Category Archives: Romanticism

लम्हों की दास्तां

लम्हों की दास्तां

समुंद्र किनारे बैठकर यूं ही कितनी यादें ताजा हो गईं हैं।
आज से बीस साल पहले जब गोवा के रमणीय स्थलों को देखने के पश्चात, मैं एक बालू तट पर आकर बैठ गई थी। समुंद्र में उठती गिरती लहरों में टटोल रही थी, तुम्हारे साथ बिताए लम्हों की दास्तां।

प्रेम का सबसे खूबसूरत अहसास  मेरे मन मस्तिष्क में ऑक्सीजन बनकर जिंदगी को तरोताजा कर गया था। समुंद्र के वक्ष पर इठलाती बलखाती लहरें, हमें एक-दूसरे के कितने समीप ले आईं थीं। तुम्हारी बाहों में सिमटी, मैं प्रेम की पराकाष्ठा तक पहुंचने के लिए लालियत, लहरों के बिछौने पर तुम्हारे अधरो की प्यास बुझाने में अनेकों दूसरे जोड़ों की भांति मदमस्त होकर, अपनी झोली में उन मोतियों को बटोर रही थी, जिनके लिए मैंने इतनी दूर का सफर तय किया था।

तुम्हारे से बिछुड़ने के बाद जिंदगी के रंग फीके होकर मेरे चेहरे पर उदासी की अस्पष्ट लकीरों में उभर आए थे। जिंदगी केवल कर्त्तव्य की नदी पर बह रही थी। किसी ने यह जानना नहीं चाहा, इस नदी में आंसुओ का समुंद्र कहां विलीन हो रहा है। नदी का कर्त्तव्य ही है सींचते जाना, अपने किनारों पर सभ्यताओं को जन्म देना और पोषित करना। तुम जानते हो, कर्त्तव्यों से मैं कभी विमुख नहीं रही लेकिन जिंदगी में कर्त्तव्यों के साथ अधिकार भी तो मिलने चाहिए। अधिकारों के लिए मुझे क्यों जूझना पड़ा? गृहस्थी में सबकुछ परफेक्ट रखने की कोशिश में, कितने ही रंगों से महरूम रही मैं। तुम जानते थे रंगों से मुझे कितना प्रेम है, लेकिन यहां किसी को परवाह नहीं थी। मेरी हसरतें जो तुम्हारे संग आकाश छूने का जनून रखती थी, धीरे धीरे शिथिल होने लगी। एक लड़की, जब विवाह बंधन के पासों में लपेट दी जाती है तो उसके ख्वाबों के पंख कतर दिए जाते हैं। विशेषतः, जहां बेमेल शादियां होती हैं। गृहस्थी के कोल्हू में मुझे खूब इस्तेमाल किया गया। इन्हीं कुछ  जिम्मेदारीयों के बीच, तुम्हारी यादें कुछ सकूं के क्षण लेकर आती थी और तुमसे मिलने की इच्छा बलवती हो जाती थी।

पति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती रही, लेकिन मुझे हर बार महसूस होता था कि, मैं दौड़ना चाहती हूं और वे एक जगह पर जम जाते हैं।  जिंदगी में इतनी तटस्थता, ठहराव मुझे नहीं भाता था क्योंकि मैं दौड़ना ही नहीं उड़ना भी चाहती थी, लेकिन मुझे एक खूंटे से बांध दिया गया था, रस्सी, उतनी ही लम्बी छोड़ी जाती थी जितना उनको मुझे उपयोग करना था और तुम्हें तो मालूम है, मेरे पांवों में तो रोलर्स लगे थे। मैं तेज़ गति से खुले मैदान और बर्फीले पहाड़ों पर रेस लगाने के रोमांच को जीना चाहती थी। तुम्हें  याद तो होगा वो जीत जब ,मैंने पी टी उषा को भी एक बार पीछे छोड़ दिया था, राष्ट्रीय स्तर की स्कूल स्पर्धा में, उस दिन पूरी टीम ने मुझे सर आंखों पर बैठा लिया था। उस दिन तुम कितने खुश थे, जब हरियाणा की एक पत्रिका में मेरी तस्वीर छपी थी और लिखा गया था, ” ये लड़की एक दिन ओलम्पिक खेलों में जाएगी”।
लेकिन, कहां जाने पाई? 1980 के दशक में हमारा समाज खेलों के विषय में जागरुक ही नहीं था। पिता जी का आदेश था, ” पढ़ाई पर ही केंद्रित रहो”। सरकार ने भी कोई सहायता सुनिश्चित नहीं की। तुम लड़के थे, तुम चले गए एन डी ए में। मुझे भी आर्मी में जाना था लेकिन लड़कियों के लिए उस दौर में नहीं थे आप्शन। तुमसे शादी कर आर्मी का हिस्सा बनना चाहा, लेकिन मेरी राय कहां ली गई थी?  जिंदगी के बहुत सारे रंग यूं ही फीके होते चले गए लेकिन तुम्हारे प्रेम का रंग शादी के बाद, मेरे अंतर्मन की गहरी कंदराओं में सिमट गया।  एक खूबसूरत अहसास जो आज भी उतना ही सुगंधित है जितना पहले प्रेम का बीज अंकुरित होने पर था। उतना ही मुलायम है, जितना पहले स्पर्श में था। आत्मीय संबंध हमेशा गहरे होते हैं।

आज भी समुंद्र के किनारे बैठकर पलकें पसारे बैठी हूं, तुम्हारे इंतज़ार में। एक बार दोबारा जीना चाहती हूं, रंगों मे में डूब जाना चाहती हूं। यहां बैठी, इन हवाओं से तुम्हारा पता पूछती रहती हूं, उन लहरों को पकड़ने की कोशिश में रहती हूं, जिन लहरों पर तुम्हारा नाम अपने नाम के साथ लिख दिया था। आसमान में उठती घटाओं में तुम्हारे अक्स को तलाशती हूं, शायद मेरे प्रेम का बादल तुम से मिलकर आया हो। पॉम के लहराते, उन दोनों वृक्षों को भी मिलकर आई हूं , जहां तुमने प्रेम के दस्खत किए थे। यहां बहुत सारी सीपियां चुनकर रखी हैं, उस सीपी को टटोलने के लिए जिस पर तुमने हमारा नाम उकेर कर समुंद्र में डाल दिया था, ये कहते हुए कि, ” हमारा प्रेम भी समुंद्र जितना गहरा है, इसे छुपा देते हैं…एक दिन ये सीपी जब किनारे पर आएगी, उस दिन हम दुबारा मिलेंगे।” आज, मैं समुंद्र किनारे, उसी सीपी को तलाश रही हूं। बालू पर एक घरौंदा भी बना लिया है, ठीक उसी जगह, जहां हम दोनों ने मिलकर बनाया था। तुम्हारा चित्र अपने चित्र के साथ उकेर दिया है। देखो, इस चित्र में हम दोनों वृद्धावस्था में पहुंच चुके हैं, लेकिन हृदय अभी भी युवा है, जहां हमारे दिलों की तरंगें फिर मिलने को आतुर हैं। मुझे विश्वास है, जब मैं सीपी को ढूंढने में कामयाब हो जाऊंगी, उसी समय तुम यहां पहुंच जाओगे। तब तक मेरी प्रतिक्षा की घड़ियां टिक टिक करती रहेंगीं।
©® ✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०२/०७/२०२०

अविवाहित लड़कियां

वे बंधी होती हैं अपने सपनों से
चूड़ियों की खनक की जगह
उन्हें सुनाई देती है कोयल की कूक,
उनके स्वास में घुली होती है
फूलों की वादियों की महक,
पायल की झंकार की जगह
वो सुनती हैं
बहते झरने का संगीत,
नदियों के संगम का आहृलादित स्वर
भरता है उनकी रगों में जोश,
पहाड़ों की ऊंचाई से सीखती हैं
वे सीना तान कर खड़ा रहना,
मस्तक पर बिंदी की जगह
उन्हें लुभाता है
आत्मसम्मान का वृहद टीका,
मंगलसूत्र की जगह
वे पहनती हैं
उपलब्धियों की माला,
लक्ष्मण रेखा के परे
वो देखती हैं विस्तृत गगन,
बाज़ सम नापती हैं नभ
बादलों से ऊपर उड़कर
आंकती हैं हुनर की क्षमता,
वे बेफिक्री से लगी रहती हैं
सपनों को हकीकत में बदलने में
समाज में उठाए गए सवालों को
कर दरकिनार,
बढ़ती हैं मंजिल की ओर
अविवाहित रहने वाली लड़कियां
इसलिए अविवाहित नहीं रहती कि,
उन्हें कोई पसंद नहीं करता,
वे शादी करेंगी
उन पुरुषों से, जिन्हें वे पसंद करेंगी
ऐसे पुरुष
जो सही मायने में उनकी उड़ान में संग संग उड़े।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २९/०६/२०२०

ग्रहण

आजकल के सामाजिक परिदृश्य में बहुत सारे उदाहरण सामने आते हैं, जहां शादियां निभाई नहीं जा रही। तलाक के केस बहुत बढ़ते जा रहे हैं। कुछ शादियां छः महीने टिकती हैं तो कोई कोई साल से दस साल तक भी चलती हैं, और फिर तलाक फॉइल हो जाते हैं। कहीं पर लड़के की कमी गिनाई जाती है तो कहीं लड़की हावी रहती है। कारण जो भी हो, जिस रफ्तार से शादीयां टूट रही हैं, वह चिंताजनक स्थिति है।  शादी की संस्था पर तलाक एक ऐसा ग्रहण है, जो समाज के ताने-बाने को एक दिन पूरा निगल जाएगा, रह जाएंगे कुंठाग्रस्त लोग, जो अपनी खुशी कहीं कहीं ढूंढते फिरेंगें। लेकिन खुशी तो हमेशा भीतर होती है, उसे हम व्यक्ति में तलाशते रहते हैं। आज की पीढ़ी को ज़रा सा भी इल्म नहीं होता, कि तलाक लेकर, वे अपने माता-पिता की भावनाओं को कितना ठेस पहुंचाते हैं। जिंदगी भर की पूंजी बच्चों के लालन-पालन, पढ़ाई व शादी में खर्च करने के पश्चात, बुढ़ापे की ओर  कदम रखते मां बाप पर एक और परेशानी आन पड़ती है। आजकल की पीढ़ी, केवल अपना स्वार्थ देखती है और कुछ भी दिक्कत उठाने को तैयार नहीं होती। कामकाजी महिलाएं, तलाक लेकर, अपने बच्चों को मां बाप के पास छोड़कर, अपने कार्य में व्यस्त रहती हैं या किसी अन्य व्यक्ति में प्रेम ढूंढ़ती हैं।
जो माता पिता अब उम्रदराज हो चुके हैं, उन्होंने अपने जीवन-काल में अनेकों कष्ट उठा कर बच्चों की परवरिश की है। ये उस दौर के लोग हैं जिन्होंने अपने माता-पिता की हर बात को शिर्योधार्य किया लेकिन अब बच्चों की सुन रहे हैं। यदि बच्चों को सुना जा रहा है तो इसका, ये मतलब तो नहीं कि बच्चे बड़े होकर सिर्फ अपने लिए जीना सीखें। कभी कभी तो लगता है कि, हमारी ही परवरिश में गलती रही, जहां हर सुविधा तश्तरी में डाल कर दे दी गई, फिर भी बच्चों को वे सुविधाएं भी कम लगती हैं। अधिकतर, लड़कियां बहुत डिमांडिंग हो गई हैं। आज़ादी के साथ , जिम्मेदारियां भी आती हैं, ये उन्हें सोचना चाहिए। मां बाप ने, बेटी को बेटों की तरह पाला है तो इसका मतलब यह कदापि नहीं होना चाहिए कि, तर्क कुतर्क कर, उनका अपमान किया जाए। हमने अपने माता-पिता की सुनी, तो बहुत सही रहे, उन्होंने जो गलती कभी की होगी ,तो उसी अनुभव से सीखकर ही मार्गदर्शन किया। आज भी, यदि माता-पिता मार्गदर्शन करना चाहते हैं तो, उन्हें भी जीवन अनुभव से सीखा है। आजकल के बच्चे टेक्नोलॉजी में होशियार हो सकते हैं, ज्यादा आमदनी कमाना जानते हों, लेकिन अनुभव तो उम्र के साथ ही आता है।
मैं, यहां बात आम मध्यम वर्ग की कर रही हूं, जहां जीवन मूल्यों को संजोकर रखा जाता था लेकिन अब इस वर्ग में भी तलाक आम बात होती जा रही है। एकदम, सब कुछ हासिल करने की होड़, त्याग व समर्पण का अवसान, भागती-दौड़ती जिंदगी में कहीं ठहराव नहीं और फिर होती है विचारों की टक्कर। ठीक है, तलाक एक अॉपशन  रखा गया था समाज में, ताकि विकट स्थितियां बनने पर अलग हो सकें। लेकिन, आजकल, मेरे संज्ञान में बहुत से केस ऐसे भी आ रहे हैं, जहां दोनों लोग कुछ समय निभाते हैं, उसमें भी अपने अपने हित साध रहे होते हैं। फिर किसी को अपनी एक्स की याद आती है तो कोई और मोटी पार्टी से दिल लगा बैठते हैं। अनेकों कारण, सिर उठाकर खड़े हो जाते हैं। समाज की संरचना जब से हुई है, बहुत से किस्से कहानियां होती थीं, लेकिन पति पत्नी, एक-दूसरे को क्षमा कर आगे बढ़ जाते थे, समाज का ढांचा बना रहता था। क्षमा करने पर डोर और भी मजबूत हो जाती थी।
आज की पीढ़ी को थोड़ा ठहरकर सोचने की जरूरत है।  जीवन अमूल्य है, इसका उपयोग कुछ रचनात्मक करने के लिए करें, परिवार के लिए कुछ बेहतर सोचें। तलाक, इस बात की गारंटी नहीं कि, आगे का जीवन सुखमय ही होगा। दूसरे व्यक्ति के साथ शादी, जरुरी नहीं सकूं ही दे। मेरे समक्ष ऐसे बहुत उदाहरण हैं, जहां मनपसंद, दूसरी शादी भी टिक ना सकी। कुछ समय, स्वंय का आत्मलोकन करने पर ,हम एक स्वस्थ समाज के योगदान में अहम भूमिका निभा सकते हैं। जिम्मेदारी, अब युवा कंधों पर है, वे कैसे समाज में रहना चाहते हैं, उन्हें ही सोचना है।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २६/०६/२०२०

रात की रानी

प्रेम पर लिखी गई सारी कविताएं
रात की रानी की लताएं होती हैं
जिनपर खिले पुष्प
चारों दिशाओं में सुगंध फैलाते हैं,
जब फूल मुरझा कर गिरते हैं
तब रोता है प्रेमी हृदय,
पुष्प के सूख जाने पर
मरने लगता है प्रेम,
सूखे पुष्पों को बटोर कर
फिर कोई प्रेमी
उनमें बसी शेष सुंगध में
टटोलता है अपना अक्स,
लगाता है अपने आंगन में
रात की रानी का पौधा,
सींचता है
उसे पीड़ा मिश्रित एहसासों से,
एहसासों की नमी पाकर
फिर खिलते हैं
रात की रानी पर प्रेम पुष्प ,
ये चक्र
अनवरत जारी रहता है
तभी तो
प्रेम कविताएं हमेशा  महकती रहती हैं।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १०/०६/२०२०

मछली

रीति रिवाजों
के धागों में उलझी
स्त्री
वैसे ही होती है
जैसे, जाल में फंसी मछली
संस्कारों की तपती भट्टी में
तपाकर
परोस दी जाती है
एक अजनबी शख्स की थाली में
जैसे
परोस दी जाती है
कड़ाही में तली मछली,
फिर वह उसे
छुरी कांटे से खाए,
या साबुत निगल जाए
सवाल कौन करेगा?
जब
सवाल नहीं किए जाते,
तब
मर जाती है एक स्त्री,
जीवित होता है बस,एक मांस का लोथड़ा
पिंजरे में कैद रुह
छटपटाती है,
यंत्रणागृह से ताकती है
विस्तृत आसमान,
लेकिन
मुक्ती भी तो देह छूटने पर ही मिलती है।

©®डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०३/०६/२०२०

प्रतिलिपियां

प्रतिलिपियां।

आंखों के काले घेरे,
औरतों की
उन कहानियों की प्रतिलिपियां हैं,
जिन्हें, वे
मुस्कराते लबों के
आवरण में ढांपे रहती हैं,
ये काले घेरे,
उनकी टूटी आस
स्याह होते सपन
और
घुटन का क्रंदन हैं,
ये कहानीयां,
जिव्हा से व्यक्त होने पर
उनकी
नैया को डोला देने का
अकूत बल रखती हैं,
पति-पत्नी के
रिश्तों की जितने गिरहें,
औरत सुलझाती है
पुरुष, उन्हें उतना ही उलझाता है
ना जाने
उसे, क्या लुत्फ़ आता है?

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १२/०५/२०२०

ख़त

ख़त

जानते हो?
मेरी जिंदगी ,एक खत बनकर रह गई है
खत का, एक एक वाक्य
जैसे तुम्हारे दिल की धड़कन,
एक एक लफ्ज़,
जैसे
मेरी पलकों में ठहरा आंसू
और
आंसू में ठहरी गहन पीड़ा
जिससे, तुम सरोकार नहीं रखते
तुमने
कभी जानना ही नहीं चाहा
कि, कैसे दर्द की कंदराओं में
एक घाव है, जो भरता ही नहीं
तुम जानते हो?
उस पर, तुम्हारे अगूंठे की छाप है,
उसको
कैसे झूठलावोगे?
जब कभी, मैं
प्रेम की कचहरी में,
मुकदमा दर्ज करवाऊंगी
तब, तुम्हारी हार निश्चित है
अंगूठे की छाप,
तुम्हारे विरुद्ध गवाही देगी।
©®डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १२/०५/२०२०

फिर कब मिलोगे?

गोवा एक्सप्रेस निर्धारित समय पर स्टेशन पहुंचने वाली थी। अदिति सपरिवार, गोवा घूमने गई थी और वहीं से बेलगाम में अपने ख़ास दोस्त के घर तीन दिन ठहरने के बाद दिल्ली लौट रही थी। अदिति के पति विनोद सिगरेट पीने के बहाने थोड़ा दूर चहलकदमी कर रहे थे। दोनों बच्चे  गोवा यात्रा में विचरण किए स्थानों पर मासूम विवेचना में उलझे हुए थे। अदिति, कर्नल मंयक के साथ खड़ी , विदाई के शिष्टाचार में व्यस्त थी। मयंक अदिति से छोटे छोटे वाक्यों में वार्तालाप कर रहा था। उसकी आंखों में अदिति ने प्रेम की वही झलक देखी, जो बीस वर्ष पहले, उसकी नींद व चैन चुरा ले गए थे। तब, जिंदगी ने, दोनों को एक मोड़ पर लाकर छोड़ दिया था, जहां से उनके रास्ते अलग जरुर हुए लेकिन प्रेम की लौ कुंद नहीं हुई थी। दो दशकों की जुदाई ओर पिछले साल से दूरभाष संपर्क ने, जलती हुई प्रेमाग्न को बढ़ा दिया था। दोनों, समाज़ की अलिखित बेड़ियों में जकड़े, आज़ भी उसी दोराहे पर खड़े थे। दोनों की अपनी गृहस्थी थी और परिवारों के प्रति समर्पण भी, लेकिन इस सबके बावजूद एक टीस जरूर थी कि मुलाकातें होती रहें। राह आसान नहीं थी। कर्नल की पत्नी नंदिता शंकालु प्रवृत्ति की थी और मयंक पर पूरा नियंत्रण रखती थी। बल्कि, यहां ये कहना ग़लत नहीं होगा कि वह मंयक को जीने की स्पेस नहीं देती थी। जिसे हम आप ‘व्यक्तिगत स्पेस’ कहते हैं। अदिति, मयंक के घर रहकर ,इस बात को संज्ञान में ले चुकी थी। अदिति ने फिर भी पूछा था, “फिर कब मिलोगे?” मयंक की आंखों में विविशता, उत्तर दे चुकी थी। आंखें, शायद कह रही हो , “ हम आपके हैं कौन?”
अश्रु, दोनों की पलकों पर ठहर चुके थे।

रेलगाड़ी प्लेटफार्म पर पहुंची। दस मिनट का स्टेशन पर ठहराव था। सारा ल्गेज़ विनोद ने सीटों के नीचे सही ढंग से लगा दिया। अदिति खिड़की वाली सीट पर आकर बैठ गई। गाड़ी ने भी धीरे धीरे गति पकड़ी। मंयक ने गाड़ी के साथ-साथ दौड़ते हुए कहा,

अगले जन्म में हम जरुर मिलेंगें”।
अदिति, मंयक और अपने बीच बढ़ते फासले को रेलगाड़ी के दरवाज़े पर खड़ी देखती रही। मयंक भी तब तक हाथ हिलाता रहा जब तक, अदिति उसकी आंखों से ओझल नहीं हो गई। विनोद बहुत ही खुश मिजाज़ व्यक्ति, जो पत्नी अदिति व मयंक की प्रेम को समझते थे। अदिति ऊपर वाली सीट पर लेटकर आंसू पौंछ रही थी। तभी पति विनोद के शब्द कानों में गूंजे, “ दो हंसो का जोड़ा बिछुड़ गया रे, गजब ….”।

प्रेम के इस स्वरुप को समाज कुछ भी नाम दे सकता है लेकिन लेखक ने साहित्यिक यज्ञ में एक आहुति डाल ही दी।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”०६/०५/२०२०

हक़

हक़

उसकी शादी हुई,
इम्तिहानों का आगाज़ हुआ
अल्हड़ सी वह लड़की,
परिक्षा के लिए बिल्कुल तैयार न थी
और
जिंदगी ने कठिन प्रश्न पत्र सामने रख दिए,
स्त्री,
सदियों से प्रश्न पत्र हल करने में लगी है
लेकिन
अधूरा ही हल कर पाती है
समय सीमा समाप्त हो जाती है
प्रश्न पत्र के अधूरे हल लेकर
वह रेतीले टीलों पर बैठकर
सोचती है
परिवार के सपनों का हिस्सा तो हल हुआ,
उसके सपनों का क्या
छूटे तो क्या ?
समाज़ रुपी जांचकर्ता,
हल हुए हिस्से से
उसे पास कर ही देगा ,
क्योंकि, ये हिस्सा उसने
पूरे विस्तार से लिखा था।
प्रश्न पत्र का,
दूसरा हिस्सा तो अनिवार्य भी नहीं था
स्त्री के लिए,
अनिवार्य होता है
झुकना, चुप रहना और सहते रहना,
उसे,जिंदगी की कठिन परीक्षा
पर, शिकायत करने का हक़ है ही नहीं
सदी, कोई भी रही।
©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”०२/०५/२०२०

क्षणिकाएं

क्षणिकाएं।

#साज़िश
कल
जो मेरे कत्ल़ की, साज़िश रच रहा था
वो
आज़, मेरे टुकड़ों पर जिंदा है।

#गिरहें
सन्नाटे में,
कैद कर रखी हैं, गिरहें मैंने
लहराते बालों सी
खुली तो, बवाल मच जाएगा।

#अभिसार

प्रेम के,
अभिसार का वायदा कर,
जाने कहां, किसने
तुम्हें, कौन सी बेड़ियों ने जकड़ा है
यह प्रश्न अनुत्तरित रहेगा।

#अवसाद

मेरी, रुह पर
जैसे पत्थर रखा है,
मैं, चीखना चाहती हूं
दम घुटने लगता है
अवसाद की, गहरी खाई में
यूं ढकेल कर,
तुम, कहां रंगरेलियां मना रहे हो?


#इतिहास

दावा,
बहुत करते हो
औरत को समझने का,
क्या, कभी झांक पाए हो
उसकी रुह की, भीतरी कोठरी में?
समझ पाए हो,
रिश्तों के कुरुक्षेत्र में,
तार तार होते, उसके वजूद का इतिहास?


©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २५/०४/२०२०