Category Archives: Romanticism

आखिरी मुलाकात

यूं तो
सालों बीते,
जब हुई थी तुम से
आखिरी मुलाकात,
तुमने, स्नेहिल स्पर्श से
मेरी हथेलियों पर
रखी थी वो गोंद की पिन्नी,
जो मैंनें
अपने हाथों से बनाई थी,
उस वक्त, अपने
अज़ीज़ दोस्त की उपस्थिति में,
तुमने, मेरे सवालों का जवाब
दिया जरूर था,
लेकिन केवल
इशारों में,
भावनाओं के वशीभूत
तुम्हारी आवाज
रुंध गई थी।
मेरी
पलकों के नीचे छिपे
जख्मों को कुरेदना,
तुमने
उचित नहीं समझा था
तुम वाकिफ थे,
मेरे हर हालात से।
तुम्हारे मेरे बीच
यही समझ
प्रेम की साक्षी रही
फिर तुम,
चले गए थे मुझ से दूर
हमेशा के लिए
लेकिन
उन पिन्नीयों में छोड़ गए थे
मुलाकात की मिठास
जिसके सहारे
करती रही तय
मैं,
जिंदगी का सफर।
एंकात
को पिघला कर,
यादों की कूची से
मन कैनवास पर
बिखेरती रही,
साथ बिताए लम्हों के रंग,
मुलाकात
की सुंगध को
यूं जीवित रखा प्रतिपल।
आज भी,
उम्मीद का एक
दीपक जलाए बैठी हूं,
जाने कब
कदम खींच लाएं तुम्हें,
मेरे बूढ़े
जिस्म की डयोढ़ी तक,
फिर
आखिरी मुलाकात के लिए
और मैं,
तुम्हारा स्नेहिल स्पर्श पा
चिरनिंद्रा में सो जाऊं…अनंत काल तक।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २४/०९/२०१९

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मूल प्रतियाँ

मेरे द्वारा
लिखे वो खत
जो तुमने फाड़ दिए
और
तुम्हारे खत
जो
मैंने जला दिए
उनमें कभी
बरसी थी झमाझम
दिल के बादलों से
इश्क़ की ऋचाएं ।

आंखों
के सागर में तैरी थी
मौन लफ्जों की कश्तियाँ
इश्क़ के ऑसिस में
बिखरे थे रुहानी संवाद
वो सारे खत
मेरे आंगन की
मिट्टी के
कण कण में हैं समाहित
उस मिट्टी में
रोपे गए गुलाब के गुंचों में
फूल
हमारे खतों की
मूलप्रतियां बन
खुशबूएं फैलाते रहे।

सालों की जुदाई
और उम्र के
बूढ़े होते जिस्मों में
इश्क़
यूं होता रहा जवां
क्योंकि
वो खत
इश्क़ की कहानी की
प्रतिलिपियाँ नहीं थे
हमारे खत
राधा-कृष्ण के प्रेम की भांति
सच्ची मोहब्बत के जिंदा दस्तावेज थे।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १३/०९/२०१९

उलझन

औरत
मर्द के विवाहेत्तर
संबधों को जानती हुई भी
उससे प्रेम करती है
उसे क्षमा कर
गृहस्थी की नींव
सुदृढ़ करने में
जुट जाती है
लेकिन
मर्द के सबंध में
देखा गया है
यदि
औरत
किसी पर-पुरुष से
सबंध बनाए
तो मर्द
आसमान
सर पर उठा लेता है
नौबत
विवाह-विच्छेद
मेरे ज़हन में
उलझन ये है…
सबंध
हवा में तो बनते नहीं
मर्द भी तो
दूसरे की औरत
से सबंध बनाता है
लेकिन
उसकी औरत से
कोई सबंध बनाए तो
हो जाता
मरने मारने पर आमदा
ये चरित्र के
दोहरे मापदंड
मेरी तुच्छ समझ से हैं परे।
चर्चा में
कुछ औरतें भी
केवल औरत को ही
कटघरे में खड़ा करती हैं
मर्द के खिलाफ बोलने का
शायद साहस नहीं
बचपन से
लड़की को ही
संस्कारों का बोझ
उठाने के लिए एक नारी द्वारा ही
किया जाता है तैयार
ये पितृसत्ता द्वारा
रची गहरी साजिश है
जहां
औरत ही औरत
से टकरा जाती है
सब कर्मों के
ठीकरे
औरत के सर
मढ़ दिए जाते हैं
और
हम औरतें
पुरुष द्वारा
बिछाए जाल
में फंसकर
एक दूसरे के बालों को
नोचने में मशगूल रहती हैं
तभी तो
पुरुष ठहाका लगाकर
कहता है
“औरतों की बुद्धी गुद्दी में होती है”।
✍️ ©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”०९/०९/२०१९

मुखर नारी

वाणी के
कोमल धागों से
बुनती रही वह
जिंदगी की रजाई
वक्त के
सूरज से चुनी थी
कुछ रंगीन किरणें
हृदय-आंगन में चमके थे
विलक्षण नगीने।

गम
की रातों में
चांद की चांदनी को
झरोखों से आवाज लगायी
अकेली
करती रही
तारों से संवाद
क्योंकि
मतलब परस्त
इस जहाँ में कौन देता
उसका साथ?

बर्फ से
ठंडे रिश्तों से
स्वास में घुलती रही
विचित्र सी गंध
कुलषित
संबधों के
खारे सागर को तज
जब
“स्व” का सोता फूटा
तब
करुणा की घटा बन
विस्तृत आकाश में छायी
और
नेह को
तरसते दिलों में
बदली सी बरस आयी।

खुली
किताब सी जिंदगी
के पन्नों पर
मुखर नारी का चित्र छपा दिखाई।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”०९/०९/२०१९

उत्सर्ग

जब
सूरज ढ़ल कर
यामिनी की गोद में सो जाता है
तब
चांद की खिड़की से
तुम्हारी यादें
तारों की पोटली बांध
मेरे हृदय के आकाश पर उतरती हैं
मन
के कैनवास पर
बिखर जाते हैं
पाक
मोहब्बत के रंग
मुखर होता
तेरे मेरे बीच मौन संवाद
तब
तुम समझाते हो
मेरे गुरु बन
हमारी मोहब्बत
नदी के दो किनारे
ना अपेक्षा है
ना उपेक्षा
प्रेम का उत्सर्ग यही है।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”०५/०९/२०१९

आवाज़

यादों के
गलियारों से
क्यों आवाज़ देकर
मेरी कोशिश को पंगु करते हो
मैं
टूटे ख्वाबों को
खंडित वजूद के सहारे ही सही
समेटने का भरसक प्रयत्न कर रही हूं
मेरे
कदमों में लगे
उम्मीद के पंखों को
रवायतों के
महीन मांझे से कतर
तुम
रंगीन महफ़िलों के
आसमां का ‘चांद’ बन गए
लेकिन
भूल गए शायद
तुम्हारी
‘चांदनी ‘ की दमक
सूरज के वजूद से है
और
मैं वह सूरज हूं।
इश़्क
की बाज़ी हार कर भी मैं जीती
खबर है
मेरे रचे नग्मों
पर
तुम हर महफ़िल में
ढ़ोल की धाप पर थिरकते हो
मुकम्मल इश़्क
का साक्ष्य
इससे बढ़कर क्या?
तुम
कहते थे
इश़्क
वो स्वाति की बूंद है
जिसकी चाह में
चातक टकटकी लगाए
मेघों को ताकता है
जानते हो
वही बूंद
मेरे रग रग में
तुम्हारी रुह को समेटे
मोती बन चुकी है
इसलिए
तुम अब
यादों के गलियारों से
आवाज़ ना दो
मुझे
इस दुर्लभ मोती संग
ही जीने दो।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १७/०८/२०१९

फ़ना मोहब्बत

तेरे
हिस्से का वक्त
मेरी जिंदगी की घड़ी में
चुपके से यादों की बौछार करता है
और मैं रुह तक भीग जाती हूं
तेरे संग
आंखों रुपी कैमरे से ली तस्वीरें
खामोशी से शोर मचाती हैं
और मैं
दिल के कानों
पर हाथ रख लेती हूं
परमंपराओं
के पहाड़ ढ़ोते ढ़ोते
इश़्क की दास्तां बूढ़ी हो चली
मोहब्बत में फ़ना होने का जज्बा
आज़ भी जवां है।
✍️©® डा. सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०८/०८/२०१९

राहें

वो राह
कहीं छूट गई
जिस राह पर
दो कदम साथ चले
हम और तुम

रह गए
शेष
टूटे दिलों पर
कसमें वादों के
आंसुओं से उकेरे निशां

जुदाई
के दशकों बाद भी
तेरे आशियाने तक
जाती हुई राह
पर गुजरते हुए
कदम
आज भी
ठिठक जाते हैं

बूढी
हसरतों में
उदासियों के कंकड़
आज भी
शूल से चुभते हैं

स्नेहिल
रिश्तों में जमी
आहों की बर्फ
ठिठुरन बन
पहली प्रीत के
निश्छल संवाद पर
नागफ़नी सी उग आई थी

फिर
आया था
बागबां इश़्क में
पतझड़ का मौसम
मासूम इरादों
के पीले पते
उस राह पर
आज भी बिखरे पड़े हैं
जहां से
तुम्हारे और मेरे घर का पता
तुम और हम
जानबूझकर भूले
ताकि
पनप सके
विश्वास का कल्पवृक्ष
और
निश्चिंत हो सकें
हमारे
सात फेरों के जीवनसाथी

लेकिन
क्या कोई ताकत
मिटा सकी है
उन पवित्र राहों को
जिनके किनारों पर
हर क्षण
खिलते हैं
इश़्क के आत्मीय पुष्प

ये राहें
दिल की नाजुक
पगडंडियों से होकर गुजरती हैं
जिन पर
रंग बदलती
दुनिया के दस्तूर
बेमानी हैं
जहां
होता है
हुस्न-ओ-इश्क़
का
एकछत्र शासन
और सजती है
रुमानियत की भव्य रंगशाला।
✍️©® डा.सन्तोष चाहार “ज़ोया”०३/०८/२०१९

प्रेम पींग

आज
हवाओं ने फिर
खामोश शोर मचाया
ऐसा लगा
शहर में दीवाना
दस्तक लाया
रुठे साज़ों ने
हठ छोड़, छेड़ी
वही पुरानी तान
धड़कते
हंसी दिलों के
थिरके थे जब अरमान।

जुदाई
की ऋतु में
जहाज़ -ए इश़्क
टक्कराता रहा
तूफानी लहरों के प्रचंड वेग से
दिल के
खामोश आंगन में
बरसे थे
विरह के बादल
टिप टिप टिप
आंखों की कोरों से
टपकी थी यादें
अश्रु बन।

प्रीत
डोर की
उलझी गाठें
सुलझीं,
जात,धर्म, बिरादरी
की ढही दीवारें
शनैः शनैः
दमघोंटू
परम्पराओं के
कुंद हुए हथौड़े
नयी राहें
इंगित करती
नये उज़ाले
नयी मंजिलें
जीवन पतंग
ने छुआ
इंसानियत का
विस्तृत गगन।

समरसता
की सुरमई बेला
प्रेमी युगलों
के हिस्से की
बंद झरोखों से
छन छन
आने लगी धूप
इंतजार
की घड़ियां हुई रुख्सत
प्रेम तरु
पर डल गई पींगें
मन पंछी के
रात दिन लगे महकने
दिल- ए-बागबां की
चिड़िया लगी चहकने।
✍️©® डा. सन्तोष चाहार “ज़ोया”२०/०७/२०१९

बेहिसाब मोहब्बत

बेहिसाब मोहब्बत की सज़ा हुई कुछ यूं मुकर्रर
जलते अंगारों पर चलती रहे वफ़ा जूं उम्र भर

तारीख ऐलान करेगी मेरी मोहब्बत का फ़साना
तेरी बेवफाई पर एक दिन जमकर हंसेगा जमाना

भ्रमर जूं मंडराते रहे बागों में तितलियों संग तुम
मधु के अतिरेक से एक दिन हो जाओगे खुद बेदम

घमंड के बादलों पर होकर सवार जो चले हो तुम
मेरी पीड़ की बरखा ना करेगी तेरी गुहार पर रहम

उम्र के साठवें साल ने दी है तेरे दरवाजे पर दस्तक
अल्हड़ सी, आदतें नहीं की हैं अभी तुमने रुखसत

विषपान कर हमेशा तुम्हें दिया ममता का आंचल
घुंघरू तोड़कर चली, न खनकेंगी तेरे नाम की पायल

अंतिम सांसो की माला जब तेरी होने लगेगी मद्वम मद्वम
चलचित्र की भांति, तेरे हृदयपटल पर चुभेगी मेरी कलम।

✍️©® डा सन्तोष चाहार “जोया” १३/०६/२०१९