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जाने क्यूं

जाने क्यूं
लड़ती रहती हूं
पंरपरा के घोडों से
निपट मूर्ख निगोड़ों से
स्व का ढ़ोल पीटते भगोड़ों से।

जाने क्यूं
टकर लेती रहती
संकीर्णता के घेरों से
दंभ में चूर पहरों से
अतीत के घाव गहरों से।

जाने क्यूं
उठा लेती हूं
तख्ती कलम दवात
धनुष तीर टंकार
धरा पर नहीं मैं भार।

जाने क्यूं
कर्म की प्रहरी बन
सज़ाती ख़्वाब धुन
ठोकती हूं ताल मैदान
जीतती निज स्वाभिमान।

जाने क्यूं
खोल फेंकती हूं पायल
बंधन जो करते हृदय घायल
होती हूं स्व दृष्टि की कायल
मोड़ना चाहती हूं वक्त का डायल।

जाने क्यूं
चाहती निजता का अंश
उड़ना चाहती गगन बिन दंश
घर बाहर के तालमेल का पंख
सीमाओं की छाती में फूंक शंख।

#नारी शक्ति # नारी स्वाभिमान #देश बने महान

✍️©® डा.सन्तोष चाहार “जोया” 08/03/2019

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हम वापिस लौट आए हैं

मां तुम क्यों आंसू बहाती हो
पिता क्यों तुम्हारी अश्रुधारा बह निकली
बच्चों तुम, क्यों हंसना भूल जाते हो
संगनी मेरी, क्यों शहादत पर नीर बहाती हो?

देखो हम लौटकर आ गए हैं
जन जन की धड़कन में समा गए हैं
देखो ये उबलता आक्रोश
आसमां से हम देख पाए हैं।

भारत मां की माटी के
कण कण में हम समाए हैं
दुश्मन की छाती चीर कर ये लाएगें
तिरंगा फिर शान से ये फहराएंगे।

हम देख रहे हैं जनता की दहाड़
दुश्मन को देगें हमेशा के लिए पछाड़
आंतक परस्तों की अब खैर नहीं
अबकी बार दुनिया देखेगी इंतकाम सही।

मां भारती की शान हमेशा बनी रहे
दुबारा इस मिट्टी में शेर दहाड़ रहे
कब्रिस्तान बना देगें ये भारत के लाल
दुश्मन को धूल चटा देगें ये वीर जवान।

हम लौट कर आ गए हैं मां
अश्रु संभाल कर इनका हौंसला बढ़ा
गर्वित हूं तुम्हारी कोख से जन्म लिया
अवसर मिला तो इस मातृभूमि पर
फिर जिंदगी दूंगा बारम्बार वार।

मातृभूमि ये रौशन रहे
वीर सपूतों की कभी कमी ना रहे
कण कण में समाए हुए हम
देश के जज्बे को करते हैं नमन।

हम वापिस आ गए हैं मां
रुह में तेरी समा गए हैं मां।

✍️ ©® डा. सन्तोष चाहार ” जोया”16/02/2019

टूटता पिंजरा

कल फिर टूटेगा
इक पिंजरा
कल फिर टूटेगा
इक बंधन
कल फिर छूटेगी
इक मैना
कल फिर हसेंगी
धरती
कल फिर हौसंले
भरेगें उड़ान
कल फिर
झुकेगा आसमान
कल फिर
होगा नय़ा सवेरा
कल फिर
लिखी जाएगी
नयी इबारत
कल फिर
चहकेगा घर आंगन
कल फिर
संस्कृति की नींव
होगी सुदृढ़
कल फिर टूटेंगी
विषमता की बेड़ियां
कल फिर
नारी का
होगा सम्मान
कल फिर उम्मीदें
चढ़ेगीं परवान
कल फिर सपने
चढ़ेगें सोपान
कल फिर
समरसता की
बहेगी बयार
क्योंकि समाज
बदल रहा है
बेटियों ने ठान ली है
वे पढ़ रहीं हैं
आगे बढ़ रही हैं
हर क्षेत्र में
गढ़ रहीं हैं
नये कीर्तिमान।

✍️©® डा.सन्तोष चाहार “जोया” 11/02/2019

रहबर

रहबर मेरे
ख्यालों में रहते नित नये सवेरे
पलकों की चिलमन तेरी

उठाए सपनों की डोली मेरी।

महकती हैं सांसे मेरी
चटकती बागवां की कली जब तेरी
तितलियां तुम्हारे हृदय की छेड़ती हैं तान
झंकृत कर जाती फिर मेरा सुरीला गान।

थिरकता है रोम का कण कण
कौंधती बिजलीयां जब नशेमन।

राही तुम मेरे कंटीले पथ के
सारथी मेरे जीवन रथ के
फूल मेरे हृदय उपवन के
शूल मेरे हर दुश्मन के।

मेरी जीवन रंगोली की बान तुम
मेरे चढ़ते सूरज़ की शान तुम
तुम से ही है रोशन मेरा नूरानी महल
जहां नित रहती खूब चहल पहल।

आसंमा के सितारों का
बनाया तुमने सुंदर बिछौना
उतार लाए चांद को नभ से
बनाया उसको फिर मेरा खिलौना।

तुम ही मेरे प्राण प्रिय
तुम ही मेरा सम्मान प्रिय
मैं प्यासी नदी मरूस्थल सी
तुम गहरा सागर मेरी जान प्रिय।

✍️©®”जोया” 11/10/2018