Category Archives: Lost Love

लम्हों की दास्तां

लम्हों की दास्तां

समुंद्र किनारे बैठकर यूं ही कितनी यादें ताजा हो गईं हैं।
आज से बीस साल पहले जब गोवा के रमणीय स्थलों को देखने के पश्चात, मैं एक बालू तट पर आकर बैठ गई थी। समुंद्र में उठती गिरती लहरों में टटोल रही थी, तुम्हारे साथ बिताए लम्हों की दास्तां।

प्रेम का सबसे खूबसूरत अहसास  मेरे मन मस्तिष्क में ऑक्सीजन बनकर जिंदगी को तरोताजा कर गया था। समुंद्र के वक्ष पर इठलाती बलखाती लहरें, हमें एक-दूसरे के कितने समीप ले आईं थीं। तुम्हारी बाहों में सिमटी, मैं प्रेम की पराकाष्ठा तक पहुंचने के लिए लालियत, लहरों के बिछौने पर तुम्हारे अधरो की प्यास बुझाने में अनेकों दूसरे जोड़ों की भांति मदमस्त होकर, अपनी झोली में उन मोतियों को बटोर रही थी, जिनके लिए मैंने इतनी दूर का सफर तय किया था।

तुम्हारे से बिछुड़ने के बाद जिंदगी के रंग फीके होकर मेरे चेहरे पर उदासी की अस्पष्ट लकीरों में उभर आए थे। जिंदगी केवल कर्त्तव्य की नदी पर बह रही थी। किसी ने यह जानना नहीं चाहा, इस नदी में आंसुओ का समुंद्र कहां विलीन हो रहा है। नदी का कर्त्तव्य ही है सींचते जाना, अपने किनारों पर सभ्यताओं को जन्म देना और पोषित करना। तुम जानते हो, कर्त्तव्यों से मैं कभी विमुख नहीं रही लेकिन जिंदगी में कर्त्तव्यों के साथ अधिकार भी तो मिलने चाहिए। अधिकारों के लिए मुझे क्यों जूझना पड़ा? गृहस्थी में सबकुछ परफेक्ट रखने की कोशिश में, कितने ही रंगों से महरूम रही मैं। तुम जानते थे रंगों से मुझे कितना प्रेम है, लेकिन यहां किसी को परवाह नहीं थी। मेरी हसरतें जो तुम्हारे संग आकाश छूने का जनून रखती थी, धीरे धीरे शिथिल होने लगी। एक लड़की, जब विवाह बंधन के पासों में लपेट दी जाती है तो उसके ख्वाबों के पंख कतर दिए जाते हैं। विशेषतः, जहां बेमेल शादियां होती हैं। गृहस्थी के कोल्हू में मुझे खूब इस्तेमाल किया गया। इन्हीं कुछ  जिम्मेदारीयों के बीच, तुम्हारी यादें कुछ सकूं के क्षण लेकर आती थी और तुमसे मिलने की इच्छा बलवती हो जाती थी।

पति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती रही, लेकिन मुझे हर बार महसूस होता था कि, मैं दौड़ना चाहती हूं और वे एक जगह पर जम जाते हैं।  जिंदगी में इतनी तटस्थता, ठहराव मुझे नहीं भाता था क्योंकि मैं दौड़ना ही नहीं उड़ना भी चाहती थी, लेकिन मुझे एक खूंटे से बांध दिया गया था, रस्सी, उतनी ही लम्बी छोड़ी जाती थी जितना उनको मुझे उपयोग करना था और तुम्हें तो मालूम है, मेरे पांवों में तो रोलर्स लगे थे। मैं तेज़ गति से खुले मैदान और बर्फीले पहाड़ों पर रेस लगाने के रोमांच को जीना चाहती थी। तुम्हें  याद तो होगा वो जीत जब ,मैंने पी टी उषा को भी एक बार पीछे छोड़ दिया था, राष्ट्रीय स्तर की स्कूल स्पर्धा में, उस दिन पूरी टीम ने मुझे सर आंखों पर बैठा लिया था। उस दिन तुम कितने खुश थे, जब हरियाणा की एक पत्रिका में मेरी तस्वीर छपी थी और लिखा गया था, ” ये लड़की एक दिन ओलम्पिक खेलों में जाएगी”।
लेकिन, कहां जाने पाई? 1980 के दशक में हमारा समाज खेलों के विषय में जागरुक ही नहीं था। पिता जी का आदेश था, ” पढ़ाई पर ही केंद्रित रहो”। सरकार ने भी कोई सहायता सुनिश्चित नहीं की। तुम लड़के थे, तुम चले गए एन डी ए में। मुझे भी आर्मी में जाना था लेकिन लड़कियों के लिए उस दौर में नहीं थे आप्शन। तुमसे शादी कर आर्मी का हिस्सा बनना चाहा, लेकिन मेरी राय कहां ली गई थी?  जिंदगी के बहुत सारे रंग यूं ही फीके होते चले गए लेकिन तुम्हारे प्रेम का रंग शादी के बाद, मेरे अंतर्मन की गहरी कंदराओं में सिमट गया।  एक खूबसूरत अहसास जो आज भी उतना ही सुगंधित है जितना पहले प्रेम का बीज अंकुरित होने पर था। उतना ही मुलायम है, जितना पहले स्पर्श में था। आत्मीय संबंध हमेशा गहरे होते हैं।

आज भी समुंद्र के किनारे बैठकर पलकें पसारे बैठी हूं, तुम्हारे इंतज़ार में। एक बार दोबारा जीना चाहती हूं, रंगों मे में डूब जाना चाहती हूं। यहां बैठी, इन हवाओं से तुम्हारा पता पूछती रहती हूं, उन लहरों को पकड़ने की कोशिश में रहती हूं, जिन लहरों पर तुम्हारा नाम अपने नाम के साथ लिख दिया था। आसमान में उठती घटाओं में तुम्हारे अक्स को तलाशती हूं, शायद मेरे प्रेम का बादल तुम से मिलकर आया हो। पॉम के लहराते, उन दोनों वृक्षों को भी मिलकर आई हूं , जहां तुमने प्रेम के दस्खत किए थे। यहां बहुत सारी सीपियां चुनकर रखी हैं, उस सीपी को टटोलने के लिए जिस पर तुमने हमारा नाम उकेर कर समुंद्र में डाल दिया था, ये कहते हुए कि, ” हमारा प्रेम भी समुंद्र जितना गहरा है, इसे छुपा देते हैं…एक दिन ये सीपी जब किनारे पर आएगी, उस दिन हम दुबारा मिलेंगे।” आज, मैं समुंद्र किनारे, उसी सीपी को तलाश रही हूं। बालू पर एक घरौंदा भी बना लिया है, ठीक उसी जगह, जहां हम दोनों ने मिलकर बनाया था। तुम्हारा चित्र अपने चित्र के साथ उकेर दिया है। देखो, इस चित्र में हम दोनों वृद्धावस्था में पहुंच चुके हैं, लेकिन हृदय अभी भी युवा है, जहां हमारे दिलों की तरंगें फिर मिलने को आतुर हैं। मुझे विश्वास है, जब मैं सीपी को ढूंढने में कामयाब हो जाऊंगी, उसी समय तुम यहां पहुंच जाओगे। तब तक मेरी प्रतिक्षा की घड़ियां टिक टिक करती रहेंगीं।
©® ✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०२/०७/२०२०

खंडहर

प्रेम के खंडहरों से आती सिसकियों की आवाज़ सुनी है कभी? चलो आज तुम्हें ले चलती हूं, उस गहरे कुएं की तरफ़, उस नदी के किनारे की तरफ़, उस पहाड़ी की खाई की तरफ या फिर रुद्रप्रयाग के पुल पर झूलते झूले की तरफ़, जहां से ना जाने कितनी बार सोचा था कि कूद जाऊं, यहां से, अपना लूं मौत को, ताकि मैं, यूं सिसक सिसक कर फर्श पर सिर पटकना बंद कर देती। तुम चले गए और पीछे छोड़ गए मुझे तिल तिल मरने के लिए और फिर भी जीवित रहने को विवश। तुम ने अपनी दुनिया को सुरक्षित रखा और परेशानी मेरे हिस्से में छोड़ गए। अवसाद की गहरी खाई में धकेलकर कर कितने खुश रह पाए होगे, ये तो नहीं जानती, लेकिन इतना जानती हूं कि, किसी का दिल तोड़कर अपनी दुनिया आबाद करने वालों ने सिसकती जिंदगी के श्राप के बारे में ठीक से नहीं जाना। प्रेम, वह नहीं था, जो तुमने किया। तुम गुनगुनाते तो बहुत थे, पाकिज़ा फिल्म का गाना,
“प्यार किया तो डरना क्या” लेकिन पहली ही चोट को बर्दाश्त नहीं कर पाए, और  अपने सुरक्षा कवच में घुस कर आंनद मग्न रहे। मेरे ऊपर अंगुली उठाने वाले की अंगुली काट कर रखने का सामर्थ्य नहीं रखते थे, तो प्रेम की आग से खेलना भी नहीं चाहिए था। तुम्हारे जैसे निष्ठुर हृदय ही, प्रेम को बदनाम करते हैं। प्रेम कोई कॉफी का मग तो नहीं कि चुस्की लेते लेते कॉफी खत्म होने पर प्रेम भी खत्म हुआ। मैंने अपना सबकुछ दांव पर लगाकर, तुमसे प्रेम किया था, लेकिन अब उसके खंडहर ही शेष हैं, क्योंकि मेरे सपनों की ईंटों से तो तुमने अपना महल खड़ा कर लिया। खंडहरों का अपना इतिहास होता है। मेरी सिसकियों की हृदयभेदी पुकार, एक दिन तुम्हें  प्रेम के खंडहरों में लेकर आएगी । सम्मोहित से तुम चले आओगे, अप्सरा का तिलिस्म टूट चुका होगा। खंडित पत्थरों को छूने पर  तुम्हें पहले प्रेम की सिसकियां सुनाई देंगी। तुम वहां भटकते रहोगे और बाहर निकलने का रास्ता दिखाई नहीं देगा। यही तुम्हारा श्राप होगा, जन्म जन्मांतर।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १२/०६/२०२०

ख़त

ख़त

जानते हो?
मेरी जिंदगी ,एक खत बनकर रह गई है
खत का, एक एक वाक्य
जैसे तुम्हारे दिल की धड़कन,
एक एक लफ्ज़,
जैसे
मेरी पलकों में ठहरा आंसू
और
आंसू में ठहरी गहन पीड़ा
जिससे, तुम सरोकार नहीं रखते
तुमने
कभी जानना ही नहीं चाहा
कि, कैसे दर्द की कंदराओं में
एक घाव है, जो भरता ही नहीं
तुम जानते हो?
उस पर, तुम्हारे अगूंठे की छाप है,
उसको
कैसे झूठलावोगे?
जब कभी, मैं
प्रेम की कचहरी में,
मुकदमा दर्ज करवाऊंगी
तब, तुम्हारी हार निश्चित है
अंगूठे की छाप,
तुम्हारे विरुद्ध गवाही देगी।
©®डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १२/०५/२०२०

पुकार

पुकार

सुनो
ॠतुराज बसंत,
इस बार जब तुम लौटो, तब
वैमनस्य के रुखे पीले पत्ते
गिरा कर आना,
तुम्हारे इंतज़ार में
कितने साल
यूं ही बीत गए,
लेकिन
मेरे ख्वाबों के, गुलमोहर पर फूल नहीं आए
उन फूलों के रंगों से
कितनी बार, हमने होली खेली थी,
अब
तुम नहीं हो तो, ना गुलमोहर पर फूल हैं
ना कभी, तुम्हारे बिन होली खेली
मेरे,
हृदय आंगन में खड़ा
ये गुलमोहर भी, मेरी तरह प्रतीक्षारत
उदासी ओढ़े है,
मेरी
खातिर ना सही,
अपने हाथों से रोपे,
गुलमोहर के लिए ही आ जाओ
मैं वसुधा
प्रेम सलिला का जल लिए
तुम्हारे पैर पखारने, उर
द्वार पर खड़ी मिलूंगी।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” ११/०५/२०२०

उसका वेलेंटाइन

जिंदगी की तपती, सुलगती रेत पर वह चलती जा रही थी।
उसके पांव के छाले, जीवन की असीम कठिनाईयों और संघर्ष की पीड़ा की ओर इशारा कर रहे थे। आंखों के काले घेरे उसके बैचेन मन की कंदराओं में टूटे सपने को रेखांकित कर रहे थे। वह आज फिर  प्रेम की पचासवीं वर्षगांठ पर उस रेत के टीले पर बैठी थी, जहां वर्षों पहले गांव के ठाकुर की कुदृष्टि, “उस हसीन जोड़े” पर कुपित हुई थी और अपने कारिंदों से उन्हें अगवा कर लिया गया था। युवक को तो दिन दहाड़े सबके सामने पेड़ पर फांसी से लटका दिया गया था।  गांव में किसी की हिम्मत नहीं थी इस जघन्य कृत्य को ललकारे। मृगनयनी को ठकुराइन की देखरेख में  नज़रबंद कर लिया था ताकि वह पुलिस को सूचना देने की हिमाकत ना करें। चूंकि ये जोड़ा परदेशी था तो गांव वालों को भी इस हत्या से कुछ लेना-देना नहीं था।
मृगनयनी के हुस्न पर ठाकुर की कुचेष्टा रहती थी लेकिन ठकुराइन की भी कड़ी नजर ठाकुर पर रहती थी। मृगनयनी को उस वक्त दो माह का गर्भ था। इसलिए ठकुराइन ने उसे अपनी  देखरेख में रखा था। मृगनयनी ठकुराइन की विशाल हृदयता की मुरीद हो गई थी और उसकी सेवा सुश्रुषा में उसके दिन बीतने लगे। समय बीता और मृगनयनी को एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई…।

मृगनयनी का समय अब बच्चे की देखभाल में व्यतीत होने लगा और पति बिछोह की पीड़ा बेटे की किलकारियों से कुछ कम होने लगी। दर्द को थोड़ा कम करने में बच्चे की मीठी मुस्कान मददगार साबित होने लगी…अंश अब दो साल का हो गया था और अपनी तोतली आवाज़ में सबका मन मोह लेता था। एक दिन मृगनयनी ने ठकुराइन से विनम्र निवेदन किया कि वह अब शहर लौट जाना चाहती है… उसे डर है कि ठाकुर की कुचेष्टा उसे कभी अपना शिकार बना सकती है।  ठकुराइन  भी अब मृगनयनी की जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहती थी। उसे भी यह लगने लगा था कि वह अब तक मृगनयनी का सुरक्षा कवच बनी रहेगी। ठकुराइन ने अच्छे मानस का परिचय देते हुए, मृगनयनी को   उसके सेवा भाव से खुश होकर कुछ रुपए  दिए और अपनी प्रियतम सहेली के नाम चिठ्ठी देकर , एक विश्वास पात्र दासी के  साथ  शहर भेज दिया। ठकुराइन की ये सहेली एक विद्यालय की प्रिंसिपल थी। इस तरह से मृगनयनी को वहां चपरासी का काम भी मिल गया और रहने के लिए एक कमरा, प्रिंसीपल साहिबा की कोठी  के बेकयार्ड में। मृगनयनी स्वाभिमानी महिला थी और वह प्रिंसीपल के घर का कामकाज कर, गुजर-बसर करने लगी। अंश की पढ़ाई का जिम्मा प्रिंसीपल महोदया ने ले लिया था। अंश शुरू से ही बहुत होशियार था…।

ठकुराइन राजरानी ने मृगनयनी को शहर भेजने के लिए उपयुक्त समय चुना। उन दिनों  ठाकुर ज़ोरावर सिंह एक सप्ताह के लिए जंगलों में शिकार पर गया हुआ था।  लौटने पर, मृगनयनी को हवेली में ना पाकर, ठाकुर ज़ोरावर सिंह ने ठकुराइन  से पूछताछ की। पचास साल की प्रौढा़ ठकुराइन जानती थी कि ठाकुर क्यों आसमान सिर पर उठाए है। वह ठाकुर की कुचेष्टा से वाकिफ थी।  उसके साथ रहते हुए वह गांव और इलाके की भोलीऔर गरीब प्रजा पर अनेकों प्रकार के जुल्म होते देख चुकी थी। आज उसकी आत्मा ने उसे झकझोर दिया और ठकुराइन राजरानी ने ठाकुर को अंजाम भुगतने की चेतावनी दे डाली। हमेशा से चुप रहने वाली ठकुराइन की बुलंद आवाज़ से ज़ोरावर सिंह सहम गया था। वह जानता था कि यदि ठकुराइन अपनी जिद्द पर आ गई तो उसे सलाखों के पीछे भिजवा देगी। ज़ोरावर सिंह की जवानी तो रंगीन मिज़ाज में बीती थी, अब वह बुढ़ापे की दहलीज पर कदम रख चुका था। इसलिए पुलिस और मुकदमों के चक्कर से बचना चाहता था। रात के अंधेरे में जब मृगनयनी के पति मणिरत्नम को गांव की मर्यादा भंग के जुर्म में पेड़ पर लटका कर सजा ए मौत  दी गई थी तब, ठकुराइन हवेली की गुप्त खिड़की से सब देख चुकी थी…।

मृगनयनी का मणिरत्नम के सिवाय इस दुनिया में कोई नहीं था। मणिरत्नम से उसकी मुलाकात एक मेले में हुई थी। मणिरत्नम मंत्रमुग्ध हो उस वक्त मृगनयनी की रस्सी पर चलने की कला को देख रहा था… तमाशा खत्म होने के बाद मणिरत्नम की सीटी की आवाज़ से मृगनयनी का ध्यान उस तरफ गया। नज़रें एक दूसरे में समा चुकी थी। नटों के मुखिया से इजाजत ले मृगनयनी, मणिरत्नम के साथ मेला घूमने लगी और फिर कभी डेरे में लौट कर नहीं गई। दो साल तक युवा जोड़ा एक अंजान शहर में, जिंदगी की छोटी-छोटी खुशियों में जीवन का आनंद लेता रहा । एक दिन मृगनयनी ने   मणिरत्नम के साथ  रेगिस्तान में,  रेत के टीले देखने की योजना बनाई। उस साल वहां ऊंटों का उत्सव भी होना था। शहर से कमाई कुछ पूंजी जमा थी और मणिरत्नम अपनी पत्नी/ प्रेयसी को रेगिस्तान के रेतीले टीलों की सुंदरता और भव्य सूर्यास्त का नजारा दिखाने के लिए जैसलमेर पहुंच गया।  वहां उन्होंने देखा कि बहुत से विदेशी सैलानी भी टीलों पर बने तम्बूओं में  राजस्थान प्रवास का पूरा आनंद ले रहे थे।
उसी दिन वहां से ठाकुर ज़ोरावर सिंह, बग्घी में सवारी करते हुए निकल रहा था। युवा जोड़ा सूर्यास्त के नज़ारे को अपनी आंखों में कैद करने में लीन था। ठाकुर की बग्घी की ओर उनका ध्यान नहीं गया।  वैसे भी वो ठहरे परदेशी, उन्हें वहां की परम्परा का भान भी नहीं था। लेकिन ठाकुर ने इसे अपना अपमान समझा और पीछे  उसकी सुरक्षा में घोड़े पर सवार  लठैतों को, युवा जोड़े को उठाने का निर्देश दिया…  मणिरत्नम को  ठाकुर ज़ोरावर सिंह के अहम की वजह से अंजाम भुगतना पड़ा और  मृगनयनी को जीवनसाथी की मृत्यु का आघात।

घटनाक्रम को बीते सालों गुज़र गए  लेकिन मृगनयनी आज भी इन्हीं रेत के टीलों में अपने प्रेमी की खुशबू तलाशने आती है। अंश पढ़-लिख बड़ा अफसर बन चुका है और बेटा ही मृगनयनी को गाड़ी में लेकर आता है… शायद वह भी पिता का आशीर्वाद प्राप्त करने आता है और ममता का कर्ज चुकाने का प्रयास भर करता है।
©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१४/०२/२०२०

रुह के परिंदे

रुह के परिंदे हर रोज़ उड़ान भर कर उन पगडंडियों के वृहद वृक्षों पर बैठकर तुम्हारा इंतजार करते हैं जहां इश्क़ की पहली नज्म गुनगुनाई थी तुमने… याद है मुझे, मेरे शांत हृदय सागर में तब उठी थी प्रेम लहरें…फासले तय कर, आंखों में सिमट गया था तुम्हरा और मेरा वजूद। धड़कते दिलों के महासागर में कसमें वादे कश्तीयां बन, तूफानी रफ्तार से दमघोंटू बेड़ियों को काटने को आतुर थे।
ख्वाबों की जमीन पर कदमताल करते हुए हम दोनों ने एक हकीकत की दुनिया बनानी चाही…समय पंख लगाकर उड़ रहा था और हमारे सपने भी जवां हो रहे थे। सब कुछ कितना हंसी था… तुम्हारी मोहब्बत ने मुझे जिस एहसास से छुआ था उसकी खूबसूरती और गहराई इतनी थी कि मेरे रोम रोम से प्रेम का सोता फूटा था… हृदय के बगीचे में रसिक भंवरा गुंजन कर ,मधु चखता हुआ मन की कलियों पर मंडरा कर मेरी नींद भी चुरा ले गया था… इश्क़ में फ़ना हम दोनों ने प्रेम को शब्दों से नहीं नवाजा था लेकिन हम दोनों ही जानते थे कि हमें जिंदगी साथ गुजारनी है और मूक स्वीकृति हम एक दूसरे को दे चुके थे… लेकिन विधाता का लिखा आजतक कोई मिटा नहीं पाया… हमारी राहें जुदा हुई चूंकि संस्कार से बंधे थे हम। मां बाप की खुशी के लिए सामाजिक मूल्यों के हवनकुंड में निश्छल प्रेम की आहुति दे कर्त्तव्य पथ पर अग्रसर हो एक दूजे के लिए गुम हो गये थे.. यही तो कसम थी तुम्हारी…। जिंदगी अपनी रफ़्तार से चलती रहती है और हमें भी उसके साथ कदम मिलाना होता है नहीं तो बहुत कुछ पीछे छूट जाता है और फिर चाहकर भी हम उसे हासिल नहीं कर सकते।
गृहस्थ आश्रम में अपने फ़र्ज़ के प्रति सजग हम दोनों ही तो समाज द्वारा निर्धारित मापदंड तय करते हुए बुढ़ापे की दहलीज पर पहुंच गए हैं.. जुदा हुए तो बहुत कुछ बदला था। नई दुनिया, नए दोस्त,नए नाते रिश्तेदार… बस जो कुछ नहीं बदला था तो वो था मोहब्बत का एहसास… ये तो वह अनमोल निधि थी जिसे कोई चुरा ही नहीं सकता था , ठीक उसी तरह जैसे कोई शिक्षा दीक्षा को नहीं चुरा सकता… सब कुछ समाप्त भी हो जाए तो भी शिक्षा रुपी धन हमें दुबारा सक्षम बना सकता है… यही धन हमारे माता-पिता ने दिया था… ये वह दौर था जब 1970 के दशक में गांव में लड़कियों की शिक्षा दीक्षा ना के बराबर थी। तुम भी तो किसान पुत्र थे और सभी भाईयों में छोटे होने के नाते ही तुम्हें शिक्षा का अवसर मिला था। तुम्हारे दो भाई तो खेती ही करते थे…ना तुम अपने बापू के सामने हमारे प्रेम की बात कह सके और ना ही मैं। लड़की होने के नाते कहने की सोच भी नहीं सकती थी… लेकिन जीवन के छः दशकों का निष्कर्ष यही कहता है कि जहां रुहानी रिश्ते होते हैं वे बने रहते हैं… ऐसे रिश्तों पर फरिश्तों का पहला रहता है इसलिए तो मन तरंगों के माध्यम से तुम्हारे संदेश मुझे मिलते रहते हैं और मेरा प्रेम यूं ही जवां रहता है। मुझे कभी लगा ही नहीं तुम मुझसे दूर हो…जब कभी भी दुविधा में पाया तब मैं खुद से ही सवाल करती थी कि फलां स्थिति में तुम्हारी क्या राय होती… ऐसा नहीं है कि तुम्हारी बांहों के आगोश में आने को मन नहीं मचलता था… शरीर एक माध्यम है पूर्ण रूप से प्रेम को महसूस करने के लिए… लेकिन only one नहीं है… एहसास , एक अहम किरदार निभाता है प्रेम प्राप्ति में। इसी एहसास को महसूस कर, जब सब निंद्रा का आंनद ले रहे होते हैं, तब मेरे कमरे में सिर्फ मैं और तुम होते हो… मेरे एहसास , कभी कविता तो कभी कहानी बनकर कलम से कागज़ पर हमारे इश्क़ की इबादत करते हैं और मेरी रुह के परिंदे तुम्हारे हृदय के आकाश पर पंख फैला कर ऊंची उड़ान भरते हैं…तब मुझे तृप्ति का अहसास होता है।
✍️©® डा. सन्तोष चाहार ” ज़ोया” 06/12/2019

लफ्जों का पुल

लफ्जों का पुल
बुनकर
पहुंची थी मैं
उसकी
खामोशी तक
जहां केवल
धड़कन का शोर
पुख्ता कर रहा था
उसके जिंदा होने का सबूत
आंखों की
झुकी पलकों में
ठहरा था अव्यक्त दर्द
आश्वस्त
हाथ का स्पर्श पा
फूट पड़ा
घुटन का गुबार
फिर
कांपते हाथों से
खींचा उसने
आलिंगनबद्ध
प्रेमी युगल का रेखाचित्र
जो
संकीर्ण सोच के
अग्नि कुंड में
जीवन की
आहुति डाल
परंपरा को जिंदा रख गए
एक मां
की आवाज़ को
ओढ़ा दी गई थी
खामोशी की चादर
ताकि
पोषित होता रहे
संवेदनहीन समाज का दंभ।
✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१८/०९/२०१९

मूल प्रतियाँ

मेरे द्वारा
लिखे वो खत
जो तुमने फाड़ दिए
और
तुम्हारे खत
जो
मैंने जला दिए
उनमें कभी
बरसी थी झमाझम
दिल के बादलों से
इश्क़ की ऋचाएं ।

आंखों
के सागर में तैरी थी
मौन लफ्जों की कश्तियाँ
इश्क़ के ऑसिस में
बिखरे थे रुहानी संवाद
वो सारे खत
मेरे आंगन की
मिट्टी के
कण कण में हैं समाहित
उस मिट्टी में
रोपे गए गुलाब के गुंचों में
फूल
हमारे खतों की
मूलप्रतियां बन
खुशबूएं फैलाते रहे।

सालों की जुदाई
और उम्र के
बूढ़े होते जिस्मों में
इश्क़
यूं होता रहा जवां
क्योंकि
वो खत
इश्क़ की कहानी की
प्रतिलिपियाँ नहीं थे
हमारे खत
राधा-कृष्ण के प्रेम की भांति
सच्ची मोहब्बत के जिंदा दस्तावेज थे।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १३/०९/२०१९

उधार

उधार
नहीं हैं अब
मेरे ऊपर
तुम्हारे किसी
एहसान का कर्ज
चुका दिया है मोल
एक मकान
जो तूने बना कर दिया
यद्यपि उसमें भी
मेरा रहा था बराबर का योगदान
बिफरकर
नौकरी त्यागने का तुम्हारा कदम
मुझे झटका तो दे गया था
लेकिन
मेरे मजबूत
इरादों को तोड़ ना सका
तुम्हारे बच्चे भी पढ़लिख कर
ऊंचे ओहदे पर पहुंच गए हैं
तुम्हारे बाप द्वारा
कह गए शब्द
मेरे जह़न में
शूल से चुभे पड़े हैं
मेरे दस साल के बेटे का
मनोबल तोड़ते हुए
बच्चों की दादी से उन्होंने कहा था
“ये बच्चे तो भीख मांगेगें”
मेरे मासूम बेटे का सवाल
आज बीस वर्ष बाद भी
मुझे अंदर तक हिला जाता है
बेटे ने पूछा था सहमते हुए
” मां, क्या हम भीख मांगेंगे?”
मैं स्तब्ध रह गई थी
मैंने पूछा था “कौन कह रहा था?”
उसने कहा “दादा जी, दादीजी को कह रहे थे”
आज
सभी शब्दों की मार
व उनके तुच्छ सोच की
सब उधार चुकता हो चुकी है
तुम सभी को
शायद इस बात का भान नहीं था कि
एक महिला/ मां के लिए
उसकी संतान से बढ़कर कुछ नहीं
उनके लिए
वह जीवन की उल्टी धारा को
मोड़ने का अदम्य साहस रखती है
तुम्हारी मां ने भी कहा था
” मेरा बेटा नौकरी करता तो ये बालक अफसर बनते”
उन्हें भी
मेरी जैसी अंतर्मुखी बहु से
उम्मीद नहीं थी
मेरी क्लास वन अफसर की
ईमानदारी की कमाई
किसी को दिखाई नहीं देती थी
डिप्लोमा कोर्स कर
जे ई एन का पद
व उपरी कमाई पर
उन्हें घंमड था
मैंने
उस वक्त
किसी बात का
जवाब नहीं दिया था
लेकिन
एक जिद्द ठान ली थी
किया था
खुद से वादा
बिखरा जो
उसे है समेटना
आज
बीस वर्ष बाद
फक्र से कहती हूं
तुम सभी का
पिछले जन्मों का उधार हुआ चुकता
जैसे सुबह का भूला शाम को घर लौटता है
तुम आए थे
मेरे पास क्षमा मांगने
कहा था ” मेरा गुस्सा मुझे खा गया”
मैंने कहा था
” कोई बात नहीं… पिछले जन्मों का उधार उतार रही हूं”
तुम्हें अपना लिया था फिर से
क्योंकि
अराध्य सा प्रेम किया था तुमसे
मेरी एक भूल को
तुम क्षमा नहीं कर सके थे
मुझे सजा देने के लिए
त्याग दी थी तुमने अपनी “शाही नौकरी ”
ये ” शाही नौकरी” का जुमला भी
तुम्हारे बाप का था
बता देना उन्हें
ईमानदारी की नौकरी ने बहुत बरकत दी
मिली विद्यार्थियों की दुआएं
मुझे कोई घंमड नहीं है
लेकिन
अपने संस्कारों
और
क्षमता पर है अटूट विश्वास और रहेगा।
✍️ ©® डा सन्तोष चाहार ” ज़ोया” १२/०९/२०१९

आवाज़

यादों के
गलियारों से
क्यों आवाज़ देकर
मेरी कोशिश को पंगु करते हो
मैं
टूटे ख्वाबों को
खंडित वजूद के सहारे ही सही
समेटने का भरसक प्रयत्न कर रही हूं
मेरे
कदमों में लगे
उम्मीद के पंखों को
रवायतों के
महीन मांझे से कतर
तुम
रंगीन महफ़िलों के
आसमां का ‘चांद’ बन गए
लेकिन
भूल गए शायद
तुम्हारी
‘चांदनी ‘ की दमक
सूरज के वजूद से है
और
मैं वह सूरज हूं।
इश़्क
की बाज़ी हार कर भी मैं जीती
खबर है
मेरे रचे नग्मों
पर
तुम हर महफ़िल में
ढ़ोल की धाप पर थिरकते हो
मुकम्मल इश़्क
का साक्ष्य
इससे बढ़कर क्या?
तुम
कहते थे
इश़्क
वो स्वाति की बूंद है
जिसकी चाह में
चातक टकटकी लगाए
मेघों को ताकता है
जानते हो
वही बूंद
मेरे रग रग में
तुम्हारी रुह को समेटे
मोती बन चुकी है
इसलिए
तुम अब
यादों के गलियारों से
आवाज़ ना दो
मुझे
इस दुर्लभ मोती संग
ही जीने दो।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १७/०८/२०१९