Category Archives: steps

एहसास

तुम्हें,
एहसास नहीं,
तुम्हारे द्वारा फेंकें गए
एक एक पत्थर को चुन चुन कर,
यथार्थ की धरती पर,
टूटे सपनों को
उसने
हकीकत में बदला।
तुमने
सोचा था, कि
पाषाण हृदय से टकरा कर
वह
चूर चूर हो जाएगी।
वक्त
बना गवाह,
कुरीतियों के
पत्थर तोड़कर
सदियों से अंतस में दफ़न
हौंसले का बीज
पनपकर
विशाल वृक्ष बना।
उसकी,
शाखाओं पर
नारी शक्ति के हरे पत्ते
नित नये फूट कर
करते रहे
दमघोंटू वातावरण में,
नयी ऊर्जा
नये पैमाने
नयी सोच की,
ऑक्सीजन का
उत्सृजन।
ये हरे पत्ते
सोखते रहे
परंपरा
की, जहरीली
कॉर्बन डाई ऑक्साइड
व निर्मित करते
वृहदाकार शीतल छांव।
इस
छांव तले,
बेटीयां,
जिंदगी के पन्नों पर,
करती
स्वाभिमान के हस्ताक्षर।
वे, जो
राहें चुनती,

हासिल करती,
होती
उनके सुमुख,
पितृसत्ता भी नतमस्तक।
तुम्हें
एहसास हो या ना हो
मंजिल की ओर
बढ़े
नारी के ये कदम
मुकाम
हासिल कर
विलक्षण क्षमता का
देती रहेंगी यूं ही परिचय।
✍️©® डा.सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०६/१०/२०१९

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आखिरी मुलाकात

यूं तो
सालों बीते,
जब हुई थी तुम से
आखिरी मुलाकात,
तुमने, स्नेहिल स्पर्श से
मेरी हथेलियों पर
रखी थी वो गोंद की पिन्नी,
जो मैंनें
अपने हाथों से बनाई थी,
उस वक्त, अपने
अज़ीज़ दोस्त की उपस्थिति में,
तुमने, मेरे सवालों का जवाब
दिया जरूर था,
लेकिन केवल
इशारों में,
भावनाओं के वशीभूत
तुम्हारी आवाज
रुंध गई थी।
मेरी
पलकों के नीचे छिपे
जख्मों को कुरेदना,
तुमने
उचित नहीं समझा था
तुम वाकिफ थे,
मेरे हर हालात से।
तुम्हारे मेरे बीच
यही समझ
प्रेम की साक्षी रही
फिर तुम,
चले गए थे मुझ से दूर
हमेशा के लिए
लेकिन
उन पिन्नीयों में छोड़ गए थे
मुलाकात की मिठास
जिसके सहारे
करती रही तय
मैं,
जिंदगी का सफर।
एंकात
को पिघला कर,
यादों की कूची से
मन कैनवास पर
बिखेरती रही,
साथ बिताए लम्हों के रंग,
मुलाकात
की सुंगध को
यूं जीवित रखा प्रतिपल।
आज भी,
उम्मीद का एक
दीपक जलाए बैठी हूं,
जाने कब
कदम खींच लाएं तुम्हें,
मेरे बूढ़े
जिस्म की डयोढ़ी तक,
फिर
आखिरी मुलाकात के लिए
और मैं,
तुम्हारा स्नेहिल स्पर्श पा
चिरनिंद्रा में सो जाऊं…अनंत काल तक।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २४/०९/२०१९

उधार

उधार
नहीं हैं अब
मेरे ऊपर
तुम्हारे किसी
एहसान का कर्ज
चुका दिया है मोल
एक मकान
जो तूने बना कर दिया
यद्यपि उसमें भी
मेरा रहा था बराबर का योगदान
बिफरकर
नौकरी त्यागने का तुम्हारा कदम
मुझे झटका तो दे गया था
लेकिन
मेरे मजबूत
इरादों को तोड़ ना सका
तुम्हारे बच्चे भी पढ़लिख कर
ऊंचे ओहदे पर पहुंच गए हैं
तुम्हारे बाप द्वारा
कह गए शब्द
मेरे जह़न में
शूल से चुभे पड़े हैं
मेरे दस साल के बेटे का
मनोबल तोड़ते हुए
बच्चों की दादी से उन्होंने कहा था
“ये बच्चे तो भीख मांगेगें”
मेरे मासूम बेटे का सवाल
आज बीस वर्ष बाद भी
मुझे अंदर तक हिला जाता है
बेटे ने पूछा था सहमते हुए
” मां, क्या हम भीख मांगेंगे?”
मैं स्तब्ध रह गई थी
मैंने पूछा था “कौन कह रहा था?”
उसने कहा “दादा जी, दादीजी को कह रहे थे”
आज
सभी शब्दों की मार
व उनके तुच्छ सोच की
सब उधार चुकता हो चुकी है
तुम सभी को
शायद इस बात का भान नहीं था कि
एक महिला/ मां के लिए
उसकी संतान से बढ़कर कुछ नहीं
उनके लिए
वह जीवन की उल्टी धारा को
मोड़ने का अदम्य साहस रखती है
तुम्हारी मां ने भी कहा था
” मेरा बेटा नौकरी करता तो ये बालक अफसर बनते”
उन्हें भी
मेरी जैसी अंतर्मुखी बहु से
उम्मीद नहीं थी
मेरी क्लास वन अफसर की
ईमानदारी की कमाई
किसी को दिखाई नहीं देती थी
डिप्लोमा कोर्स कर
जे ई एन का पद
व उपरी कमाई पर
उन्हें घंमड था
मैंने
उस वक्त
किसी बात का
जवाब नहीं दिया था
लेकिन
एक जिद्द ठान ली थी
किया था
खुद से वादा
बिखरा जो
उसे है समेटना
आज
बीस वर्ष बाद
फक्र से कहती हूं
तुम सभी का
पिछले जन्मों का उधार हुआ चुकता
जैसे सुबह का भूला शाम को घर लौटता है
तुम आए थे
मेरे पास क्षमा मांगने
कहा था ” मेरा गुस्सा मुझे खा गया”
मैंने कहा था
” कोई बात नहीं… पिछले जन्मों का उधार उतार रही हूं”
तुम्हें अपना लिया था फिर से
क्योंकि
अराध्य सा प्रेम किया था तुमसे
मेरी एक भूल को
तुम क्षमा नहीं कर सके थे
मुझे सजा देने के लिए
त्याग दी थी तुमने अपनी “शाही नौकरी ”
ये ” शाही नौकरी” का जुमला भी
तुम्हारे बाप का था
बता देना उन्हें
ईमानदारी की नौकरी ने बहुत बरकत दी
मिली विद्यार्थियों की दुआएं
मुझे कोई घंमड नहीं है
लेकिन
अपने संस्कारों
और
क्षमता पर है अटूट विश्वास और रहेगा।
✍️ ©® डा सन्तोष चाहार ” ज़ोया” १२/०९/२०१९

मुमकिन

है मुमकिन
स्नेह की चादर पर
रिश्तों के मोती सजाना
थोड़ा झुक कर
थोड़ा मुस्कुरा कर

है मुमकिन
बुजुर्गों से लेना
आशिर्वाद
थोड़ा उन्हें सुनकर
थोड़ी सेवा कर
लगा पाएं जख्मों पर मरहम

है मुमकिन
बेटियो के सपनों को
मिलना परवाज़
गर मुक्त हो
उनके कदम
दोहरे मापदंड से

है मुमकिन
शिक्षित हो समाज
दीप से दीप जले
मिट जाए
गहन अंधकार
निभाएं हम इंसानियत धर्म

है मुमकिन
कृषक बन जाए
खुशहाल
अपनी उपज़
का दाम तय
करने का हो अधिकार

है मुमकिन
वंचित को मिले
योजनाओं का लाभ
भ्रष्टाचार
का भस्मासुर
गर स्मूल नष्ट कर दिया जाए

है मुमकिन
लेना शुद्ध हवा में स्वास
गर ठान लें
जन जन
विस्तार दे जंगलों को
रोपण कर एक एक वृक्ष

बूंद बूंद
योगदान दे कर
मुमकिन है
राष्ट्र को कर पाएं
स्थापित
गगनचुंबी मुकाम पर।
✍️ ©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २८/०८/२०१९

टंकार

उदासी
के पंजों से
छीनी खुशियां अपार
रात के
रुखे रुखे पतों से
छीना अपना अधिकार
छांव के
जख्मों से छीना
सीना तान चलने का व्यवहार
जिंदगी के
कोहरे से छीना
निज़ अस्तित्व का आधार
राह की
दुश्वारियों से छीना
मंजिल का ओजस्वी संसार
पतझड़ के
मौसम से छीनी
बंसत की रंगीन बहार
बैचेनी के
मेघों से छीनी
आंनद की सौंधी फुहार
मुश्किलों के
पर्वत से छीनी
हौंसलों की तलवार
जीवन के
मरुस्थल में उगाए
आत्मविश्वास के गुंचें
पितृसत्ता
की तोड़ी
असंख्य कंटीली बेड़ियां
सूरज को
हथेली पर उगाया
चांद को खिलौना बनाया
तारों से सुंदर परिधान सजाया
मैं
इक्कीसवीं
सदी की बेटी हूँ
समुंद्र में दीप जलाती हूँ।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २०/०८/२०१९

बेजुबां इश़्क

सरेराह
मिलकर गुज़रा वो
अज़ीज हसरतों का गुंचा लिए
डायरी के सफ़हों सी उजली
उसकी मासूम तमन्ना
जो
पिंजरबंद रही
ऊसलों के शहर
बंद मुठ्ठी में रेत सी
उसके
इश़्क की कहानी
शाख़
से टूटे पतों सा नसीब
कुछ लम्हें रीत गए
कुछ यूं ही बीत गए
एक
खास लम्हा
ख़त की सांसे बन
जीने की राह दिखा गया
बेजुबां इश़्क
का उजला ये पहर रहा।

सफ़र-ए-इश़्क
कुछ यूं तय हुआ
जूं
रात की मुठ्ठी में दिन निहित
और हो
घने अंधेरों से गुजरना चिन्हित
समर्पित
दिलों की दास्तां
रवायतों के
महीन धागों में
यूं उलझी
जूं
कूकुन में तितली
इश़्क के
सब्र का पहिया
अदब से फिर
नया मोड़ मुड़ गया
वक्त
की छैनी से
तराशता रहा
प्रेम पत्थरों को
रुह
का रुह से
जारी रहा मौन संवाद
मिसाल -ए- इश़्क
की
लिखी गई
यूं
अद्वितीय गाथा
फिर भी
हसीं दिलों में ठहर सी गई
मिलन की कसक
चाहतों के परिंदे
भर उड़ान
चूमना चाहें
एक दूजे का माथा।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २६/०७/२०१९

प्रेम पींग

आज
हवाओं ने फिर
खामोश शोर मचाया
ऐसा लगा
शहर में दीवाना
दस्तक लाया
रुठे साज़ों ने
हठ छोड़, छेड़ी
वही पुरानी तान
धड़कते
हंसी दिलों के
थिरके थे जब अरमान।

जुदाई
की ऋतु में
जहाज़ -ए इश़्क
टक्कराता रहा
तूफानी लहरों के प्रचंड वेग से
दिल के
खामोश आंगन में
बरसे थे
विरह के बादल
टिप टिप टिप
आंखों की कोरों से
टपकी थी यादें
अश्रु बन।

प्रीत
डोर की
उलझी गाठें
सुलझीं,
जात,धर्म, बिरादरी
की ढही दीवारें
शनैः शनैः
दमघोंटू
परम्पराओं के
कुंद हुए हथौड़े
नयी राहें
इंगित करती
नये उज़ाले
नयी मंजिलें
जीवन पतंग
ने छुआ
इंसानियत का
विस्तृत गगन।

समरसता
की सुरमई बेला
प्रेमी युगलों
के हिस्से की
बंद झरोखों से
छन छन
आने लगी धूप
इंतजार
की घड़ियां हुई रुख्सत
प्रेम तरु
पर डल गई पींगें
मन पंछी के
रात दिन लगे महकने
दिल- ए-बागबां की
चिड़िया लगी चहकने।
✍️©® डा. सन्तोष चाहार “ज़ोया”२०/०७/२०१९

गिरहें

टूटे धागों
को जोड़कर
ख्वाब बुनने जब
मैं चली
ढूंढती रही
वह
रेशम की डोरी
जिसमें
गुथे थे प्रेम के मोती
सागर से चुन चुन कर लाए थे तुम
तूफानों से टकराए थे तुम
फिर अचानक
ओढ़ ली
तुमने
खामोशी की चादर
जिंदगी
के चक्रवात में घिरे
हम
पत्तों जूं उड़ गए
तुम गिरे
माली की बगिया
मेरा ठिकाना
बियाबान जंगल
मंजिलें
हो गई जुदा
रेत
सा वजूद जिंदगी का
हाथ से फिसलती ही जा रही थी
कि
अचानक
एक मोड़ पर हुई मुलाकात
पकड़े थे
तुम वह रेशम की डोरी
अनगिनत
गिरहें उसकी
तुम खोल ना पाए
जब
मैंने खोला तो पाया
हर गिरह
तुम्हारे
टूटे आत्मविश्वास
की कहानी दर्ज किए थी
तुम
वो शख्स ही नहीं थे
जिसे टूटकर चाहा था मैंने
स्पष्ट था
मखमली बिछौने पर सोते हुए भी
तुम्हारी अंतर-आत्मा कचोटती हो जैसे
जंगलों
में रहकर
अस्तित्व की लड़ाई लड़
मेरा कद
तुम्हारे से कहीं ज्यादा बड़ा हो गया था
तुम
जीतकर भी हार चुके थे
और
मैंने हारी बाजी
जीत ली थी
क्योंकि
मेरे प्रेम की डोर में गिरहें नहीं थी।

✍️©® डा सन्तोष चाहार “जोया”२७/०५/२०१९

बगावत

“हैलो बेटा जूही”
रमा ने शाम सात बजे अपनी बेटी जूही को फोन लगाया। लेकिन अभी लाइन व्यस्त का संदेश आ रहा था। रमा ने सोचा थोड़ी देर में दुबारा मिला लूंगी और वह किचन में रात के खाने की तैयारी में जुट गई। रमा बेटी के साथ मित्रवत ही रहती थी।
जूही, एक सुंदर, आत्मविश्वासी लड़की, जो कि पिछले तीन साल से एम।एन।सी। में मुम्बई में मैनेजर के पद पर कार्यरत
थी। रमा की पहली संतान, खूब दुलार से पली पढ़ी और उच्च संस्थानो से एम। बी।ए। कर अच्छे पैकेज पर कैंपस प्लेसमेंट लेकर अपनी क्षमता का लोहा मनवा रही थी। जॉब के तीन साल तक रमा और शशांक ने उसे कभी शादी के लिए बाध्य नहीं किया था। लेकिन अब शशांक का स्वास्थ्य भी ज्यादा ठीक नहीं रहता था क्योंकि एक साल पहले ही हॉर्ट सर्जरी हुई थी और समय से पहले रिटायरमेंट ले लिया था। इकलौती संतान थी तो रमा के सास ससुर भी चाहते थे कि शादी धूमधाम से हो जाए चूंकि उन्हें भी पोती की शादी का बहुत चाव था। दूसरी बात ये भी थी कि रिश्ते नातेदार भी कभी ना कभी अहसास करा ही देते थे कि, “लड़की की उम्र निकली जा रही है और शादी नहीं कर रहे हो क्या?”

“हैलो मम्मा” इस बार जूही ने फोन लगाया था।
” हां, बेटा, कैसी हो?”
“बहुत खुश हूं मम्मा” अभी अपने ऑफिस से निकली हूं। मेरी दोस्त नीना का फोन आया हुआ था , जूही बताती चली।
“बेटा, एक बहुत बढ़िया रिश्ता आया है, उसी के संबंध में बातचीत करनी है” रमा ने अपना पासा फेंकने की कोशिश की।
” मम्मा आपको पता है, मैं इस तरह की एरेंजड़ मैरिज में विश्वास नहीं करती… मैं किसी भी अजनबी से शादी कैसे कर सकती हूं… मुझे पहले बताओ कौन है, क्या करता है। कहाँ से शिक्षा हुई है.. कितना पैकेज है…?” जूही की लम्बी लिस्ट थी सवालों की और रमा समझ नहीं पा रही थी, इतना कम बोलने वाली जूही इतने प्रश्न उठा रही है।
” बेटा, लड़का पूना में इंफोसिस में चीफ मैनेजर है। सुंदर, गठीला शरीर और बढिया व्यक्तित्व का धनी है। तीस लाख का पैकेज है….गोत्र भी नहीं मिलते हैं…तेरे पापा के एक दोस्त ने रिश्ता बताया है…वे लोग घर आए थे और रिश्ते के लिए तैयार हैं… हमने ही कहा था कि एक बार बेटी से बात कर लेते हैं…।”
” मम्मा, ऐसा है, मैं अभी कुछ नहीं कह सकती जब तक लड़के से मिलकर बातचीत ना हो जाए… उसको समझ ना लूं… ऐसे कैसे शादी कर लूं”।
“ऐसा है, बेटा, किसी को भी आप सारी जिंदगी भी नहीं समझ सकते… क्या समझ लोगी कुछ दिनों में..तेरे पापा को ही मैं समझ नहीं पायी इतने सालों में.. हमारे स्वयं के विचार भी बदलते रहते हैं… शादी ब्याह में बड़ों की पारखी नज़र होती है… दादा जी भी चाहते हैं ये रिश्ता हो जाए… ” इस बार रमा अपनी पूरी कोशिश कर रही थी।
” मम्मा, बस अब और नहीं सुनना मुझे… पढ़ लिखकर क्या हमारी समझ इतनी विकसित नहीं है कि अपना भला बुरा सोच सकें… आप लड़के का बॉयोडाटा वटसप कर दें…लिंकड़न पर मैं सारा चैक कर लूंगी… और यदि लड़का बातचीत करना चाहता है तो उसका नंबर मुझे दे देना…”।

“ठीक है, बेटा, भेज देती हूं लेकिन मुझे नहीं लगता वे बातचीत में रूचि दिखाएगा… शायद उसके मां बाप को भी ये बात पंसद ना आए” रमा ने हिचकते हुए कहा।
” मम्मा, फिर ठीक है ना। जो लड़का अभी भी मां बाप की ही अंगुली पकड़ कर चलना चाहता है तो बात करने का क्या मतलब है… शादी जीवन भर का बंधन है और यदि एक पढ़ा लिखा व्यक्ति अपना खुद का वजूद नहीं रखता तो ऐसे व्यक्ति से बातचीत किसलिए… मैं मानती हूं मां बाप का आशिर्वाद लेना चाहिए लेकिन उसके अपने भी कुछ ख्यालात होगें शादी के संबंध को लेकर… अच्छा मम्मा मैं रखती हूं, अभी जिम जाना है… बॉय”। जूही की बेबाकी से एकबारगी तो रमा अचम्भे में थी लेकिन शांत मन से सोचा तो लगा कि ठीक ही तो कह रही है। रमा जीवन के तीस साल पीछे चली जाती है जब वह अपनी कोई पंसद नापंसद नहीं बता पायी थी। हिम्मत ही नहीं होती थी उस जमाने में। जहां पिता, ताऊ व चाचा ने रिश्ता तय किया, चुपचाप शिरोधार्य था। पढ़ीलिखी तो वह भी थी, लेकिन मज़ाल अपनी कोई बात रख सकें। शादी के बाद भी कोई परेशानी होती तो यही कहा जाता था कि, ” अब वही तुम्हारा घर है। एडजस्ट करो”। रमा को याद है उसके बाद सारी उम्र एडजस्टमेंट में ही गुज़री थी…पहले अपने मायके की इज्ज़त की खातिर, फिर अपनी बच्ची की खातिर…।

शंशाक ने भोजन करने के पश्चात पूछा था रमा से…इस रिश्ते को लेकर। रमा ने जो बातचीत हुई थी जस की तस बता दी थी। शशांक कुछ नहीं बोले। रमा ने कहा, ” आप चिंता ना करें… क्या मालूम बातचीत करने से जूही को लड़का पंसद आ जाए”। शशांक ने अपने दोस्त को सारी स्थिति से अवगत करवाया और जूही को बातचीत के लिए मोबाइल नंबर दे दिया गया। मुंबई और पूना की दूरी भी बहुत अधिक नहीं थी, सो जूही ने नीलेश से मिलने का प्लान बनाया। दो चार बार वे एक दूसरे से लंच पर मिले, जिंदगी व शादी के फलसफे पर चर्चा हुई। नीलेश मुंबई भी आया। एक महीने बाद जूही ने अपनी मम्मा को फोन कर सारी बातचीत का निष्कर्ष बताया।
” मम्मा, मैं इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हूं”
“क्यों, बेटा। क्या हुआ?” रमा परेशान हुई।
” नीलेश, दिखने में तो बहुत आधुनिक है। बेरेंड सूटबूट है। महंगे होटल्स में खाने का शौकीन है। घूमने फिरने का भी शौक है…” जूही बताती जा रही थी।
” फिर , दिक्कत कहां है?” रमा ने सीधा सवाल किया क्योंकि उसे घुमा फिराकर कहना पंसद नहीं था।
” मम्मा, नीलेश की सोच वही पुरुष प्रधान मानसिकता वाली है… उसके हर एक एक्शन से साबित हो रहा था कि पढ़ने लिखने से उसके ज्ञानचक्षु नहीं खुले हैं…ये डिग्रीयां केवल अच्छे ओहदे पर पहुंचने के लिए हैं उसके लिए.. चूंकि मैं शादी से पहले सब बातें रखना चाहती थी तो मैंने अपनी साथी दोस्तों के बारे में बताया तो उसके चेहरे पर ईर्ष्या के भाव स्पष्ट थे…और उसने ये भी कहा कि शादी के बाद ये पुरुषमित्रों से वास्ता नहीं रखना है…।”
” बेटा, ये सब बातें उससे कहने की क्या जरूरत थी। पुरुषों को ईर्ष्या होती ही है…”
” मम्मा , ऐसा है। जो व्यक्ति शादी की नींव ही अविश्वास पर रखना चाहता है तो मैं ऐसे व्यक्ति से शादी नहीं कर सकती.. चाहे मुझे ताउम्र अविवाहित रहना हो…।”
रमा को बहुत तनाव हो रहा था क्योंकि रिश्ता खुद चलकर आया था और वह तो सोच रही थी, ये शादी की जिम्मेवारी भी पूरी हो जाए तो गंगा नहा लें। लेकिन इस लड़की के बगावती तेवर के सामने किसी का बस नहीं चलेगा। ये तो घर में सब जानते थे कि बचपन से ही जिस बात पर अड़ जाती तो किसी चेतावनी से भी नहीं डरती थी। अपने बाप पर गई थी। बाप की तरह काम में होशियार तो थी ही, सोशल सर्कल का दायरा भी विस्तृत था और इसीलिए, उसके दोस्तों की फेरहिस्त में लड़के व लड़कियां दोनों शामिल थे। जूही में कभी जैंडर बॉयस नहीं था। हर रिश्ते में क्लेरिटी चाहती थी बस।
रमा ने शाम को शशांक को वस्तुस्थिति से अवगत कराया। दादा जी तो बहुत गुस्से में थे लेकिन शशांक बेटी की जिद्द के आगे झुक गए। वे समझते थे कि नया जमाना है इसके साथ कदम मिलाना ही बेहतर है। जूही ने ये भी स्पष्ट कर दिया था कि वह शादी अपनी पंसद से ही करेगी। दो साल इस तरह और बीत गए और फिर एक दिन जूही ने रमा को फोन करके बताया कि वह निशांत से शादी करना चाहती है। निशांत सजातिय नहीं था। दादाजी पुराने ख्यालात के आदमी थे।.घर में खूब हंगामा किया लेकिन जूही ने कहा कि, ” आप लोग यदि शादी नहीं करेंगे तो हम दोनों कोर्ट मैरिज कर लेगें। निशांत सुलझा हुआ लड़का है और अच्छे पद पर उसके ही ऑफिस में चीफ मैनेजर है। उसके घर वाले भी शादी के लिए तैयार हैं”। इकलौती बेटी की शादी के खूब सुनहरे ख्वाब देखे थे रमा और शशांक ने। जूही निशांत को मिलवाने घर लाई थी। बातचीत करके शशांक ने फैसला किया कि शादी धूमधाम से होगी। बेटी की खुशी से बढ़कर उनके लिए कुछ नहीं है। पढ़ा लिखा परिवार मिल रहा था। शुभ मुहूर्त देखकर दोनों पक्षों के रीति रिवाज से शादी संपन्न हो गई। जूही और निशांत की जॉब भी विदेश में अच्छी कंपनी में निश्चित हो गई थी। अपने सपनों को साकार करने दोनों विदेश चले गए। दोनों को ही दुनिया भ्रमण का शौक था। जूही पांच साल बाद निशांत के साथ देश वापिस लौट आई। रमा और शशांक नाना नानी बन चुके थे। नातिन को देखकर दोनों का दिल गदगद हो रहा था। बिल्कुल नन्ही जूही ही थी और उन्हें इस बात का डर भी था कि उनकी नातिन भी एक दिन जूही और निशांत के फैसलों पर बगावत करेगी। खैर जो भी हो अभी वे उसके बचपन को एन्जॉय कर रहे थे।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “जोया”०२/०४/२०१९

मोहब्बतें

रविवार का दिन था। रमा, अपनी बहन से मिलने दिल्ली (द्वारीका)उसके घर पहुंची ही थी कि उसने दरवाजे पर ही सुनाई पड़ा कि उसकी बहन दीपा, बेटी ईवा पर जोर जोर से चिल्ला रही थी। दरवाजा चूंकि खुला था तो वह अंदर चली गई । अंदर जाकर देखा तो ईवा की नानी व मामाजी भी आए हुए थे। वे ईवा के रिश्ते के सिलसिले में ही उदयपुर से पहुंचे थे। सबके चेहरों पर हवाईयां उड़ रही थी। दीपा को समझ नहीं आया कि ईवा से ऐसी क्या गलती हुई है। रमा, मां व भाई के साथ बैठे ईवा के पापा को नमस्ते कर वहीं बैठ गई। नानी उठकर, दूसरे कमरे में चली गई, ईवा के पास। रमा ने ईवा के पापा सोमबीर से पूछा, “कि, क्या बात है?” रमा को डर था कहीं भड़क ना जाएं। सोमबीर ने कहा ” ये लड़की, दूसरी जाति के लड़के से शादी करना चाहती है और ऐसा मैं हरगिज़ नहीं होने दूंगा”। रमा आधुनिक ख्यालात की सुलझी हुई महिला थी। उसने सोमबीर से कहा, ” क्या हो गया? दूसरी जाति के लोग क्या इंसान नहीं होते?” सोमबीर के तेवर अब और तीखे हो गए। उनको वैसे भी रमा की आजाद ख्याली पंसद नहीं थी और उन्हें संशय रहता था कि कहीं ,रमा उनकी बेटियों को बहका ना दे। शंकालु प्रवृत्ति के इंसान तो थे ही शुरू से। रमा की भी उनसे बनती नहीं थी। सोमबीर ने कहा, ” गांव के सरपंच की पोती है, ईवा। चौधरी परिवार की आन बान है। यदि इसने जिद की तो मैं, इसकी बोटी बोटी काट दूंगा”। रमा को बहुत अचम्भा हुआ ये सब सुनकर। वैसे भी खाप पंचायतों के फरमान आए दिन अखबारों में पढ़ती रहती थी। घर का माहोल तनाव पूर्ण हो चुका था। ईवा के मामाजी ने सोमबीर और बहन दीपा को समझाने की काफी कोशिश की, लेकिन दोनों टस से मस नहीं हुए। ईवा, बहुत ही सुंदर, शिक्षित इंजीनियर लड़की, घर और रिश्तेदारी में सबसे बड़ी थी। इतने सालों में पहली बार उसने अपनी कोई इच्छा रखी थी। ईवा, संवेदनशील भी बहुत थी और मां बाप की हर बात को शिरोधार्य करती आई थी अबतक। अभी भी बड़ी शालीनता से अपनी बात रखी थी।

सन् 2002 का भारत था, जब लड़कियों की शिक्षा दिक्षा बढ़चढ़ कर हो रही थी। लेकिन गांव/शहर के समाज की सोच में परिवर्तन बहुत ही धीमी गति से हो रहा था। खूब शोर शराबा हुआ उस दिन। ईवा, रमा मौसी को बहुत मानती थी। दोनों ने रातभर बातचीत की क्योंकि इस वक्त उसे ऐसे सबंल की जरूरत थी जो उसकी भावनाओं को समझ सके। रमा को ईवा से पता लगा कि, प्रशांत, इंजीनियरिंग कॉलेज में उसके सीनियर थे और अब विदेश में जॉब कर रहे हैं। ईवा ने बताया कि वे पिछले पांच सालों से संपर्क में हैं। रमा ने उसको नैतिक समर्थन दिया और समझा दिया था, ” कि ये तुम्हारा पारिवारिक मामला है तो दखल नहीं दे सकती लेकिन तुम मजबूती से अपने ‘ इश़्क’ के लिए खड़ी रहो।” सोमबीर की बातें ईवा ने सुन ही ली थी और वह बहुत आहत हुई थी। वह कुछ निश्चय करके सो गई। रमा अगले दिन वापिस अपने घर आ गई थी और बहुत दुखी थी ईवा के लिए। पंद्रह दिन बीत गए तब रमा की छोटी बहन, शिखा का फोन आया कि , “क्या ईवा तुम्हारे पास आई है? वह गाड़ी लेकर निकली थी सुबह और शाम हो गई, घर नहीं पहुंची है। वहां सब परेशान हैं”। रमा का मन भी बहुत विचलित हो रहा था। एक घंटे बाद खबर मिली कि उसकी कार दुर्घटना हो गई है, थोड़ी चोट लगी है लेकिन वैसे ठीक है। रमा, मिलने हॉस्पिटल पंहुची तो ईवा के मां बाप भी वहीं थे। रमा को ईवा ने कहा, ” मौसी, मैं जीना नहीं चाहती थी, इसलिए गाड़ी तेज़ स्पीड़ में चला रही थी।” रमा से अब जज्ब नहीं हुआ और उसने अब सोमबीर और दीपा से लगभग चीखते हुए कहा, ” तुम्हें, बेटी से ज्यादा अपनी झूठी शान प्यारी है। आजतक इसने वही पढ़ा, जो तुम चाहते थे। कभी गलत नहीं चली। आज़, एक ऐसे जीवनसाथी के लिए तुम्हारी इजाजत मांग रही है, जहां वह दिल दिमाग से जुड़ी है। लड़का हैंडसम है, अच्छी जॉब पर है और क्या चाहिए?आज, इसे खुदा ना खास्ता कुछ हो जाता तो अपने वसूल लेकर बैठे रहना”।

सोमबीर को अब समझ में आ गया था कि लड़की अपने जीवन से खिलवाड़ कर सकती है। दीपा ने भी अपने पति को कह दिया कि, ” अब शादी वहीं होगी, जहां ईवा चाहती है”। निर्णय हो चुका था। आज एक मां अपनी बेटी के लिए पति का साथ छोड़ बेटी के साथ खड़ी थी। चार महीने बाद शुभ मुहूर्त देखकर शादी निश्चित हो गई। सोमबीर के दोस्त ने ही सारा इंतजाम किया था और उसकी पत्नी ही खरीदारी करने ईवा के साथ गई थी। सोमबीर अपने दोस्त के सामने फफ़क कर रोया था। उसने कहा था कि, ” मेरी मर्जी से शादी करती तो गहनों से लाद देता। लम्बी गाड़ी में विदा करता”। रमा को सारी बातें पता लगती रहती थी क्योंकि वह भी इस परिवार को जानती थी। समाज को दिखाने के लिए बहुत बढिया शादी की व्यवस्था की गई लेकिन नाममात्र के गहने और कपड़ें दिए गए थे। गाड़ी देने की हैसियत थी लेकिन वह भी नहीं दी, जिद अभी भी कायम थी। रमा, सोमबीर के अड़ियल रवैए से वाकिफ़ थी। ईवा ने कोई जिद नहीं की क्योंकि उसका ‘इश़्क” मुक्म्मल हो रहा था। विदेश जाने की सारी तैयारियां पहले ही हो चुकी थी। वीजा भी लग गया था। शादी के एक सप्ताह बाद ईवा अपने जीवनसाथी के साथ विदेश चली गई। दो हंसों की जोड़ी का मिलन हो चुका था।

सन् 2017 में सोमबीर और दीपा की दूसरी बेटी, मेहा, जो अमेरिका से सुपर स्पेशलिस्ट बनकर आयी थी उसने भी अंतरजातीय प्रेमविवाह ही किया है। लेकिन चूंकि वह थोड़ी प्रैक्टिकल है तो अपने मां बाप को अपने पक्ष में शुरु से ही कर लिया था। पंद्रह साल बाद दूसरी शादी हो रही थी तो अब सोमबीर भी जमाने के साथ ताल मिला रहा था। रमा, बताती है कि, ” मेहा ने डेस्टिनेशन वेडिंग पर सोमबीर का एक करोड़ रुपया खर्च करवा दिया और वे कुछ कह भी नहीं पा रहे थे”। बड़ी बेटी ईवा ने शादी के बाद कभी घर से कुछ नहीं लिया। अमेरिका में अच्छी जॉब पर है। रमा मेरे पास बैठकर कहती है कि, ” एक बाप भी बच्चों में कितना भेदभाव कर देता है। ” पैसे का पूरा नियंत्रण सोमबीर के पास रहता था तो दीपा इस मामले में दखलंदाजी नहीं कर सकती थी। ईवा आत्मकेंद्रित हो चुकी है क्योंकि उसका दिल पिता की तरफ से टूटा था। सुसराल में सास को बहुत सम्मान दिया और प्यार किया था लेकिन वहां से भी सुनने को मिला था कि, ” बहु, हो। ज्यादा बेटी बनने की कोशिश मत करो”। रमा की छोटी भानजी, मेहा, सब बता देती है रमा को, क्योंकि वह रमा की लाड़ली है। सोमबीर और दीपा की दोनों बेटियों ने मनपसंद साथी से विवाह किया और एक नयी सोच की आधारशिला रखी। सोमबीर की दोनों बेटियां अपनी गृहस्थी में सुखी व संतुष्ट हैं। सोमबीर अब अपने दामादों की भूरी भूरी प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि, “मेरी बेटियों की च्वॉइस कम थोड़े ही है’।

रमा का मानना है कि , “लड़कियां जब हर क्षेत्र में सक्षम हैं तो ,उनमें इतनी समझ भी है कि अपना जीवनसाथी चुन सकें। झूठे दम्भ की दीवारें अब गिरनी शुरू हो चुकी हैं।अभी भी लेकिन समाज का बड़ा हिस्सा है जिन्हें ये सब बेमानी लगता है। लेकिन समझने की बात ये है कि बच्चे सक्षम हैं, अच्छी जॉब करने की क्षमता रखते हैं तो क्या जीवनसाथी चुनने की उनकी समझ नहीं है?”

✍️ ©® डा. सन्तोष चाहार “जोया” २५/०३/२०१९