Category Archives: light

अविवाहित लड़कियां

वे बंधी होती हैं अपने सपनों से
चूड़ियों की खनक की जगह
उन्हें सुनाई देती है कोयल की कूक,
उनके स्वास में घुली होती है
फूलों की वादियों की महक,
पायल की झंकार की जगह
वो सुनती हैं
बहते झरने का संगीत,
नदियों के संगम का आहृलादित स्वर
भरता है उनकी रगों में जोश,
पहाड़ों की ऊंचाई से सीखती हैं
वे सीना तान कर खड़ा रहना,
मस्तक पर बिंदी की जगह
उन्हें लुभाता है
आत्मसम्मान का वृहद टीका,
मंगलसूत्र की जगह
वे पहनती हैं
उपलब्धियों की माला,
लक्ष्मण रेखा के परे
वो देखती हैं विस्तृत गगन,
बाज़ सम नापती हैं नभ
बादलों से ऊपर उड़कर
आंकती हैं हुनर की क्षमता,
वे बेफिक्री से लगी रहती हैं
सपनों को हकीकत में बदलने में
समाज में उठाए गए सवालों को
कर दरकिनार,
बढ़ती हैं मंजिल की ओर
अविवाहित रहने वाली लड़कियां
इसलिए अविवाहित नहीं रहती कि,
उन्हें कोई पसंद नहीं करता,
वे शादी करेंगी
उन पुरुषों से, जिन्हें वे पसंद करेंगी
ऐसे पुरुष
जो सही मायने में उनकी उड़ान में संग संग उड़े।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २९/०६/२०२०

दुआ

दुआओं का कोई छोर नहीं होता
बरसने लगती हैं तब
कट जाते हैं
सारे पाप
रब की रहमत बरसती है
तो मां मिलती है
मां की दुआ बरसती है तो
हर लेती है
सारे संताप।

मैंने देखा है
मां को मंदिर में
दंडवत हो
मेरे लिए दुआ मांगते
मैं
मां के पैर पखार कर
बटोर लेती हूं दुआएं।

सब कहते हैं मां
बूढ़ी हो चली,
मैं कहती हूं
मांए कभी
बूढ़ी नहीं होती
उनकी तो
उम्र बढ़ती है।
©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २०/०५/२०२०

एहसास

तुम्हें,
एहसास नहीं,
तुम्हारे द्वारा फेंकें गए
एक एक पत्थर को चुन चुन कर,
यथार्थ की धरती पर,
टूटे सपनों को
उसने
हकीकत में बदला।
तुमने
सोचा था, कि
पाषाण हृदय से टकरा कर
वह
चूर चूर हो जाएगी।
वक्त
बना गवाह,
कुरीतियों के
पत्थर तोड़कर
सदियों से अंतस में दफ़न
हौंसले का बीज
पनपकर
विशाल वृक्ष बना।
उसकी,
शाखाओं पर
नारी शक्ति के हरे पत्ते
नित नये फूट कर
करते रहे
दमघोंटू वातावरण में,
नयी ऊर्जा
नये पैमाने
नयी सोच की,
ऑक्सीजन का
उत्सृजन।
ये हरे पत्ते
सोखते रहे
परंपरा
की, जहरीली
कॉर्बन डाई ऑक्साइड
व निर्मित करते
वृहदाकार शीतल छांव।
इस
छांव तले,
बेटीयां,
जिंदगी के पन्नों पर,
करती
स्वाभिमान के हस्ताक्षर।
वे, जो
राहें चुनती,

हासिल करती,
होती
उनके सुमुख,
पितृसत्ता भी नतमस्तक।
तुम्हें
एहसास हो या ना हो
मंजिल की ओर
बढ़े
नारी के ये कदम
मुकाम
हासिल कर
विलक्षण क्षमता का
देती रहेंगी यूं ही परिचय।
✍️©® डा.सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०६/१०/२०१९

मुमकिन

है मुमकिन
स्नेह की चादर पर
रिश्तों के मोती सजाना
थोड़ा झुक कर
थोड़ा मुस्कुरा कर

है मुमकिन
बुजुर्गों से लेना
आशिर्वाद
थोड़ा उन्हें सुनकर
थोड़ी सेवा कर
लगा पाएं जख्मों पर मरहम

है मुमकिन
बेटियो के सपनों को
मिलना परवाज़
गर मुक्त हो
उनके कदम
दोहरे मापदंड से

है मुमकिन
शिक्षित हो समाज
दीप से दीप जले
मिट जाए
गहन अंधकार
निभाएं हम इंसानियत धर्म

है मुमकिन
कृषक बन जाए
खुशहाल
अपनी उपज़
का दाम तय
करने का हो अधिकार

है मुमकिन
वंचित को मिले
योजनाओं का लाभ
भ्रष्टाचार
का भस्मासुर
गर स्मूल नष्ट कर दिया जाए

है मुमकिन
लेना शुद्ध हवा में स्वास
गर ठान लें
जन जन
विस्तार दे जंगलों को
रोपण कर एक एक वृक्ष

बूंद बूंद
योगदान दे कर
मुमकिन है
राष्ट्र को कर पाएं
स्थापित
गगनचुंबी मुकाम पर।
✍️ ©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २८/०८/२०१९

यूं न गवां

घर
सुखद बसेरा
आशाओं का नित सवेरा
रिश्तों की मिठास का अद्भुत बसेरा
भाग्यशाली को मिलता है सुरक्षा का ये घेरा
इसे यूं न गवां।

संतान
ईश्वरीय देन
चहल पहल से घर में चैन
सपनों पर उनके न लगाओ बैन
संस्कार सिंचित करने का ये सही रैन
इसे यूं न गवां।

रिश्तों
की महिमा
जिसने समझी व जानी
दुनिया में कोई नहीं उसका सानी
दंभ में होते हैं रिश्ते सदियों से चूर चूर
इन्हें यूं न गवां।

दोस्ती
का उंचा दर्जा
विश्वास की डगर फलता फूलता
शंकाओं के बादलों से हमेशा ही टूटता
दोस्ती में प्रेम-सरोवर का झरना फूटता
इसे यूं न गवां।

प्रेम
रसधार में
डूबे हैं नायब मोती
त्याग व समर्पण इसकी ज्योति
मिली है सौगात ईश्वर के दरबार से
इसे यूं न गवां।

जीवन
सुंदर सौगात
नयी राहों का लिखो प्रभात
क्षमताओं का परिचय हो दिन रात
सुंदर सुवासित हो रीत का मधुर संगीत
इसे यूं न गवां।

✍️©® डा. सन्तोष चाहार “जोया”14/03/2019

क्षणिकाएं

इश़्क
की कलम
ख़्वाब-ए-गुल की स्याही
लफ़्जों की फुलवारी का उपवन।
*********
उम्र
के काग़ज
नसीब-ए-सितम
ठहर गई तमन्नाओं की मंजिल।
***********
हुस्न
का ज़ाल
रफ़ाकतों का भ्रम
अहम और अंहकार के ऊंट।
***********
अंतर्दद्व
को झटक कर
थाम हौंसले की डोर
कागज़, कलम और दवात का
विस्तृत, रोमांचक व अद्भुत संसार।

✍️ ©® डा. सन्तोष चाहार ” जोया” 26/02/2019

रफ़ाकतों* मेलजोल

प्रेम पुष्प- कल और आज़

प्रौढ़ प्रेम

मुखर मौन उपवन
इश़्क लेता अंगड़ाई
मुस्कराते हृदय सुमन
हंस संग हंसनी शरमाई।

इश़्क सागर अनंत
प्रेम पुष्प पंखुडियां
जुड़ती अनेकों कड़ियां
रुहानी रिश्ता न होता अंत।

प्रेम डोर के धागे
रंग बिरंगे मांझे
बुनते सुंदर दोशाला
इश़्क एक भव्य पाठशाला।

युवा प्रेम आज़कल

युवा पीढ़ी समझें
प्रेम की गहराई
दंभपूर्ण करो ना
एक दूजे से रुसवाई।

प्रेम पुष्पों से महके
जीवन की सच्चाई
सुवासित रहे, हर डगर
जीवन बने सुखदाई।

इश़्क एक
सुरमयी अहसास
सच्चे हृदय में
खिलते फूल ये खास।

प्रेम की बहे
हर ओर सुवास
यही है कवि कलम की
हृदयतल से दरख्वाश।

✍️©® डा. सन्तोष चाहार “जोया”14/02/2019

टूटता पिंजरा

कल फिर टूटेगा
इक पिंजरा
कल फिर टूटेगा
इक बंधन
कल फिर छूटेगी
इक मैना
कल फिर हसेंगी
धरती
कल फिर हौसंले
भरेगें उड़ान
कल फिर
झुकेगा आसमान
कल फिर
होगा नय़ा सवेरा
कल फिर
लिखी जाएगी
नयी इबारत
कल फिर
चहकेगा घर आंगन
कल फिर
संस्कृति की नींव
होगी सुदृढ़
कल फिर टूटेंगी
विषमता की बेड़ियां
कल फिर
नारी का
होगा सम्मान
कल फिर उम्मीदें
चढ़ेगीं परवान
कल फिर सपने
चढ़ेगें सोपान
कल फिर
समरसता की
बहेगी बयार
क्योंकि समाज
बदल रहा है
बेटियों ने ठान ली है
वे पढ़ रहीं हैं
आगे बढ़ रही हैं
हर क्षेत्र में
गढ़ रहीं हैं
नये कीर्तिमान।

✍️©® डा.सन्तोष चाहार “जोया” 11/02/2019

तो…मैं गीत लिखूं

जब

विहग नव कलरव गाएं

भौंरे पुष्पों पर मंडरायें

तितलियाँ उपवन में भरे उड़ान
बागों में कोयल कूके
पपीहा भी मधुर गीत सुनाए
तो…मैं गीत लिखूं।
जब
धरा प्रकृति से लहराए
गगन जब तारे चमकाए
शशि नभ में मुस्काए
समीर जीवन संदेश लाए
सागर में लहरें इठलाएं
तो…मैं गीत लिखूं।
जब
हंसी की हिमानियां पिघल जाएं
करुण क्रंदन जब ठहर जाए
हिंसा का ताण्डव जब रुक जाए
सैनिक तिरंगे में लिपट कर ना आए
मां की ममता ना नीर बहाए
तो…मैं गीत लिखूं।
जब
हौंसलों को परवाज़ मिल जाए
बेटियां भी गौरव गाथा रच पाएं
दहलीज़ पार संसार को समझ पाएं
सदियों के दर्द जब मिट जाएं
मातृभूमि पर सब न्यौछावर हो जाएं
तो…मैं गीत लिखूं।
जब
कृषक के जीवन में खुशहाली आए
शिक्षा आमजन को सुलभ हो जाए
रंग भेद व जाति धर्म की दीवारें ढह जाएं
सुरसा सम बेरोजगारी का निदान हो जाए
संस्कारों की नीवं जब सुदृढ़ हो जाए
वृद्धावस्था जब मजबूर ना हो जाए
तो…मैं गीत लिखूं।
जब
मासूम बचपन मजदूरी से मुक्त हो जाए
इंसानियत का उत्सर्ग हो जाए
रिश्तों में कड़वाहट कुंद हो जाए
प्रकृति से सब लयबद्ध हो जाएं
सर्व सुखंति, सर्व संपदा बुलंद हो जाए
तो…मैं गीत लिखूं।
✍️©® “जोया” 10/02/2019

अज़ब कहानी

औरत की ये अज़ब कहानी

दुनिया करती आई मनमानी

दोयम दर्जा दिया पुरुषों ने

अपमानित किया नये हथकंडों ने।

लक्ष्मण रेखा सी पहेरेदारी

वचिंत रही सुखों की सवारी
सुबह से हो जाती शाम

नहीं होते खत्म घर के काम।

सदियों से जंजीर में जकड़ी

सपनों की डोर अब है पकड़ी
शिक्षित होने वह अब निकली
विषम परिस्थितियों में भले पली।

प्रेम में ठगी गई भावनाएं

झेलती रही बलाएं

नारी हृदय कभी न हर्षाए
दुआ में फिर भी मंगलकामनाएं।

जीवन मूल्यों की पक्षधर

शक्ति पल पल रही निखर

चेहरे पर है तेज़ प्रखर

कुटिलताओं से निपटे बन विषधर।

खेल जगत में मुकाम बनाती

गौरव देश का नित बढ़ाती

हिम्मत उसकी लिखती इबारत

दुश्मन पर टूटती बन कयामत।

नयी राहें हैं अपनाए

बाधाओं से तनिक ना घबराएं

छूती अब गगन तारिकाएं

अंतरिक्ष में झंडा फहराए।

सेना का गौरव बढा़ती

खुलकर अब वह हर्षाती

नाप रही सागर की थाती

लिख रही वक्त पर पाती।

धरा की गर्भ में हैं ज्यों मोती

प्रकृति सृजन नारी भी करती

रोशन जीवन सबका करती

दीप से दीप जले ज्यों ज्योति।

मान मर्दन को है ललकार

करेगी नहीं कृष्ण को पुकार

दुर्गा रुप धर लिए त्रिशूल

दुर्जनों की छाती में दाग देगी शूल।

समरसता का है उदघोष

नारी नारी में भरती जोश।

✍️©® “जोया”07/02/2019