा के दिल के आंसू सैलाब बन उमड़े थे। निर्णय तो लेना ही था क्योंकि जख्मों को साथ लेकर जीने से वर्तमान और भविष्य दोनों पर गहरा असर पड़ता है।

महिमा अपने गृहस्थ जीवन में खुश थी। मेज़र शेखर एक सुलझे हुए इंसान थे। महिमा ने पति से विवाह से पहले की सभी बात सांझा कर ली थी क्योंकि दोनों पति पत्नी जानते थे कि आधुनिक समय में सभी के कोई न कोई प्रेम प्रसंग होते हैं और बेहतर है उन यादों को जहन से एकबार निकाल कर नयी जिंदगी की शुरुआत की जाए तो पति पत्नी का रिश्ता विश्वास की मजबूत नींव पर सवार होकर  जिंदगी में सुवास भर देता है। महिमा शेखर जैसे पति को जीवनसाथी के रूप में पाकर गौरवान्वित महसूस कर रही थी और उसकी बाहों में महफूज़ भी।

✍️©® “जोया” 08/02/2019

दास्तां ए इश्क़

उन दिनों मेरी कर्नाटक में पोस्टिंग थी और मैं आर्मी में मेज़र के पद पर तैनात था। दिसम्बर का महीना था, हल्की ठंड़क थी। मैं नाश्ता करने के बाद अपने घर के बगीचे में कुर्सी मेज़ लगा कर बैठा था। रविवार का दिन था। कुछ जरूरी डाक थी जो शनिवार को स्टेशन से बाहर होने की वजह से देख नहीं पाया था। इसलिए अर्दली सुबह देकर गया था। एक एक करके मैं सारी डाक देख रहा था। तभी एक खत जिस पर गुरुग्राम की स्टेम्प लगी थी मिला। ख़त पर भेजने वाले का कोई नाम पता नहीं था। हां, लिखावट जानी पहचानी लग रही थी। खैर, ज्यादा न सोचते हुए मैंने वह पत्र खोला और मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। हर्ष व पीडा़ से मिश्रित आंसू मेरी आंखो में छलक आए। पत्र के अंत में भी नाम नहीं लिखा था- सिर्फ कप्तान व दूरभाष नम्बर लिखा था। वह शायद मेरी याददाश्त को परखना चाह रही थी। ये मेरी मोहब्बत का ख़त था जो मेरी रुह का हिस्सा उस समय बन गई थी जब हम दोंनो ने बचपन पर सवार होकर युवावस्था की दहलीज पर कदम रखा था।

मेरा मन दर्पण मुझे 1970 के दशक में ले गया जब हम दोनों को देहरादून के एक आवसीय विद्यालय में प्रवेश मिला था। दसवीं कक्षा में कदम रखते तक, मधु का नाम हर बच्चे और अध्यापक की जुबान पर था। राजस्थान से आई, इस लड़की की सादगी, अनुशासन, पढ़ाई और खेल क्षेत्र की उपलब्धियों का परिणाम था कि बारहवीं कक्षा में उसे हैड गर्ल, रुम कप्तान, एथलेटिक्स कप्तान व कक्षा मोनीटर की जिम्मेवारी सौंपी गई। मुझे स्वयं भी चूंकि विद्यालय कप्तान होने का गौरव प्राप्त हुआ था इसलिए मेरा व मधु का संपर्क का दायरा विस्तृत हो रहा था। विद्यालय की अनेक गतिविधियों का हम हिस्सा रहे थे। एक दूसरे के प्रति जादुई सम्मोहन था। मधु एक कठोर आवरण अपने चेहरे पर ओढ़े रखती थी। उसका सौम्य व्यक्तित्व, उसके चेहरे का तेज़ और अंदाज में गंभीरता, किसी को भी अपनी तरफ़ आकर्षित करने के लिए काफी था। मेरी दीवानगी उसकी तरफ दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी लेकिन उसकी आंखों के तेज़ की वज़ह से मेरा साहस साथ नहीं देता था। अपने दिल में उमड़ते घुमड़ते प्रेम रस से परिपूर्ण बादलों की बरखा को मैं उसके हृदय की धरती पर बरसाना चाहता था। मेरी दीवानगी से मेरे दोस्त भलीभांति परिचित थे। उन्होंने कहा कि ” यार, जब तक तुम उससे इज़हार नहीं करोगे तो वह कैसे समझेगी”।लेकिन उसके चेहरे का हर वक्त का कठोर आवरण मेरी हिम्मत को तोड़ देता था।

युवा हृदय में अवतरित प्रीत तरंगें मन को उद्वेलित कर रहीं थी। एक दिन जब मधु रात्रिभोज के बाद मैस से निकल रही थी तो मैने एक जूनियर से कहलवाया कि, ” मधु को बोलो, स्कूल कप्तान ने कुछ समय रुकने आदेश दिया है”।मुझे’आदेश’ शब्द का इस्तेमाल करना पड़ा क्योंकि पहले दिन मेरे दोस्त के कहने पर वह रुकी नहीं थी। सभी छात्र छात्राएं अपने अपने छात्रावास का रुख कर चुके थे। मैं, शंशाक, पूरी हिम्मत बटोर कर उसके पास गया और बड़ी मुश्किल से इतना कह पाया, ” तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो”। उसने कुछ कहा तो नहीं लेकिन पहली बार उसकी नज़रों में अपने लिए मोहब्बत देखी थी। उसके बाद हमारी नज़रें एक दूसरे को पढ़ने में मशगूल रही थीं। वह खामोशी से प्रेम गीत गुनगुनाती थी और मैं चुपके से सुनता था। हम दोनों ने ही कभी रुहानी प्रेम को शब्दों में नहीं पिरोया था।

आवासीय विद्यालय में सभी कप्तान प्रिंसिपल के साथ दोपहर का भोज़न करते थे। खाने की मेज़ पर भी मधु और मैं आमने सामने ही बैठते थे और अनायास ही हमारी नज़रें प्रेम का संचार कर जाती थी। शब्द खामोशी की चादर ओढ़कर नृत्य करते थे जिसके सम्मोहन में मेरा अस्तित्व मधु के साथ एकाकार हो जाता था। स्टेडियम हो या ऑडिटोरियम हर प्रोग्राम में हम साथ हिस्सा लेते थे। मैं हॉकी का अच्छा खिलाड़ी था और वह लम्बी दूरी की धावक। मेरी उपस्थिति मात्र से ही उसके धावक कदम हवा की गति पकड़ जाते थे। पांच किलोमीटर की लम्बी दूरी वह हर बार अंतर- हाऊस मुकाबले में जीत जाती थी। उसकी अगवानी में एथलेटिक्स टीम ने अनगिनत राज्य स्तरीय व राष्ट्रीय स्तर पर पारितोषिक जीते थे।

1980
बारहवीं कक्षा के इम्तिहान नज़दीक थे और हम दोनों अपने नोटस एक दूसरे से सांझा करते थे। उन्हीं नोटस में, मैंने हिम्मत करके एक पत्र रख दिया। इश्क़ की सुगंध से महके ख़त, जिसमें मोहब्बत थी, सम्मान था, उसका इज़हार कर दिया। प्रत्युत्तर में उसकी स्वीकृति पाकर मेरे मन का हिरण कुलांचे भर रहा था। उसने ये भी कहा कि दुबारा ख़त न लिखें और पढ़ाई पर ध्यान देने की हिदायत दी। खैर परीक्षा भी समाप्त हुई और अब ग्यारहवीं कक्षा के छात्रों द्वारा विदाई समारोह का आयोज़न किया गया। मधु भावुक बहुत थी ये उस दिन पता चला जब उसके मृगनयनों से सावन भादों की झड़ी लग गई थी। स्टेज़ पर ग्यारहवीं कक्षा के छात्र शरारत भरे अंदाज में हर किसी का टाईटल दे रहे थे। हम दोनों का नाम एक साथ पुकारा गया। एक गीत बज़ रहा था, ” चांद आहें भरेगा, लोग दिल थाम लेंगे, जब हुस्न की बात चलेगी सब तेरा नाम लेंगे”।पूरे हॉल में करतल ध्वनि गूंज रही थी और हम एक दूसरे को देखे जा रहे थे। एक छात्र हमारे सामने कुछ पर्चीयों वाला बॉक्स लाया और कहा कि, ” आप दोनों को एक एक पर्ची उठानी है।” हम दोनों ने पर्ची उठाई तो उस पर लिखा था, ” पंसदीदा साथी के साथ डांस”।हॉल फिर करतल ध्वनि से गूंज उठा।

एक स्टेज़ प्रोग्राम में एक बार कोरियन डांस किया था। उसकी ही धुन बज़ने लगी और पहली बार हमने एक दूसरे को छुआ था। इतने सालों से स्व अंकुशित प्रेम को नदी सा प्रवाह मिल गया था। प्रेम सागर की लहरें, तट को छूने के लिए आतुर दी थी। खैर, चैलेंज सामने रखा तो हमने भी अच्छी परफोर्मेंस दी। स्मृति चिन्ह लेकर हम स्टेज़ से उतर आए। रात्रिभोज़ के दौरान पता चला कि उस बॉक्स में उन सभी पर्चियों पर ही “कपल्स डांस” लिखा हुआ था। ये तो जानबूझकर की गई शरारत थी। अब समझ आ गया था कि हम दोनों ने चाहे इश्क को खामोशी की चादर में लपेटकर रखा लेकिन इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुपता। इश्क़ की सुवास वातावरण को महका ही देती है। एक दूसरे के ऑटोग्राफ लेकर हम सब साथी विदा हो गए अपने अपने सपनों को पूरा करने…।

मधु और मैं गांव के परिवेश थे लेकिन पढ़ाई के लिए परिवार शहर में शिफ्ट कर गए थे। मधु उदयपुर चली गई और मैं एन। डी। ए। में चयनित होकर देहरादून डिफेंस एकेडमी। एक महीने बाद मधु का खत आया था। उसका पत्र मिलते ही मेरी दिल की धड़कन बढ़ गई थी। प्रेम की खुशबू से महकता खत मेरे दिल के दरवाज़े से होता हुआ रुह को छू गया था। मैं खुश था। मैनें भी जवाबी खत लिखा जो कि बहुत सामान्य सा था, सबकी खैर खबर, क्योंकि मैं समझता था कि ऐसी कोई बात ना लिखी जाए जो मधु के लिए परेशानी का सबब बने। लेकिन इश्क की राह में बाधाएं ना आएं, ये मुमकिन नहीं। अस्सी के दशक में तो इश्क़ करने वालों को गुनहगार की तरह देखा जाता था। परिवार की मान मर्यादा की दुहाई दी जाती थी और इश्क़ परंपरा की बेड़ियों में जकड़ दिया जाता था। पंद्रह दिन बाद मधु का दूसरा खत आया था जिसमें उसने लिखा था कि, ” पिताजी बहुत ओवर पोरक्टेटिव हो रहे हैं… आदि आदि… कि यदि तुम वास्तव में मुझ से मोहब्बत करते हो तो ये हमारी मोहब्बत की परीक्षा है.. मुझे कभी खत मत लिखना… तुम हमेशा मेरे हृदय पर राज़ करते रहोगे…।”

1998
आज़ अठारह साल बाद उसका ख़त मेरे पास फिर आया है। मैं उसे दुबारा खोना नहीं चाहता था। उसने बताया कि उसकी जल्दी शादी कर दी गई थी। फिर घर गृहस्थी की जिम्मेदारी में उलझ कर रह गई थी। शशि के पास उसकी शादी का कार्ड देखा था…उस दिन घर आकर मैं आंसुओं के सैलाब में बह गया था। शशि ने पूछा था, ” कि तुम्हें पता है उसकी शादी हो रही है?” मैंने कहा, “हां, मैनें ही उसे कहा है जैसे तुम्हारे पिताजी कह रहे हैं वैसा ही करो”। मेरे लिए खो गई थी वह। उसकी शादी के दस साल बाद मेरे खास दोस्तों ने बहुत समझाया। तब तक मैं आर्मी का करियर चुन चुका था। मेरे एक बहुत ही खास दोस्त ने मुझे अपनी बहन के रिश्ते की बात करके दोस्ती को और मजबूत करने का सुझाव दिया जो मैं ठुकरा न सका क्योंकि मेरा सबसे खास दोस्त था जिसने मुझे मधु की जुदाई में बिखरते देखा था। मन में ये सब चल रहा था तभी छाया गरमागरम चाय के दो कप लेकर आई और पूछा, ” कहां खोए हो? मैंने पत्र छात्रा की नज़रों से बचा लिया था और बाकी डाक के साथ रख दिया।

छाया थोड़ी शंकालु प्रवृत्ति की थी इसलिए मैं उससे ये बात सांझा नहीं कर रहा था। मधु को जवाबी ख़त लिखते वक्त मेरे रोम रोम से वक्त की तिजोरी में कैद इश्क पंख लगा कर उड़ रहा था। मधु और मेरे बीच पत्रों का सिलसिला जारी रहा व दूरभाष से भी संपर्क जारी रखा। सोयी हुई हसरतें फिर जाग उठी थी। पहली मोहब्बत को भुलाना नामुमकिन होता है। शादी तो एक आपसी समझौता होता है, जहां प्रेम कम और आरोप प्रत्यारोप अधिक होते हैं और इसलिए प्रेम की सुवास कुछ समय बाद ही मंद पड़ जाती है। शादी में केवल रह जाता है परिवार के प्रति फर्ज़ और कभी ना समाप्त होने वाली अपेक्षाएं। भारतीय समाज में यूं भी शादी एक व्यक्ति से ना होकर पूरे परिवार से होती हैं। एक बेटा मां और पत्नी रुपी दो पाटों के बीच पिसता रहता है। इस तरह प्रेम कहीं लुप्तप्राय हो जाता है।

मधु का मेरे जीवन में दुबारा आना ऐसे ही था जैसे सूखे झरने में जल का प्रवाह हो जाए। हम दोनों अपने परिवार के प्रति समर्पित रहते हुए भी उस सागर में डूबकी लगा रहे थे जहां प्रेम में लिपटे नायाब मोती, हमारे जीवन को पुष्पित पल्लवित कर रहे थे। जीवन में एक नयी स्फूर्ति और उर्जा का संचार हो चुका था। इश्क़ लेकिन पूरा हो जाए तो वह सुंगध खो देता है। मधु और मेरे इश्क़ की दास्तां में भी विरह ने दस्तक उस वक्त दी जब एक बार दूरभाष पर मेरी पत्नी ने मुझे प्रेमालाप करते सुन लिया। उसकी शंकालु निगाहें मेरे स्वभाव में आए परिवर्तन से चौकस थीं। छाया, जिसे मैंने मधु से अलग होने के बाद सबसे अधिक चाहा था, बिफ़र गई। स्थिति को संम्भालते हुए मधु को मैंने वस्तुस्थिति से अवगत कराया। हम दोनों का इरादा किसी को आहत करने का नहीं था। लेकिन प्रेम का बीज उर्वरक धरती पर डलेगा तो अंकुरित तो होगा। मधु नहीं चाहती थी मेरे परिवार पर कोई आंच आए, इसलिए हम दोनों ने जुदाई की राह पकड़ ली जहां अपने अपने परिवार के प्रति बस फर्ज़ ही फर्ज़ था। इश्क़, पीड़ का आंचल ओढ़कर प्रेमी हंसों की तलाश में निकल पड़ा।

शंशाक ने जैसा लेखक के साथ सांझा किया।

✍️©®”जोया” 06/02/2019

औरत की कहानी

पहला परिदृश्य

औरत की ये अज़ब कहानी

दुनिया करती आई मनमानी।

दोयम दर्जा दिया पुरुषों ने

नित किया अपमान नये हथकंडों ने।

लक्ष्मण रेखा की पहेरेदारी
कभी ना की सुखों की सवारी।
सुबह से हो जाती शाम
कभी ना होते खत्म घर के काम।

खेत खलिहान को भी जोतती

कष्टों को नित वह भोगती।

खाकर रुखी सूखी सो जाती

कभी कभी तो रह जाती भूखी।

परिवार पर रहती हरदम न्यौछावर

सिर पर ढ़ोती नीर सरोवर।

ईर्ष्या उसकी को खूब भुनाया

औरत को औरत से टकराया।

नारी को नारी के खिलाफ किया खड़ा

इस तरह पुरुष बना रहा बहुत बड़ा।

होती रही वासना का शिकार

पीडा़ का नहीं कोई पारावार।

दूसरा परिदृश्य

परंपराओं की जंजीर से जकड़ी
सपनों की डोर फिर भी पकड़ी।
शिक्षित होने वह अब निकली
नहीं ओढ़ती नकाब वो नकली।
खेल जगत में मुकाम बनाया
देश का गौरव नित बढ़ाया।
छूती अब गगन तारिकाएं
झंडा देश का चोटी पर लहराएं।
बन फौजी देश का गौरव बढा़ती
बाधाओं से नहीं अब घबराती।
बन पायलट वह विमान उड़ाती

दुश्मनों के छक्के अब छुड़ाती।

बनकर आई एस अधिकारी

योजनाएं बनाती न्यारी न्यारी।

सी.ई.ओ बन योग्यता का परचम फहराती

डिजिटल भारत का तिरंगा लहराती।

शिक्षाजगत की दुनिया उसकी अनोखी

महिला शिक्षादिक्षा में महारत उसकी चोखी।

बढ़े कदम बनाते नित नयी डगर

मिट जाएगा अब मन का तिमिर।

✍️©® “जोया” 22/01/2019

अटूट मौन

शब्द बयां नहीं कर सकते उस प्रेम को जो सुरभि और शंशाक एक दूसरे के लिए महसूस करते आ रहे थे जब से दोनों ने बचपन की दहलीज़ पार कर युवावस्था में कदम रखा था। पिछले बारह वर्षों से दोनो एक दूसरे की कदम दर कदम शिक्षा औरखेलजगतकी उपलब्धियों के साक्षी रहे थे। व्यवहार कुशल होने के साथ साथ शिक्षकों के प्रिय विद्धार्थीओं की श्रेणी में दोनों ने नाम दर्ज करवा रखा था।

भाषण प्रतियोगिता हो या नाटक मंचन, हमनें हमेशा दोनों को साथ साथ हिस्सा लेते देखा था। संस्कृत के नाटक शुंकतला में जिस ढंग से दोनों ने दुष्यंत और शुंकतला के चरित्र को चरितार्थ किया उसका पूरे आडिटोरियम में बैठी सभा ने करतल ध्वनिसे स्वागत किया। दोनों ने अपने प्रेम के अटूट मौन को मंच पर अभिनीत करके सबका आशिर्वाद जैसे प्राप्त कर लिया था। कभी भी हमने सुरभि और शंशाक के रोम रोम में बसते प्रेम को शब्दों की बैसाखी पर चलते नहीं देखा। एक दूसरे के पास से गुज़रते हुए उनका अंग अंग प्रेम के संप्नदन को इन्द्रधनुषी जामा पहना जाता था। कभी भी हमने उन्हें किसी भी तरहं की हलकी मस्ती में नहीं पाया। उन दोनों के प्रेम का पूरा बोर्डिंग परिसर साक्षी था। लेकिन क्या मज़ाल कोई किसी तरह की उंगली उठा सके। प्रेम के सागर में डूबकी लगाते हुए भी एक निश्चित दूरी बनाकर रखना व प्रेम के अहसास को नया आयाम देना दोनों के चरित्र की सुदृढ़ता को इंगित करता था।

सुरभि और शंशाक मेरे परम मित्र रह थे बोर्डिंग स्कूल में जहां हमने पहली कक्षा से अपनी जीवन यात्रा शिक्षा जगत के पायदान पर एक साथ शुरू की थी। निश्चित रूप से हम सबकी आपस में एक ऐसी समझ विकसित हुई थी जिसकी खूशबू आज साठ बरस की उम्र में भी भावनाओं से अभिभूत कर जाती है। ये कथनाक 1980 के दशक का है जब प्रेम आज़ की तरह बात बात पर दम नहीं तोड़ता था। उस प्रेम में समुंद्र सी गहराई और आसमान सी ऊंचाई थी जो परंम्पराओ में बंधे होने के बावजूद इश्क की नयी कहानी गढ़ गया था। जिसमें अलगाव भी हुआ, रास्ते भी बदले, अलग अलग गृहस्थी भी बसी लेकिन प्यार ने दम नहीं तोड़ा।

सुरभि और शंशाक अपने परिवार की सीमाओं में बंधे हुए, माता पिता की समझ के हवन में अपने प्रेम की आहुति डालकर कर्तव्य के सज़ग परहरी बने और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर अपनी राहों पर पीड़ा मिश्रित आंनद की अनूभूति के साथ गृहस्थीकी डगर चल पड़े। सालों तक अपने जीवन में व्यस्त हम सब साथी डिजिटल मीडिया से दुबारा संम्पर्क में आए और साथ लौट कर आए युवा अवस्था के प्रेम- किस्से। सुरभि और शंशाक आज़ भी पार्टियों में बड़ी संजदगी से एक दूसरे से अटूट मौन में रहकर उस सुरमई अहसास में खो जाते हैं जो बरसों पहले वातावरण में एक सुंगंध फैलाता था। आज़ भी कभी उन्होंने अपनेप्यार को शब्दों में नहीं पिरोया। बस दोनों के साथ होने की सुखद अनूभूति मात्र ही हमारी पार्टियों में नयी खुशबू बिखेर जाती है। हम सबके बीच सुरभि और शंशाक इश्क का वो दरिया हैं जिसमें हम बचपन के साथी प्रेम के मोती चुनने का अधूरा प्रयासकरते हैं।

✍️© “जोया” 09/10/2018