Category Archives: Lost Love

लफ्जों का पुल

लफ्जों का पुल
बुनकर
पहुंची थी मैं
उसकी
खामोशी तक
जहां केवल
धड़कन का शोर
पुख्ता कर रहा था
उसके जिंदा होने का सबूत
आंखों की
झुकी पलकों में
ठहरा था अव्यक्त दर्द
आश्वस्त
हाथ का स्पर्श पा
फूट पड़ा
घुटन का गुबार
फिर
कांपते हाथों से
खींचा उसने
आलिंगनबद्ध
प्रेमी युगल का रेखाचित्र
जो
संकीर्ण सोच के
अग्नि कुंड में
जीवन की
आहुति डाल
परंपरा को जिंदा रख गए
एक मां
की आवाज़ को
ओढ़ा दी गई थी
खामोशी की चादर
ताकि
पोषित होता रहे
संवेदनहीन समाज का दंभ।
✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१८/०९/२०१९

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मूल प्रतियाँ

मेरे द्वारा
लिखे वो खत
जो तुमने फाड़ दिए
और
तुम्हारे खत
जो
मैंने जला दिए
उनमें कभी
बरसी थी झमाझम
दिल के बादलों से
इश्क़ की ऋचाएं ।

आंखों
के सागर में तैरी थी
मौन लफ्जों की कश्तियाँ
इश्क़ के ऑसिस में
बिखरे थे रुहानी संवाद
वो सारे खत
मेरे आंगन की
मिट्टी के
कण कण में हैं समाहित
उस मिट्टी में
रोपे गए गुलाब के गुंचों में
फूल
हमारे खतों की
मूलप्रतियां बन
खुशबूएं फैलाते रहे।

सालों की जुदाई
और उम्र के
बूढ़े होते जिस्मों में
इश्क़
यूं होता रहा जवां
क्योंकि
वो खत
इश्क़ की कहानी की
प्रतिलिपियाँ नहीं थे
हमारे खत
राधा-कृष्ण के प्रेम की भांति
सच्ची मोहब्बत के जिंदा दस्तावेज थे।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १३/०९/२०१९

उधार

उधार
नहीं हैं अब
मेरे ऊपर
तुम्हारे किसी
एहसान का कर्ज
चुका दिया है मोल
एक मकान
जो तूने बना कर दिया
यद्यपि उसमें भी
मेरा रहा था बराबर का योगदान
बिफरकर
नौकरी त्यागने का तुम्हारा कदम
मुझे झटका तो दे गया था
लेकिन
मेरे मजबूत
इरादों को तोड़ ना सका
तुम्हारे बच्चे भी पढ़लिख कर
ऊंचे ओहदे पर पहुंच गए हैं
तुम्हारे बाप द्वारा
कह गए शब्द
मेरे जह़न में
शूल से चुभे पड़े हैं
मेरे दस साल के बेटे का
मनोबल तोड़ते हुए
बच्चों की दादी से उन्होंने कहा था
“ये बच्चे तो भीख मांगेगें”
मेरे मासूम बेटे का सवाल
आज बीस वर्ष बाद भी
मुझे अंदर तक हिला जाता है
बेटे ने पूछा था सहमते हुए
” मां, क्या हम भीख मांगेंगे?”
मैं स्तब्ध रह गई थी
मैंने पूछा था “कौन कह रहा था?”
उसने कहा “दादा जी, दादीजी को कह रहे थे”
आज
सभी शब्दों की मार
व उनके तुच्छ सोच की
सब उधार चुकता हो चुकी है
तुम सभी को
शायद इस बात का भान नहीं था कि
एक महिला/ मां के लिए
उसकी संतान से बढ़कर कुछ नहीं
उनके लिए
वह जीवन की उल्टी धारा को
मोड़ने का अदम्य साहस रखती है
तुम्हारी मां ने भी कहा था
” मेरा बेटा नौकरी करता तो ये बालक अफसर बनते”
उन्हें भी
मेरी जैसी अंतर्मुखी बहु से
उम्मीद नहीं थी
मेरी क्लास वन अफसर की
ईमानदारी की कमाई
किसी को दिखाई नहीं देती थी
डिप्लोमा कोर्स कर
जे ई एन का पद
व उपरी कमाई पर
उन्हें घंमड था
मैंने
उस वक्त
किसी बात का
जवाब नहीं दिया था
लेकिन
एक जिद्द ठान ली थी
किया था
खुद से वादा
बिखरा जो
उसे है समेटना
आज
बीस वर्ष बाद
फक्र से कहती हूं
तुम सभी का
पिछले जन्मों का उधार हुआ चुकता
जैसे सुबह का भूला शाम को घर लौटता है
तुम आए थे
मेरे पास क्षमा मांगने
कहा था ” मेरा गुस्सा मुझे खा गया”
मैंने कहा था
” कोई बात नहीं… पिछले जन्मों का उधार उतार रही हूं”
तुम्हें अपना लिया था फिर से
क्योंकि
अराध्य सा प्रेम किया था तुमसे
मेरी एक भूल को
तुम क्षमा नहीं कर सके थे
मुझे सजा देने के लिए
त्याग दी थी तुमने अपनी “शाही नौकरी ”
ये ” शाही नौकरी” का जुमला भी
तुम्हारे बाप का था
बता देना उन्हें
ईमानदारी की नौकरी ने बहुत बरकत दी
मिली विद्यार्थियों की दुआएं
मुझे कोई घंमड नहीं है
लेकिन
अपने संस्कारों
और
क्षमता पर है अटूट विश्वास और रहेगा।
✍️ ©® डा सन्तोष चाहार ” ज़ोया” १२/०९/२०१९

आवाज़

यादों के
गलियारों से
क्यों आवाज़ देकर
मेरी कोशिश को पंगु करते हो
मैं
टूटे ख्वाबों को
खंडित वजूद के सहारे ही सही
समेटने का भरसक प्रयत्न कर रही हूं
मेरे
कदमों में लगे
उम्मीद के पंखों को
रवायतों के
महीन मांझे से कतर
तुम
रंगीन महफ़िलों के
आसमां का ‘चांद’ बन गए
लेकिन
भूल गए शायद
तुम्हारी
‘चांदनी ‘ की दमक
सूरज के वजूद से है
और
मैं वह सूरज हूं।
इश़्क
की बाज़ी हार कर भी मैं जीती
खबर है
मेरे रचे नग्मों
पर
तुम हर महफ़िल में
ढ़ोल की धाप पर थिरकते हो
मुकम्मल इश़्क
का साक्ष्य
इससे बढ़कर क्या?
तुम
कहते थे
इश़्क
वो स्वाति की बूंद है
जिसकी चाह में
चातक टकटकी लगाए
मेघों को ताकता है
जानते हो
वही बूंद
मेरे रग रग में
तुम्हारी रुह को समेटे
मोती बन चुकी है
इसलिए
तुम अब
यादों के गलियारों से
आवाज़ ना दो
मुझे
इस दुर्लभ मोती संग
ही जीने दो।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १७/०८/२०१९

फ़ना मोहब्बत

तेरे
हिस्से का वक्त
मेरी जिंदगी की घड़ी में
चुपके से यादों की बौछार करता है
और मैं रुह तक भीग जाती हूं
तेरे संग
आंखों रुपी कैमरे से ली तस्वीरें
खामोशी से शोर मचाती हैं
और मैं
दिल के कानों
पर हाथ रख लेती हूं
परमंपराओं
के पहाड़ ढ़ोते ढ़ोते
इश़्क की दास्तां बूढ़ी हो चली
मोहब्बत में फ़ना होने का जज्बा
आज़ भी जवां है।
✍️©® डा. सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०८/०८/२०१९

राहें

वो राह
कहीं छूट गई
जिस राह पर
दो कदम साथ चले
हम और तुम

रह गए
शेष
टूटे दिलों पर
कसमें वादों के
आंसुओं से उकेरे निशां

जुदाई
के दशकों बाद भी
तेरे आशियाने तक
जाती हुई राह
पर गुजरते हुए
कदम
आज भी
ठिठक जाते हैं

बूढी
हसरतों में
उदासियों के कंकड़
आज भी
शूल से चुभते हैं

स्नेहिल
रिश्तों में जमी
आहों की बर्फ
ठिठुरन बन
पहली प्रीत के
निश्छल संवाद पर
नागफ़नी सी उग आई थी

फिर
आया था
बागबां इश़्क में
पतझड़ का मौसम
मासूम इरादों
के पीले पते
उस राह पर
आज भी बिखरे पड़े हैं
जहां से
तुम्हारे और मेरे घर का पता
तुम और हम
जानबूझकर भूले
ताकि
पनप सके
विश्वास का कल्पवृक्ष
और
निश्चिंत हो सकें
हमारे
सात फेरों के जीवनसाथी

लेकिन
क्या कोई ताकत
मिटा सकी है
उन पवित्र राहों को
जिनके किनारों पर
हर क्षण
खिलते हैं
इश़्क के आत्मीय पुष्प

ये राहें
दिल की नाजुक
पगडंडियों से होकर गुजरती हैं
जिन पर
रंग बदलती
दुनिया के दस्तूर
बेमानी हैं
जहां
होता है
हुस्न-ओ-इश्क़
का
एकछत्र शासन
और सजती है
रुमानियत की भव्य रंगशाला।
✍️©® डा.सन्तोष चाहार “ज़ोया”०३/०८/२०१९

बेजुबां इश़्क

सरेराह
मिलकर गुज़रा वो
अज़ीज हसरतों का गुंचा लिए
डायरी के सफ़हों सी उजली
उसकी मासूम तमन्ना
जो
पिंजरबंद रही
ऊसलों के शहर
बंद मुठ्ठी में रेत सी
उसके
इश़्क की कहानी
शाख़
से टूटे पतों सा नसीब
कुछ लम्हें रीत गए
कुछ यूं ही बीत गए
एक
खास लम्हा
ख़त की सांसे बन
जीने की राह दिखा गया
बेजुबां इश़्क
का उजला ये पहर रहा।

सफ़र-ए-इश़्क
कुछ यूं तय हुआ
जूं
रात की मुठ्ठी में दिन निहित
और हो
घने अंधेरों से गुजरना चिन्हित
समर्पित
दिलों की दास्तां
रवायतों के
महीन धागों में
यूं उलझी
जूं
कूकुन में तितली
इश़्क के
सब्र का पहिया
अदब से फिर
नया मोड़ मुड़ गया
वक्त
की छैनी से
तराशता रहा
प्रेम पत्थरों को
रुह
का रुह से
जारी रहा मौन संवाद
मिसाल -ए- इश़्क
की
लिखी गई
यूं
अद्वितीय गाथा
फिर भी
हसीं दिलों में ठहर सी गई
मिलन की कसक
चाहतों के परिंदे
भर उड़ान
चूमना चाहें
एक दूजे का माथा।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २६/०७/२०१९

प्रेम पींग

आज
हवाओं ने फिर
खामोश शोर मचाया
ऐसा लगा
शहर में दीवाना
दस्तक लाया
रुठे साज़ों ने
हठ छोड़, छेड़ी
वही पुरानी तान
धड़कते
हंसी दिलों के
थिरके थे जब अरमान।

जुदाई
की ऋतु में
जहाज़ -ए इश़्क
टक्कराता रहा
तूफानी लहरों के प्रचंड वेग से
दिल के
खामोश आंगन में
बरसे थे
विरह के बादल
टिप टिप टिप
आंखों की कोरों से
टपकी थी यादें
अश्रु बन।

प्रीत
डोर की
उलझी गाठें
सुलझीं,
जात,धर्म, बिरादरी
की ढही दीवारें
शनैः शनैः
दमघोंटू
परम्पराओं के
कुंद हुए हथौड़े
नयी राहें
इंगित करती
नये उज़ाले
नयी मंजिलें
जीवन पतंग
ने छुआ
इंसानियत का
विस्तृत गगन।

समरसता
की सुरमई बेला
प्रेमी युगलों
के हिस्से की
बंद झरोखों से
छन छन
आने लगी धूप
इंतजार
की घड़ियां हुई रुख्सत
प्रेम तरु
पर डल गई पींगें
मन पंछी के
रात दिन लगे महकने
दिल- ए-बागबां की
चिड़िया लगी चहकने।
✍️©® डा. सन्तोष चाहार “ज़ोया”२०/०७/२०१९

जिद्दी यादें

येंं
यादें ना
जिद्दी हैं बहुतं
रात के
अंधेरे में
बेखौफ
टहलने निकल जाती हैं,
दुनिया
से बेखबर
टटोलती हैं
दिल का आंगन
सुरक्षित है जहां
वह
रुहानी ख़त
जो साक्षी रहा
इज़हार-ए-मोहब्बत का…।
यादें
बड़ी शिद्दत से ढूंढती हैं
उन
ख़तों के पुर्ज़ों को
जहां
इश़्क ने
कभी लिखी थी
वफ़ा की इबारत
और
हुस्न की आंखों में
तैरने लगी थी
सपनों की रंगीन तितलियां…।
यादों
के गलियारे में
अचानक
अमावस का हुआ बसेरा
मानसपटल
पर उग आए
कड़वी
यादों के कैक्टस
और
शूल की तरहं
चुभने लगी
वक्त की नुकीली सुईयां
लेकिन
यादें जिद्दी हैं
ठहर गई हैं
उसी मुकाम पर
जहां
हुआ था इक़रार
फिर
जुदा हुई थी राहें…।
यादें
घूमती रही
धरती की झिलमिल छत पर
जब
उग आया था चांद
सितारों से घिरा
तब
इश़्क और हुस्न
सिमट गए थे
एक दूजे की बाहों में…।
यादों
के ज़हन में
अटक गए
प्रेमपूर्ण
ख़तो के पन्ने
जो
फड़फड़ा कर
देना चाहें
रुहानी मोहब्बत
की ठोस गवाही
जब
हुस्न और इश़्क ने
बसाया था
प्रेमरस से सरोबार
स्वप्निली आशियाना…
यादें
जिद्दी हैं
सबसे बेफिक्र
रचाती इश़्क
की मेंहदी,
इश़्क
शिद्दत से
भरता हुस्न की मांग
रुमानियत के परदे में
सुहाग
की सज़ती सेज़
दुनिया के
संकीर्ण बंधनों से दूर
क्योंकि
यादें जिद्दी हैं
वे
कभी ना मानती हार।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१४/०७/२०१९

बेहिसाब मोहब्बत

बेहिसाब मोहब्बत की सज़ा हुई कुछ यूं मुकर्रर
जलते अंगारों पर चलती रहे वफ़ा जूं उम्र भर

तारीख ऐलान करेगी मेरी मोहब्बत का फ़साना
तेरी बेवफाई पर एक दिन जमकर हंसेगा जमाना

भ्रमर जूं मंडराते रहे बागों में तितलियों संग तुम
मधु के अतिरेक से एक दिन हो जाओगे खुद बेदम

घमंड के बादलों पर होकर सवार जो चले हो तुम
मेरी पीड़ की बरखा ना करेगी तेरी गुहार पर रहम

उम्र के साठवें साल ने दी है तेरे दरवाजे पर दस्तक
अल्हड़ सी, आदतें नहीं की हैं अभी तुमने रुखसत

विषपान कर हमेशा तुम्हें दिया ममता का आंचल
घुंघरू तोड़कर चली, न खनकेंगी तेरे नाम की पायल

अंतिम सांसो की माला जब तेरी होने लगेगी मद्वम मद्वम
चलचित्र की भांति, तेरे हृदयपटल पर चुभेगी मेरी कलम।

✍️©® डा सन्तोष चाहार “जोया” १३/०६/२०१९