Category Archives: happiness

एहसास

तुम्हें,
एहसास नहीं,
तुम्हारे द्वारा फेंकें गए
एक एक पत्थर को चुन चुन कर,
यथार्थ की धरती पर,
टूटे सपनों को
उसने
हकीकत में बदला।
तुमने
सोचा था, कि
पाषाण हृदय से टकरा कर
वह
चूर चूर हो जाएगी।
वक्त
बना गवाह,
कुरीतियों के
पत्थर तोड़कर
सदियों से अंतस में दफ़न
हौंसले का बीज
पनपकर
विशाल वृक्ष बना।
उसकी,
शाखाओं पर
नारी शक्ति के हरे पत्ते
नित नये फूट कर
करते रहे
दमघोंटू वातावरण में,
नयी ऊर्जा
नये पैमाने
नयी सोच की,
ऑक्सीजन का
उत्सृजन।
ये हरे पत्ते
सोखते रहे
परंपरा
की, जहरीली
कॉर्बन डाई ऑक्साइड
व निर्मित करते
वृहदाकार शीतल छांव।
इस
छांव तले,
बेटीयां,
जिंदगी के पन्नों पर,
करती
स्वाभिमान के हस्ताक्षर।
वे, जो
राहें चुनती,

हासिल करती,
होती
उनके सुमुख,
पितृसत्ता भी नतमस्तक।
तुम्हें
एहसास हो या ना हो
मंजिल की ओर
बढ़े
नारी के ये कदम
मुकाम
हासिल कर
विलक्षण क्षमता का
देती रहेंगी यूं ही परिचय।
✍️©® डा.सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०६/१०/२०१९

Advertisements

दस्तक

ये कौन
दस्तक दे रहा
दिल का दरवाजा
स्वतः ही खुल गया
फिज़ाओं में फैली
प्रीतम के
आगमन की महक
खत्म हुआ
मंजिल का इंतजार
ओह! ये मदहोशी का आलम
सब्र का बांध टूटा जाए
वो शायद
उसके शहर में हो चुका दाखिल
तभी तो
ये
दिल की धड़कन
हो रही बेलगाम
सांसो की डोर
में
प्रियतम की सांसें
ऐसे घुल रही
जैसे
दूध में शक्कर
खुद को संवारने
आईना देख
प्रयेसी ने पहनी
चटक गुलाबी रंग की साड़ी
जुड़े में ठूंसा
सुर्ख गुलाब
उसे है याद
सदियों से गुलाब
प्रीतम का पंसदीदा फूल
मोगरे का गज़रा तो वह लायेगा
चूंकिउसे
खुशबूओं से रहा बेपनाह लगाव
भौंरे की तरह
मंडराता तो था कलियों के इर्दगिर्द
कदमों की आहट सुन
प्रयेसी दौड़ी
सजाया आरती का थाल
चंदन की खुशबू से घर दिया महका
कहा ना
उसका प्रीतम
खुशबूओं से होता मदहोश
लेकिन
कदमों की आहट
कानों के दरवाजे पर हुई मद्वम
प्रेयसी उलझन में
शायद
घर के दरवाजे पर करे इंतजार
सोच रहा होगा
कि
उसकी प्रयेसी तो
धड़कन सुनने में चतुर
वह
नव यौवना की
गति से दौड़ना चाहती
ऊफ
ये दर्द करते घुटने
सपने से
जाग चुकी थी
सतर साल की वृद्धा
गर्म चाय के
प्याले में उठी खुशबू में ” दस्तक”
ज़हन में उतरी
आंखों
की कोर
गीली हो प्रेमपुष्प अर्पित कर गयी।

✍️©® डा सन्तोष चाहार “जोया” ३०/०५/२०१९

दुल्हन

शुभा के दोनों बच्चे प्रदेश में एम।एन।सी। में जॉब कर रहे हैं। पति की असमय मृत्यु के बाद से ही शुभा पर गृहस्थी की सारी जिम्मेदारी आ गई थी। वह पिछले साल ही बैंक मेनेजर पद से रिटायर हुई है। शुभा अभी रात के खाने की तैयारी कर रही थी कि फोन की घंटी घनघना उठी। देखा तो बेटे का फोन था।
“मां, आपसे बात करनी है” अमन की आवाज़ थी।
“हां, बेटा। कहो क्या कहना चाहते हो” शुभा उसे आश्वस्त कर रही थी।
“मां, आप जीवनसाथी पर रिश्ते देखना बंद कर दो”
“क्यों, क्या हुआ” शुभा चिंतित थी। अभी उससे बात करने के बाद ही तो प्रोफाइल बनाया था।
” मां, मेरी एक अच्छी दोस्त है रिया। यहीं पूना में ही जॉब करती है। हम दोनों ने इस विषय पर सोचा है कि हम चूंकि एक दूसरे को अच्छे से जानते हैं, तो क्यों ना हम जीवनसाथी बन जाएं। आपकी व दीदी की राय क्या है?”
शुभा ने रिया की सारी जानकारी ली अमन से। दोनों की समकक्ष योग्यता थी और बढ़िया पैकेज भी। शुभा को बस एक बात थोड़ी खटक रही थी कि रिया सजातिय नहीं थी और बी। सी। कैटगरी से थी। अमन के दादा जी इस विवाह के लिए बिल्कुल तैयार नहीं होंगे। शुभा की बात एक जाट परिवार से चल रही थी, लड़की खूबसूरत, लम्बा कद और नौकरीपेशा थी। शुभा ने अमन को भी फोटो भेजा था। तब अमन ने कहा था, “आपकी मर्जी”। शुभा ने कहा था अमन को, ” जिंदगी तुम्हें साथ बितानी है। हर बात तुम परिवार के हिसाब से करते आए हो। बेटा, ये जिंदगी का अहम निर्णय है। इसमे हिचकना नहीं है, तुम्हारी कोई पंसद हो तो बता देना”
शुभा द्वारा दिए हौंसले की वजह से ही आज अमन ने अपनी इच्छा बताई है। अपनी दीदी,नूर,को वह बहुत अहमियत देता था। नूर एक ऊंचे औहदे पर एम।एन।सी। में जॉब कर रही थी। शुभा ने नूर के साथ इस रिश्ते पर चर्चा की। नूर ने लड़की से बात कर सब जानकारी परिवार के बारे में जुटाई। नूर को लड़की अच्छी लगी। लेकिन अमन के दादाजी व चाचा तैयार नहीं थे। उधर शुभा, नूर और अमन ने फैसला कर लिया था कि रिया को ही घर की बहू बनाएंगे। लड़की के घर वाले भी रिश्ते से राज़ी थे। कुंडली भी उन्होंने मिलवा ली थी। अमन के दादाजी ने कहा,” गांव में सब बात बनाएंगे। लड़की हमारी जाति की नहीं है। मैं क्या जवाब दूंगा…हमारी यहां इज्ज़त क्या रह जाएगी… आदि”।
शुभा, लेकिन मन बना चुकी थी। वह उस गलती को दोहराना नहीं चाहती थी जब उसने अपनी शादी के वक्त सिर झुका कर पिता के चरणों में अपने इश़्क की बलि दे दी थी। समाज़ में इज्ज़त के डर से, पिताजी के सम्मान की खातिर, एक रुहानी प्रेम को बलिदान कर दिया था, जिसकी टीस ता उम्र उसे चुभन देती रही थी। वह नहीं चाहती थी कि बेटा भी इस दर्द से गुजरे। उसे समझ थी कि इंसान की एक ही जात है ‘इंसानियत’। जहां आपके विचार मिलते हैं, रिश्तों को लेकर एक समझ है तो जीवन सरल हो जाता है। अमन के दादा जी को भी इस रिश्ते के लिए मनाया। बेटी ने भी प्रेम विवाह किया था लेकिन तब दादाजी को मनाना आसान था क्योंकि नूर का रिश्ता जाट परिवार में ही हुआ था। लेकिन अमन के रिश्ते में ये जाति का भेद आड़े आ रहा था। खैर, जो भी हो , शुभा ने परिस्थिति को अमन के पक्ष में कर लिया था यद्यपि सबको तैयार करने में उसे काफी महीने लगे। अमन और रिया को जब निर्णय से अवगत करवाया गया तो उनकी खुशी नयनों से छलक गई। शादी की तैयारियां दोनों तरफ से शुरु हो गई…।
शहनाई की धुन वातावरण में गूंज रही थी। नववधू के चरण घर में चिंहित हो रहे थे। चूड़ियों की खनक और पायल की झंकार शुभा को अपने अतीत में ले जाती है जब वह दुल्हन बनकर इस घर में आई थी। आज उसका प्रेम, बेटे की शादी में पुष्पित पल्लवित हो रहा था।

✍️©® डा. सन्तोष चाहार “जोया”१९/०३/२०१९

यूं न गवां

घर
सुखद बसेरा
आशाओं का नित सवेरा
रिश्तों की मिठास का अद्भुत बसेरा
भाग्यशाली को मिलता है सुरक्षा का ये घेरा
इसे यूं न गवां।

संतान
ईश्वरीय देन
चहल पहल से घर में चैन
सपनों पर उनके न लगाओ बैन
संस्कार सिंचित करने का ये सही रैन
इसे यूं न गवां।

रिश्तों
की महिमा
जिसने समझी व जानी
दुनिया में कोई नहीं उसका सानी
दंभ में होते हैं रिश्ते सदियों से चूर चूर
इन्हें यूं न गवां।

दोस्ती
का उंचा दर्जा
विश्वास की डगर फलता फूलता
शंकाओं के बादलों से हमेशा ही टूटता
दोस्ती में प्रेम-सरोवर का झरना फूटता
इसे यूं न गवां।

प्रेम
रसधार में
डूबे हैं नायब मोती
त्याग व समर्पण इसकी ज्योति
मिली है सौगात ईश्वर के दरबार से
इसे यूं न गवां।

जीवन
सुंदर सौगात
नयी राहों का लिखो प्रभात
क्षमताओं का परिचय हो दिन रात
सुंदर सुवासित हो रीत का मधुर संगीत
इसे यूं न गवां।

✍️©® डा. सन्तोष चाहार “जोया”14/03/2019

यूं ही नहीं

यूं ही नहीं
आती सदाएं खुशियों की तेरे आंगन
यूं ही नहीं
आती मेरे कंगन की खनक साजन
यूं ही नहीं
आती हिचकी नित तुम्हारे हिया
यूं ही नहीं
गिनते तुम तारे घनी अंधेरी रात
यूं ही नहीं
छूकर आते तुम महकते फूल गुलाब
यूं ही नहीं
महफ़िल में गुनगुनाते रचे मेरे प्रेम गीत
यूं ही नहीं
नयनों में तुम ख़्वाब मिलन सजाते
यूं ही नहीं
नदियों की धारा का प्रवाह बन जाते
यूं ही नहीं
सागर में लहर बन अठखेलियां करते
यूं ही नहीं
बारिश की बूंद बन सीप में समाते
यूं ही नहीं
आसमां सा छाता बन धरा को ढ़क लेते

किए हैं
प्रेमपुष्प अर्पित तुम्हें टकरा परंपरागत बंधन
किए हैं
अश्रु अर्पित तुम्हारे हर दर्द और विकट कुरुंदन
किए हैं
नज़ीर अनमोल जिंदगी पल व सुंगधित चंदन
किए हैं
सुनिश्चित तुम्हारे ऊंच आंकक्षाओं के हर स्वप्न
मिटा कर स्व-अस्तित्व समाहित किया तुम्हें हर धड़कन।

✍️©® डा.सन्तोष चाहार “जोया” 06/03/2019

कुछ बात कर

कुछ
बात कर
यूं चुप न बैठ
कुछ बात कर
साज छेड़
गीत गा
वीणा सी
झंकार कर।

कशिश
मिलन की गहरी
तुमने पुकारा
प्रेयसी तुम्हारी
बंधन जगत
सब तोड़
यादों की
पोटली बांध
साथ है लाई
अब कुछ
बात तो कर।

सालों बीते
नहीं मिली
बीती रैैना
जिसने बांधा
तुम्हारा मन
मेरा मन।

बरस रहे
अब अश्रु
बादल बन
तरस रहा
मन प्यासा
कुछ बात कर।

याद है
वो तुम्हारा
स्नेहिल स्पृश
हुआ जिससे
रोम रोम
पुल्लकित
क्यों होता
दिल अब
शंकित।

प्रिये
पास बैठ
अधर हिला
पलक उठा
पलक गिरा
होने दे सपंदन
प्रत्येक शिरा।

✍️©®डा.सन्तोष चाहार “जोया” 05/03/2019

तिरंगे की मन की बात

मां भारती के चरणों में बैठकर
तिरंगे ने की करुण पुकार
शहीदों के परिजनों की सुनी है
मां, मैंने हृदयभेदी चीख पुकार।

देखा है
बिलखते बच्चों का जज्बा
मां बाप की सहनशक्ति का रुतबा
विधवा की रुदन चीत्कार
उमड़े जन सैलाब की गगनभेदी पुकार।

तिरंगा मां भारती से करता है अर्ज़
क्या शहीदों का कफन बनना ही फर्ज़?
क्यों नहीं बन पाता शूरवीरों की आन?
क्यों नहीं रख पाता रणबांकुरों की बान?

कब तक
सत्ता के लालच में नेता रहेंगे लिप्त
महागठबंधन से करेंगे सिंहासन प्राप्त
फिर भूल जाएंगे शहादतें बन निर्लिप्त?

कब तक
शहीदों की चिताओं पर साहस होगा चूर
फिकरापरस्ती में आतंकवाद बनेगा नासूर
क्या है आम भारतीय का कसूर?
कब तक विदेशी आकाओं का रहेगा फितूर?

क्यों नहीं
काटने देते दुश्मनों की बोटियां
आंतक परस्त फिर तरसे रोटियां
क्यों नहीं
आदेश देते फतह करें दुश्मनों की चोटियां?

मां भारती
सुनो मेरी आंतर्नाद
बजने दो रणभेरी व शंखनाद
आतंकी सर जमीं बने कब्रगाह
आंतकी सपोलों का तभी होगा दाह।

तिरंगा
करता है मां भारती से दरख्वास्त
शूरवीरों का बल कभी ना हो परास्त
प्रचंड प्रहार कर सेना,दुश्मन को करे त्रस्त
भारतीय जन हर कला में है सिद्धहस्त।

मां भारती
चाहता हूं शान से फहराया जाऊं
कभी शहीद का कफ़न ना बनकर आऊं
दुश्मन की जमीं तलक फहराया जाऊं
कभी किसी शहीद का कफ़न बन कर ना आऊं।

✍️ डा. सन्तोष चाहार” जोया”17/02/2019
[रोहतक- हरियाणा]

प्रेम पुष्प- कल और आज़

प्रौढ़ प्रेम

मुखर मौन उपवन
इश़्क लेता अंगड़ाई
मुस्कराते हृदय सुमन
हंस संग हंसनी शरमाई।

इश़्क सागर अनंत
प्रेम पुष्प पंखुडियां
जुड़ती अनेकों कड़ियां
रुहानी रिश्ता न होता अंत।

प्रेम डोर के धागे
रंग बिरंगे मांझे
बुनते सुंदर दोशाला
इश़्क एक भव्य पाठशाला।

युवा प्रेम आज़कल

युवा पीढ़ी समझें
प्रेम की गहराई
दंभपूर्ण करो ना
एक दूजे से रुसवाई।

प्रेम पुष्पों से महके
जीवन की सच्चाई
सुवासित रहे, हर डगर
जीवन बने सुखदाई।

इश़्क एक
सुरमयी अहसास
सच्चे हृदय में
खिलते फूल ये खास।

प्रेम की बहे
हर ओर सुवास
यही है कवि कलम की
हृदयतल से दरख्वाश।

✍️©® डा. सन्तोष चाहार “जोया”14/02/2019

टूटता पिंजरा

कल फिर टूटेगा
इक पिंजरा
कल फिर टूटेगा
इक बंधन
कल फिर छूटेगी
इक मैना
कल फिर हसेंगी
धरती
कल फिर हौसंले
भरेगें उड़ान
कल फिर
झुकेगा आसमान
कल फिर
होगा नय़ा सवेरा
कल फिर
लिखी जाएगी
नयी इबारत
कल फिर
चहकेगा घर आंगन
कल फिर
संस्कृति की नींव
होगी सुदृढ़
कल फिर टूटेंगी
विषमता की बेड़ियां
कल फिर
नारी का
होगा सम्मान
कल फिर उम्मीदें
चढ़ेगीं परवान
कल फिर सपने
चढ़ेगें सोपान
कल फिर
समरसता की
बहेगी बयार
क्योंकि समाज
बदल रहा है
बेटियों ने ठान ली है
वे पढ़ रहीं हैं
आगे बढ़ रही हैं
हर क्षेत्र में
गढ़ रहीं हैं
नये कीर्तिमान।

✍️©® डा.सन्तोष चाहार “जोया” 11/02/2019

तो…मैं गीत लिखूं

जब

विहग नव कलरव गाएं

भौंरे पुष्पों पर मंडरायें

तितलियाँ उपवन में भरे उड़ान
बागों में कोयल कूके
पपीहा भी मधुर गीत सुनाए
तो…मैं गीत लिखूं।
जब
धरा प्रकृति से लहराए
गगन जब तारे चमकाए
शशि नभ में मुस्काए
समीर जीवन संदेश लाए
सागर में लहरें इठलाएं
तो…मैं गीत लिखूं।
जब
हंसी की हिमानियां पिघल जाएं
करुण क्रंदन जब ठहर जाए
हिंसा का ताण्डव जब रुक जाए
सैनिक तिरंगे में लिपट कर ना आए
मां की ममता ना नीर बहाए
तो…मैं गीत लिखूं।
जब
हौंसलों को परवाज़ मिल जाए
बेटियां भी गौरव गाथा रच पाएं
दहलीज़ पार संसार को समझ पाएं
सदियों के दर्द जब मिट जाएं
मातृभूमि पर सब न्यौछावर हो जाएं
तो…मैं गीत लिखूं।
जब
कृषक के जीवन में खुशहाली आए
शिक्षा आमजन को सुलभ हो जाए
रंग भेद व जाति धर्म की दीवारें ढह जाएं
सुरसा सम बेरोजगारी का निदान हो जाए
संस्कारों की नीवं जब सुदृढ़ हो जाए
वृद्धावस्था जब मजबूर ना हो जाए
तो…मैं गीत लिखूं।
जब
मासूम बचपन मजदूरी से मुक्त हो जाए
इंसानियत का उत्सर्ग हो जाए
रिश्तों में कड़वाहट कुंद हो जाए
प्रकृति से सब लयबद्ध हो जाएं
सर्व सुखंति, सर्व संपदा बुलंद हो जाए
तो…मैं गीत लिखूं।
✍️©® “जोया” 10/02/2019