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दुल्हन की पोटली

दहेज़ लेने से मना कर देने पर,

उन्हें तो सुसराल कुछ लाना था

इसलिए आजकल

दुल्हनें पोटली में बांध कर,

लेकर आती हैं

एजूकेशनल लोन,

लाने की,परंपरा तो निभानी होती है

टोकने पर, पतियों को चुंगल में ले चुकी

ऐसी फेमिनिस्ट लड़कीयां

घरों में तूफान खड़ा करवाती हैं,

शादी के कुछ समय बाद

भेद खुलने पर,

टकराव तो निश्चित होते हैं

घर में बैठकर,

प्रति मिनट की खबर रखने वाली

बेटी के सुसराल में, दखलंदाजी करती माएं

वाकई पढ़ी-लिखी गंवार होती हैं,

बेटीयों की कमाई को ऐसी मांए निंयत्रित करती हैं

और

पतियों की कमाई को,

ये तथाकथित फेमिनिस्ट लड़कियां,

जिन्हें ये नहीं मालूम, कि

फेमिनिज्म का मतलब बदतमीजी नहीं होता,

झूठ और चालाकी नहीं होता

लोन की किस्तों के जाल में उलझाकर

प्रेम में अंधे हुए

लड़कों का करती हैं भरपूर दोहन,

रिंग सेरेमनी से लेकर

विदेशों में हनीमून तक

अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा

लगा देती हैं भावुक माएं,

फिर भी

भड़क जाते हैं ऐसे लड़के

जिन्होंने प्रेम-विवाह किया होता है,

वो

सभी सास फिर बुरी कहलाती हैं,

क्योंकि वे सटीक सवाल उठाती हैं।

ऐसे लड़के

भूल जाते हैं, माएं


जूझ जाती हैं विषम परिस्थितियों से

ताकि बच्चों के सपनों में रुकावटें ना आएं,


वे

समझते क्यों नहीं ?

जो माएं अपने बलबूते पर

बच्चों को कैरियर में स्थापित

करने का दम रखती हैं,

तो

बहू, बेटे की

झूठ, बदतमीजी और चालाकी भी

बर्दाश्त नहीं करेंगी,

क्या ग़लत होता है?

ये कहना,

इन तथाकथित

फेमिनिस्ट लड़कियों के घरवालों से

कि, “दुल्हनें कर्ज़ लेकर नहीं आती”।

दहेज़ नहीं, कर्ज़ भी नहीं

यहीस्वस्थ परंपरा होनी चाहिए।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०७/०७/२०२०

अविवाहित लड़कियां

वे बंधी होती हैं अपने सपनों से
चूड़ियों की खनक की जगह
उन्हें सुनाई देती है कोयल की कूक,
उनके स्वास में घुली होती है
फूलों की वादियों की महक,
पायल की झंकार की जगह
वो सुनती हैं
बहते झरने का संगीत,
नदियों के संगम का आहृलादित स्वर
भरता है उनकी रगों में जोश,
पहाड़ों की ऊंचाई से सीखती हैं
वे सीना तान कर खड़ा रहना,
मस्तक पर बिंदी की जगह
उन्हें लुभाता है
आत्मसम्मान का वृहद टीका,
मंगलसूत्र की जगह
वे पहनती हैं
उपलब्धियों की माला,
लक्ष्मण रेखा के परे
वो देखती हैं विस्तृत गगन,
बाज़ सम नापती हैं नभ
बादलों से ऊपर उड़कर
आंकती हैं हुनर की क्षमता,
वे बेफिक्री से लगी रहती हैं
सपनों को हकीकत में बदलने में
समाज में उठाए गए सवालों को
कर दरकिनार,
बढ़ती हैं मंजिल की ओर
अविवाहित रहने वाली लड़कियां
इसलिए अविवाहित नहीं रहती कि,
उन्हें कोई पसंद नहीं करता,
वे शादी करेंगी
उन पुरुषों से, जिन्हें वे पसंद करेंगी
ऐसे पुरुष
जो सही मायने में उनकी उड़ान में संग संग उड़े।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २९/०६/२०२०

दीवारें

सुना है दीवारों के कान होते हैं,
लेकिन मैं कहती हूं
दीवारों की आंखें भी होती हैं,
दीवारें गवाह होती हैं
वीभत्स घटनाओं की
खामोशी की चीखों की,
वे सुनती हैं
उस अंतर्नाद को
जिसे, अपनों के कान नहीं सुनते
उन सिसकियों को,
जिन्हें लोग
कमजोर व्यक्तित्व का ठप्पा लगाकर
छोड़ देते हैं अकेले,
फिर सुनती हैं
उस रुदन को
जिसमें आवाज़ नहींं होती,
ना ही गिरता है, आंख से आंसू
दीवारें गवाह रहती हैं
प्रेमियों की गुफ्तगू की,
तब वे थोड़ा सहम जाती हैं
उनके पकड़े जाने के डर से,
दीवारें, प्रेमपूर्ण व
वीभत्स घटनाओं की सदीयों से रही हैं गवाह।

लेकिन ये दीवारें
चुप रहते रहते
गूंगी हो गई हैं
चींखें सुनते सुनते बहरी
ये दीवारें घरों से लेकर बड़े बंगलों ,
छोटे गांव से लेकर
बड़े शहरों तक उग आई हैं।
लेकिन, एक दिन यकायक
ये चीखकर बिखर जाएंगी
रह जाएंगी बस बिखरी पड़ी ईंटें
जिनको उठा उठा कर
घुटे घुटे लोग
एक दूसरे पर मारेंगें।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१६/०६/२०२०

अजनबी अतिथि

पीड़ा
की गठरी उठाए,
नाप रहें हैं
अपनी मंजिल,
पैरों में पड़े हुए छाले
भी ,राह रोक न पाएं
भूख प्यास से व्याकुल
जिजिविषा के धनी,
पहुंचना चाहें
अपने गांव,
क्योंकि
गांव कभी
अजनबी नहीं होते।
©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१९/०५/२०२०

ख़त

ख़त

जानते हो?
मेरी जिंदगी ,एक खत बनकर रह गई है
खत का, एक एक वाक्य
जैसे तुम्हारे दिल की धड़कन,
एक एक लफ्ज़,
जैसे
मेरी पलकों में ठहरा आंसू
और
आंसू में ठहरी गहन पीड़ा
जिससे, तुम सरोकार नहीं रखते
तुमने
कभी जानना ही नहीं चाहा
कि, कैसे दर्द की कंदराओं में
एक घाव है, जो भरता ही नहीं
तुम जानते हो?
उस पर, तुम्हारे अगूंठे की छाप है,
उसको
कैसे झूठलावोगे?
जब कभी, मैं
प्रेम की कचहरी में,
मुकदमा दर्ज करवाऊंगी
तब, तुम्हारी हार निश्चित है
अंगूठे की छाप,
तुम्हारे विरुद्ध गवाही देगी।
©®डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १२/०५/२०२०

बैल्कमेल

ब्लैकमेल

प्रोफसर सुधा अभी अंग्रेजी विषय का लेक्चर देने के पश्चात प्रथम वर्ष (स्नातक) की कक्षा से बाहर निकली ही थी कि तभी तृतीय वर्ष में पढ़ने वाली तीन छात्राएं उनसे मिली और कहा
” मैम, आपसे एक बहुत जरूरी बात करनी है”
” हां, हां क्यों नहीं”
तीनों छात्राएं एक दूसरे की ओर देख रही थी , शायद उलझन थी कि कौन बात शुरू करे। प्रोफसर सुधा की महाविद्यालय में अध्ययनरत छात्राओं में एक विशिष्ट पहचान थी। प्रोफसर सुधा अनुशासन प्रिय होने के साथ  छात्राओं की समस्यायों को धैर्य से सुनती थी, कभी उन्हें कटघरे में खड़ा नहीं करती थी, बल्कि समय समय पर मार्गदर्शन करती रहती थी और समस्या को समस्या के रुप में देखती थी। दूसरी अधिकतर प्रोफसरों का रवैया गांव से पढ़ने आने वाली  छात्राओं के प्रति उदासीन होता था, शायद यही वजह थी कि ये तीनों छात्राएं भी उनसे बात करने में सहज़ महसूस कर रही थी।
तृतीय वर्ष की छात्रा, कुसुम ने कहा
” मैम, ये मेरी सहेली है और बहुत परेशानी में उलझ हुई है”
” क्या बात है, कुछ बताओगी या यूं ही पहेली बुझाती रहोगी?”
” मैम, प्लीज, आप किसी से भी शेयर नहीं करना”
“हां, हां ठीक है”
” मैम, नीरज को एक लड़का ब्लैकमेल कर रहा है…ये मानसिक रूप से बहुत तनाव में है”
” क्यों, स्पष्ट बताओ”
” मैम , इसकी एक साल से एक लड़के से दोस्ती है लेकिन अब वह इसे धमकी दे रहा है”
प्रोफसर सुधा ने नीरज की ओर मुताखिब होकर कहा
” तुम्हारे घर वालों को पता है, दोस्ती के बारे में?”
सिर झुकाए खड़ी नीरज के मुंह से जुबान नहीं फूट रही थी। उसने गर्दन हिला कर ना में जवाब दिया। प्रोफसर सुधा ने उसे कहा, बेझिझक होकर बताओ, अब मुसीबत में फंस गए हो तो समाधान भी निकालना है।
” मैम, प्लीज, मेरे घर पर मत बताना और महाविद्यालय में भी किसी दूसरी टीचर को भी नहीं, यहां मेरा जीना मुहाल कर देंगें। आप से इसलिए बात कर रहें हैं क्योंकि आपका व्यक्तित्व सबसे अलग है… घर पर बात पहुंच गई तो मेरी पढ़ाई छुड़वा देंगें”
” हां, हां। ठीक है। मुझे ये बताइए, ये दोस्ती कब से है?”
” एक साल से”
” तुम, लड़के के साथ कहां तक आगे बढ़ी हो?”
नीरज की आंखें जमीन में गड़ी हुई थी। उसके मुंह से एक भी शब्द नहीं निकल रहा था। उसकी सहेली ने बताया कि मैम इसका एक न्यूड फोटो है ,उस लड़के के मोबाइल फोन में। अब तो सुधा की आंखों में क्रोध स्पष्ट झलक रहा था, फिर भी शांत रहते हुए नीरज से पूछा
” तुम, उसके साथ होटल गई थी?”
” जी”
” खुद, इतनी बड़ी गलती करती हो, अपने हाथ खुद कटवाती हो और फिर कहती हो कि, ब्लैकमेल किया जा रहा है। तुम्हें, इतनी भी समझ नहीं है कि, ये कितना बड़ा जाल है, जिसमें तुम फंस चुकी हो… इसे तुम दोस्ती कहती हो? दोस्ती शब्द और उसकी महिमा को यूं मलिन मत करो… मामला गंभीर है, तुम्हारे मां बाप को तो समस्या के समाधान में शामिल करना पड़ेगा”
” प्लीज मैम, उन्हें कुछ मत बताएं। वो लोग मुझे जिंदा गाड़ देंगें”
“क्या करते हैं, तुम्हारे पैरेंट्स?”
“खेती करते हैं”
” ये मोबाइल फोन किसने दिलवाया?”
नीरज चुप…
” मुझे पता है, ये उस लड़के ने ही दिया होगा। इतना मंहगा मोबाइल फोन तो, मैं भी अभी खरीद नही पा रही”
सुधा ने पूछा,
” तुम्हारे घर में और किस को पता है?”
” भाई को”
” कौन सी कक्षा में पढ़ता है?
” बी ए द्वितीय वर्ष”
” तो दोनों भाई बहन, मां बाप को अंधेरे में रख, उनकी मेहनत की कमाई को जाया कर रहे हो… अनपढ़ होने के बावजूद, वो लोग तुम्हें पढ़ा रहे हैं और तुम आवारागर्दी में समय खराब कर, अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हो “
” मैम, बहुत बड़ी गलती हो गई”
” जब दोस्ती थी तो अब ब्लैकमेल क्यों कर रहा है?”
“मैम, अब मैंने उसे मिलने से मना कर दिया है, इसलिए”
” क्यों, अब क्या हो गया?”
” मैम, वह अपने दूसरे दोस्तों के साथ भी संबंध बनाने के लिए कह रहा था”
“हूं… आसान शिकार मिल रहा है उन्हें… ऐसा होता है। ख़बरें नहीं पढ़ती क्या अखबारों में… पुस्तकालय में तुम छात्राओं के लिए ही तो अखबार मंगवाएं जातें हैं ताकि, जो छात्राएं, घर में अखबार नहीं मंगा सकते ,वे सब महाविद्यालय में पढ़ लें… लेकिन मैं देख रही हूं, लड़कियां बहुत कम जाती हैं पुस्तकालय में”
” सोरी मैम”
” ठीक है, मैं पुलिस को फोन करती हूं”
” मैम, यहां महाविद्यालय में पुलिस आएगी तो हमारी बदनामी होगी… हमने सुबह पुलिस को फोन कर दिया है”
” क्या कहा उन्होंने?’
” लड़के का नंबर लिया है और मेरे भाई का भी… सभी को ग्यारह बजे बुलाया है एक निर्धारित स्थान पर… आप बस हमें महाविद्यालय से बाहर जाने की परमिशन दे देना… गेटकीपर बिना किसी प्रोफसर के हस्ताक्षर बगैर जाने नहीं देगा”
” मामला गंभीर है… मुझे प्रिंसीपल के संज्ञान में लाना पड़ेगा”
” मैम, फिर तो बात फैल जाएगी”
” नहीं, इसकी गारंटी में लेती हूं… तुम इंतजार करो, मैं बात करके आती हूं”
” जी मैम”
प्रोफसर सुधा सीधी प्रिंसिपल से मुलाकात करने उनके कक्ष में पहुंच जाती है और चपरासी को निर्देश दिया जाता है कि,  आधे घंटे तक  कोई अंदर ना आए”। फिर प्रिंसीपल महोदया को सारी वस्तुस्थिति से अवगत कराया गया। प्रिंसिपल ने छात्रा को तलब किया… सभी बिंदुओं पर ध्यान देते हुए यही निर्णय किया गया कि, पुलिस अपने स्तर पर कार्रवाई करे …।

अगले दिन प्रिंसीपल महोदया ने हाॅल में सभी छात्राओं को संबोधित करते हुए, जीवन मूल्यों को विस्तार से समझाया लड़कियों के प्रति अपराधों के बारे में आगाह किया। दोस्ती के नाम पर लड़कों से दूरी बनाए रखने का आग्रह किया। साथ में चेतावनी भी दी कि यदि महाविद्यालय की किसी भी छात्रा को किसी अक्षम्य गतिविधियों में लिप्त पाया गया तो उसे महाविद्यालय से निष्कासित कर दिया जाएगा। ये आखिरी चेतावनी है।

नीरज की तरह बहुत सारी छात्राएं, मां बाप, समाज और सरकार द्वारा महिला शिक्षा की “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” मुहिम में अवरोध उत्पन्न करने का कार्य कर रही हैं। दोस्ती जैसे शब्दों की पवित्रता को दाग़दार करती हैं।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”०२/०४/२०२०

एहसास

तुम्हें,
एहसास नहीं,
तुम्हारे द्वारा फेंकें गए
एक एक पत्थर को चुन चुन कर,
यथार्थ की धरती पर,
टूटे सपनों को
उसने
हकीकत में बदला।
तुमने
सोचा था, कि
पाषाण हृदय से टकरा कर
वह
चूर चूर हो जाएगी।
वक्त
बना गवाह,
कुरीतियों के
पत्थर तोड़कर
सदियों से अंतस में दफ़न
हौंसले का बीज
पनपकर
विशाल वृक्ष बना।
उसकी,
शाखाओं पर
नारी शक्ति के हरे पत्ते
नित नये फूट कर
करते रहे
दमघोंटू वातावरण में,
नयी ऊर्जा
नये पैमाने
नयी सोच की,
ऑक्सीजन का
उत्सृजन।
ये हरे पत्ते
सोखते रहे
परंपरा
की, जहरीली
कॉर्बन डाई ऑक्साइड
व निर्मित करते
वृहदाकार शीतल छांव।
इस
छांव तले,
बेटीयां,
जिंदगी के पन्नों पर,
करती
स्वाभिमान के हस्ताक्षर।
वे, जो
राहें चुनती,

हासिल करती,
होती
उनके सुमुख,
पितृसत्ता भी नतमस्तक।
तुम्हें
एहसास हो या ना हो
मंजिल की ओर
बढ़े
नारी के ये कदम
मुकाम
हासिल कर
विलक्षण क्षमता का
देती रहेंगी यूं ही परिचय।
✍️©® डा.सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०६/१०/२०१९

आखिरी मुलाकात

यूं तो
सालों बीते,
जब हुई थी तुम से
आखिरी मुलाकात,
तुमने, स्नेहिल स्पर्श से
मेरी हथेलियों पर
रखी थी वो गोंद की पिन्नी,
जो मैंनें
अपने हाथों से बनाई थी,
उस वक्त, अपने
अज़ीज़ दोस्त की उपस्थिति में,
तुमने, मेरे सवालों का जवाब
दिया जरूर था,
लेकिन केवल
इशारों में,
भावनाओं के वशीभूत
तुम्हारी आवाज
रुंध गई थी।
मेरी
पलकों के नीचे छिपे
जख्मों को कुरेदना,
तुमने
उचित नहीं समझा था
तुम वाकिफ थे,
मेरे हर हालात से।
तुम्हारे मेरे बीच
यही समझ
प्रेम की साक्षी रही
फिर तुम,
चले गए थे मुझ से दूर
हमेशा के लिए
लेकिन
उन पिन्नीयों में छोड़ गए थे
मुलाकात की मिठास
जिसके सहारे
करती रही तय
मैं,
जिंदगी का सफर।
एंकात
को पिघला कर,
यादों की कूची से
मन कैनवास पर
बिखेरती रही,
साथ बिताए लम्हों के रंग,
मुलाकात
की सुंगध को
यूं जीवित रखा प्रतिपल।
आज भी,
उम्मीद का एक
दीपक जलाए बैठी हूं,
जाने कब
कदम खींच लाएं तुम्हें,
मेरे बूढ़े
जिस्म की डयोढ़ी तक,
फिर
आखिरी मुलाकात के लिए
और मैं,
तुम्हारा स्नेहिल स्पर्श पा
चिरनिंद्रा में सो जाऊं…अनंत काल तक।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २४/०९/२०१९

उधार

उधार
नहीं हैं अब
मेरे ऊपर
तुम्हारे किसी
एहसान का कर्ज
चुका दिया है मोल
एक मकान
जो तूने बना कर दिया
यद्यपि उसमें भी
मेरा रहा था बराबर का योगदान
बिफरकर
नौकरी त्यागने का तुम्हारा कदम
मुझे झटका तो दे गया था
लेकिन
मेरे मजबूत
इरादों को तोड़ ना सका
तुम्हारे बच्चे भी पढ़लिख कर
ऊंचे ओहदे पर पहुंच गए हैं
तुम्हारे बाप द्वारा
कह गए शब्द
मेरे जह़न में
शूल से चुभे पड़े हैं
मेरे दस साल के बेटे का
मनोबल तोड़ते हुए
बच्चों की दादी से उन्होंने कहा था
“ये बच्चे तो भीख मांगेगें”
मेरे मासूम बेटे का सवाल
आज बीस वर्ष बाद भी
मुझे अंदर तक हिला जाता है
बेटे ने पूछा था सहमते हुए
” मां, क्या हम भीख मांगेंगे?”
मैं स्तब्ध रह गई थी
मैंने पूछा था “कौन कह रहा था?”
उसने कहा “दादा जी, दादीजी को कह रहे थे”
आज
सभी शब्दों की मार
व उनके तुच्छ सोच की
सब उधार चुकता हो चुकी है
तुम सभी को
शायद इस बात का भान नहीं था कि
एक महिला/ मां के लिए
उसकी संतान से बढ़कर कुछ नहीं
उनके लिए
वह जीवन की उल्टी धारा को
मोड़ने का अदम्य साहस रखती है
तुम्हारी मां ने भी कहा था
” मेरा बेटा नौकरी करता तो ये बालक अफसर बनते”
उन्हें भी
मेरी जैसी अंतर्मुखी बहु से
उम्मीद नहीं थी
मेरी क्लास वन अफसर की
ईमानदारी की कमाई
किसी को दिखाई नहीं देती थी
डिप्लोमा कोर्स कर
जे ई एन का पद
व उपरी कमाई पर
उन्हें घंमड था
मैंने
उस वक्त
किसी बात का
जवाब नहीं दिया था
लेकिन
एक जिद्द ठान ली थी
किया था
खुद से वादा
बिखरा जो
उसे है समेटना
आज
बीस वर्ष बाद
फक्र से कहती हूं
तुम सभी का
पिछले जन्मों का उधार हुआ चुकता
जैसे सुबह का भूला शाम को घर लौटता है
तुम आए थे
मेरे पास क्षमा मांगने
कहा था ” मेरा गुस्सा मुझे खा गया”
मैंने कहा था
” कोई बात नहीं… पिछले जन्मों का उधार उतार रही हूं”
तुम्हें अपना लिया था फिर से
क्योंकि
अराध्य सा प्रेम किया था तुमसे
मेरी एक भूल को
तुम क्षमा नहीं कर सके थे
मुझे सजा देने के लिए
त्याग दी थी तुमने अपनी “शाही नौकरी ”
ये ” शाही नौकरी” का जुमला भी
तुम्हारे बाप का था
बता देना उन्हें
ईमानदारी की नौकरी ने बहुत बरकत दी
मिली विद्यार्थियों की दुआएं
मुझे कोई घंमड नहीं है
लेकिन
अपने संस्कारों
और
क्षमता पर है अटूट विश्वास और रहेगा।
✍️ ©® डा सन्तोष चाहार ” ज़ोया” १२/०९/२०१९

मुमकिन

है मुमकिन
स्नेह की चादर पर
रिश्तों के मोती सजाना
थोड़ा झुक कर
थोड़ा मुस्कुरा कर

है मुमकिन
बुजुर्गों से लेना
आशिर्वाद
थोड़ा उन्हें सुनकर
थोड़ी सेवा कर
लगा पाएं जख्मों पर मरहम

है मुमकिन
बेटियो के सपनों को
मिलना परवाज़
गर मुक्त हो
उनके कदम
दोहरे मापदंड से

है मुमकिन
शिक्षित हो समाज
दीप से दीप जले
मिट जाए
गहन अंधकार
निभाएं हम इंसानियत धर्म

है मुमकिन
कृषक बन जाए
खुशहाल
अपनी उपज़
का दाम तय
करने का हो अधिकार

है मुमकिन
वंचित को मिले
योजनाओं का लाभ
भ्रष्टाचार
का भस्मासुर
गर स्मूल नष्ट कर दिया जाए

है मुमकिन
लेना शुद्ध हवा में स्वास
गर ठान लें
जन जन
विस्तार दे जंगलों को
रोपण कर एक एक वृक्ष

बूंद बूंद
योगदान दे कर
मुमकिन है
राष्ट्र को कर पाएं
स्थापित
गगनचुंबी मुकाम पर।
✍️ ©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २८/०८/२०१९