Category Archives: Love

आखिरी मुलाकात

यूं तो
सालों बीते,
जब हुई थी तुम से
आखिरी मुलाकात,
तुमने, स्नेहिल स्पर्श से
मेरी हथेलियों पर
रखी थी वो गोंद की पिन्नी,
जो मैंनें
अपने हाथों से बनाई थी,
उस वक्त, अपने
अज़ीज़ दोस्त की उपस्थिति में,
तुमने, मेरे सवालों का जवाब
दिया जरूर था,
लेकिन केवल
इशारों में,
भावनाओं के वशीभूत
तुम्हारी आवाज
रुंध गई थी।
मेरी
पलकों के नीचे छिपे
जख्मों को कुरेदना,
तुमने
उचित नहीं समझा था
तुम वाकिफ थे,
मेरे हर हालात से।
तुम्हारे मेरे बीच
यही समझ
प्रेम की साक्षी रही
फिर तुम,
चले गए थे मुझ से दूर
हमेशा के लिए
लेकिन
उन पिन्नीयों में छोड़ गए थे
मुलाकात की मिठास
जिसके सहारे
करती रही तय
मैं,
जिंदगी का सफर।
एंकात
को पिघला कर,
यादों की कूची से
मन कैनवास पर
बिखेरती रही,
साथ बिताए लम्हों के रंग,
मुलाकात
की सुंगध को
यूं जीवित रखा प्रतिपल।
आज भी,
उम्मीद का एक
दीपक जलाए बैठी हूं,
जाने कब
कदम खींच लाएं तुम्हें,
मेरे बूढ़े
जिस्म की डयोढ़ी तक,
फिर
आखिरी मुलाकात के लिए
और मैं,
तुम्हारा स्नेहिल स्पर्श पा
चिरनिंद्रा में सो जाऊं…अनंत काल तक।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २४/०९/२०१९

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मूल प्रतियाँ

मेरे द्वारा
लिखे वो खत
जो तुमने फाड़ दिए
और
तुम्हारे खत
जो
मैंने जला दिए
उनमें कभी
बरसी थी झमाझम
दिल के बादलों से
इश्क़ की ऋचाएं ।

आंखों
के सागर में तैरी थी
मौन लफ्जों की कश्तियाँ
इश्क़ के ऑसिस में
बिखरे थे रुहानी संवाद
वो सारे खत
मेरे आंगन की
मिट्टी के
कण कण में हैं समाहित
उस मिट्टी में
रोपे गए गुलाब के गुंचों में
फूल
हमारे खतों की
मूलप्रतियां बन
खुशबूएं फैलाते रहे।

सालों की जुदाई
और उम्र के
बूढ़े होते जिस्मों में
इश्क़
यूं होता रहा जवां
क्योंकि
वो खत
इश्क़ की कहानी की
प्रतिलिपियाँ नहीं थे
हमारे खत
राधा-कृष्ण के प्रेम की भांति
सच्ची मोहब्बत के जिंदा दस्तावेज थे।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १३/०९/२०१९

उत्सर्ग

जब
सूरज ढ़ल कर
यामिनी की गोद में सो जाता है
तब
चांद की खिड़की से
तुम्हारी यादें
तारों की पोटली बांध
मेरे हृदय के आकाश पर उतरती हैं
मन
के कैनवास पर
बिखर जाते हैं
पाक
मोहब्बत के रंग
मुखर होता
तेरे मेरे बीच मौन संवाद
तब
तुम समझाते हो
मेरे गुरु बन
हमारी मोहब्बत
नदी के दो किनारे
ना अपेक्षा है
ना उपेक्षा
प्रेम का उत्सर्ग यही है।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”०५/०९/२०१९

दस्तक

ये कौन
दस्तक दे रहा
दिल का दरवाजा
स्वतः ही खुल गया
फिज़ाओं में फैली
प्रीतम के
आगमन की महक
खत्म हुआ
मंजिल का इंतजार
ओह! ये मदहोशी का आलम
सब्र का बांध टूटा जाए
वो शायद
उसके शहर में हो चुका दाखिल
तभी तो
ये
दिल की धड़कन
हो रही बेलगाम
सांसो की डोर
में
प्रियतम की सांसें
ऐसे घुल रही
जैसे
दूध में शक्कर
खुद को संवारने
आईना देख
प्रयेसी ने पहनी
चटक गुलाबी रंग की साड़ी
जुड़े में ठूंसा
सुर्ख गुलाब
उसे है याद
सदियों से गुलाब
प्रीतम का पंसदीदा फूल
मोगरे का गज़रा तो वह लायेगा
चूंकिउसे
खुशबूओं से रहा बेपनाह लगाव
भौंरे की तरह
मंडराता तो था कलियों के इर्दगिर्द
कदमों की आहट सुन
प्रयेसी दौड़ी
सजाया आरती का थाल
चंदन की खुशबू से घर दिया महका
कहा ना
उसका प्रीतम
खुशबूओं से होता मदहोश
लेकिन
कदमों की आहट
कानों के दरवाजे पर हुई मद्वम
प्रेयसी उलझन में
शायद
घर के दरवाजे पर करे इंतजार
सोच रहा होगा
कि
उसकी प्रयेसी तो
धड़कन सुनने में चतुर
वह
नव यौवना की
गति से दौड़ना चाहती
ऊफ
ये दर्द करते घुटने
सपने से
जाग चुकी थी
सतर साल की वृद्धा
गर्म चाय के
प्याले में उठी खुशबू में ” दस्तक”
ज़हन में उतरी
आंखों
की कोर
गीली हो प्रेमपुष्प अर्पित कर गयी।

✍️©® डा सन्तोष चाहार “जोया” ३०/०५/२०१९

मोड़

मोड़
मुड़ गए थे तुम
चलकर साथ दो कदम
दर्द दे
जुदा हुए
डरे थे तुम
दुनिया के दस्तूरों से
दोराहे पर
छोड़ अकेला
भीड़ का हिस्सा बन गए।

प्रेम
करते थे तुम
पर दुनिया से डरते थे
मेरा प्रेम
शाश्वत
मधुर
अंंनत
सदियों से बहती धारा सा

एंकात
मुझे भाता
स्वीकार नहीं मुझे
अस्तित्वहीन भीड़ का वजूद
मेरा प्रेम
मीरा सा
राधा सा
निश्छल
निर्लिप्त।

आज भी
मेरी रुह
का हिस्सा हो तुम
फिर कहां जुदा हो तुम
इस मोड़ पर
दस्तूरों के सब दरवाजे बंद है
ना खोने का डर है ना मिलने का भ्रम
प्रगाढ़ प्रेम की धारा बहती यूं बन दुर्लभ।
✍️ ©® डा सन्तोष चाहार “जोया” १२/०४/२०१९

बगावत

“हैलो बेटा जूही”
रमा ने शाम सात बजे अपनी बेटी जूही को फोन लगाया। लेकिन अभी लाइन व्यस्त का संदेश आ रहा था। रमा ने सोचा थोड़ी देर में दुबारा मिला लूंगी और वह किचन में रात के खाने की तैयारी में जुट गई। रमा बेटी के साथ मित्रवत ही रहती थी।
जूही, एक सुंदर, आत्मविश्वासी लड़की, जो कि पिछले तीन साल से एम।एन।सी। में मुम्बई में मैनेजर के पद पर कार्यरत
थी। रमा की पहली संतान, खूब दुलार से पली पढ़ी और उच्च संस्थानो से एम। बी।ए। कर अच्छे पैकेज पर कैंपस प्लेसमेंट लेकर अपनी क्षमता का लोहा मनवा रही थी। जॉब के तीन साल तक रमा और शशांक ने उसे कभी शादी के लिए बाध्य नहीं किया था। लेकिन अब शशांक का स्वास्थ्य भी ज्यादा ठीक नहीं रहता था क्योंकि एक साल पहले ही हॉर्ट सर्जरी हुई थी और समय से पहले रिटायरमेंट ले लिया था। इकलौती संतान थी तो रमा के सास ससुर भी चाहते थे कि शादी धूमधाम से हो जाए चूंकि उन्हें भी पोती की शादी का बहुत चाव था। दूसरी बात ये भी थी कि रिश्ते नातेदार भी कभी ना कभी अहसास करा ही देते थे कि, “लड़की की उम्र निकली जा रही है और शादी नहीं कर रहे हो क्या?”

“हैलो मम्मा” इस बार जूही ने फोन लगाया था।
” हां, बेटा, कैसी हो?”
“बहुत खुश हूं मम्मा” अभी अपने ऑफिस से निकली हूं। मेरी दोस्त नीना का फोन आया हुआ था , जूही बताती चली।
“बेटा, एक बहुत बढ़िया रिश्ता आया है, उसी के संबंध में बातचीत करनी है” रमा ने अपना पासा फेंकने की कोशिश की।
” मम्मा आपको पता है, मैं इस तरह की एरेंजड़ मैरिज में विश्वास नहीं करती… मैं किसी भी अजनबी से शादी कैसे कर सकती हूं… मुझे पहले बताओ कौन है, क्या करता है। कहाँ से शिक्षा हुई है.. कितना पैकेज है…?” जूही की लम्बी लिस्ट थी सवालों की और रमा समझ नहीं पा रही थी, इतना कम बोलने वाली जूही इतने प्रश्न उठा रही है।
” बेटा, लड़का पूना में इंफोसिस में चीफ मैनेजर है। सुंदर, गठीला शरीर और बढिया व्यक्तित्व का धनी है। तीस लाख का पैकेज है….गोत्र भी नहीं मिलते हैं…तेरे पापा के एक दोस्त ने रिश्ता बताया है…वे लोग घर आए थे और रिश्ते के लिए तैयार हैं… हमने ही कहा था कि एक बार बेटी से बात कर लेते हैं…।”
” मम्मा, ऐसा है, मैं अभी कुछ नहीं कह सकती जब तक लड़के से मिलकर बातचीत ना हो जाए… उसको समझ ना लूं… ऐसे कैसे शादी कर लूं”।
“ऐसा है, बेटा, किसी को भी आप सारी जिंदगी भी नहीं समझ सकते… क्या समझ लोगी कुछ दिनों में..तेरे पापा को ही मैं समझ नहीं पायी इतने सालों में.. हमारे स्वयं के विचार भी बदलते रहते हैं… शादी ब्याह में बड़ों की पारखी नज़र होती है… दादा जी भी चाहते हैं ये रिश्ता हो जाए… ” इस बार रमा अपनी पूरी कोशिश कर रही थी।
” मम्मा, बस अब और नहीं सुनना मुझे… पढ़ लिखकर क्या हमारी समझ इतनी विकसित नहीं है कि अपना भला बुरा सोच सकें… आप लड़के का बॉयोडाटा वटसप कर दें…लिंकड़न पर मैं सारा चैक कर लूंगी… और यदि लड़का बातचीत करना चाहता है तो उसका नंबर मुझे दे देना…”।

“ठीक है, बेटा, भेज देती हूं लेकिन मुझे नहीं लगता वे बातचीत में रूचि दिखाएगा… शायद उसके मां बाप को भी ये बात पंसद ना आए” रमा ने हिचकते हुए कहा।
” मम्मा, फिर ठीक है ना। जो लड़का अभी भी मां बाप की ही अंगुली पकड़ कर चलना चाहता है तो बात करने का क्या मतलब है… शादी जीवन भर का बंधन है और यदि एक पढ़ा लिखा व्यक्ति अपना खुद का वजूद नहीं रखता तो ऐसे व्यक्ति से बातचीत किसलिए… मैं मानती हूं मां बाप का आशिर्वाद लेना चाहिए लेकिन उसके अपने भी कुछ ख्यालात होगें शादी के संबंध को लेकर… अच्छा मम्मा मैं रखती हूं, अभी जिम जाना है… बॉय”। जूही की बेबाकी से एकबारगी तो रमा अचम्भे में थी लेकिन शांत मन से सोचा तो लगा कि ठीक ही तो कह रही है। रमा जीवन के तीस साल पीछे चली जाती है जब वह अपनी कोई पंसद नापंसद नहीं बता पायी थी। हिम्मत ही नहीं होती थी उस जमाने में। जहां पिता, ताऊ व चाचा ने रिश्ता तय किया, चुपचाप शिरोधार्य था। पढ़ीलिखी तो वह भी थी, लेकिन मज़ाल अपनी कोई बात रख सकें। शादी के बाद भी कोई परेशानी होती तो यही कहा जाता था कि, ” अब वही तुम्हारा घर है। एडजस्ट करो”। रमा को याद है उसके बाद सारी उम्र एडजस्टमेंट में ही गुज़री थी…पहले अपने मायके की इज्ज़त की खातिर, फिर अपनी बच्ची की खातिर…।

शंशाक ने भोजन करने के पश्चात पूछा था रमा से…इस रिश्ते को लेकर। रमा ने जो बातचीत हुई थी जस की तस बता दी थी। शशांक कुछ नहीं बोले। रमा ने कहा, ” आप चिंता ना करें… क्या मालूम बातचीत करने से जूही को लड़का पंसद आ जाए”। शशांक ने अपने दोस्त को सारी स्थिति से अवगत करवाया और जूही को बातचीत के लिए मोबाइल नंबर दे दिया गया। मुंबई और पूना की दूरी भी बहुत अधिक नहीं थी, सो जूही ने नीलेश से मिलने का प्लान बनाया। दो चार बार वे एक दूसरे से लंच पर मिले, जिंदगी व शादी के फलसफे पर चर्चा हुई। नीलेश मुंबई भी आया। एक महीने बाद जूही ने अपनी मम्मा को फोन कर सारी बातचीत का निष्कर्ष बताया।
” मम्मा, मैं इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हूं”
“क्यों, बेटा। क्या हुआ?” रमा परेशान हुई।
” नीलेश, दिखने में तो बहुत आधुनिक है। बेरेंड सूटबूट है। महंगे होटल्स में खाने का शौकीन है। घूमने फिरने का भी शौक है…” जूही बताती जा रही थी।
” फिर , दिक्कत कहां है?” रमा ने सीधा सवाल किया क्योंकि उसे घुमा फिराकर कहना पंसद नहीं था।
” मम्मा, नीलेश की सोच वही पुरुष प्रधान मानसिकता वाली है… उसके हर एक एक्शन से साबित हो रहा था कि पढ़ने लिखने से उसके ज्ञानचक्षु नहीं खुले हैं…ये डिग्रीयां केवल अच्छे ओहदे पर पहुंचने के लिए हैं उसके लिए.. चूंकि मैं शादी से पहले सब बातें रखना चाहती थी तो मैंने अपनी साथी दोस्तों के बारे में बताया तो उसके चेहरे पर ईर्ष्या के भाव स्पष्ट थे…और उसने ये भी कहा कि शादी के बाद ये पुरुषमित्रों से वास्ता नहीं रखना है…।”
” बेटा, ये सब बातें उससे कहने की क्या जरूरत थी। पुरुषों को ईर्ष्या होती ही है…”
” मम्मा , ऐसा है। जो व्यक्ति शादी की नींव ही अविश्वास पर रखना चाहता है तो मैं ऐसे व्यक्ति से शादी नहीं कर सकती.. चाहे मुझे ताउम्र अविवाहित रहना हो…।”
रमा को बहुत तनाव हो रहा था क्योंकि रिश्ता खुद चलकर आया था और वह तो सोच रही थी, ये शादी की जिम्मेवारी भी पूरी हो जाए तो गंगा नहा लें। लेकिन इस लड़की के बगावती तेवर के सामने किसी का बस नहीं चलेगा। ये तो घर में सब जानते थे कि बचपन से ही जिस बात पर अड़ जाती तो किसी चेतावनी से भी नहीं डरती थी। अपने बाप पर गई थी। बाप की तरह काम में होशियार तो थी ही, सोशल सर्कल का दायरा भी विस्तृत था और इसीलिए, उसके दोस्तों की फेरहिस्त में लड़के व लड़कियां दोनों शामिल थे। जूही में कभी जैंडर बॉयस नहीं था। हर रिश्ते में क्लेरिटी चाहती थी बस।
रमा ने शाम को शशांक को वस्तुस्थिति से अवगत कराया। दादा जी तो बहुत गुस्से में थे लेकिन शशांक बेटी की जिद्द के आगे झुक गए। वे समझते थे कि नया जमाना है इसके साथ कदम मिलाना ही बेहतर है। जूही ने ये भी स्पष्ट कर दिया था कि वह शादी अपनी पंसद से ही करेगी। दो साल इस तरह और बीत गए और फिर एक दिन जूही ने रमा को फोन करके बताया कि वह निशांत से शादी करना चाहती है। निशांत सजातिय नहीं था। दादाजी पुराने ख्यालात के आदमी थे।.घर में खूब हंगामा किया लेकिन जूही ने कहा कि, ” आप लोग यदि शादी नहीं करेंगे तो हम दोनों कोर्ट मैरिज कर लेगें। निशांत सुलझा हुआ लड़का है और अच्छे पद पर उसके ही ऑफिस में चीफ मैनेजर है। उसके घर वाले भी शादी के लिए तैयार हैं”। इकलौती बेटी की शादी के खूब सुनहरे ख्वाब देखे थे रमा और शशांक ने। जूही निशांत को मिलवाने घर लाई थी। बातचीत करके शशांक ने फैसला किया कि शादी धूमधाम से होगी। बेटी की खुशी से बढ़कर उनके लिए कुछ नहीं है। पढ़ा लिखा परिवार मिल रहा था। शुभ मुहूर्त देखकर दोनों पक्षों के रीति रिवाज से शादी संपन्न हो गई। जूही और निशांत की जॉब भी विदेश में अच्छी कंपनी में निश्चित हो गई थी। अपने सपनों को साकार करने दोनों विदेश चले गए। दोनों को ही दुनिया भ्रमण का शौक था। जूही पांच साल बाद निशांत के साथ देश वापिस लौट आई। रमा और शशांक नाना नानी बन चुके थे। नातिन को देखकर दोनों का दिल गदगद हो रहा था। बिल्कुल नन्ही जूही ही थी और उन्हें इस बात का डर भी था कि उनकी नातिन भी एक दिन जूही और निशांत के फैसलों पर बगावत करेगी। खैर जो भी हो अभी वे उसके बचपन को एन्जॉय कर रहे थे।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “जोया”०२/०४/२०१९

मोहब्बतें

रविवार का दिन था। रमा, अपनी बहन से मिलने दिल्ली (द्वारीका)उसके घर पहुंची ही थी कि उसने दरवाजे पर ही सुनाई पड़ा कि उसकी बहन दीपा, बेटी ईवा पर जोर जोर से चिल्ला रही थी। दरवाजा चूंकि खुला था तो वह अंदर चली गई । अंदर जाकर देखा तो ईवा की नानी व मामाजी भी आए हुए थे। वे ईवा के रिश्ते के सिलसिले में ही उदयपुर से पहुंचे थे। सबके चेहरों पर हवाईयां उड़ रही थी। दीपा को समझ नहीं आया कि ईवा से ऐसी क्या गलती हुई है। रमा, मां व भाई के साथ बैठे ईवा के पापा को नमस्ते कर वहीं बैठ गई। नानी उठकर, दूसरे कमरे में चली गई, ईवा के पास। रमा ने ईवा के पापा सोमबीर से पूछा, “कि, क्या बात है?” रमा को डर था कहीं भड़क ना जाएं। सोमबीर ने कहा ” ये लड़की, दूसरी जाति के लड़के से शादी करना चाहती है और ऐसा मैं हरगिज़ नहीं होने दूंगा”। रमा आधुनिक ख्यालात की सुलझी हुई महिला थी। उसने सोमबीर से कहा, ” क्या हो गया? दूसरी जाति के लोग क्या इंसान नहीं होते?” सोमबीर के तेवर अब और तीखे हो गए। उनको वैसे भी रमा की आजाद ख्याली पंसद नहीं थी और उन्हें संशय रहता था कि कहीं ,रमा उनकी बेटियों को बहका ना दे। शंकालु प्रवृत्ति के इंसान तो थे ही शुरू से। रमा की भी उनसे बनती नहीं थी। सोमबीर ने कहा, ” गांव के सरपंच की पोती है, ईवा। चौधरी परिवार की आन बान है। यदि इसने जिद की तो मैं, इसकी बोटी बोटी काट दूंगा”। रमा को बहुत अचम्भा हुआ ये सब सुनकर। वैसे भी खाप पंचायतों के फरमान आए दिन अखबारों में पढ़ती रहती थी। घर का माहोल तनाव पूर्ण हो चुका था। ईवा के मामाजी ने सोमबीर और बहन दीपा को समझाने की काफी कोशिश की, लेकिन दोनों टस से मस नहीं हुए। ईवा, बहुत ही सुंदर, शिक्षित इंजीनियर लड़की, घर और रिश्तेदारी में सबसे बड़ी थी। इतने सालों में पहली बार उसने अपनी कोई इच्छा रखी थी। ईवा, संवेदनशील भी बहुत थी और मां बाप की हर बात को शिरोधार्य करती आई थी अबतक। अभी भी बड़ी शालीनता से अपनी बात रखी थी।

सन् 2002 का भारत था, जब लड़कियों की शिक्षा दिक्षा बढ़चढ़ कर हो रही थी। लेकिन गांव/शहर के समाज की सोच में परिवर्तन बहुत ही धीमी गति से हो रहा था। खूब शोर शराबा हुआ उस दिन। ईवा, रमा मौसी को बहुत मानती थी। दोनों ने रातभर बातचीत की क्योंकि इस वक्त उसे ऐसे सबंल की जरूरत थी जो उसकी भावनाओं को समझ सके। रमा को ईवा से पता लगा कि, प्रशांत, इंजीनियरिंग कॉलेज में उसके सीनियर थे और अब विदेश में जॉब कर रहे हैं। ईवा ने बताया कि वे पिछले पांच सालों से संपर्क में हैं। रमा ने उसको नैतिक समर्थन दिया और समझा दिया था, ” कि ये तुम्हारा पारिवारिक मामला है तो दखल नहीं दे सकती लेकिन तुम मजबूती से अपने ‘ इश़्क’ के लिए खड़ी रहो।” सोमबीर की बातें ईवा ने सुन ही ली थी और वह बहुत आहत हुई थी। वह कुछ निश्चय करके सो गई। रमा अगले दिन वापिस अपने घर आ गई थी और बहुत दुखी थी ईवा के लिए। पंद्रह दिन बीत गए तब रमा की छोटी बहन, शिखा का फोन आया कि , “क्या ईवा तुम्हारे पास आई है? वह गाड़ी लेकर निकली थी सुबह और शाम हो गई, घर नहीं पहुंची है। वहां सब परेशान हैं”। रमा का मन भी बहुत विचलित हो रहा था। एक घंटे बाद खबर मिली कि उसकी कार दुर्घटना हो गई है, थोड़ी चोट लगी है लेकिन वैसे ठीक है। रमा, मिलने हॉस्पिटल पंहुची तो ईवा के मां बाप भी वहीं थे। रमा को ईवा ने कहा, ” मौसी, मैं जीना नहीं चाहती थी, इसलिए गाड़ी तेज़ स्पीड़ में चला रही थी।” रमा से अब जज्ब नहीं हुआ और उसने अब सोमबीर और दीपा से लगभग चीखते हुए कहा, ” तुम्हें, बेटी से ज्यादा अपनी झूठी शान प्यारी है। आजतक इसने वही पढ़ा, जो तुम चाहते थे। कभी गलत नहीं चली। आज़, एक ऐसे जीवनसाथी के लिए तुम्हारी इजाजत मांग रही है, जहां वह दिल दिमाग से जुड़ी है। लड़का हैंडसम है, अच्छी जॉब पर है और क्या चाहिए?आज, इसे खुदा ना खास्ता कुछ हो जाता तो अपने वसूल लेकर बैठे रहना”।

सोमबीर को अब समझ में आ गया था कि लड़की अपने जीवन से खिलवाड़ कर सकती है। दीपा ने भी अपने पति को कह दिया कि, ” अब शादी वहीं होगी, जहां ईवा चाहती है”। निर्णय हो चुका था। आज एक मां अपनी बेटी के लिए पति का साथ छोड़ बेटी के साथ खड़ी थी। चार महीने बाद शुभ मुहूर्त देखकर शादी निश्चित हो गई। सोमबीर के दोस्त ने ही सारा इंतजाम किया था और उसकी पत्नी ही खरीदारी करने ईवा के साथ गई थी। सोमबीर अपने दोस्त के सामने फफ़क कर रोया था। उसने कहा था कि, ” मेरी मर्जी से शादी करती तो गहनों से लाद देता। लम्बी गाड़ी में विदा करता”। रमा को सारी बातें पता लगती रहती थी क्योंकि वह भी इस परिवार को जानती थी। समाज को दिखाने के लिए बहुत बढिया शादी की व्यवस्था की गई लेकिन नाममात्र के गहने और कपड़ें दिए गए थे। गाड़ी देने की हैसियत थी लेकिन वह भी नहीं दी, जिद अभी भी कायम थी। रमा, सोमबीर के अड़ियल रवैए से वाकिफ़ थी। ईवा ने कोई जिद नहीं की क्योंकि उसका ‘इश़्क” मुक्म्मल हो रहा था। विदेश जाने की सारी तैयारियां पहले ही हो चुकी थी। वीजा भी लग गया था। शादी के एक सप्ताह बाद ईवा अपने जीवनसाथी के साथ विदेश चली गई। दो हंसों की जोड़ी का मिलन हो चुका था।

सन् 2017 में सोमबीर और दीपा की दूसरी बेटी, मेहा, जो अमेरिका से सुपर स्पेशलिस्ट बनकर आयी थी उसने भी अंतरजातीय प्रेमविवाह ही किया है। लेकिन चूंकि वह थोड़ी प्रैक्टिकल है तो अपने मां बाप को अपने पक्ष में शुरु से ही कर लिया था। पंद्रह साल बाद दूसरी शादी हो रही थी तो अब सोमबीर भी जमाने के साथ ताल मिला रहा था। रमा, बताती है कि, ” मेहा ने डेस्टिनेशन वेडिंग पर सोमबीर का एक करोड़ रुपया खर्च करवा दिया और वे कुछ कह भी नहीं पा रहे थे”। बड़ी बेटी ईवा ने शादी के बाद कभी घर से कुछ नहीं लिया। अमेरिका में अच्छी जॉब पर है। रमा मेरे पास बैठकर कहती है कि, ” एक बाप भी बच्चों में कितना भेदभाव कर देता है। ” पैसे का पूरा नियंत्रण सोमबीर के पास रहता था तो दीपा इस मामले में दखलंदाजी नहीं कर सकती थी। ईवा आत्मकेंद्रित हो चुकी है क्योंकि उसका दिल पिता की तरफ से टूटा था। सुसराल में सास को बहुत सम्मान दिया और प्यार किया था लेकिन वहां से भी सुनने को मिला था कि, ” बहु, हो। ज्यादा बेटी बनने की कोशिश मत करो”। रमा की छोटी भानजी, मेहा, सब बता देती है रमा को, क्योंकि वह रमा की लाड़ली है। सोमबीर और दीपा की दोनों बेटियों ने मनपसंद साथी से विवाह किया और एक नयी सोच की आधारशिला रखी। सोमबीर की दोनों बेटियां अपनी गृहस्थी में सुखी व संतुष्ट हैं। सोमबीर अब अपने दामादों की भूरी भूरी प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि, “मेरी बेटियों की च्वॉइस कम थोड़े ही है’।

रमा का मानना है कि , “लड़कियां जब हर क्षेत्र में सक्षम हैं तो ,उनमें इतनी समझ भी है कि अपना जीवनसाथी चुन सकें। झूठे दम्भ की दीवारें अब गिरनी शुरू हो चुकी हैं।अभी भी लेकिन समाज का बड़ा हिस्सा है जिन्हें ये सब बेमानी लगता है। लेकिन समझने की बात ये है कि बच्चे सक्षम हैं, अच्छी जॉब करने की क्षमता रखते हैं तो क्या जीवनसाथी चुनने की उनकी समझ नहीं है?”

✍️ ©® डा. सन्तोष चाहार “जोया” २५/०३/२०१९

दुल्हन

शुभा के दोनों बच्चे प्रदेश में एम।एन।सी। में जॉब कर रहे हैं। पति की असमय मृत्यु के बाद से ही शुभा पर गृहस्थी की सारी जिम्मेदारी आ गई थी। वह पिछले साल ही बैंक मेनेजर पद से रिटायर हुई है। शुभा अभी रात के खाने की तैयारी कर रही थी कि फोन की घंटी घनघना उठी। देखा तो बेटे का फोन था।
“मां, आपसे बात करनी है” अमन की आवाज़ थी।
“हां, बेटा। कहो क्या कहना चाहते हो” शुभा उसे आश्वस्त कर रही थी।
“मां, आप जीवनसाथी पर रिश्ते देखना बंद कर दो”
“क्यों, क्या हुआ” शुभा चिंतित थी। अभी उससे बात करने के बाद ही तो प्रोफाइल बनाया था।
” मां, मेरी एक अच्छी दोस्त है रिया। यहीं पूना में ही जॉब करती है। हम दोनों ने इस विषय पर सोचा है कि हम चूंकि एक दूसरे को अच्छे से जानते हैं, तो क्यों ना हम जीवनसाथी बन जाएं। आपकी व दीदी की राय क्या है?”
शुभा ने रिया की सारी जानकारी ली अमन से। दोनों की समकक्ष योग्यता थी और बढ़िया पैकेज भी। शुभा को बस एक बात थोड़ी खटक रही थी कि रिया सजातिय नहीं थी और बी। सी। कैटगरी से थी। अमन के दादा जी इस विवाह के लिए बिल्कुल तैयार नहीं होंगे। शुभा की बात एक जाट परिवार से चल रही थी, लड़की खूबसूरत, लम्बा कद और नौकरीपेशा थी। शुभा ने अमन को भी फोटो भेजा था। तब अमन ने कहा था, “आपकी मर्जी”। शुभा ने कहा था अमन को, ” जिंदगी तुम्हें साथ बितानी है। हर बात तुम परिवार के हिसाब से करते आए हो। बेटा, ये जिंदगी का अहम निर्णय है। इसमे हिचकना नहीं है, तुम्हारी कोई पंसद हो तो बता देना”
शुभा द्वारा दिए हौंसले की वजह से ही आज अमन ने अपनी इच्छा बताई है। अपनी दीदी,नूर,को वह बहुत अहमियत देता था। नूर एक ऊंचे औहदे पर एम।एन।सी। में जॉब कर रही थी। शुभा ने नूर के साथ इस रिश्ते पर चर्चा की। नूर ने लड़की से बात कर सब जानकारी परिवार के बारे में जुटाई। नूर को लड़की अच्छी लगी। लेकिन अमन के दादाजी व चाचा तैयार नहीं थे। उधर शुभा, नूर और अमन ने फैसला कर लिया था कि रिया को ही घर की बहू बनाएंगे। लड़की के घर वाले भी रिश्ते से राज़ी थे। कुंडली भी उन्होंने मिलवा ली थी। अमन के दादाजी ने कहा,” गांव में सब बात बनाएंगे। लड़की हमारी जाति की नहीं है। मैं क्या जवाब दूंगा…हमारी यहां इज्ज़त क्या रह जाएगी… आदि”।
शुभा, लेकिन मन बना चुकी थी। वह उस गलती को दोहराना नहीं चाहती थी जब उसने अपनी शादी के वक्त सिर झुका कर पिता के चरणों में अपने इश़्क की बलि दे दी थी। समाज़ में इज्ज़त के डर से, पिताजी के सम्मान की खातिर, एक रुहानी प्रेम को बलिदान कर दिया था, जिसकी टीस ता उम्र उसे चुभन देती रही थी। वह नहीं चाहती थी कि बेटा भी इस दर्द से गुजरे। उसे समझ थी कि इंसान की एक ही जात है ‘इंसानियत’। जहां आपके विचार मिलते हैं, रिश्तों को लेकर एक समझ है तो जीवन सरल हो जाता है। अमन के दादा जी को भी इस रिश्ते के लिए मनाया। बेटी ने भी प्रेम विवाह किया था लेकिन तब दादाजी को मनाना आसान था क्योंकि नूर का रिश्ता जाट परिवार में ही हुआ था। लेकिन अमन के रिश्ते में ये जाति का भेद आड़े आ रहा था। खैर, जो भी हो , शुभा ने परिस्थिति को अमन के पक्ष में कर लिया था यद्यपि सबको तैयार करने में उसे काफी महीने लगे। अमन और रिया को जब निर्णय से अवगत करवाया गया तो उनकी खुशी नयनों से छलक गई। शादी की तैयारियां दोनों तरफ से शुरु हो गई…।
शहनाई की धुन वातावरण में गूंज रही थी। नववधू के चरण घर में चिंहित हो रहे थे। चूड़ियों की खनक और पायल की झंकार शुभा को अपने अतीत में ले जाती है जब वह दुल्हन बनकर इस घर में आई थी। आज उसका प्रेम, बेटे की शादी में पुष्पित पल्लवित हो रहा था।

✍️©® डा. सन्तोष चाहार “जोया”१९/०३/२०१९

इक़रार

दिल-ए-मुज़्तर ख्वाहिश इश़्क-ए-दीदार
सुख़न-ए-अल्फ़ाज़ में बयां हुआ इक़रार
आसमां से बरसा खुदा का नूरानी फ़जल
मोहब्बत में फ़ना जोड़ी के नयन सजल।

✍️©® डा. सन्तोष चाहार “जोया”१९/०३/२०१९

सुख़न-ए-अल्फ़ाज़*गज़ल

दिल,-ए-मुज़्तर*अधीर हृदय

फ़जल*कृपा

यादों की कश्ती

यादों की कश्ती के चप्पू ताउम्र चलते रहते हैं और रह रह कर उस मंजिल की ओर रुख करते हैं जहां प्रेमसागर के एकांत टापू पर कभी इश़्क की तहरीरें दिल की तख्ती पर लिखी गईं थी। माही और सुरभि का प्रेम इस बात से बेखबर था कि उन परवान चढ़ता इश़्क एक उस अंधेरी कोठरी की ओर बढ़ रहा है जहां दर्द के काफ़िले कभी उनका पीछा नहीं छोड़ेंगे।

माही , एक बहुउद्देश्यीय कम्पनी में सी। ई ।ओ। के पद पर आसीन बखूबी अपनी जिम्मेदारी को निभाते हुए, कम्पनी के ऊंच अधिकारियों की नज़रों में निश्चित स्थान बना चुका था। ऊंच आंकाक्षाओं के चलते माही ने कभी शादी के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा था। चालीस वर्ष की उम्र में अब उसकी शादी की कोई इच्छा शेष नहीं थी। सुरभि एक आत्मविश्वास से लबरेज़ पैंतीस वर्षीय महिला दो महीने पहले ही माही की कम्पनी में चीफ़ मैनेजर बनकर आई थी। सुरभि की सुझबूझ , कार्य क्षमता व दक्षता ने सभी के मन में एक खास जगह बना ली थी। माही और सुरभि का मेलजोल बढ़ रहा था और एक साल में वे एक दूसरे के काफी करीब आए। एक सुखद भविष्य की कल्पना से दोनों प्रेम की कश्ती में सवार हो प्रेमासागर में विहार कर रहे थे। समय पंख लगाकर उड़ने लगा और रंगीन सपने क्षितिज छूने की चाह लिए उड़ान भर रहे थे।
दोनों उम्र के उस पड़ाव पर थे जहां शादी विवाह को वे बहुत सादगी पूर्ण तरीके से सम्पन्न करने में विश्वास रखते थे। अजातीय प्रेम विवाह होने की वज़ह से दोनों के घर वाले बहुत खुश नहीं थे क्योंकि मूल रूप से उनकी जड़ें गांव से जुड़ीं थी। माही के परिवार ने तो सुरभि को स्वीकार कर लिया था लेकिन सुरभि के घरवालों ने सभी संपर्क सूत्र काट लिए थे और पग फेरा के लिए भी वह अपनी सहेली के यहां गई थी। उसकी सहेली काफी आधुनिक विचारों की थी जो इंसान को इंसान के रूप में ही महत्व देती थी। समय बीता और सुरभि और माही के आंगन में नन्ही परी का आगमन हुआ। अब सुरभि ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया था क्योंकि वह अपनी बेटी की परवरिश के लिए केवल ‘आया’ पर भरोसा नहीं कर सकती थी। कितने ही किस्से सुने थे उसने कि किस तरह आया लोग छोटे बच्चों को कुछ हल्का नशीला पदार्थ सुंघाकर कर सुला देते थे। माही ने काफी बचत कर रखी थी और एक सपनों का घर खरीद लिया था। दोनों की जिंदगी में खुशहाली थी। नन्ही परी भी अब तीन वर्ष की हो चली थी। उसकी तुतलाती प्यारी बातें सबका मन मोह लेती थी। माही के माता पिता पुश्तैनी जमीन व मकान छोड़कर शहर आने को राज़ी नहीं थे। अतः सुरभि ने अभी दुबारा नौकरी ज्वाइन नहीं की थी।

माही बहुत ही मेहनती व सफल इंसान था। महत्वाकांक्षी भी बहुत था, इसलिए जल्द ही कम्पनी में प्रेजिडेंट के पद पर पहुंच गया था। सुरभि और माही की शादी को अब दस साल हो चुके थे। माही ने दोस्तों के साथ मिलकर काफी जमीन मेट्रो सिटी में खरीदी। लेकिन ये जमीन आगे चलकर घाटे का सौदा साबित हुई। माही को एक करोड़ रुपयों का चूना लग चुका था और वह इस नुकसान को झेल नहीं पाया। परिणाम ये हुआ कि माही गहरे अवसाद में चला गया और शराब को अपनी संगनी बना लिया। सुरभि के लिए ये बहुत कठिन दौर था। मायके वाले तो पहले ही शादी के विरुद्ध थे, अब कष्ट की घड़ी में सुसराल वालों ने भी किनारा कर लिया। सुरभि और दोस्तों ने लाख समझया कि मनोचिकित्सक से सलाह ले ली जाए लेकिन माही तो ये मानने को ही तैयार नहीं हुआ कि उसे मनोचिकित्सा की आवश्यकता है। असल में भारतीय समाज में अभी भी मानसिक स्वास्थ्य को लेकर लोग सजग नहीं हैं और ऐसी चिकित्सा लेने वाले लोगों को पागल घोषित कर दिया जाता है। यही कारण है कि लोग मनोचिकित्सक के पास जाने से कतराते हैं। सुरभि के लिए जिंदगी का सबसे कठिन दौर था। उसने हिम्मत नहीं हारी और दोबारा नौकरी ज्वाइन कर ली। बेटी अब पांच साल की हो चुकी थी, उसे डे बोर्डिंग में करवा दिया गया। ऑफिस से लौटते वक्त वह अपनी बेटी को स्कूल से ले लेती थी। माही की मनोस्थिति को जानकर, खुद मरीज़ बनकर मनोचिकित्सक से मिलती और दवाओं को सब्जी में डालकर माही को देती ताकि रात की नींद माही चैन से सो सके। इसी तरह उनके जीवन के चार साल बीत गए। लेकिन जब मरीज डाक्टर से खुद नहीं मिलता तो बीमारी पकड़ से बाहर रहती है। माही का अवसाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था। बेटी की शिक्षा, अपनी नौकरी, मानसिक रूप से बीमार पति की तीमारदारी ने सुरभि को अंदर तक हिला दिया और फिर एक दिन वही हुआ जिसकी आंशका थी। माही ने बिमारी से परेशान हो अपनी नशें ब्लेड से काट डाली। सुरभि घर लौटी तो माही को मृत पाया। सुरभि की दुनिया लुट चुकी थी। माही के घरवालों को सूचित किया गया। सबने सुरभि को कटघरे में खड़ा कर दिया और अनेकों आरोप उस पर मढ़ दिए गए। तेरवहीं की रस्म अदायगी के बाद सब अपने पुश्तैनी घर लौट गए, सुरभि और उसकी बेटी को छोड़कर।

सुरभि के लिए जिंदगी दुश्वारियां लेकर आयी। लेकिन बेटी के लिए जीना तो था। एक आत्मविश्वासी लड़की कहीं अंदर तक हिल चुकी थी। वक्त के घाव वक्त की मरहम से भरते हैं और सुरभि भी अपने दिल पर लगे गहरे घावों को भरने में सफल रही थी। शेष थी तो माही की यादें और उसका जिद्दी स्वभाव। मनोचिकित्सा के अभाव की परिणिति थी कि आज सुरभि रिश्तों नातों से भरी दुनिया में स्वयं को अकेला पाती है। एक दो सहेलियां हैं जो सुरभि का हौंसला बढ़ाती हैं। सुरभि के माता पिता तो ऊंच जाति से थे और उनपर जातिवाद का चश्मा ऐसा चढ़ा था कि बेटी के दुख से भी उतर नहीं पाया। सुरभि भी उन्हीं का अंश है तो वह भी कठोरता ओढ़े कभी स्वयं के द्वारा लिए निर्णय पर अडिग रही। उसने भी अपने मां बाप से किसी तरह की उम्मीद नहीं रखी है। अपनी बेटी को पालने में वह सक्षम है और पहले से ज्यादा मजबूत भी। माही की यादों के साथ अपनी जीवन यात्रा पर अग्रसर सुरभि बहुत सारी महिलाओं के लिए प्ररेणा स्त्रोत भी है।

✍️ ©® डा. सन्तोष चाहार “जोया” 17/03/2019