Category Archives: Respect

सृष्टि चक्र#मां

मांए
कसकर बांध देती हैं
सारी तकलीफें चोटी में,
और
हर सुबह लग जाती हैं
बच्चों के सपने पूरे करने,
रोटी बेलते वक्त
आकार देती हैं, उनकी
छोटी-छोटी खुशियों को,
गर्म दूध में बोर्नविटा के साथ
घोल देती हैं अपने स्नेह की उर्जा
पति के लिए,
चाय खौलते वक्त
खौल देती हैं पिछली रात की कहासुनी ,
सभी के लिए टिफिन लगाते वक्त
छुपा देती हैं
पौष्टिक आहार के साथ दुआएं,
घर लौटने पर,
उतारती हैं सबकी नज़र
मांए
कभी थकती नहीं हैं,
लेकिन वो थकती हैं
जब उनसे कहा जाता है
“घर में सारा दिन तुम करती ही क्या हो?”
वे थकती हैं
जब, बच्चे बड़े  होने पर कहने लगें
“आप चुप रहो, हमें मालूम है सही ग़लत “
मां को थकने मत दो,
मां थक गई तो सृष्टि चक्र रुक जाएगा
जो निर्मित हुआ है वह ढ़ह जाएगा
ढ़हने से बचना है तो
मां का सम्मान करो,
उसे थकने मत दो।
©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१६/०६/२०२०

दुआ

दुआओं का कोई छोर नहीं होता
बरसने लगती हैं तब
कट जाते हैं
सारे पाप
रब की रहमत बरसती है
तो मां मिलती है
मां की दुआ बरसती है तो
हर लेती है
सारे संताप।

मैंने देखा है
मां को मंदिर में
दंडवत हो
मेरे लिए दुआ मांगते
मैं
मां के पैर पखार कर
बटोर लेती हूं दुआएं।

सब कहते हैं मां
बूढ़ी हो चली,
मैं कहती हूं
मांए कभी
बूढ़ी नहीं होती
उनकी तो
उम्र बढ़ती है।
©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २०/०५/२०२०

फिर कब मिलोगे?

गोवा एक्सप्रेस निर्धारित समय पर स्टेशन पहुंचने वाली थी। अदिति सपरिवार, गोवा घूमने गई थी और वहीं से बेलगाम में अपने ख़ास दोस्त के घर तीन दिन ठहरने के बाद दिल्ली लौट रही थी। अदिति के पति विनोद सिगरेट पीने के बहाने थोड़ा दूर चहलकदमी कर रहे थे। दोनों बच्चे  गोवा यात्रा में विचरण किए स्थानों पर मासूम विवेचना में उलझे हुए थे। अदिति, कर्नल मंयक के साथ खड़ी , विदाई के शिष्टाचार में व्यस्त थी। मयंक अदिति से छोटे छोटे वाक्यों में वार्तालाप कर रहा था। उसकी आंखों में अदिति ने प्रेम की वही झलक देखी, जो बीस वर्ष पहले, उसकी नींद व चैन चुरा ले गए थे। तब, जिंदगी ने, दोनों को एक मोड़ पर लाकर छोड़ दिया था, जहां से उनके रास्ते अलग जरुर हुए लेकिन प्रेम की लौ कुंद नहीं हुई थी। दो दशकों की जुदाई ओर पिछले साल से दूरभाष संपर्क ने, जलती हुई प्रेमाग्न को बढ़ा दिया था। दोनों, समाज़ की अलिखित बेड़ियों में जकड़े, आज़ भी उसी दोराहे पर खड़े थे। दोनों की अपनी गृहस्थी थी और परिवारों के प्रति समर्पण भी, लेकिन इस सबके बावजूद एक टीस जरूर थी कि मुलाकातें होती रहें। राह आसान नहीं थी। कर्नल की पत्नी नंदिता शंकालु प्रवृत्ति की थी और मयंक पर पूरा नियंत्रण रखती थी। बल्कि, यहां ये कहना ग़लत नहीं होगा कि वह मंयक को जीने की स्पेस नहीं देती थी। जिसे हम आप ‘व्यक्तिगत स्पेस’ कहते हैं। अदिति, मयंक के घर रहकर ,इस बात को संज्ञान में ले चुकी थी। अदिति ने फिर भी पूछा था, “फिर कब मिलोगे?” मयंक की आंखों में विविशता, उत्तर दे चुकी थी। आंखें, शायद कह रही हो , “ हम आपके हैं कौन?”
अश्रु, दोनों की पलकों पर ठहर चुके थे।

रेलगाड़ी प्लेटफार्म पर पहुंची। दस मिनट का स्टेशन पर ठहराव था। सारा ल्गेज़ विनोद ने सीटों के नीचे सही ढंग से लगा दिया। अदिति खिड़की वाली सीट पर आकर बैठ गई। गाड़ी ने भी धीरे धीरे गति पकड़ी। मंयक ने गाड़ी के साथ-साथ दौड़ते हुए कहा,

अगले जन्म में हम जरुर मिलेंगें”।
अदिति, मंयक और अपने बीच बढ़ते फासले को रेलगाड़ी के दरवाज़े पर खड़ी देखती रही। मयंक भी तब तक हाथ हिलाता रहा जब तक, अदिति उसकी आंखों से ओझल नहीं हो गई। विनोद बहुत ही खुश मिजाज़ व्यक्ति, जो पत्नी अदिति व मयंक की प्रेम को समझते थे। अदिति ऊपर वाली सीट पर लेटकर आंसू पौंछ रही थी। तभी पति विनोद के शब्द कानों में गूंजे, “ दो हंसो का जोड़ा बिछुड़ गया रे, गजब ….”।

प्रेम के इस स्वरुप को समाज कुछ भी नाम दे सकता है लेकिन लेखक ने साहित्यिक यज्ञ में एक आहुति डाल ही दी।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”०६/०५/२०२०

कमाई

कमाई

कालोनी की औरतें , अनुभा के विषय में चर्चा करती रहती  हैं और समय समय पर नयी नयी उपाधियों से अलंकृत करती रहती  हैं। कोई उसे “पागल” तो, कोई “बेवकूफ” बताता रहता है। कभी कभी तो ये महिलाएं उसे सीधे तौर पर भी कह देती थी, “तुम इन बाई लोगों को बिगाड़ रही हो”, लेकिन अनुभा की जीवनशैली में कोई फर्क नहीं पड़ता था…।

अनुभा पढ़-लिख कर, अच्छे ओहदे पर बहुत संघर्ष करने के पश्चात पहुंची थी। उसके लिए कर्म ही पूजा अर्चना थी … हमने कभी उसे मंदिर जाते नहीं देखा। बस साल में एक आध बार मुख्य अवसरों पर ही शिरकत करती थी।  व्रत उपवास में भी उसका खासा रुझान देखने को नहीं मिला… महाशिवरात्रि पर्व पर जरुर हमने उसे मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते देखा है… यूं नहीं है कि वह नास्तिक है… उसके घर से, प्रतिदिन सुबह शाम, घर के मंदिर की घंटी जरुर सुनाई देती है और दीपक/कपूर की महक भी आती है .. लेकिन इस सबके पीछे उसका मकसद पूजा अर्चना कम, बल्कि वातावरण  की शुद्धता कारक होता है… चूंकि मेरा घर उसके बगल में ही है तो यदा-कदा मेरा जाना लगा रहता है… वैसे है वह , अंतर्मुखी स्वभाव की,  बहुत गपशप नहीं करती है… कालोनी की कुछ महिलाएं, इसीलिए उसे घमंडी भी कह देती हैं… लेकिन उसकी नेकी के किस्से एक बाई से होते हुए दूसरी बाई तक पहुंचते रहते हैं और वहां से कालोनी की महिलाओं तक…।

अनुभा की विशिष्ट जीवनशैली रही है। पिछले तीस वर्षों से वह इस सेक्टर में रह रही है…हम सभी युवा थे जब हमने अपने घर यहां बनाए थे, तो पहचान पुरानी है। अनुभा के घर में  बाई /माली / धोबी/  आदि सभी  हमने शुरू से ही देखें हैं। उसे  बागवानी का भी बहुत शौक है और आफिस से आते ही खुद भी बगीचे में लगी रहती है और यही कारण है कि इतने वर्षों से सेक्टर में सब उसके बगीचे को देखकर उसकी प्रशंसा भी करते हैं… पर्यावरण संरक्षण में उसकी ये छोटी सी आहुति है।

हां , तो बात ये हो रही थी कि कालोनी की महिलाएं उसे पागल/बेवकूफ क्यों कहते हैं। अरे, भाई वो काम ही ऐसे करती रहती है। आजतक ना जाने घर में से कितनी चीजें , जिनमें, कुलर/पंखा/ सोफे/ पुराना टेलीविजन/वाशिंग मशीन/ डेस्कटॉप/ घड़ी/कालीन/सिलाई मशीन/दहेज की संदूक आदि… बहुत लम्बी फेहरिस्त है… साड़ी/सूट/चद्दर/गद्दे  की तो गिनती ही नहीं है। जब भी वह घर में कुछ नया लाती है तो  पुराना(यानी दस साल) सबसे पहले, अपने यहां लगे हेल्प से पूछती है और उन्हें एक पैसा लिए बगैर दे देती है जबकि बाजार में रिसेल में अच्छे दाम मिल सकते हैं… लेकिन नहीं। उसका एक ही मंत्र है ” जो वस्तु किसी गरीब के काम आ सकती है तो उससे पैसे बनाने की क्या जरूरत है?”
कभी मैं उसे टोक भी देती हूं,
” अनुभा, क्यों इन सबकी आदत खराब करती हो? मुफ्त की वस्तु का लोग आदर नहीं करते हैं…”। 
उसका स्पष्ट सा उत्तर होता है:
” ऐसा है, मैं कभी चंदे आदि की रसीद /या मंदिर की दान पेटियों में तो  रुपए डालती नहीं हूं… तो मेरा फंडा है कि जो आपके सामने है उसकी मदद करो… तसल्ली भी रहती है कि मदद सही जगह हो रही है…जब देश में बाढ़ या अन्य संकट आता है तो, तुम्हें मालूम है तनख्वाह में से कट ही जाता है… मधु तूझे पता तो है , रामप्यारी(मेड) मेरे यहां बीस साल से काम कर रही है… आदमी निक्कमा है, दो बेटियों की शादी में ही तो दिए थे सोफे व संदूक पोलिश करवा कर…साथ में दोनों लड़कियों को सिलाई मशीन दिलवा दी ताकि वो घर पर ही कुछ कमाई कर सकें…आज वो खुश हैं, अपना गुजर-बसर कर रही हैं… मिलने भी आती हैं। मुझे संतुष्टि मिलती है , थोड़ी मदद इस तरह मैं कर पाई”।
“अरे, भाई तुमने वो डेस्कटॉप भी तो अपने ड्राइवर को दे दिया… बच्चों के लिए लेपटाप लेना था तो, वह तेरे काम आ जाता?”
” देख, मधु, उसकी बेटी चौथी कक्षा में है और अब विद्यालयों में कम्प्यूटर जरुरी कर दिया है… एक बेटी वह भी सीख जाएगी , इसमें क्या हर्ज है?”।
“अरे, पिछली बार आंटी आईं थीं, तो वो भी तो मेरे सामने तेरी शिकायत कर रही थी , ‘मधु बेटी , इसने तो दहेज की संदूक भी दे दी… कोई  संदूक भी देता है क्या ?’

“अरे, छोड़ मां की बात। उन्हीं से तो सीखा है। बचपन से देखती आ रही हूं… कभी किसी को मना नहीं करते देखा…”

घर पर आकर, मैं भी बहुत देर तक सोचती रहती कि ,अनुभा कहती तो ठीक है , सोचती हूं कि, नौकरीपेशा है, इसीलिए ये मदद कर पाती है। एक दिन मैंने उससे पूछ ही लिया
” सुनो, अनु। तुम्हारे पतिदेव , तुम्हे कभी कुछ कहते नहीं? ऐसे चीजें बांटती रहती हो।”
” हां, कहते हैं ना…कि तेरे शौक बहुत महंगे हैं… फ़ालतू में बांटती रहती है, नयी चीज लाने का चाव रहता है… तेरा बस चले तो तू मुझे भी बदल दे( हंसती है)”।
“फिर?”
“फिर, क्या। मैं कह देती हूं , मेरा अपना ज्वेलरी/कास्मेटिक आदि का कोई खर्च नहीं है। इतना तो मैं कर ही सकती हूं… जनाब दुआएं कमाओ, यही साथ चलेंगीं… पैसे का क्या है…ढलती फिरती छांव है…आज है, कल नहीं”।

अनुभा के जीवन में भी एक ऐसा मोड़ आया कि उसकी हंसती खेलती गृहस्थी बिखरी… नहीं टूटा था तो बस उसका हौंसला और खुद पर विश्वास। अमन, अनुभा के पति,एक सड़क दुघर्टना में ऐसे चोटिल हुए कि चारपाई पकड़ ली.. रीढ़ की हड्डी में चोट थी, जिसका असर दिमाग तक गया.. अनुभा के कंधों पर भारी बोझ आन पड़ा लेकिन उसने हार नहीं मानी… परिस्थितियां विपरीत जरुर थी लेकिन उसके हौंसले को डिगा नहीं पाई…।

अनुभा के पति बीस साल की सेवा/इलाज के बाद, आज  चल फिर लेते हैं और चारपाई से उठ गए हैं लेकिन नौकरी तो छूट ही गई थी। अनुभा के बच्चे पढ़-लिखकर अच्छे ओहदे पर हैं। अनुभा के साथ साथ मैं भी बूढ़ी हो चली हूं ।  अनुभा की बहू बहुत सुलक्षणी है , दामाद भी  उसकी बहुत इज्जत करता है।  जिंदगी का विश्लेषण करती हूं तो इस निष्कर्ष पर ही पहुंचती हूं , अनुभा ने जो दुआएं कमाई थी, उन्हीं ने उसे संकट से उबारने में मदद की है।

वास्तव में यही नेक कमाई है। आज भी उसका माली जो अस्सी साल का हो गया है और उसकी बाईं( रामप्यारी) उससे मिलने आते रहते हैं। अनुभा, उन्हें अभी भी कभी खाली हाथ नहीं जाने देती…उनके पोते/दोहता/दोहती के लिए कुछ ना कुछ भेजती रहती है…  रिटायरमेंट के बाद से ही एक घंटा कालोनी की मेडस के बच्चों  का होमवर्क पूरा करवाने में सहयोग करती है…कमाई अभी भी जारी है।
©®✍️ डा सन्तोष चाहार ” ज़ोया”०८/०४/२०२०

रात्री का दूसरा पहर

प्रिय कर्नल

उम्मीद करती हूं  कोरोनावायरस जैसी महामारी के संकटकाल में तुम सपरिवार सुरक्षित होगे। प्रतिदिन मेरी प्रार्थना में तुम विशेष रूप से शामिल रहते हो। दिन के चौबीस घंटो में रात्री का दूसरा पहर हमेशा तुम्हारी यादों की पोटली ले आता है जिसमें कुछ सुखद अहसास और कुछ कड़वे अनुभव के वो घूंट भी हैं, जो हम दोनों को केवल इसलिए पीने पड़े क्योंकि हमारे समाज का ढांचा और उसकी सोच इतनी संकीर्ण है कि, इसकी संकरी गलियों से गुजरते हुए, स्थापित मापदंडों के, पत्थरों से टकरा कर चोट निश्चित ही लगती है, फिर चाहे,आपके विचार ….आपका अंतःकरण कितना ही निर्मल हो… आचरण कितना ही अनुकरणीय हो। ऐसा क्यों होता है? जिंदगी के सबसे हसीन व उर्जावान बीस वर्षों की उठा-पटक के बाद, मैं, एक ही निष्कर्ष पर पहुंची हूं कि, मनुष्य जब किसी व्यक्ति के गुणों की बराबरी नहीं कर सकता है तो वह ऐसे मौके की तलाश में रहता है कि एक, केवल एक, अवसर मिल जाए तो कैसे रुह को लहुलुहान किया जाए… फिर वह गिद्ध की तरह झपटा मारता है और शिकार को अपने पंजों में दबोच उसे तसल्ली से नोचता है।

याद है?… यही तो हुआ था हमारे साथ। अभिमन्यु की तरह, हम दोनों, एक ऐसे चक्रव्यूह में घिरे थे, जहां से निकलना दोनों के लिए अत्यंत मुश्किल था… तुम समझदार थे, रणनीति बनाने में सक्षम थे, आर्मी का तजुर्बा तुम्हारे काम आया…. चक्रव्यूह भेद, तुम कुशलता से बाहर आ गए…. तुम्हारी आंखों में पीड़ा… तुम्हारी वाणी से निकले वो रक्तरंजित शब्द…( जोरू का गुलाम हूं), आज भी बीस वर्षों के बाद मैं स्पष्ट सुन सकती हूं। मुझे ये भी मालूम है कि, ये शब्द तुमने मेरी हिफाजत के लिए ही  बोले थे….। लेकिन मैं चक्रव्यूह में चारों ओर से होने वाले कटाक्षपूर्ण बाणों की बौछार का सामना करती रही….तुम्हारी पत्नी ने वह चिठ्ठी मेरे पति को शायद दे दी थी…मेरी सहेली ने भी आग में घी डाला था, तभी तो उनकी प्रताड़ना सही….. गूंगी हो गई थी… सदमे में थी, कि चिठ्ठी में लिखी एक पंक्ति ने मेरे जीवन में  ऐसा भयानक तूफान कैसे ला दिया? तुम्हें मालूम होगा कि, उसके बंवडर से निकलने में  मुझे दशकों लगे….वह केवल एक पंक्ति नहीं थी, बल्कि मेरी भाग्यशाली रेखा की गहरी काट थी। मेरी सहेली जब भी मेरा हाथ देखती थी तो कहती थी, ” देखो कितनी लम्बी भाग्य-रेखा है!” मैंने उसके बाद से फिर किसी को हाथ नहीं दिखाया, मुझे डर था …. लेकिन नज़र तो लग चुकी थी। तुम्हें  तो पता ही है, उसी सहेली ने मेरे दिल के ताले को खोल,हम दोनों के पवित्र प्रेम की दास्तां सुनी …वे सब राज़ जाने, जो मैंनें वर्षों तक अपने सीने में दफ़न कर रखे थे…. उसका, बार बार , तुम्हारा जिक्र करने , ठिठोली करने पर तुम से मिलने की इच्छा प्रबल होती चली गई क्योंकि मुझे लगता था कि, इतने सालों की मजबूत गृहस्थी में पनपे विश्वास में अविश्वास की कोई जगह नहीं हो सकती…. फिर मेरी खोज़ शुरू हुई…. तुम्हारा पता मिला….मेरी तुम्हारी मुलाकात शादी के सोलह साल बाद हुई और दिल के कोने में सिसकता प्रेम मुखर होने को आतुर था, लेकिन हम दोनों ने ही तो खुद पर नियंत्रण रखा था… पारिवारिक दोस्ती की तरफ बढ़े कदम, एक पंक्ति की वजह से लड़खड़ाए….. इतना ही तो लिखा था, “तुम मेरा पहला प्यार हो”….. बहुत बार सोचती हूं, पति-पत्नी में भेद किसी तीसरे की वजह से कम और खुद की असुरक्षा की भावना…..खोने का डर…..साथी पर अविश्वास….की वजह से होता है। मेरी उसी सहेली ने मेरे को साथियों में हमें बदनाम किया… पता है उसकी इस हरकत की वजह से,अब मेरा, दोस्ती से विश्वास उठ चुका है… दोस्ती इतनी उथली व छिछली कैसे हो सकती है?…मेरे लिए दोस्ती के मायने बदल गए हैं। इस दुनिया में आप खुद ही अपने दोस्त हैं, बाकी जगत के सभी रिश्ते नाते केवल स्वार्थ पर टिके हैं। आजतक मैंने उसे क्षमा नहीं किया है।

सच ही कहा जाता है, ये कलयुग ही है और मनुष्य की, इसी आपाधापी और एक-दूसरे को नीचा दिखाने का परिणाम है कि, सारा विश्व एक श्राप से गुजर रहा है। जब जब धर्म की हानी होती है ऐसी विपदाओं का मनुष्य जाति को सामना करना पड़ता है। जीवन के मूल्यों में सतत गिरावट हमें गहरे संकट में डालती है…… दुनिया भर में प्रकृति के साथ छेड़खानी का गंभीर परिणाम भुगतना पड़ता है….. शायद ये संकटकाल जब बीतेगा तो मानव जाति कुछ समझदार होकर खोए प्रकृति संतुलन और ग्रहण लगे मूल्यों को, संवारने सजाने का कार्य करेगी, ऐसी मेरी आशा ही नहीं विश्वास है।

खैर, मैं भी क्या जिक्र लेकर बैठ गई। महिमा से पता चला था, तुम्हारी बेटी की शादी हो गई है। मेरी तरफ से बहुत बहुत शुभकामनाएं। तुम्हें भी तो जरुर पता चला होगा, मेरे बेटे की शादी पिछले साल नवंबर में हुई थी। बेटी, कॉरपोरेट जगत को सात साल सेवा दे चुकी है। एडलवाइज में चीफ़ मैनेजर का पद त्याग कर अपनी स्टार्टप को बिल्ड कर रही है। अभी उसका शादी का कोई इरादा नहीं है। मैंने भी कह दिया है , ” तुम जो भी करना चाहती हो करो…. शादी के अलावा भी बहुत कुछ है दुनिया में करने के लिए… मनपसंद साथी मिल जाए तब कर लेना…. नहीं तो जिंदगी तुम्हारी है… कुछ सृजनात्मक करो।”

ठीक है कर्नल, अपना ख्याल रखना। बहुत दिनों से सोच रही थी, तुमसे बात की जाए….संकट की घड़ी में अपने सभी की
खैरियत पूछने का दिल होता ही है। शुभकामनाएं।

तुम्हारी प्रेयसी

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”७/०४/२०२०

रुह के परिंदे

रुह के परिंदे हर रोज़ उड़ान भर कर उन पगडंडियों के वृहद वृक्षों पर बैठकर तुम्हारा इंतजार करते हैं जहां इश्क़ की पहली नज्म गुनगुनाई थी तुमने… याद है मुझे, मेरे शांत हृदय सागर में तब उठी थी प्रेम लहरें…फासले तय कर, आंखों में सिमट गया था तुम्हरा और मेरा वजूद। धड़कते दिलों के महासागर में कसमें वादे कश्तीयां बन, तूफानी रफ्तार से दमघोंटू बेड़ियों को काटने को आतुर थे।
ख्वाबों की जमीन पर कदमताल करते हुए हम दोनों ने एक हकीकत की दुनिया बनानी चाही…समय पंख लगाकर उड़ रहा था और हमारे सपने भी जवां हो रहे थे। सब कुछ कितना हंसी था… तुम्हारी मोहब्बत ने मुझे जिस एहसास से छुआ था उसकी खूबसूरती और गहराई इतनी थी कि मेरे रोम रोम से प्रेम का सोता फूटा था… हृदय के बगीचे में रसिक भंवरा गुंजन कर ,मधु चखता हुआ मन की कलियों पर मंडरा कर मेरी नींद भी चुरा ले गया था… इश्क़ में फ़ना हम दोनों ने प्रेम को शब्दों से नहीं नवाजा था लेकिन हम दोनों ही जानते थे कि हमें जिंदगी साथ गुजारनी है और मूक स्वीकृति हम एक दूसरे को दे चुके थे… लेकिन विधाता का लिखा आजतक कोई मिटा नहीं पाया… हमारी राहें जुदा हुई चूंकि संस्कार से बंधे थे हम। मां बाप की खुशी के लिए सामाजिक मूल्यों के हवनकुंड में निश्छल प्रेम की आहुति दे कर्त्तव्य पथ पर अग्रसर हो एक दूजे के लिए गुम हो गये थे.. यही तो कसम थी तुम्हारी…। जिंदगी अपनी रफ़्तार से चलती रहती है और हमें भी उसके साथ कदम मिलाना होता है नहीं तो बहुत कुछ पीछे छूट जाता है और फिर चाहकर भी हम उसे हासिल नहीं कर सकते।
गृहस्थ आश्रम में अपने फ़र्ज़ के प्रति सजग हम दोनों ही तो समाज द्वारा निर्धारित मापदंड तय करते हुए बुढ़ापे की दहलीज पर पहुंच गए हैं.. जुदा हुए तो बहुत कुछ बदला था। नई दुनिया, नए दोस्त,नए नाते रिश्तेदार… बस जो कुछ नहीं बदला था तो वो था मोहब्बत का एहसास… ये तो वह अनमोल निधि थी जिसे कोई चुरा ही नहीं सकता था , ठीक उसी तरह जैसे कोई शिक्षा दीक्षा को नहीं चुरा सकता… सब कुछ समाप्त भी हो जाए तो भी शिक्षा रुपी धन हमें दुबारा सक्षम बना सकता है… यही धन हमारे माता-पिता ने दिया था… ये वह दौर था जब 1970 के दशक में गांव में लड़कियों की शिक्षा दीक्षा ना के बराबर थी। तुम भी तो किसान पुत्र थे और सभी भाईयों में छोटे होने के नाते ही तुम्हें शिक्षा का अवसर मिला था। तुम्हारे दो भाई तो खेती ही करते थे…ना तुम अपने बापू के सामने हमारे प्रेम की बात कह सके और ना ही मैं। लड़की होने के नाते कहने की सोच भी नहीं सकती थी… लेकिन जीवन के छः दशकों का निष्कर्ष यही कहता है कि जहां रुहानी रिश्ते होते हैं वे बने रहते हैं… ऐसे रिश्तों पर फरिश्तों का पहला रहता है इसलिए तो मन तरंगों के माध्यम से तुम्हारे संदेश मुझे मिलते रहते हैं और मेरा प्रेम यूं ही जवां रहता है। मुझे कभी लगा ही नहीं तुम मुझसे दूर हो…जब कभी भी दुविधा में पाया तब मैं खुद से ही सवाल करती थी कि फलां स्थिति में तुम्हारी क्या राय होती… ऐसा नहीं है कि तुम्हारी बांहों के आगोश में आने को मन नहीं मचलता था… शरीर एक माध्यम है पूर्ण रूप से प्रेम को महसूस करने के लिए… लेकिन only one नहीं है… एहसास , एक अहम किरदार निभाता है प्रेम प्राप्ति में। इसी एहसास को महसूस कर, जब सब निंद्रा का आंनद ले रहे होते हैं, तब मेरे कमरे में सिर्फ मैं और तुम होते हो… मेरे एहसास , कभी कविता तो कभी कहानी बनकर कलम से कागज़ पर हमारे इश्क़ की इबादत करते हैं और मेरी रुह के परिंदे तुम्हारे हृदय के आकाश पर पंख फैला कर ऊंची उड़ान भरते हैं…तब मुझे तृप्ति का अहसास होता है।
✍️©® डा. सन्तोष चाहार ” ज़ोया” 06/12/2019

आखिरी मुलाकात

यूं तो
सालों बीते,
जब हुई थी तुम से
आखिरी मुलाकात,
तुमने, स्नेहिल स्पर्श से
मेरी हथेलियों पर
रखी थी वो गोंद की पिन्नी,
जो मैंनें
अपने हाथों से बनाई थी,
उस वक्त, अपने
अज़ीज़ दोस्त की उपस्थिति में,
तुमने, मेरे सवालों का जवाब
दिया जरूर था,
लेकिन केवल
इशारों में,
भावनाओं के वशीभूत
तुम्हारी आवाज
रुंध गई थी।
मेरी
पलकों के नीचे छिपे
जख्मों को कुरेदना,
तुमने
उचित नहीं समझा था
तुम वाकिफ थे,
मेरे हर हालात से।
तुम्हारे मेरे बीच
यही समझ
प्रेम की साक्षी रही
फिर तुम,
चले गए थे मुझ से दूर
हमेशा के लिए
लेकिन
उन पिन्नीयों में छोड़ गए थे
मुलाकात की मिठास
जिसके सहारे
करती रही तय
मैं,
जिंदगी का सफर।
एंकात
को पिघला कर,
यादों की कूची से
मन कैनवास पर
बिखेरती रही,
साथ बिताए लम्हों के रंग,
मुलाकात
की सुंगध को
यूं जीवित रखा प्रतिपल।
आज भी,
उम्मीद का एक
दीपक जलाए बैठी हूं,
जाने कब
कदम खींच लाएं तुम्हें,
मेरे बूढ़े
जिस्म की डयोढ़ी तक,
फिर
आखिरी मुलाकात के लिए
और मैं,
तुम्हारा स्नेहिल स्पर्श पा
चिरनिंद्रा में सो जाऊं…अनंत काल तक।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २४/०९/२०१९

उत्सर्ग

जब
सूरज ढ़ल कर
यामिनी की गोद में सो जाता है
तब
चांद की खिड़की से
तुम्हारी यादें
तारों की पोटली बांध
मेरे हृदय के आकाश पर उतरती हैं
मन
के कैनवास पर
बिखर जाते हैं
पाक
मोहब्बत के रंग
मुखर होता
तेरे मेरे बीच मौन संवाद
तब
तुम समझाते हो
मेरे गुरु बन
हमारी मोहब्बत
नदी के दो किनारे
ना अपेक्षा है
ना उपेक्षा
प्रेम का उत्सर्ग यही है।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”०५/०९/२०१९

आवाज़

यादों के
गलियारों से
क्यों आवाज़ देकर
मेरी कोशिश को पंगु करते हो
मैं
टूटे ख्वाबों को
खंडित वजूद के सहारे ही सही
समेटने का भरसक प्रयत्न कर रही हूं
मेरे
कदमों में लगे
उम्मीद के पंखों को
रवायतों के
महीन मांझे से कतर
तुम
रंगीन महफ़िलों के
आसमां का ‘चांद’ बन गए
लेकिन
भूल गए शायद
तुम्हारी
‘चांदनी ‘ की दमक
सूरज के वजूद से है
और
मैं वह सूरज हूं।
इश़्क
की बाज़ी हार कर भी मैं जीती
खबर है
मेरे रचे नग्मों
पर
तुम हर महफ़िल में
ढ़ोल की धाप पर थिरकते हो
मुकम्मल इश़्क
का साक्ष्य
इससे बढ़कर क्या?
तुम
कहते थे
इश़्क
वो स्वाति की बूंद है
जिसकी चाह में
चातक टकटकी लगाए
मेघों को ताकता है
जानते हो
वही बूंद
मेरे रग रग में
तुम्हारी रुह को समेटे
मोती बन चुकी है
इसलिए
तुम अब
यादों के गलियारों से
आवाज़ ना दो
मुझे
इस दुर्लभ मोती संग
ही जीने दो।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १७/०८/२०१९

उधेड़बुन

रिश्तों की
स्वेटर उधड़ती रही,
वह लड़की
कर्तव्यों के धागों
से पेबंद लगाती गई
इसी उधेड़बुन में
दुल्हन से
मां, काकी, ताई
से दादी, नानी
तक का सफर
पूरा हुआ
बुढ़ापे
की दहलीज पर
आभास हुआ
खुद के लिए
जीवन जीया ही नहीं
और
जिंदगी ने
अनंत सफर की
तैयारी कर ली
स्वास
अंदर खिंचा
लेकिन
बाहर नहीं आया
आत्मा
जर्जर देह को त्याग
नया चोला
पहनने की तैयारी में
आंगन के बीच
चहलकदमी कर रही थी
विस्मित हो
दहाड़े मारते
सगे संबधियों को
सुन रही थी
उसके
गुणों के
कसीदे पढ़े जा रहे थे
हर कोई
एक अदद बीबी
मां, काकी ताई को
जर्जर देह में तलाश रहा था
चीखें
सन्नाटें में बदल गई
आंखों के आंसू
सूख चुके थे…
रह गए थे केवल
पश्चाताप व
आत्मग्लानि के अंगारे
अंनत सफ़र पर निकली
सूक्ष्म आत्मा
सबके
दुख से दुखी
उनकी सांत्वना के लिए
फिर
उधेड़बुन में
व्यस्त हो गई।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २०/०७/२०१९