Category Archives: happiness

अविवाहित लड़कियां

वे बंधी होती हैं अपने सपनों से
चूड़ियों की खनक की जगह
उन्हें सुनाई देती है कोयल की कूक,
उनके स्वास में घुली होती है
फूलों की वादियों की महक,
पायल की झंकार की जगह
वो सुनती हैं
बहते झरने का संगीत,
नदियों के संगम का आहृलादित स्वर
भरता है उनकी रगों में जोश,
पहाड़ों की ऊंचाई से सीखती हैं
वे सीना तान कर खड़ा रहना,
मस्तक पर बिंदी की जगह
उन्हें लुभाता है
आत्मसम्मान का वृहद टीका,
मंगलसूत्र की जगह
वे पहनती हैं
उपलब्धियों की माला,
लक्ष्मण रेखा के परे
वो देखती हैं विस्तृत गगन,
बाज़ सम नापती हैं नभ
बादलों से ऊपर उड़कर
आंकती हैं हुनर की क्षमता,
वे बेफिक्री से लगी रहती हैं
सपनों को हकीकत में बदलने में
समाज में उठाए गए सवालों को
कर दरकिनार,
बढ़ती हैं मंजिल की ओर
अविवाहित रहने वाली लड़कियां
इसलिए अविवाहित नहीं रहती कि,
उन्हें कोई पसंद नहीं करता,
वे शादी करेंगी
उन पुरुषों से, जिन्हें वे पसंद करेंगी
ऐसे पुरुष
जो सही मायने में उनकी उड़ान में संग संग उड़े।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २९/०६/२०२०

रात की रानी

प्रेम पर लिखी गई सारी कविताएं
रात की रानी की लताएं होती हैं
जिनपर खिले पुष्प
चारों दिशाओं में सुगंध फैलाते हैं,
जब फूल मुरझा कर गिरते हैं
तब रोता है प्रेमी हृदय,
पुष्प के सूख जाने पर
मरने लगता है प्रेम,
सूखे पुष्पों को बटोर कर
फिर कोई प्रेमी
उनमें बसी शेष सुंगध में
टटोलता है अपना अक्स,
लगाता है अपने आंगन में
रात की रानी का पौधा,
सींचता है
उसे पीड़ा मिश्रित एहसासों से,
एहसासों की नमी पाकर
फिर खिलते हैं
रात की रानी पर प्रेम पुष्प ,
ये चक्र
अनवरत जारी रहता है
तभी तो
प्रेम कविताएं हमेशा  महकती रहती हैं।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १०/०६/२०२०

अखंड ज्योत

अधूरे प्रेम
के, अधूरे अफ़सानों
में,
कलम
की
सीढ़ियां चढ़,
उतर
आते हैं प्रेमी,
कविता,
कहानी के किस्सों में,
रुठे
जज़्बातों के
तिल -तिल
सुलगते हिस्सों में।

अखंड ज्योत सा, जलता रहता है अधूरा प्रेम, ताउम्र।

©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१८/०५/२०२०

कमाई

कमाई

कालोनी की औरतें , अनुभा के विषय में चर्चा करती रहती  हैं और समय समय पर नयी नयी उपाधियों से अलंकृत करती रहती  हैं। कोई उसे “पागल” तो, कोई “बेवकूफ” बताता रहता है। कभी कभी तो ये महिलाएं उसे सीधे तौर पर भी कह देती थी, “तुम इन बाई लोगों को बिगाड़ रही हो”, लेकिन अनुभा की जीवनशैली में कोई फर्क नहीं पड़ता था…।

अनुभा पढ़-लिख कर, अच्छे ओहदे पर बहुत संघर्ष करने के पश्चात पहुंची थी। उसके लिए कर्म ही पूजा अर्चना थी … हमने कभी उसे मंदिर जाते नहीं देखा। बस साल में एक आध बार मुख्य अवसरों पर ही शिरकत करती थी।  व्रत उपवास में भी उसका खासा रुझान देखने को नहीं मिला… महाशिवरात्रि पर्व पर जरुर हमने उसे मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते देखा है… यूं नहीं है कि वह नास्तिक है… उसके घर से, प्रतिदिन सुबह शाम, घर के मंदिर की घंटी जरुर सुनाई देती है और दीपक/कपूर की महक भी आती है .. लेकिन इस सबके पीछे उसका मकसद पूजा अर्चना कम, बल्कि वातावरण  की शुद्धता कारक होता है… चूंकि मेरा घर उसके बगल में ही है तो यदा-कदा मेरा जाना लगा रहता है… वैसे है वह , अंतर्मुखी स्वभाव की,  बहुत गपशप नहीं करती है… कालोनी की कुछ महिलाएं, इसीलिए उसे घमंडी भी कह देती हैं… लेकिन उसकी नेकी के किस्से एक बाई से होते हुए दूसरी बाई तक पहुंचते रहते हैं और वहां से कालोनी की महिलाओं तक…।

अनुभा की विशिष्ट जीवनशैली रही है। पिछले तीस वर्षों से वह इस सेक्टर में रह रही है…हम सभी युवा थे जब हमने अपने घर यहां बनाए थे, तो पहचान पुरानी है। अनुभा के घर में  बाई /माली / धोबी/  आदि सभी  हमने शुरू से ही देखें हैं। उसे  बागवानी का भी बहुत शौक है और आफिस से आते ही खुद भी बगीचे में लगी रहती है और यही कारण है कि इतने वर्षों से सेक्टर में सब उसके बगीचे को देखकर उसकी प्रशंसा भी करते हैं… पर्यावरण संरक्षण में उसकी ये छोटी सी आहुति है।

हां , तो बात ये हो रही थी कि कालोनी की महिलाएं उसे पागल/बेवकूफ क्यों कहते हैं। अरे, भाई वो काम ही ऐसे करती रहती है। आजतक ना जाने घर में से कितनी चीजें , जिनमें, कुलर/पंखा/ सोफे/ पुराना टेलीविजन/वाशिंग मशीन/ डेस्कटॉप/ घड़ी/कालीन/सिलाई मशीन/दहेज की संदूक आदि… बहुत लम्बी फेहरिस्त है… साड़ी/सूट/चद्दर/गद्दे  की तो गिनती ही नहीं है। जब भी वह घर में कुछ नया लाती है तो  पुराना(यानी दस साल) सबसे पहले, अपने यहां लगे हेल्प से पूछती है और उन्हें एक पैसा लिए बगैर दे देती है जबकि बाजार में रिसेल में अच्छे दाम मिल सकते हैं… लेकिन नहीं। उसका एक ही मंत्र है ” जो वस्तु किसी गरीब के काम आ सकती है तो उससे पैसे बनाने की क्या जरूरत है?”
कभी मैं उसे टोक भी देती हूं,
” अनुभा, क्यों इन सबकी आदत खराब करती हो? मुफ्त की वस्तु का लोग आदर नहीं करते हैं…”। 
उसका स्पष्ट सा उत्तर होता है:
” ऐसा है, मैं कभी चंदे आदि की रसीद /या मंदिर की दान पेटियों में तो  रुपए डालती नहीं हूं… तो मेरा फंडा है कि जो आपके सामने है उसकी मदद करो… तसल्ली भी रहती है कि मदद सही जगह हो रही है…जब देश में बाढ़ या अन्य संकट आता है तो, तुम्हें मालूम है तनख्वाह में से कट ही जाता है… मधु तूझे पता तो है , रामप्यारी(मेड) मेरे यहां बीस साल से काम कर रही है… आदमी निक्कमा है, दो बेटियों की शादी में ही तो दिए थे सोफे व संदूक पोलिश करवा कर…साथ में दोनों लड़कियों को सिलाई मशीन दिलवा दी ताकि वो घर पर ही कुछ कमाई कर सकें…आज वो खुश हैं, अपना गुजर-बसर कर रही हैं… मिलने भी आती हैं। मुझे संतुष्टि मिलती है , थोड़ी मदद इस तरह मैं कर पाई”।
“अरे, भाई तुमने वो डेस्कटॉप भी तो अपने ड्राइवर को दे दिया… बच्चों के लिए लेपटाप लेना था तो, वह तेरे काम आ जाता?”
” देख, मधु, उसकी बेटी चौथी कक्षा में है और अब विद्यालयों में कम्प्यूटर जरुरी कर दिया है… एक बेटी वह भी सीख जाएगी , इसमें क्या हर्ज है?”।
“अरे, पिछली बार आंटी आईं थीं, तो वो भी तो मेरे सामने तेरी शिकायत कर रही थी , ‘मधु बेटी , इसने तो दहेज की संदूक भी दे दी… कोई  संदूक भी देता है क्या ?’

“अरे, छोड़ मां की बात। उन्हीं से तो सीखा है। बचपन से देखती आ रही हूं… कभी किसी को मना नहीं करते देखा…”

घर पर आकर, मैं भी बहुत देर तक सोचती रहती कि ,अनुभा कहती तो ठीक है , सोचती हूं कि, नौकरीपेशा है, इसीलिए ये मदद कर पाती है। एक दिन मैंने उससे पूछ ही लिया
” सुनो, अनु। तुम्हारे पतिदेव , तुम्हे कभी कुछ कहते नहीं? ऐसे चीजें बांटती रहती हो।”
” हां, कहते हैं ना…कि तेरे शौक बहुत महंगे हैं… फ़ालतू में बांटती रहती है, नयी चीज लाने का चाव रहता है… तेरा बस चले तो तू मुझे भी बदल दे( हंसती है)”।
“फिर?”
“फिर, क्या। मैं कह देती हूं , मेरा अपना ज्वेलरी/कास्मेटिक आदि का कोई खर्च नहीं है। इतना तो मैं कर ही सकती हूं… जनाब दुआएं कमाओ, यही साथ चलेंगीं… पैसे का क्या है…ढलती फिरती छांव है…आज है, कल नहीं”।

अनुभा के जीवन में भी एक ऐसा मोड़ आया कि उसकी हंसती खेलती गृहस्थी बिखरी… नहीं टूटा था तो बस उसका हौंसला और खुद पर विश्वास। अमन, अनुभा के पति,एक सड़क दुघर्टना में ऐसे चोटिल हुए कि चारपाई पकड़ ली.. रीढ़ की हड्डी में चोट थी, जिसका असर दिमाग तक गया.. अनुभा के कंधों पर भारी बोझ आन पड़ा लेकिन उसने हार नहीं मानी… परिस्थितियां विपरीत जरुर थी लेकिन उसके हौंसले को डिगा नहीं पाई…।

अनुभा के पति बीस साल की सेवा/इलाज के बाद, आज  चल फिर लेते हैं और चारपाई से उठ गए हैं लेकिन नौकरी तो छूट ही गई थी। अनुभा के बच्चे पढ़-लिखकर अच्छे ओहदे पर हैं। अनुभा के साथ साथ मैं भी बूढ़ी हो चली हूं ।  अनुभा की बहू बहुत सुलक्षणी है , दामाद भी  उसकी बहुत इज्जत करता है।  जिंदगी का विश्लेषण करती हूं तो इस निष्कर्ष पर ही पहुंचती हूं , अनुभा ने जो दुआएं कमाई थी, उन्हीं ने उसे संकट से उबारने में मदद की है।

वास्तव में यही नेक कमाई है। आज भी उसका माली जो अस्सी साल का हो गया है और उसकी बाईं( रामप्यारी) उससे मिलने आते रहते हैं। अनुभा, उन्हें अभी भी कभी खाली हाथ नहीं जाने देती…उनके पोते/दोहता/दोहती के लिए कुछ ना कुछ भेजती रहती है…  रिटायरमेंट के बाद से ही एक घंटा कालोनी की मेडस के बच्चों  का होमवर्क पूरा करवाने में सहयोग करती है…कमाई अभी भी जारी है।
©®✍️ डा सन्तोष चाहार ” ज़ोया”०८/०४/२०२०

एहसास

तुम्हें,
एहसास नहीं,
तुम्हारे द्वारा फेंकें गए
एक एक पत्थर को चुन चुन कर,
यथार्थ की धरती पर,
टूटे सपनों को
उसने
हकीकत में बदला।
तुमने
सोचा था, कि
पाषाण हृदय से टकरा कर
वह
चूर चूर हो जाएगी।
वक्त
बना गवाह,
कुरीतियों के
पत्थर तोड़कर
सदियों से अंतस में दफ़न
हौंसले का बीज
पनपकर
विशाल वृक्ष बना।
उसकी,
शाखाओं पर
नारी शक्ति के हरे पत्ते
नित नये फूट कर
करते रहे
दमघोंटू वातावरण में,
नयी ऊर्जा
नये पैमाने
नयी सोच की,
ऑक्सीजन का
उत्सृजन।
ये हरे पत्ते
सोखते रहे
परंपरा
की, जहरीली
कॉर्बन डाई ऑक्साइड
व निर्मित करते
वृहदाकार शीतल छांव।
इस
छांव तले,
बेटीयां,
जिंदगी के पन्नों पर,
करती
स्वाभिमान के हस्ताक्षर।
वे, जो
राहें चुनती,

हासिल करती,
होती
उनके सुमुख,
पितृसत्ता भी नतमस्तक।
तुम्हें
एहसास हो या ना हो
मंजिल की ओर
बढ़े
नारी के ये कदम
मुकाम
हासिल कर
विलक्षण क्षमता का
देती रहेंगी यूं ही परिचय।
✍️©® डा.सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०६/१०/२०१९

दस्तक

ये कौन
दस्तक दे रहा
दिल का दरवाजा
स्वतः ही खुल गया
फिज़ाओं में फैली
प्रीतम के
आगमन की महक
खत्म हुआ
मंजिल का इंतजार
ओह! ये मदहोशी का आलम
सब्र का बांध टूटा जाए
वो शायद
उसके शहर में हो चुका दाखिल
तभी तो
ये
दिल की धड़कन
हो रही बेलगाम
सांसो की डोर
में
प्रियतम की सांसें
ऐसे घुल रही
जैसे
दूध में शक्कर
खुद को संवारने
आईना देख
प्रयेसी ने पहनी
चटक गुलाबी रंग की साड़ी
जुड़े में ठूंसा
सुर्ख गुलाब
उसे है याद
सदियों से गुलाब
प्रीतम का पंसदीदा फूल
मोगरे का गज़रा तो वह लायेगा
चूंकिउसे
खुशबूओं से रहा बेपनाह लगाव
भौंरे की तरह
मंडराता तो था कलियों के इर्दगिर्द
कदमों की आहट सुन
प्रयेसी दौड़ी
सजाया आरती का थाल
चंदन की खुशबू से घर दिया महका
कहा ना
उसका प्रीतम
खुशबूओं से होता मदहोश
लेकिन
कदमों की आहट
कानों के दरवाजे पर हुई मद्वम
प्रेयसी उलझन में
शायद
घर के दरवाजे पर करे इंतजार
सोच रहा होगा
कि
उसकी प्रयेसी तो
धड़कन सुनने में चतुर
वह
नव यौवना की
गति से दौड़ना चाहती
ऊफ
ये दर्द करते घुटने
सपने से
जाग चुकी थी
सतर साल की वृद्धा
गर्म चाय के
प्याले में उठी खुशबू में ” दस्तक”
ज़हन में उतरी
आंखों
की कोर
गीली हो प्रेमपुष्प अर्पित कर गयी।

✍️©® डा सन्तोष चाहार “जोया” ३०/०५/२०१९

दुल्हन

शुभा के दोनों बच्चे प्रदेश में एम।एन।सी। में जॉब कर रहे हैं। पति की असमय मृत्यु के बाद से ही शुभा पर गृहस्थी की सारी जिम्मेदारी आ गई थी। वह पिछले साल ही बैंक मेनेजर पद से रिटायर हुई है। शुभा अभी रात के खाने की तैयारी कर रही थी कि फोन की घंटी घनघना उठी। देखा तो बेटे का फोन था।
“मां, आपसे बात करनी है” अमन की आवाज़ थी।
“हां, बेटा। कहो क्या कहना चाहते हो” शुभा उसे आश्वस्त कर रही थी।
“मां, आप जीवनसाथी पर रिश्ते देखना बंद कर दो”
“क्यों, क्या हुआ” शुभा चिंतित थी। अभी उससे बात करने के बाद ही तो प्रोफाइल बनाया था।
” मां, मेरी एक अच्छी दोस्त है रिया। यहीं पूना में ही जॉब करती है। हम दोनों ने इस विषय पर सोचा है कि हम चूंकि एक दूसरे को अच्छे से जानते हैं, तो क्यों ना हम जीवनसाथी बन जाएं। आपकी व दीदी की राय क्या है?”
शुभा ने रिया की सारी जानकारी ली अमन से। दोनों की समकक्ष योग्यता थी और बढ़िया पैकेज भी। शुभा को बस एक बात थोड़ी खटक रही थी कि रिया सजातिय नहीं थी और बी। सी। कैटगरी से थी। अमन के दादा जी इस विवाह के लिए बिल्कुल तैयार नहीं होंगे। शुभा की बात एक जाट परिवार से चल रही थी, लड़की खूबसूरत, लम्बा कद और नौकरीपेशा थी। शुभा ने अमन को भी फोटो भेजा था। तब अमन ने कहा था, “आपकी मर्जी”। शुभा ने कहा था अमन को, ” जिंदगी तुम्हें साथ बितानी है। हर बात तुम परिवार के हिसाब से करते आए हो। बेटा, ये जिंदगी का अहम निर्णय है। इसमे हिचकना नहीं है, तुम्हारी कोई पंसद हो तो बता देना”
शुभा द्वारा दिए हौंसले की वजह से ही आज अमन ने अपनी इच्छा बताई है। अपनी दीदी,नूर,को वह बहुत अहमियत देता था। नूर एक ऊंचे औहदे पर एम।एन।सी। में जॉब कर रही थी। शुभा ने नूर के साथ इस रिश्ते पर चर्चा की। नूर ने लड़की से बात कर सब जानकारी परिवार के बारे में जुटाई। नूर को लड़की अच्छी लगी। लेकिन अमन के दादाजी व चाचा तैयार नहीं थे। उधर शुभा, नूर और अमन ने फैसला कर लिया था कि रिया को ही घर की बहू बनाएंगे। लड़की के घर वाले भी रिश्ते से राज़ी थे। कुंडली भी उन्होंने मिलवा ली थी। अमन के दादाजी ने कहा,” गांव में सब बात बनाएंगे। लड़की हमारी जाति की नहीं है। मैं क्या जवाब दूंगा…हमारी यहां इज्ज़त क्या रह जाएगी… आदि”।
शुभा, लेकिन मन बना चुकी थी। वह उस गलती को दोहराना नहीं चाहती थी जब उसने अपनी शादी के वक्त सिर झुका कर पिता के चरणों में अपने इश़्क की बलि दे दी थी। समाज़ में इज्ज़त के डर से, पिताजी के सम्मान की खातिर, एक रुहानी प्रेम को बलिदान कर दिया था, जिसकी टीस ता उम्र उसे चुभन देती रही थी। वह नहीं चाहती थी कि बेटा भी इस दर्द से गुजरे। उसे समझ थी कि इंसान की एक ही जात है ‘इंसानियत’। जहां आपके विचार मिलते हैं, रिश्तों को लेकर एक समझ है तो जीवन सरल हो जाता है। अमन के दादा जी को भी इस रिश्ते के लिए मनाया। बेटी ने भी प्रेम विवाह किया था लेकिन तब दादाजी को मनाना आसान था क्योंकि नूर का रिश्ता जाट परिवार में ही हुआ था। लेकिन अमन के रिश्ते में ये जाति का भेद आड़े आ रहा था। खैर, जो भी हो , शुभा ने परिस्थिति को अमन के पक्ष में कर लिया था यद्यपि सबको तैयार करने में उसे काफी महीने लगे। अमन और रिया को जब निर्णय से अवगत करवाया गया तो उनकी खुशी नयनों से छलक गई। शादी की तैयारियां दोनों तरफ से शुरु हो गई…।
शहनाई की धुन वातावरण में गूंज रही थी। नववधू के चरण घर में चिंहित हो रहे थे। चूड़ियों की खनक और पायल की झंकार शुभा को अपने अतीत में ले जाती है जब वह दुल्हन बनकर इस घर में आई थी। आज उसका प्रेम, बेटे की शादी में पुष्पित पल्लवित हो रहा था।

✍️©® डा. सन्तोष चाहार “जोया”१९/०३/२०१९

यूं न गवां

घर
सुखद बसेरा
आशाओं का नित सवेरा
रिश्तों की मिठास का अद्भुत बसेरा
भाग्यशाली को मिलता है सुरक्षा का ये घेरा
इसे यूं न गवां।

संतान
ईश्वरीय देन
चहल पहल से घर में चैन
सपनों पर उनके न लगाओ बैन
संस्कार सिंचित करने का ये सही रैन
इसे यूं न गवां।

रिश्तों
की महिमा
जिसने समझी व जानी
दुनिया में कोई नहीं उसका सानी
दंभ में होते हैं रिश्ते सदियों से चूर चूर
इन्हें यूं न गवां।

दोस्ती
का उंचा दर्जा
विश्वास की डगर फलता फूलता
शंकाओं के बादलों से हमेशा ही टूटता
दोस्ती में प्रेम-सरोवर का झरना फूटता
इसे यूं न गवां।

प्रेम
रसधार में
डूबे हैं नायब मोती
त्याग व समर्पण इसकी ज्योति
मिली है सौगात ईश्वर के दरबार से
इसे यूं न गवां।

जीवन
सुंदर सौगात
नयी राहों का लिखो प्रभात
क्षमताओं का परिचय हो दिन रात
सुंदर सुवासित हो रीत का मधुर संगीत
इसे यूं न गवां।

✍️©® डा. सन्तोष चाहार “जोया”14/03/2019

यूं ही नहीं

यूं ही नहीं
आती सदाएं खुशियों की तेरे आंगन
यूं ही नहीं
आती मेरे कंगन की खनक साजन
यूं ही नहीं
आती हिचकी नित तुम्हारे हिया
यूं ही नहीं
गिनते तुम तारे घनी अंधेरी रात
यूं ही नहीं
छूकर आते तुम महकते फूल गुलाब
यूं ही नहीं
महफ़िल में गुनगुनाते रचे मेरे प्रेम गीत
यूं ही नहीं
नयनों में तुम ख़्वाब मिलन सजाते
यूं ही नहीं
नदियों की धारा का प्रवाह बन जाते
यूं ही नहीं
सागर में लहर बन अठखेलियां करते
यूं ही नहीं
बारिश की बूंद बन सीप में समाते
यूं ही नहीं
आसमां सा छाता बन धरा को ढ़क लेते

किए हैं
प्रेमपुष्प अर्पित तुम्हें टकरा परंपरागत बंधन
किए हैं
अश्रु अर्पित तुम्हारे हर दर्द और विकट कुरुंदन
किए हैं
नज़ीर अनमोल जिंदगी पल व सुंगधित चंदन
किए हैं
सुनिश्चित तुम्हारे ऊंच आंकक्षाओं के हर स्वप्न
मिटा कर स्व-अस्तित्व समाहित किया तुम्हें हर धड़कन।

✍️©® डा.सन्तोष चाहार “जोया” 06/03/2019

कुछ बात कर

कुछ
बात कर
यूं चुप न बैठ
कुछ बात कर
साज छेड़
गीत गा
वीणा सी
झंकार कर।

कशिश
मिलन की गहरी
तुमने पुकारा
प्रेयसी तुम्हारी
बंधन जगत
सब तोड़
यादों की
पोटली बांध
साथ है लाई
अब कुछ
बात तो कर।

सालों बीते
नहीं मिली
बीती रैैना
जिसने बांधा
तुम्हारा मन
मेरा मन।

बरस रहे
अब अश्रु
बादल बन
तरस रहा
मन प्यासा
कुछ बात कर।

याद है
वो तुम्हारा
स्नेहिल स्पृश
हुआ जिससे
रोम रोम
पुल्लकित
क्यों होता
दिल अब
शंकित।

प्रिये
पास बैठ
अधर हिला
पलक उठा
पलक गिरा
होने दे सपंदन
प्रत्येक शिरा।

✍️©®डा.सन्तोष चाहार “जोया” 05/03/2019