Category Archives: Respect

आखिरी मुलाकात

यूं तो
सालों बीते,
जब हुई थी तुम से
आखिरी मुलाकात,
तुमने, स्नेहिल स्पर्श से
मेरी हथेलियों पर
रखी थी वो गोंद की पिन्नी,
जो मैंनें
अपने हाथों से बनाई थी,
उस वक्त, अपने
अज़ीज़ दोस्त की उपस्थिति में,
तुमने, मेरे सवालों का जवाब
दिया जरूर था,
लेकिन केवल
इशारों में,
भावनाओं के वशीभूत
तुम्हारी आवाज
रुंध गई थी।
मेरी
पलकों के नीचे छिपे
जख्मों को कुरेदना,
तुमने
उचित नहीं समझा था
तुम वाकिफ थे,
मेरे हर हालात से।
तुम्हारे मेरे बीच
यही समझ
प्रेम की साक्षी रही
फिर तुम,
चले गए थे मुझ से दूर
हमेशा के लिए
लेकिन
उन पिन्नीयों में छोड़ गए थे
मुलाकात की मिठास
जिसके सहारे
करती रही तय
मैं,
जिंदगी का सफर।
एंकात
को पिघला कर,
यादों की कूची से
मन कैनवास पर
बिखेरती रही,
साथ बिताए लम्हों के रंग,
मुलाकात
की सुंगध को
यूं जीवित रखा प्रतिपल।
आज भी,
उम्मीद का एक
दीपक जलाए बैठी हूं,
जाने कब
कदम खींच लाएं तुम्हें,
मेरे बूढ़े
जिस्म की डयोढ़ी तक,
फिर
आखिरी मुलाकात के लिए
और मैं,
तुम्हारा स्नेहिल स्पर्श पा
चिरनिंद्रा में सो जाऊं…अनंत काल तक।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २४/०९/२०१९

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उत्सर्ग

जब
सूरज ढ़ल कर
यामिनी की गोद में सो जाता है
तब
चांद की खिड़की से
तुम्हारी यादें
तारों की पोटली बांध
मेरे हृदय के आकाश पर उतरती हैं
मन
के कैनवास पर
बिखर जाते हैं
पाक
मोहब्बत के रंग
मुखर होता
तेरे मेरे बीच मौन संवाद
तब
तुम समझाते हो
मेरे गुरु बन
हमारी मोहब्बत
नदी के दो किनारे
ना अपेक्षा है
ना उपेक्षा
प्रेम का उत्सर्ग यही है।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”०५/०९/२०१९

आवाज़

यादों के
गलियारों से
क्यों आवाज़ देकर
मेरी कोशिश को पंगु करते हो
मैं
टूटे ख्वाबों को
खंडित वजूद के सहारे ही सही
समेटने का भरसक प्रयत्न कर रही हूं
मेरे
कदमों में लगे
उम्मीद के पंखों को
रवायतों के
महीन मांझे से कतर
तुम
रंगीन महफ़िलों के
आसमां का ‘चांद’ बन गए
लेकिन
भूल गए शायद
तुम्हारी
‘चांदनी ‘ की दमक
सूरज के वजूद से है
और
मैं वह सूरज हूं।
इश़्क
की बाज़ी हार कर भी मैं जीती
खबर है
मेरे रचे नग्मों
पर
तुम हर महफ़िल में
ढ़ोल की धाप पर थिरकते हो
मुकम्मल इश़्क
का साक्ष्य
इससे बढ़कर क्या?
तुम
कहते थे
इश़्क
वो स्वाति की बूंद है
जिसकी चाह में
चातक टकटकी लगाए
मेघों को ताकता है
जानते हो
वही बूंद
मेरे रग रग में
तुम्हारी रुह को समेटे
मोती बन चुकी है
इसलिए
तुम अब
यादों के गलियारों से
आवाज़ ना दो
मुझे
इस दुर्लभ मोती संग
ही जीने दो।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १७/०८/२०१९

उधेड़बुन

रिश्तों की
स्वेटर उधड़ती रही,
वह लड़की
कर्तव्यों के धागों
से पेबंद लगाती गई
इसी उधेड़बुन में
दुल्हन से
मां, काकी, ताई
से दादी, नानी
तक का सफर
पूरा हुआ
बुढ़ापे
की दहलीज पर
आभास हुआ
खुद के लिए
जीवन जीया ही नहीं
और
जिंदगी ने
अनंत सफर की
तैयारी कर ली
स्वास
अंदर खिंचा
लेकिन
बाहर नहीं आया
आत्मा
जर्जर देह को त्याग
नया चोला
पहनने की तैयारी में
आंगन के बीच
चहलकदमी कर रही थी
विस्मित हो
दहाड़े मारते
सगे संबधियों को
सुन रही थी
उसके
गुणों के
कसीदे पढ़े जा रहे थे
हर कोई
एक अदद बीबी
मां, काकी ताई को
जर्जर देह में तलाश रहा था
चीखें
सन्नाटें में बदल गई
आंखों के आंसू
सूख चुके थे…
रह गए थे केवल
पश्चाताप व
आत्मग्लानि के अंगारे
अंनत सफ़र पर निकली
सूक्ष्म आत्मा
सबके
दुख से दुखी
उनकी सांत्वना के लिए
फिर
उधेड़बुन में
व्यस्त हो गई।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २०/०७/२०१९

जिद्दी यादें

येंं
यादें ना
जिद्दी हैं बहुतं
रात के
अंधेरे में
बेखौफ
टहलने निकल जाती हैं,
दुनिया
से बेखबर
टटोलती हैं
दिल का आंगन
सुरक्षित है जहां
वह
रुहानी ख़त
जो साक्षी रहा
इज़हार-ए-मोहब्बत का…।
यादें
बड़ी शिद्दत से ढूंढती हैं
उन
ख़तों के पुर्ज़ों को
जहां
इश़्क ने
कभी लिखी थी
वफ़ा की इबारत
और
हुस्न की आंखों में
तैरने लगी थी
सपनों की रंगीन तितलियां…।
यादों
के गलियारे में
अचानक
अमावस का हुआ बसेरा
मानसपटल
पर उग आए
कड़वी
यादों के कैक्टस
और
शूल की तरहं
चुभने लगी
वक्त की नुकीली सुईयां
लेकिन
यादें जिद्दी हैं
ठहर गई हैं
उसी मुकाम पर
जहां
हुआ था इक़रार
फिर
जुदा हुई थी राहें…।
यादें
घूमती रही
धरती की झिलमिल छत पर
जब
उग आया था चांद
सितारों से घिरा
तब
इश़्क और हुस्न
सिमट गए थे
एक दूजे की बाहों में…।
यादों
के ज़हन में
अटक गए
प्रेमपूर्ण
ख़तो के पन्ने
जो
फड़फड़ा कर
देना चाहें
रुहानी मोहब्बत
की ठोस गवाही
जब
हुस्न और इश़्क ने
बसाया था
प्रेमरस से सरोबार
स्वप्निली आशियाना…
यादें
जिद्दी हैं
सबसे बेफिक्र
रचाती इश़्क
की मेंहदी,
इश़्क
शिद्दत से
भरता हुस्न की मांग
रुमानियत के परदे में
सुहाग
की सज़ती सेज़
दुनिया के
संकीर्ण बंधनों से दूर
क्योंकि
यादें जिद्दी हैं
वे
कभी ना मानती हार।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१४/०७/२०१९

हंसते जख्म

“एक पैदाइशी पागल से तुम लोगों ने मेरी शादी कर दी। क्यों मां क्यों?” विभा आज अपनी अस्सी वर्षीय बुजुर्ग मां से झगड़ रही थी। विभा के सब्र का बांध टूट चुका था और उसका और किसी पर बस नहीं चला तो मां के पास मायके में बूढ़ी मां को उल्हाना दे रही थी। वह स्वयं भी छप्पन वर्ष की प्रौढ़ महिला, दो सयाने बच्चों की मां, अपने दिल में उठ रहे विरोध के अतिरेक को जज्ब नहीं कर पा रही थी। तेईस साल की उम्र से ही गजेटेड आफिसर के पद पर कार्यरत विभा पति के चौंतीस साल से जब तब होते हिंसात्मक व्यवहार से सख्त नाराज थी। मां ने धैर्य बंधाते हुए कहा कि ” बेटी, परिवार तो अच्छा ही देखा था। कमाऊ पूत था। घर में सबसे बड़ा। हमने तो यही सोचा था कि तुम्हारी इज्ज़त रहेगी बड़ी होने के नाते। देखने में इतना खूबसूरत जवान था कि तेरे पिता को एकदम पंसद आ गया…बेटी किसी के अंदर क्या है उसको तो भांपने का कोई यंत्र नहीं था हमारे पास।” विभा भी समझती तो सब थी। बचपन से ही हमेशा मां बाप की इज्ज़त करती आई थी। उनके संघर्ष को सलाम करती रही थी। चार बहनों में दूसरे नंबर की विभा, समझदारी में सबसे बड़ी ही लगती थी और यही कारण था कि आंख मूंद कर मां बाप की हर आज्ञा को शिरोधार्य किया था, इतने सालों तक और कभी अपनी तकलीफ भी नहीं बताई थी किसी को भी। लेकिन आज उसका दिल रो रहा था क्योंकि बेटे की सगाई से लौटते वक्त जो ड्रामा उसके पति विनेश ने किया था वह उसके लिए असहनयी था। यूं तो वह जानती है कि स्वयं की शादी से लेकर चौंतीस साल के वैवाहिक जीवन में परिवार व रिश्तेदारी में कोई प्रोग्राम ऐसा नहीं था जब विनेश ने ड्रामा ना किया हो…और विभा को ये सब अशोभनीय लगता था क्योंकि उसके संस्कार बहुत उच्च स्तरीय रहे थे और वह हर खुशी के पल को अपने जहन में कैद कर लेना चाहती थी लेकिन यहां ये महाशय सारी खुशी पर पानी फेर देते थे। पिछले बीस साल से तो वह गृहस्थी की गाड़ी अकेले अपने कंधों पर उठा रही थी क्योंकि विनेश पर “बुरी नजर” का तांत्रिक से करवाया हुआ टोटका किसी ने ऐसा किया था कि वह सचमुच में ही पागल हो गया था और विभा की ही हिम्मत थी कि उसे झेलते हुए संभव सब इलाज करवाया… और अंततः विनेश इस हद तक ठीक हो गया था कि पिछले चार पांच साल से फिर से लोगों से मिलने जुलने लगा था। विनेश के पागलपन का दौर ऐसा था कि उसका असर विभा के बच्चों पर भी पड़ा लेकिन दोनों बच्चे फिर भी आजकल की सख्त प्रतिस्पर्धा में अव्वल हो अपने मुकाम को हासिल कर चुके थे और इसीलिए विभा भी थोड़ा खुश रहने लगी थी। विभा का पति के प्रति आगाध प्रेम और समर्पण ही था जो उसने हिम्मत नहीं हारी थी जबकि वह स्वयं डिप्रेशन की दवाएं ले रही थी। एक पागल व्यक्ति को अकेले संभालते संभालते उसकी खुद की दवाई शुरू हो गई थी। विभा के जज्बे व हिम्मत की, सुसराल वाले भी दाद देते थे लेकिन आज तो वह बिफर गई थी मां के सामने। विभा की मां बहुत ही सरल स्वभाव की महिला रही हैं, जिसने खुद चुनौती भरा जीवन जीया था लेकिन पति के इंतकाल के बाद वह भी पिछले आठ साल से काफी हिल चुकी थीं। बड़ी बेटी से उनका बहुत लगाव भी था और सहारा भी यद्यपि एकमात्र बेटा किसी तरह की कमी नहीं रहने देता था।
विभा, बेटी के साथ मां से मिलने गई थी। मां तो विभा की तकलीफ से वाकिफ थी क्योंकि डिप्रेशन के फेज़ में विभा गुमसुम रहती थी लेकिन नौकरी पर जाती रही थी क्योंकि दो बच्चों की जिम्मेदारी उसके कंधों पर थी। विभा को मां ने काफी सांतवना दी लेकिन आज तो उसे जैसे भूली हुई बातें भी ताज़ा हो गई थी। विभा ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा कि ” मां, विनेश ने शादी के तीसरे दिन थप्पड़ मारा था क्योंकि सब्जी में मिर्च तेज हो गई थी और उसे नहीं मालूम था कि वह सादा सब्जी पंसद करता है… नयी बहु को सास को बताना चाहिए था… मां शादी से लेकर आजतक एक दिन ऐसा नहीं गया होगा जब मेरी आंख से आंसू ना गिरा हो… तीन महीने की बेटी जब पलंग से गिर गई थी तो मेरी लापरवाही बताते हुए उसे कुएं में डालने भागा था.. बच्चे टी वी देखने की जिद्द करते तो उठा कर उनका सिर टी वी से दे मारते थे…एक और तीन साल के नन्हें दो बच्चे… मां ये पागलपन नहीं तो और क्या है… ज्यादा रोने पर अनाज की टंकी में बंद करना, चाहे दो मिनट ही सही लेकिन बच्चों के दिमाग पर असर तो पड़ता है… थोड़ा बड़े होने पर बहन भाई में झगड़ा हो जाए तो घर से बाहर निकाल कर गेट बंद कर लेना और मुझे भी धमकी देना… ये पागलपन नहीं तो और क्या है? ” विभा की आंखों के सामने तो चलचित्र की भांति पिछले पैंतीस साल के वैवाहिक जीवन की रील जैसे चल निकली हो। विभा को अपनी नानी से ऐसे शिकायत करते देख विभा की बेटी नीना ने उसे चुप कराते हुए कहा कि ” मां, बहुत परेशान कर लिया नानी को। अब चुप करो। आपको इस शादी से हम दो प्यारे प्यारे बच्चे तो मिले हैं। खुश रहो। अब पापा की आदतों को आप बदल तो नहीं सकती। ” विभा बेटी की बात से सहमत थी बच्चे तो वाकई बहुत प्यारे हैं। वे केवल सुंदर ही नहीं हैं बल्कि उनकी सोच भी उम्दा दर्जे की है। विभा ने फिर बूढ़ी मां के हाथ पैर की मालिश की व सिर में तेल लगाकर बाल गूंथे। एक सप्ताह का समय बिताने के बाद वह मां को वायदा करके लौटी थी कि वह अपने जख्मों को हंसते हंसते सहन करती रहेगी लेकिन फिर कभी शिकायत नहीं करेगी क्योंकि अब नयी पीढ़ी को मनोबल और खुशहाल रखने का समय आ चुका है।

✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २७/०६/२०१९

बेवजह

ना हमसफर बने,ना हमनवां बन पाए
ना जाने क्यों फिर भी रोज याद आए

तेरी पलकों में रही कैद मेरी हसरतें
साज़ की धुन पर गाती दर्द भरे नगमें

घुंघराले बालों की गिरफ्त में ये दिल
अधखुले होंठों की पंखुरी जाती मचल

प्रेमदीप जला, खींची लक्ष्मण रेखा
दस्तूरों का जाल महीन गया फेंका

हर पल तेरी सीरत की रही दीवानी
यादों के झूले में झूले ये प्रेम रुहानी

सागर के सीप में ज्यूं मोती बनता
मधुर बातों का सिलसिला यूं चलता

दस्तक देती सदाएं हृदयभुवन हर पल
रात के आगोश में सुनूं तेरी विरह अग्न

दुनिया से हो बेखबर, ख्याल मैं बुनती
धड़कनों में तेरी ,मेरी धड़कन मिलती

तुमसे मिलने की उम्मीद नहीं कोई
बेवजह मैं फिर क्यूँ गीत ये गाती ?

✍️©® डा सन्तोष चाहार “जोया” ०१/०५/२०१९

मृगतृष्णा

रेत
के टीले
पर बैठकर
बालू का घरौंदा
बनाने की निरंतर कोशिश में एक बच्चा
मुठ्ठी में
भरा रेत
अंगुलियों
से झरता
बच्चा
फिर
दुबारा
उसी कोशिश में जुट जाता
जिंदगी
एक टक
देखती
ये अनवरत सिलसिला
मुठ्ठी में
रेत सी इच्छाएं
बांधने
की आदमी की लाख कोशिशें
फिसलती
रहती बार बार
वक्त
की सुई घूमती रहती अनवरत
भागते
दौड़ते
आदमी के हाथ
खाली
ही
संसार
से लेते विदा
एक दिन
और
बन जाते
उसी
मिट्टी का वजूद
जिससे पायी थी ये देह।

✍️ ©® डा संतोष चाहार “जोया” १४/०४/२०१९

बगावत

“हैलो बेटा जूही”
रमा ने शाम सात बजे अपनी बेटी जूही को फोन लगाया। लेकिन अभी लाइन व्यस्त का संदेश आ रहा था। रमा ने सोचा थोड़ी देर में दुबारा मिला लूंगी और वह किचन में रात के खाने की तैयारी में जुट गई। रमा बेटी के साथ मित्रवत ही रहती थी।
जूही, एक सुंदर, आत्मविश्वासी लड़की, जो कि पिछले तीन साल से एम।एन।सी। में मुम्बई में मैनेजर के पद पर कार्यरत
थी। रमा की पहली संतान, खूब दुलार से पली पढ़ी और उच्च संस्थानो से एम। बी।ए। कर अच्छे पैकेज पर कैंपस प्लेसमेंट लेकर अपनी क्षमता का लोहा मनवा रही थी। जॉब के तीन साल तक रमा और शशांक ने उसे कभी शादी के लिए बाध्य नहीं किया था। लेकिन अब शशांक का स्वास्थ्य भी ज्यादा ठीक नहीं रहता था क्योंकि एक साल पहले ही हॉर्ट सर्जरी हुई थी और समय से पहले रिटायरमेंट ले लिया था। इकलौती संतान थी तो रमा के सास ससुर भी चाहते थे कि शादी धूमधाम से हो जाए चूंकि उन्हें भी पोती की शादी का बहुत चाव था। दूसरी बात ये भी थी कि रिश्ते नातेदार भी कभी ना कभी अहसास करा ही देते थे कि, “लड़की की उम्र निकली जा रही है और शादी नहीं कर रहे हो क्या?”

“हैलो मम्मा” इस बार जूही ने फोन लगाया था।
” हां, बेटा, कैसी हो?”
“बहुत खुश हूं मम्मा” अभी अपने ऑफिस से निकली हूं। मेरी दोस्त नीना का फोन आया हुआ था , जूही बताती चली।
“बेटा, एक बहुत बढ़िया रिश्ता आया है, उसी के संबंध में बातचीत करनी है” रमा ने अपना पासा फेंकने की कोशिश की।
” मम्मा आपको पता है, मैं इस तरह की एरेंजड़ मैरिज में विश्वास नहीं करती… मैं किसी भी अजनबी से शादी कैसे कर सकती हूं… मुझे पहले बताओ कौन है, क्या करता है। कहाँ से शिक्षा हुई है.. कितना पैकेज है…?” जूही की लम्बी लिस्ट थी सवालों की और रमा समझ नहीं पा रही थी, इतना कम बोलने वाली जूही इतने प्रश्न उठा रही है।
” बेटा, लड़का पूना में इंफोसिस में चीफ मैनेजर है। सुंदर, गठीला शरीर और बढिया व्यक्तित्व का धनी है। तीस लाख का पैकेज है….गोत्र भी नहीं मिलते हैं…तेरे पापा के एक दोस्त ने रिश्ता बताया है…वे लोग घर आए थे और रिश्ते के लिए तैयार हैं… हमने ही कहा था कि एक बार बेटी से बात कर लेते हैं…।”
” मम्मा, ऐसा है, मैं अभी कुछ नहीं कह सकती जब तक लड़के से मिलकर बातचीत ना हो जाए… उसको समझ ना लूं… ऐसे कैसे शादी कर लूं”।
“ऐसा है, बेटा, किसी को भी आप सारी जिंदगी भी नहीं समझ सकते… क्या समझ लोगी कुछ दिनों में..तेरे पापा को ही मैं समझ नहीं पायी इतने सालों में.. हमारे स्वयं के विचार भी बदलते रहते हैं… शादी ब्याह में बड़ों की पारखी नज़र होती है… दादा जी भी चाहते हैं ये रिश्ता हो जाए… ” इस बार रमा अपनी पूरी कोशिश कर रही थी।
” मम्मा, बस अब और नहीं सुनना मुझे… पढ़ लिखकर क्या हमारी समझ इतनी विकसित नहीं है कि अपना भला बुरा सोच सकें… आप लड़के का बॉयोडाटा वटसप कर दें…लिंकड़न पर मैं सारा चैक कर लूंगी… और यदि लड़का बातचीत करना चाहता है तो उसका नंबर मुझे दे देना…”।

“ठीक है, बेटा, भेज देती हूं लेकिन मुझे नहीं लगता वे बातचीत में रूचि दिखाएगा… शायद उसके मां बाप को भी ये बात पंसद ना आए” रमा ने हिचकते हुए कहा।
” मम्मा, फिर ठीक है ना। जो लड़का अभी भी मां बाप की ही अंगुली पकड़ कर चलना चाहता है तो बात करने का क्या मतलब है… शादी जीवन भर का बंधन है और यदि एक पढ़ा लिखा व्यक्ति अपना खुद का वजूद नहीं रखता तो ऐसे व्यक्ति से बातचीत किसलिए… मैं मानती हूं मां बाप का आशिर्वाद लेना चाहिए लेकिन उसके अपने भी कुछ ख्यालात होगें शादी के संबंध को लेकर… अच्छा मम्मा मैं रखती हूं, अभी जिम जाना है… बॉय”। जूही की बेबाकी से एकबारगी तो रमा अचम्भे में थी लेकिन शांत मन से सोचा तो लगा कि ठीक ही तो कह रही है। रमा जीवन के तीस साल पीछे चली जाती है जब वह अपनी कोई पंसद नापंसद नहीं बता पायी थी। हिम्मत ही नहीं होती थी उस जमाने में। जहां पिता, ताऊ व चाचा ने रिश्ता तय किया, चुपचाप शिरोधार्य था। पढ़ीलिखी तो वह भी थी, लेकिन मज़ाल अपनी कोई बात रख सकें। शादी के बाद भी कोई परेशानी होती तो यही कहा जाता था कि, ” अब वही तुम्हारा घर है। एडजस्ट करो”। रमा को याद है उसके बाद सारी उम्र एडजस्टमेंट में ही गुज़री थी…पहले अपने मायके की इज्ज़त की खातिर, फिर अपनी बच्ची की खातिर…।

शंशाक ने भोजन करने के पश्चात पूछा था रमा से…इस रिश्ते को लेकर। रमा ने जो बातचीत हुई थी जस की तस बता दी थी। शशांक कुछ नहीं बोले। रमा ने कहा, ” आप चिंता ना करें… क्या मालूम बातचीत करने से जूही को लड़का पंसद आ जाए”। शशांक ने अपने दोस्त को सारी स्थिति से अवगत करवाया और जूही को बातचीत के लिए मोबाइल नंबर दे दिया गया। मुंबई और पूना की दूरी भी बहुत अधिक नहीं थी, सो जूही ने नीलेश से मिलने का प्लान बनाया। दो चार बार वे एक दूसरे से लंच पर मिले, जिंदगी व शादी के फलसफे पर चर्चा हुई। नीलेश मुंबई भी आया। एक महीने बाद जूही ने अपनी मम्मा को फोन कर सारी बातचीत का निष्कर्ष बताया।
” मम्मा, मैं इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हूं”
“क्यों, बेटा। क्या हुआ?” रमा परेशान हुई।
” नीलेश, दिखने में तो बहुत आधुनिक है। बेरेंड सूटबूट है। महंगे होटल्स में खाने का शौकीन है। घूमने फिरने का भी शौक है…” जूही बताती जा रही थी।
” फिर , दिक्कत कहां है?” रमा ने सीधा सवाल किया क्योंकि उसे घुमा फिराकर कहना पंसद नहीं था।
” मम्मा, नीलेश की सोच वही पुरुष प्रधान मानसिकता वाली है… उसके हर एक एक्शन से साबित हो रहा था कि पढ़ने लिखने से उसके ज्ञानचक्षु नहीं खुले हैं…ये डिग्रीयां केवल अच्छे ओहदे पर पहुंचने के लिए हैं उसके लिए.. चूंकि मैं शादी से पहले सब बातें रखना चाहती थी तो मैंने अपनी साथी दोस्तों के बारे में बताया तो उसके चेहरे पर ईर्ष्या के भाव स्पष्ट थे…और उसने ये भी कहा कि शादी के बाद ये पुरुषमित्रों से वास्ता नहीं रखना है…।”
” बेटा, ये सब बातें उससे कहने की क्या जरूरत थी। पुरुषों को ईर्ष्या होती ही है…”
” मम्मा , ऐसा है। जो व्यक्ति शादी की नींव ही अविश्वास पर रखना चाहता है तो मैं ऐसे व्यक्ति से शादी नहीं कर सकती.. चाहे मुझे ताउम्र अविवाहित रहना हो…।”
रमा को बहुत तनाव हो रहा था क्योंकि रिश्ता खुद चलकर आया था और वह तो सोच रही थी, ये शादी की जिम्मेवारी भी पूरी हो जाए तो गंगा नहा लें। लेकिन इस लड़की के बगावती तेवर के सामने किसी का बस नहीं चलेगा। ये तो घर में सब जानते थे कि बचपन से ही जिस बात पर अड़ जाती तो किसी चेतावनी से भी नहीं डरती थी। अपने बाप पर गई थी। बाप की तरह काम में होशियार तो थी ही, सोशल सर्कल का दायरा भी विस्तृत था और इसीलिए, उसके दोस्तों की फेरहिस्त में लड़के व लड़कियां दोनों शामिल थे। जूही में कभी जैंडर बॉयस नहीं था। हर रिश्ते में क्लेरिटी चाहती थी बस।
रमा ने शाम को शशांक को वस्तुस्थिति से अवगत कराया। दादा जी तो बहुत गुस्से में थे लेकिन शशांक बेटी की जिद्द के आगे झुक गए। वे समझते थे कि नया जमाना है इसके साथ कदम मिलाना ही बेहतर है। जूही ने ये भी स्पष्ट कर दिया था कि वह शादी अपनी पंसद से ही करेगी। दो साल इस तरह और बीत गए और फिर एक दिन जूही ने रमा को फोन करके बताया कि वह निशांत से शादी करना चाहती है। निशांत सजातिय नहीं था। दादाजी पुराने ख्यालात के आदमी थे।.घर में खूब हंगामा किया लेकिन जूही ने कहा कि, ” आप लोग यदि शादी नहीं करेंगे तो हम दोनों कोर्ट मैरिज कर लेगें। निशांत सुलझा हुआ लड़का है और अच्छे पद पर उसके ही ऑफिस में चीफ मैनेजर है। उसके घर वाले भी शादी के लिए तैयार हैं”। इकलौती बेटी की शादी के खूब सुनहरे ख्वाब देखे थे रमा और शशांक ने। जूही निशांत को मिलवाने घर लाई थी। बातचीत करके शशांक ने फैसला किया कि शादी धूमधाम से होगी। बेटी की खुशी से बढ़कर उनके लिए कुछ नहीं है। पढ़ा लिखा परिवार मिल रहा था। शुभ मुहूर्त देखकर दोनों पक्षों के रीति रिवाज से शादी संपन्न हो गई। जूही और निशांत की जॉब भी विदेश में अच्छी कंपनी में निश्चित हो गई थी। अपने सपनों को साकार करने दोनों विदेश चले गए। दोनों को ही दुनिया भ्रमण का शौक था। जूही पांच साल बाद निशांत के साथ देश वापिस लौट आई। रमा और शशांक नाना नानी बन चुके थे। नातिन को देखकर दोनों का दिल गदगद हो रहा था। बिल्कुल नन्ही जूही ही थी और उन्हें इस बात का डर भी था कि उनकी नातिन भी एक दिन जूही और निशांत के फैसलों पर बगावत करेगी। खैर जो भी हो अभी वे उसके बचपन को एन्जॉय कर रहे थे।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “जोया”०२/०४/२०१९

दुल्हन

शुभा के दोनों बच्चे प्रदेश में एम।एन।सी। में जॉब कर रहे हैं। पति की असमय मृत्यु के बाद से ही शुभा पर गृहस्थी की सारी जिम्मेदारी आ गई थी। वह पिछले साल ही बैंक मेनेजर पद से रिटायर हुई है। शुभा अभी रात के खाने की तैयारी कर रही थी कि फोन की घंटी घनघना उठी। देखा तो बेटे का फोन था।
“मां, आपसे बात करनी है” अमन की आवाज़ थी।
“हां, बेटा। कहो क्या कहना चाहते हो” शुभा उसे आश्वस्त कर रही थी।
“मां, आप जीवनसाथी पर रिश्ते देखना बंद कर दो”
“क्यों, क्या हुआ” शुभा चिंतित थी। अभी उससे बात करने के बाद ही तो प्रोफाइल बनाया था।
” मां, मेरी एक अच्छी दोस्त है रिया। यहीं पूना में ही जॉब करती है। हम दोनों ने इस विषय पर सोचा है कि हम चूंकि एक दूसरे को अच्छे से जानते हैं, तो क्यों ना हम जीवनसाथी बन जाएं। आपकी व दीदी की राय क्या है?”
शुभा ने रिया की सारी जानकारी ली अमन से। दोनों की समकक्ष योग्यता थी और बढ़िया पैकेज भी। शुभा को बस एक बात थोड़ी खटक रही थी कि रिया सजातिय नहीं थी और बी। सी। कैटगरी से थी। अमन के दादा जी इस विवाह के लिए बिल्कुल तैयार नहीं होंगे। शुभा की बात एक जाट परिवार से चल रही थी, लड़की खूबसूरत, लम्बा कद और नौकरीपेशा थी। शुभा ने अमन को भी फोटो भेजा था। तब अमन ने कहा था, “आपकी मर्जी”। शुभा ने कहा था अमन को, ” जिंदगी तुम्हें साथ बितानी है। हर बात तुम परिवार के हिसाब से करते आए हो। बेटा, ये जिंदगी का अहम निर्णय है। इसमे हिचकना नहीं है, तुम्हारी कोई पंसद हो तो बता देना”
शुभा द्वारा दिए हौंसले की वजह से ही आज अमन ने अपनी इच्छा बताई है। अपनी दीदी,नूर,को वह बहुत अहमियत देता था। नूर एक ऊंचे औहदे पर एम।एन।सी। में जॉब कर रही थी। शुभा ने नूर के साथ इस रिश्ते पर चर्चा की। नूर ने लड़की से बात कर सब जानकारी परिवार के बारे में जुटाई। नूर को लड़की अच्छी लगी। लेकिन अमन के दादाजी व चाचा तैयार नहीं थे। उधर शुभा, नूर और अमन ने फैसला कर लिया था कि रिया को ही घर की बहू बनाएंगे। लड़की के घर वाले भी रिश्ते से राज़ी थे। कुंडली भी उन्होंने मिलवा ली थी। अमन के दादाजी ने कहा,” गांव में सब बात बनाएंगे। लड़की हमारी जाति की नहीं है। मैं क्या जवाब दूंगा…हमारी यहां इज्ज़त क्या रह जाएगी… आदि”।
शुभा, लेकिन मन बना चुकी थी। वह उस गलती को दोहराना नहीं चाहती थी जब उसने अपनी शादी के वक्त सिर झुका कर पिता के चरणों में अपने इश़्क की बलि दे दी थी। समाज़ में इज्ज़त के डर से, पिताजी के सम्मान की खातिर, एक रुहानी प्रेम को बलिदान कर दिया था, जिसकी टीस ता उम्र उसे चुभन देती रही थी। वह नहीं चाहती थी कि बेटा भी इस दर्द से गुजरे। उसे समझ थी कि इंसान की एक ही जात है ‘इंसानियत’। जहां आपके विचार मिलते हैं, रिश्तों को लेकर एक समझ है तो जीवन सरल हो जाता है। अमन के दादा जी को भी इस रिश्ते के लिए मनाया। बेटी ने भी प्रेम विवाह किया था लेकिन तब दादाजी को मनाना आसान था क्योंकि नूर का रिश्ता जाट परिवार में ही हुआ था। लेकिन अमन के रिश्ते में ये जाति का भेद आड़े आ रहा था। खैर, जो भी हो , शुभा ने परिस्थिति को अमन के पक्ष में कर लिया था यद्यपि सबको तैयार करने में उसे काफी महीने लगे। अमन और रिया को जब निर्णय से अवगत करवाया गया तो उनकी खुशी नयनों से छलक गई। शादी की तैयारियां दोनों तरफ से शुरु हो गई…।
शहनाई की धुन वातावरण में गूंज रही थी। नववधू के चरण घर में चिंहित हो रहे थे। चूड़ियों की खनक और पायल की झंकार शुभा को अपने अतीत में ले जाती है जब वह दुल्हन बनकर इस घर में आई थी। आज उसका प्रेम, बेटे की शादी में पुष्पित पल्लवित हो रहा था।

✍️©® डा. सन्तोष चाहार “जोया”१९/०३/२०१९