Category Archives: Love

रात की रानी

प्रेम पर लिखी गई सारी कविताएं
रात की रानी की लताएं होती हैं
जिनपर खिले पुष्प
चारों दिशाओं में सुगंध फैलाते हैं,
जब फूल मुरझा कर गिरते हैं
तब रोता है प्रेमी हृदय,
पुष्प के सूख जाने पर
मरने लगता है प्रेम,
सूखे पुष्पों को बटोर कर
फिर कोई प्रेमी
उनमें बसी शेष सुंगध में
टटोलता है अपना अक्स,
लगाता है अपने आंगन में
रात की रानी का पौधा,
सींचता है
उसे पीड़ा मिश्रित एहसासों से,
एहसासों की नमी पाकर
फिर खिलते हैं
रात की रानी पर प्रेम पुष्प ,
ये चक्र
अनवरत जारी रहता है
तभी तो
प्रेम कविताएं हमेशा  महकती रहती हैं।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १०/०६/२०२०

अखंड ज्योत

अधूरे प्रेम
के, अधूरे अफ़सानों
में,
कलम
की
सीढ़ियां चढ़,
उतर
आते हैं प्रेमी,
कविता,
कहानी के किस्सों में,
रुठे
जज़्बातों के
तिल -तिल
सुलगते हिस्सों में।

अखंड ज्योत सा, जलता रहता है अधूरा प्रेम, ताउम्र।

©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१८/०५/२०२०

फिर कब मिलोगे?

गोवा एक्सप्रेस निर्धारित समय पर स्टेशन पहुंचने वाली थी। अदिति सपरिवार, गोवा घूमने गई थी और वहीं से बेलगाम में अपने ख़ास दोस्त के घर तीन दिन ठहरने के बाद दिल्ली लौट रही थी। अदिति के पति विनोद सिगरेट पीने के बहाने थोड़ा दूर चहलकदमी कर रहे थे। दोनों बच्चे  गोवा यात्रा में विचरण किए स्थानों पर मासूम विवेचना में उलझे हुए थे। अदिति, कर्नल मंयक के साथ खड़ी , विदाई के शिष्टाचार में व्यस्त थी। मयंक अदिति से छोटे छोटे वाक्यों में वार्तालाप कर रहा था। उसकी आंखों में अदिति ने प्रेम की वही झलक देखी, जो बीस वर्ष पहले, उसकी नींद व चैन चुरा ले गए थे। तब, जिंदगी ने, दोनों को एक मोड़ पर लाकर छोड़ दिया था, जहां से उनके रास्ते अलग जरुर हुए लेकिन प्रेम की लौ कुंद नहीं हुई थी। दो दशकों की जुदाई ओर पिछले साल से दूरभाष संपर्क ने, जलती हुई प्रेमाग्न को बढ़ा दिया था। दोनों, समाज़ की अलिखित बेड़ियों में जकड़े, आज़ भी उसी दोराहे पर खड़े थे। दोनों की अपनी गृहस्थी थी और परिवारों के प्रति समर्पण भी, लेकिन इस सबके बावजूद एक टीस जरूर थी कि मुलाकातें होती रहें। राह आसान नहीं थी। कर्नल की पत्नी नंदिता शंकालु प्रवृत्ति की थी और मयंक पर पूरा नियंत्रण रखती थी। बल्कि, यहां ये कहना ग़लत नहीं होगा कि वह मंयक को जीने की स्पेस नहीं देती थी। जिसे हम आप ‘व्यक्तिगत स्पेस’ कहते हैं। अदिति, मयंक के घर रहकर ,इस बात को संज्ञान में ले चुकी थी। अदिति ने फिर भी पूछा था, “फिर कब मिलोगे?” मयंक की आंखों में विविशता, उत्तर दे चुकी थी। आंखें, शायद कह रही हो , “ हम आपके हैं कौन?”
अश्रु, दोनों की पलकों पर ठहर चुके थे।

रेलगाड़ी प्लेटफार्म पर पहुंची। दस मिनट का स्टेशन पर ठहराव था। सारा ल्गेज़ विनोद ने सीटों के नीचे सही ढंग से लगा दिया। अदिति खिड़की वाली सीट पर आकर बैठ गई। गाड़ी ने भी धीरे धीरे गति पकड़ी। मंयक ने गाड़ी के साथ-साथ दौड़ते हुए कहा,

अगले जन्म में हम जरुर मिलेंगें”।
अदिति, मंयक और अपने बीच बढ़ते फासले को रेलगाड़ी के दरवाज़े पर खड़ी देखती रही। मयंक भी तब तक हाथ हिलाता रहा जब तक, अदिति उसकी आंखों से ओझल नहीं हो गई। विनोद बहुत ही खुश मिजाज़ व्यक्ति, जो पत्नी अदिति व मयंक की प्रेम को समझते थे। अदिति ऊपर वाली सीट पर लेटकर आंसू पौंछ रही थी। तभी पति विनोद के शब्द कानों में गूंजे, “ दो हंसो का जोड़ा बिछुड़ गया रे, गजब ….”।

प्रेम के इस स्वरुप को समाज कुछ भी नाम दे सकता है लेकिन लेखक ने साहित्यिक यज्ञ में एक आहुति डाल ही दी।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”०६/०५/२०२०

रात्री का दूसरा पहर

प्रिय कर्नल

उम्मीद करती हूं  कोरोनावायरस जैसी महामारी के संकटकाल में तुम सपरिवार सुरक्षित होगे। प्रतिदिन मेरी प्रार्थना में तुम विशेष रूप से शामिल रहते हो। दिन के चौबीस घंटो में रात्री का दूसरा पहर हमेशा तुम्हारी यादों की पोटली ले आता है जिसमें कुछ सुखद अहसास और कुछ कड़वे अनुभव के वो घूंट भी हैं, जो हम दोनों को केवल इसलिए पीने पड़े क्योंकि हमारे समाज का ढांचा और उसकी सोच इतनी संकीर्ण है कि, इसकी संकरी गलियों से गुजरते हुए, स्थापित मापदंडों के, पत्थरों से टकरा कर चोट निश्चित ही लगती है, फिर चाहे,आपके विचार ….आपका अंतःकरण कितना ही निर्मल हो… आचरण कितना ही अनुकरणीय हो। ऐसा क्यों होता है? जिंदगी के सबसे हसीन व उर्जावान बीस वर्षों की उठा-पटक के बाद, मैं, एक ही निष्कर्ष पर पहुंची हूं कि, मनुष्य जब किसी व्यक्ति के गुणों की बराबरी नहीं कर सकता है तो वह ऐसे मौके की तलाश में रहता है कि एक, केवल एक, अवसर मिल जाए तो कैसे रुह को लहुलुहान किया जाए… फिर वह गिद्ध की तरह झपटा मारता है और शिकार को अपने पंजों में दबोच उसे तसल्ली से नोचता है।

याद है?… यही तो हुआ था हमारे साथ। अभिमन्यु की तरह, हम दोनों, एक ऐसे चक्रव्यूह में घिरे थे, जहां से निकलना दोनों के लिए अत्यंत मुश्किल था… तुम समझदार थे, रणनीति बनाने में सक्षम थे, आर्मी का तजुर्बा तुम्हारे काम आया…. चक्रव्यूह भेद, तुम कुशलता से बाहर आ गए…. तुम्हारी आंखों में पीड़ा… तुम्हारी वाणी से निकले वो रक्तरंजित शब्द…( जोरू का गुलाम हूं), आज भी बीस वर्षों के बाद मैं स्पष्ट सुन सकती हूं। मुझे ये भी मालूम है कि, ये शब्द तुमने मेरी हिफाजत के लिए ही  बोले थे….। लेकिन मैं चक्रव्यूह में चारों ओर से होने वाले कटाक्षपूर्ण बाणों की बौछार का सामना करती रही….तुम्हारी पत्नी ने वह चिठ्ठी मेरे पति को शायद दे दी थी…मेरी सहेली ने भी आग में घी डाला था, तभी तो उनकी प्रताड़ना सही….. गूंगी हो गई थी… सदमे में थी, कि चिठ्ठी में लिखी एक पंक्ति ने मेरे जीवन में  ऐसा भयानक तूफान कैसे ला दिया? तुम्हें मालूम होगा कि, उसके बंवडर से निकलने में  मुझे दशकों लगे….वह केवल एक पंक्ति नहीं थी, बल्कि मेरी भाग्यशाली रेखा की गहरी काट थी। मेरी सहेली जब भी मेरा हाथ देखती थी तो कहती थी, ” देखो कितनी लम्बी भाग्य-रेखा है!” मैंने उसके बाद से फिर किसी को हाथ नहीं दिखाया, मुझे डर था …. लेकिन नज़र तो लग चुकी थी। तुम्हें  तो पता ही है, उसी सहेली ने मेरे दिल के ताले को खोल,हम दोनों के पवित्र प्रेम की दास्तां सुनी …वे सब राज़ जाने, जो मैंनें वर्षों तक अपने सीने में दफ़न कर रखे थे…. उसका, बार बार , तुम्हारा जिक्र करने , ठिठोली करने पर तुम से मिलने की इच्छा प्रबल होती चली गई क्योंकि मुझे लगता था कि, इतने सालों की मजबूत गृहस्थी में पनपे विश्वास में अविश्वास की कोई जगह नहीं हो सकती…. फिर मेरी खोज़ शुरू हुई…. तुम्हारा पता मिला….मेरी तुम्हारी मुलाकात शादी के सोलह साल बाद हुई और दिल के कोने में सिसकता प्रेम मुखर होने को आतुर था, लेकिन हम दोनों ने ही तो खुद पर नियंत्रण रखा था… पारिवारिक दोस्ती की तरफ बढ़े कदम, एक पंक्ति की वजह से लड़खड़ाए….. इतना ही तो लिखा था, “तुम मेरा पहला प्यार हो”….. बहुत बार सोचती हूं, पति-पत्नी में भेद किसी तीसरे की वजह से कम और खुद की असुरक्षा की भावना…..खोने का डर…..साथी पर अविश्वास….की वजह से होता है। मेरी उसी सहेली ने मेरे को साथियों में हमें बदनाम किया… पता है उसकी इस हरकत की वजह से,अब मेरा, दोस्ती से विश्वास उठ चुका है… दोस्ती इतनी उथली व छिछली कैसे हो सकती है?…मेरे लिए दोस्ती के मायने बदल गए हैं। इस दुनिया में आप खुद ही अपने दोस्त हैं, बाकी जगत के सभी रिश्ते नाते केवल स्वार्थ पर टिके हैं। आजतक मैंने उसे क्षमा नहीं किया है।

सच ही कहा जाता है, ये कलयुग ही है और मनुष्य की, इसी आपाधापी और एक-दूसरे को नीचा दिखाने का परिणाम है कि, सारा विश्व एक श्राप से गुजर रहा है। जब जब धर्म की हानी होती है ऐसी विपदाओं का मनुष्य जाति को सामना करना पड़ता है। जीवन के मूल्यों में सतत गिरावट हमें गहरे संकट में डालती है…… दुनिया भर में प्रकृति के साथ छेड़खानी का गंभीर परिणाम भुगतना पड़ता है….. शायद ये संकटकाल जब बीतेगा तो मानव जाति कुछ समझदार होकर खोए प्रकृति संतुलन और ग्रहण लगे मूल्यों को, संवारने सजाने का कार्य करेगी, ऐसी मेरी आशा ही नहीं विश्वास है।

खैर, मैं भी क्या जिक्र लेकर बैठ गई। महिमा से पता चला था, तुम्हारी बेटी की शादी हो गई है। मेरी तरफ से बहुत बहुत शुभकामनाएं। तुम्हें भी तो जरुर पता चला होगा, मेरे बेटे की शादी पिछले साल नवंबर में हुई थी। बेटी, कॉरपोरेट जगत को सात साल सेवा दे चुकी है। एडलवाइज में चीफ़ मैनेजर का पद त्याग कर अपनी स्टार्टप को बिल्ड कर रही है। अभी उसका शादी का कोई इरादा नहीं है। मैंने भी कह दिया है , ” तुम जो भी करना चाहती हो करो…. शादी के अलावा भी बहुत कुछ है दुनिया में करने के लिए… मनपसंद साथी मिल जाए तब कर लेना…. नहीं तो जिंदगी तुम्हारी है… कुछ सृजनात्मक करो।”

ठीक है कर्नल, अपना ख्याल रखना। बहुत दिनों से सोच रही थी, तुमसे बात की जाए….संकट की घड़ी में अपने सभी की
खैरियत पूछने का दिल होता ही है। शुभकामनाएं।

तुम्हारी प्रेयसी

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”७/०४/२०२०

आखिरी मुलाकात

यूं तो
सालों बीते,
जब हुई थी तुम से
आखिरी मुलाकात,
तुमने, स्नेहिल स्पर्श से
मेरी हथेलियों पर
रखी थी वो गोंद की पिन्नी,
जो मैंनें
अपने हाथों से बनाई थी,
उस वक्त, अपने
अज़ीज़ दोस्त की उपस्थिति में,
तुमने, मेरे सवालों का जवाब
दिया जरूर था,
लेकिन केवल
इशारों में,
भावनाओं के वशीभूत
तुम्हारी आवाज
रुंध गई थी।
मेरी
पलकों के नीचे छिपे
जख्मों को कुरेदना,
तुमने
उचित नहीं समझा था
तुम वाकिफ थे,
मेरे हर हालात से।
तुम्हारे मेरे बीच
यही समझ
प्रेम की साक्षी रही
फिर तुम,
चले गए थे मुझ से दूर
हमेशा के लिए
लेकिन
उन पिन्नीयों में छोड़ गए थे
मुलाकात की मिठास
जिसके सहारे
करती रही तय
मैं,
जिंदगी का सफर।
एंकात
को पिघला कर,
यादों की कूची से
मन कैनवास पर
बिखेरती रही,
साथ बिताए लम्हों के रंग,
मुलाकात
की सुंगध को
यूं जीवित रखा प्रतिपल।
आज भी,
उम्मीद का एक
दीपक जलाए बैठी हूं,
जाने कब
कदम खींच लाएं तुम्हें,
मेरे बूढ़े
जिस्म की डयोढ़ी तक,
फिर
आखिरी मुलाकात के लिए
और मैं,
तुम्हारा स्नेहिल स्पर्श पा
चिरनिंद्रा में सो जाऊं…अनंत काल तक।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २४/०९/२०१९

मूल प्रतियाँ

मेरे द्वारा
लिखे वो खत
जो तुमने फाड़ दिए
और
तुम्हारे खत
जो
मैंने जला दिए
उनमें कभी
बरसी थी झमाझम
दिल के बादलों से
इश्क़ की ऋचाएं ।

आंखों
के सागर में तैरी थी
मौन लफ्जों की कश्तियाँ
इश्क़ के ऑसिस में
बिखरे थे रुहानी संवाद
वो सारे खत
मेरे आंगन की
मिट्टी के
कण कण में हैं समाहित
उस मिट्टी में
रोपे गए गुलाब के गुंचों में
फूल
हमारे खतों की
मूलप्रतियां बन
खुशबूएं फैलाते रहे।

सालों की जुदाई
और उम्र के
बूढ़े होते जिस्मों में
इश्क़
यूं होता रहा जवां
क्योंकि
वो खत
इश्क़ की कहानी की
प्रतिलिपियाँ नहीं थे
हमारे खत
राधा-कृष्ण के प्रेम की भांति
सच्ची मोहब्बत के जिंदा दस्तावेज थे।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १३/०९/२०१९

उत्सर्ग

जब
सूरज ढ़ल कर
यामिनी की गोद में सो जाता है
तब
चांद की खिड़की से
तुम्हारी यादें
तारों की पोटली बांध
मेरे हृदय के आकाश पर उतरती हैं
मन
के कैनवास पर
बिखर जाते हैं
पाक
मोहब्बत के रंग
मुखर होता
तेरे मेरे बीच मौन संवाद
तब
तुम समझाते हो
मेरे गुरु बन
हमारी मोहब्बत
नदी के दो किनारे
ना अपेक्षा है
ना उपेक्षा
प्रेम का उत्सर्ग यही है।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”०५/०९/२०१९

दस्तक

ये कौन
दस्तक दे रहा
दिल का दरवाजा
स्वतः ही खुल गया
फिज़ाओं में फैली
प्रीतम के
आगमन की महक
खत्म हुआ
मंजिल का इंतजार
ओह! ये मदहोशी का आलम
सब्र का बांध टूटा जाए
वो शायद
उसके शहर में हो चुका दाखिल
तभी तो
ये
दिल की धड़कन
हो रही बेलगाम
सांसो की डोर
में
प्रियतम की सांसें
ऐसे घुल रही
जैसे
दूध में शक्कर
खुद को संवारने
आईना देख
प्रयेसी ने पहनी
चटक गुलाबी रंग की साड़ी
जुड़े में ठूंसा
सुर्ख गुलाब
उसे है याद
सदियों से गुलाब
प्रीतम का पंसदीदा फूल
मोगरे का गज़रा तो वह लायेगा
चूंकिउसे
खुशबूओं से रहा बेपनाह लगाव
भौंरे की तरह
मंडराता तो था कलियों के इर्दगिर्द
कदमों की आहट सुन
प्रयेसी दौड़ी
सजाया आरती का थाल
चंदन की खुशबू से घर दिया महका
कहा ना
उसका प्रीतम
खुशबूओं से होता मदहोश
लेकिन
कदमों की आहट
कानों के दरवाजे पर हुई मद्वम
प्रेयसी उलझन में
शायद
घर के दरवाजे पर करे इंतजार
सोच रहा होगा
कि
उसकी प्रयेसी तो
धड़कन सुनने में चतुर
वह
नव यौवना की
गति से दौड़ना चाहती
ऊफ
ये दर्द करते घुटने
सपने से
जाग चुकी थी
सतर साल की वृद्धा
गर्म चाय के
प्याले में उठी खुशबू में ” दस्तक”
ज़हन में उतरी
आंखों
की कोर
गीली हो प्रेमपुष्प अर्पित कर गयी।

✍️©® डा सन्तोष चाहार “जोया” ३०/०५/२०१९

मोड़

मोड़
मुड़ गए थे तुम
चलकर साथ दो कदम
दर्द दे
जुदा हुए
डरे थे तुम
दुनिया के दस्तूरों से
दोराहे पर
छोड़ अकेला
भीड़ का हिस्सा बन गए।

प्रेम
करते थे तुम
पर दुनिया से डरते थे
मेरा प्रेम
शाश्वत
मधुर
अंंनत
सदियों से बहती धारा सा

एंकात
मुझे भाता
स्वीकार नहीं मुझे
अस्तित्वहीन भीड़ का वजूद
मेरा प्रेम
मीरा सा
राधा सा
निश्छल
निर्लिप्त।

आज भी
मेरी रुह
का हिस्सा हो तुम
फिर कहां जुदा हो तुम
इस मोड़ पर
दस्तूरों के सब दरवाजे बंद है
ना खोने का डर है ना मिलने का भ्रम
प्रगाढ़ प्रेम की धारा बहती यूं बन दुर्लभ।
✍️ ©® डा सन्तोष चाहार “जोया” १२/०४/२०१९

बगावत

“हैलो बेटा जूही”
रमा ने शाम सात बजे अपनी बेटी जूही को फोन लगाया। लेकिन अभी लाइन व्यस्त का संदेश आ रहा था। रमा ने सोचा थोड़ी देर में दुबारा मिला लूंगी और वह किचन में रात के खाने की तैयारी में जुट गई। रमा बेटी के साथ मित्रवत ही रहती थी।
जूही, एक सुंदर, आत्मविश्वासी लड़की, जो कि पिछले तीन साल से एम।एन।सी। में मुम्बई में मैनेजर के पद पर कार्यरत
थी। रमा की पहली संतान, खूब दुलार से पली पढ़ी और उच्च संस्थानो से एम। बी।ए। कर अच्छे पैकेज पर कैंपस प्लेसमेंट लेकर अपनी क्षमता का लोहा मनवा रही थी। जॉब के तीन साल तक रमा और शशांक ने उसे कभी शादी के लिए बाध्य नहीं किया था। लेकिन अब शशांक का स्वास्थ्य भी ज्यादा ठीक नहीं रहता था क्योंकि एक साल पहले ही हॉर्ट सर्जरी हुई थी और समय से पहले रिटायरमेंट ले लिया था। इकलौती संतान थी तो रमा के सास ससुर भी चाहते थे कि शादी धूमधाम से हो जाए चूंकि उन्हें भी पोती की शादी का बहुत चाव था। दूसरी बात ये भी थी कि रिश्ते नातेदार भी कभी ना कभी अहसास करा ही देते थे कि, “लड़की की उम्र निकली जा रही है और शादी नहीं कर रहे हो क्या?”

“हैलो मम्मा” इस बार जूही ने फोन लगाया था।
” हां, बेटा, कैसी हो?”
“बहुत खुश हूं मम्मा” अभी अपने ऑफिस से निकली हूं। मेरी दोस्त नीना का फोन आया हुआ था , जूही बताती चली।
“बेटा, एक बहुत बढ़िया रिश्ता आया है, उसी के संबंध में बातचीत करनी है” रमा ने अपना पासा फेंकने की कोशिश की।
” मम्मा आपको पता है, मैं इस तरह की एरेंजड़ मैरिज में विश्वास नहीं करती… मैं किसी भी अजनबी से शादी कैसे कर सकती हूं… मुझे पहले बताओ कौन है, क्या करता है। कहाँ से शिक्षा हुई है.. कितना पैकेज है…?” जूही की लम्बी लिस्ट थी सवालों की और रमा समझ नहीं पा रही थी, इतना कम बोलने वाली जूही इतने प्रश्न उठा रही है।
” बेटा, लड़का पूना में इंफोसिस में चीफ मैनेजर है। सुंदर, गठीला शरीर और बढिया व्यक्तित्व का धनी है। तीस लाख का पैकेज है….गोत्र भी नहीं मिलते हैं…तेरे पापा के एक दोस्त ने रिश्ता बताया है…वे लोग घर आए थे और रिश्ते के लिए तैयार हैं… हमने ही कहा था कि एक बार बेटी से बात कर लेते हैं…।”
” मम्मा, ऐसा है, मैं अभी कुछ नहीं कह सकती जब तक लड़के से मिलकर बातचीत ना हो जाए… उसको समझ ना लूं… ऐसे कैसे शादी कर लूं”।
“ऐसा है, बेटा, किसी को भी आप सारी जिंदगी भी नहीं समझ सकते… क्या समझ लोगी कुछ दिनों में..तेरे पापा को ही मैं समझ नहीं पायी इतने सालों में.. हमारे स्वयं के विचार भी बदलते रहते हैं… शादी ब्याह में बड़ों की पारखी नज़र होती है… दादा जी भी चाहते हैं ये रिश्ता हो जाए… ” इस बार रमा अपनी पूरी कोशिश कर रही थी।
” मम्मा, बस अब और नहीं सुनना मुझे… पढ़ लिखकर क्या हमारी समझ इतनी विकसित नहीं है कि अपना भला बुरा सोच सकें… आप लड़के का बॉयोडाटा वटसप कर दें…लिंकड़न पर मैं सारा चैक कर लूंगी… और यदि लड़का बातचीत करना चाहता है तो उसका नंबर मुझे दे देना…”।

“ठीक है, बेटा, भेज देती हूं लेकिन मुझे नहीं लगता वे बातचीत में रूचि दिखाएगा… शायद उसके मां बाप को भी ये बात पंसद ना आए” रमा ने हिचकते हुए कहा।
” मम्मा, फिर ठीक है ना। जो लड़का अभी भी मां बाप की ही अंगुली पकड़ कर चलना चाहता है तो बात करने का क्या मतलब है… शादी जीवन भर का बंधन है और यदि एक पढ़ा लिखा व्यक्ति अपना खुद का वजूद नहीं रखता तो ऐसे व्यक्ति से बातचीत किसलिए… मैं मानती हूं मां बाप का आशिर्वाद लेना चाहिए लेकिन उसके अपने भी कुछ ख्यालात होगें शादी के संबंध को लेकर… अच्छा मम्मा मैं रखती हूं, अभी जिम जाना है… बॉय”। जूही की बेबाकी से एकबारगी तो रमा अचम्भे में थी लेकिन शांत मन से सोचा तो लगा कि ठीक ही तो कह रही है। रमा जीवन के तीस साल पीछे चली जाती है जब वह अपनी कोई पंसद नापंसद नहीं बता पायी थी। हिम्मत ही नहीं होती थी उस जमाने में। जहां पिता, ताऊ व चाचा ने रिश्ता तय किया, चुपचाप शिरोधार्य था। पढ़ीलिखी तो वह भी थी, लेकिन मज़ाल अपनी कोई बात रख सकें। शादी के बाद भी कोई परेशानी होती तो यही कहा जाता था कि, ” अब वही तुम्हारा घर है। एडजस्ट करो”। रमा को याद है उसके बाद सारी उम्र एडजस्टमेंट में ही गुज़री थी…पहले अपने मायके की इज्ज़त की खातिर, फिर अपनी बच्ची की खातिर…।

शंशाक ने भोजन करने के पश्चात पूछा था रमा से…इस रिश्ते को लेकर। रमा ने जो बातचीत हुई थी जस की तस बता दी थी। शशांक कुछ नहीं बोले। रमा ने कहा, ” आप चिंता ना करें… क्या मालूम बातचीत करने से जूही को लड़का पंसद आ जाए”। शशांक ने अपने दोस्त को सारी स्थिति से अवगत करवाया और जूही को बातचीत के लिए मोबाइल नंबर दे दिया गया। मुंबई और पूना की दूरी भी बहुत अधिक नहीं थी, सो जूही ने नीलेश से मिलने का प्लान बनाया। दो चार बार वे एक दूसरे से लंच पर मिले, जिंदगी व शादी के फलसफे पर चर्चा हुई। नीलेश मुंबई भी आया। एक महीने बाद जूही ने अपनी मम्मा को फोन कर सारी बातचीत का निष्कर्ष बताया।
” मम्मा, मैं इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हूं”
“क्यों, बेटा। क्या हुआ?” रमा परेशान हुई।
” नीलेश, दिखने में तो बहुत आधुनिक है। बेरेंड सूटबूट है। महंगे होटल्स में खाने का शौकीन है। घूमने फिरने का भी शौक है…” जूही बताती जा रही थी।
” फिर , दिक्कत कहां है?” रमा ने सीधा सवाल किया क्योंकि उसे घुमा फिराकर कहना पंसद नहीं था।
” मम्मा, नीलेश की सोच वही पुरुष प्रधान मानसिकता वाली है… उसके हर एक एक्शन से साबित हो रहा था कि पढ़ने लिखने से उसके ज्ञानचक्षु नहीं खुले हैं…ये डिग्रीयां केवल अच्छे ओहदे पर पहुंचने के लिए हैं उसके लिए.. चूंकि मैं शादी से पहले सब बातें रखना चाहती थी तो मैंने अपनी साथी दोस्तों के बारे में बताया तो उसके चेहरे पर ईर्ष्या के भाव स्पष्ट थे…और उसने ये भी कहा कि शादी के बाद ये पुरुषमित्रों से वास्ता नहीं रखना है…।”
” बेटा, ये सब बातें उससे कहने की क्या जरूरत थी। पुरुषों को ईर्ष्या होती ही है…”
” मम्मा , ऐसा है। जो व्यक्ति शादी की नींव ही अविश्वास पर रखना चाहता है तो मैं ऐसे व्यक्ति से शादी नहीं कर सकती.. चाहे मुझे ताउम्र अविवाहित रहना हो…।”
रमा को बहुत तनाव हो रहा था क्योंकि रिश्ता खुद चलकर आया था और वह तो सोच रही थी, ये शादी की जिम्मेवारी भी पूरी हो जाए तो गंगा नहा लें। लेकिन इस लड़की के बगावती तेवर के सामने किसी का बस नहीं चलेगा। ये तो घर में सब जानते थे कि बचपन से ही जिस बात पर अड़ जाती तो किसी चेतावनी से भी नहीं डरती थी। अपने बाप पर गई थी। बाप की तरह काम में होशियार तो थी ही, सोशल सर्कल का दायरा भी विस्तृत था और इसीलिए, उसके दोस्तों की फेरहिस्त में लड़के व लड़कियां दोनों शामिल थे। जूही में कभी जैंडर बॉयस नहीं था। हर रिश्ते में क्लेरिटी चाहती थी बस।
रमा ने शाम को शशांक को वस्तुस्थिति से अवगत कराया। दादा जी तो बहुत गुस्से में थे लेकिन शशांक बेटी की जिद्द के आगे झुक गए। वे समझते थे कि नया जमाना है इसके साथ कदम मिलाना ही बेहतर है। जूही ने ये भी स्पष्ट कर दिया था कि वह शादी अपनी पंसद से ही करेगी। दो साल इस तरह और बीत गए और फिर एक दिन जूही ने रमा को फोन करके बताया कि वह निशांत से शादी करना चाहती है। निशांत सजातिय नहीं था। दादाजी पुराने ख्यालात के आदमी थे।.घर में खूब हंगामा किया लेकिन जूही ने कहा कि, ” आप लोग यदि शादी नहीं करेंगे तो हम दोनों कोर्ट मैरिज कर लेगें। निशांत सुलझा हुआ लड़का है और अच्छे पद पर उसके ही ऑफिस में चीफ मैनेजर है। उसके घर वाले भी शादी के लिए तैयार हैं”। इकलौती बेटी की शादी के खूब सुनहरे ख्वाब देखे थे रमा और शशांक ने। जूही निशांत को मिलवाने घर लाई थी। बातचीत करके शशांक ने फैसला किया कि शादी धूमधाम से होगी। बेटी की खुशी से बढ़कर उनके लिए कुछ नहीं है। पढ़ा लिखा परिवार मिल रहा था। शुभ मुहूर्त देखकर दोनों पक्षों के रीति रिवाज से शादी संपन्न हो गई। जूही और निशांत की जॉब भी विदेश में अच्छी कंपनी में निश्चित हो गई थी। अपने सपनों को साकार करने दोनों विदेश चले गए। दोनों को ही दुनिया भ्रमण का शौक था। जूही पांच साल बाद निशांत के साथ देश वापिस लौट आई। रमा और शशांक नाना नानी बन चुके थे। नातिन को देखकर दोनों का दिल गदगद हो रहा था। बिल्कुल नन्ही जूही ही थी और उन्हें इस बात का डर भी था कि उनकी नातिन भी एक दिन जूही और निशांत के फैसलों पर बगावत करेगी। खैर जो भी हो अभी वे उसके बचपन को एन्जॉय कर रहे थे।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “जोया”०२/०४/२०१९