Category Archives: Faith

दुल्हन की पोटली

दहेज़ लेने से मना कर देने पर,

उन्हें तो सुसराल कुछ लाना था

इसलिए आजकल

दुल्हनें पोटली में बांध कर,

लेकर आती हैं

एजूकेशनल लोन,

लाने की,परंपरा तो निभानी होती है

टोकने पर, पतियों को चुंगल में ले चुकी

ऐसी फेमिनिस्ट लड़कीयां

घरों में तूफान खड़ा करवाती हैं,

शादी के कुछ समय बाद

भेद खुलने पर,

टकराव तो निश्चित होते हैं

घर में बैठकर,

प्रति मिनट की खबर रखने वाली

बेटी के सुसराल में, दखलंदाजी करती माएं

वाकई पढ़ी-लिखी गंवार होती हैं,

बेटीयों की कमाई को ऐसी मांए निंयत्रित करती हैं

और

पतियों की कमाई को,

ये तथाकथित फेमिनिस्ट लड़कियां,

जिन्हें ये नहीं मालूम, कि

फेमिनिज्म का मतलब बदतमीजी नहीं होता,

झूठ और चालाकी नहीं होता

लोन की किस्तों के जाल में उलझाकर

प्रेम में अंधे हुए

लड़कों का करती हैं भरपूर दोहन,

रिंग सेरेमनी से लेकर

विदेशों में हनीमून तक

अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा

लगा देती हैं भावुक माएं,

फिर भी

भड़क जाते हैं ऐसे लड़के

जिन्होंने प्रेम-विवाह किया होता है,

वो

सभी सास फिर बुरी कहलाती हैं,

क्योंकि वे सटीक सवाल उठाती हैं।

ऐसे लड़के

भूल जाते हैं, माएं


जूझ जाती हैं विषम परिस्थितियों से

ताकि बच्चों के सपनों में रुकावटें ना आएं,


वे

समझते क्यों नहीं ?

जो माएं अपने बलबूते पर

बच्चों को कैरियर में स्थापित

करने का दम रखती हैं,

तो

बहू, बेटे की

झूठ, बदतमीजी और चालाकी भी

बर्दाश्त नहीं करेंगी,

क्या ग़लत होता है?

ये कहना,

इन तथाकथित

फेमिनिस्ट लड़कियों के घरवालों से

कि, “दुल्हनें कर्ज़ लेकर नहीं आती”।

दहेज़ नहीं, कर्ज़ भी नहीं

यहीस्वस्थ परंपरा होनी चाहिए।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०७/०७/२०२०

लम्हों की दास्तां

लम्हों की दास्तां

समुंद्र किनारे बैठकर यूं ही कितनी यादें ताजा हो गईं हैं।
आज से बीस साल पहले जब गोवा के रमणीय स्थलों को देखने के पश्चात, मैं एक बालू तट पर आकर बैठ गई थी। समुंद्र में उठती गिरती लहरों में टटोल रही थी, तुम्हारे साथ बिताए लम्हों की दास्तां।

प्रेम का सबसे खूबसूरत अहसास  मेरे मन मस्तिष्क में ऑक्सीजन बनकर जिंदगी को तरोताजा कर गया था। समुंद्र के वक्ष पर इठलाती बलखाती लहरें, हमें एक-दूसरे के कितने समीप ले आईं थीं। तुम्हारी बाहों में सिमटी, मैं प्रेम की पराकाष्ठा तक पहुंचने के लिए लालियत, लहरों के बिछौने पर तुम्हारे अधरो की प्यास बुझाने में अनेकों दूसरे जोड़ों की भांति मदमस्त होकर, अपनी झोली में उन मोतियों को बटोर रही थी, जिनके लिए मैंने इतनी दूर का सफर तय किया था।

तुम्हारे से बिछुड़ने के बाद जिंदगी के रंग फीके होकर मेरे चेहरे पर उदासी की अस्पष्ट लकीरों में उभर आए थे। जिंदगी केवल कर्त्तव्य की नदी पर बह रही थी। किसी ने यह जानना नहीं चाहा, इस नदी में आंसुओ का समुंद्र कहां विलीन हो रहा है। नदी का कर्त्तव्य ही है सींचते जाना, अपने किनारों पर सभ्यताओं को जन्म देना और पोषित करना। तुम जानते हो, कर्त्तव्यों से मैं कभी विमुख नहीं रही लेकिन जिंदगी में कर्त्तव्यों के साथ अधिकार भी तो मिलने चाहिए। अधिकारों के लिए मुझे क्यों जूझना पड़ा? गृहस्थी में सबकुछ परफेक्ट रखने की कोशिश में, कितने ही रंगों से महरूम रही मैं। तुम जानते थे रंगों से मुझे कितना प्रेम है, लेकिन यहां किसी को परवाह नहीं थी। मेरी हसरतें जो तुम्हारे संग आकाश छूने का जनून रखती थी, धीरे धीरे शिथिल होने लगी। एक लड़की, जब विवाह बंधन के पासों में लपेट दी जाती है तो उसके ख्वाबों के पंख कतर दिए जाते हैं। विशेषतः, जहां बेमेल शादियां होती हैं। गृहस्थी के कोल्हू में मुझे खूब इस्तेमाल किया गया। इन्हीं कुछ  जिम्मेदारीयों के बीच, तुम्हारी यादें कुछ सकूं के क्षण लेकर आती थी और तुमसे मिलने की इच्छा बलवती हो जाती थी।

पति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती रही, लेकिन मुझे हर बार महसूस होता था कि, मैं दौड़ना चाहती हूं और वे एक जगह पर जम जाते हैं।  जिंदगी में इतनी तटस्थता, ठहराव मुझे नहीं भाता था क्योंकि मैं दौड़ना ही नहीं उड़ना भी चाहती थी, लेकिन मुझे एक खूंटे से बांध दिया गया था, रस्सी, उतनी ही लम्बी छोड़ी जाती थी जितना उनको मुझे उपयोग करना था और तुम्हें तो मालूम है, मेरे पांवों में तो रोलर्स लगे थे। मैं तेज़ गति से खुले मैदान और बर्फीले पहाड़ों पर रेस लगाने के रोमांच को जीना चाहती थी। तुम्हें  याद तो होगा वो जीत जब ,मैंने पी टी उषा को भी एक बार पीछे छोड़ दिया था, राष्ट्रीय स्तर की स्कूल स्पर्धा में, उस दिन पूरी टीम ने मुझे सर आंखों पर बैठा लिया था। उस दिन तुम कितने खुश थे, जब हरियाणा की एक पत्रिका में मेरी तस्वीर छपी थी और लिखा गया था, ” ये लड़की एक दिन ओलम्पिक खेलों में जाएगी”।
लेकिन, कहां जाने पाई? 1980 के दशक में हमारा समाज खेलों के विषय में जागरुक ही नहीं था। पिता जी का आदेश था, ” पढ़ाई पर ही केंद्रित रहो”। सरकार ने भी कोई सहायता सुनिश्चित नहीं की। तुम लड़के थे, तुम चले गए एन डी ए में। मुझे भी आर्मी में जाना था लेकिन लड़कियों के लिए उस दौर में नहीं थे आप्शन। तुमसे शादी कर आर्मी का हिस्सा बनना चाहा, लेकिन मेरी राय कहां ली गई थी?  जिंदगी के बहुत सारे रंग यूं ही फीके होते चले गए लेकिन तुम्हारे प्रेम का रंग शादी के बाद, मेरे अंतर्मन की गहरी कंदराओं में सिमट गया।  एक खूबसूरत अहसास जो आज भी उतना ही सुगंधित है जितना पहले प्रेम का बीज अंकुरित होने पर था। उतना ही मुलायम है, जितना पहले स्पर्श में था। आत्मीय संबंध हमेशा गहरे होते हैं।

आज भी समुंद्र के किनारे बैठकर पलकें पसारे बैठी हूं, तुम्हारे इंतज़ार में। एक बार दोबारा जीना चाहती हूं, रंगों मे में डूब जाना चाहती हूं। यहां बैठी, इन हवाओं से तुम्हारा पता पूछती रहती हूं, उन लहरों को पकड़ने की कोशिश में रहती हूं, जिन लहरों पर तुम्हारा नाम अपने नाम के साथ लिख दिया था। आसमान में उठती घटाओं में तुम्हारे अक्स को तलाशती हूं, शायद मेरे प्रेम का बादल तुम से मिलकर आया हो। पॉम के लहराते, उन दोनों वृक्षों को भी मिलकर आई हूं , जहां तुमने प्रेम के दस्खत किए थे। यहां बहुत सारी सीपियां चुनकर रखी हैं, उस सीपी को टटोलने के लिए जिस पर तुमने हमारा नाम उकेर कर समुंद्र में डाल दिया था, ये कहते हुए कि, ” हमारा प्रेम भी समुंद्र जितना गहरा है, इसे छुपा देते हैं…एक दिन ये सीपी जब किनारे पर आएगी, उस दिन हम दुबारा मिलेंगे।” आज, मैं समुंद्र किनारे, उसी सीपी को तलाश रही हूं। बालू पर एक घरौंदा भी बना लिया है, ठीक उसी जगह, जहां हम दोनों ने मिलकर बनाया था। तुम्हारा चित्र अपने चित्र के साथ उकेर दिया है। देखो, इस चित्र में हम दोनों वृद्धावस्था में पहुंच चुके हैं, लेकिन हृदय अभी भी युवा है, जहां हमारे दिलों की तरंगें फिर मिलने को आतुर हैं। मुझे विश्वास है, जब मैं सीपी को ढूंढने में कामयाब हो जाऊंगी, उसी समय तुम यहां पहुंच जाओगे। तब तक मेरी प्रतिक्षा की घड़ियां टिक टिक करती रहेंगीं।
©® ✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०२/०७/२०२०

अविवाहित लड़कियां

वे बंधी होती हैं अपने सपनों से
चूड़ियों की खनक की जगह
उन्हें सुनाई देती है कोयल की कूक,
उनके स्वास में घुली होती है
फूलों की वादियों की महक,
पायल की झंकार की जगह
वो सुनती हैं
बहते झरने का संगीत,
नदियों के संगम का आहृलादित स्वर
भरता है उनकी रगों में जोश,
पहाड़ों की ऊंचाई से सीखती हैं
वे सीना तान कर खड़ा रहना,
मस्तक पर बिंदी की जगह
उन्हें लुभाता है
आत्मसम्मान का वृहद टीका,
मंगलसूत्र की जगह
वे पहनती हैं
उपलब्धियों की माला,
लक्ष्मण रेखा के परे
वो देखती हैं विस्तृत गगन,
बाज़ सम नापती हैं नभ
बादलों से ऊपर उड़कर
आंकती हैं हुनर की क्षमता,
वे बेफिक्री से लगी रहती हैं
सपनों को हकीकत में बदलने में
समाज में उठाए गए सवालों को
कर दरकिनार,
बढ़ती हैं मंजिल की ओर
अविवाहित रहने वाली लड़कियां
इसलिए अविवाहित नहीं रहती कि,
उन्हें कोई पसंद नहीं करता,
वे शादी करेंगी
उन पुरुषों से, जिन्हें वे पसंद करेंगी
ऐसे पुरुष
जो सही मायने में उनकी उड़ान में संग संग उड़े।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २९/०६/२०२०

सृष्टि चक्र#मां

मांए
कसकर बांध देती हैं
सारी तकलीफें चोटी में,
और
हर सुबह लग जाती हैं
बच्चों के सपने पूरे करने,
रोटी बेलते वक्त
आकार देती हैं, उनकी
छोटी-छोटी खुशियों को,
गर्म दूध में बोर्नविटा के साथ
घोल देती हैं अपने स्नेह की उर्जा
पति के लिए,
चाय खौलते वक्त
खौल देती हैं पिछली रात की कहासुनी ,
सभी के लिए टिफिन लगाते वक्त
छुपा देती हैं
पौष्टिक आहार के साथ दुआएं,
घर लौटने पर,
उतारती हैं सबकी नज़र
मांए
कभी थकती नहीं हैं,
लेकिन वो थकती हैं
जब उनसे कहा जाता है
“घर में सारा दिन तुम करती ही क्या हो?”
वे थकती हैं
जब, बच्चे बड़े  होने पर कहने लगें
“आप चुप रहो, हमें मालूम है सही ग़लत “
मां को थकने मत दो,
मां थक गई तो सृष्टि चक्र रुक जाएगा
जो निर्मित हुआ है वह ढ़ह जाएगा
ढ़हने से बचना है तो
मां का सम्मान करो,
उसे थकने मत दो।
©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१६/०६/२०२०

रात की रानी

प्रेम पर लिखी गई सारी कविताएं
रात की रानी की लताएं होती हैं
जिनपर खिले पुष्प
चारों दिशाओं में सुगंध फैलाते हैं,
जब फूल मुरझा कर गिरते हैं
तब रोता है प्रेमी हृदय,
पुष्प के सूख जाने पर
मरने लगता है प्रेम,
सूखे पुष्पों को बटोर कर
फिर कोई प्रेमी
उनमें बसी शेष सुंगध में
टटोलता है अपना अक्स,
लगाता है अपने आंगन में
रात की रानी का पौधा,
सींचता है
उसे पीड़ा मिश्रित एहसासों से,
एहसासों की नमी पाकर
फिर खिलते हैं
रात की रानी पर प्रेम पुष्प ,
ये चक्र
अनवरत जारी रहता है
तभी तो
प्रेम कविताएं हमेशा  महकती रहती हैं।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १०/०६/२०२०

दुआ

दुआओं का कोई छोर नहीं होता
बरसने लगती हैं तब
कट जाते हैं
सारे पाप
रब की रहमत बरसती है
तो मां मिलती है
मां की दुआ बरसती है तो
हर लेती है
सारे संताप।

मैंने देखा है
मां को मंदिर में
दंडवत हो
मेरे लिए दुआ मांगते
मैं
मां के पैर पखार कर
बटोर लेती हूं दुआएं।

सब कहते हैं मां
बूढ़ी हो चली,
मैं कहती हूं
मांए कभी
बूढ़ी नहीं होती
उनकी तो
उम्र बढ़ती है।
©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २०/०५/२०२०

अखंड ज्योत

अधूरे प्रेम
के, अधूरे अफ़सानों
में,
कलम
की
सीढ़ियां चढ़,
उतर
आते हैं प्रेमी,
कविता,
कहानी के किस्सों में,
रुठे
जज़्बातों के
तिल -तिल
सुलगते हिस्सों में।

अखंड ज्योत सा, जलता रहता है अधूरा प्रेम, ताउम्र।

©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१८/०५/२०२०

अजनबी अतिथि

पीड़ा
की गठरी उठाए,
नाप रहें हैं
अपनी मंजिल,
पैरों में पड़े हुए छाले
भी ,राह रोक न पाएं
भूख प्यास से व्याकुल
जिजिविषा के धनी,
पहुंचना चाहें
अपने गांव,
क्योंकि
गांव कभी
अजनबी नहीं होते।
©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१९/०५/२०२०

परछाई

परछाई#औरत।

उसने कहा,

परछाई बनना मेरी नियति,

मैंने कहा

परछाई बनना, तुम्हारी नियति नहीं

बल्कि ,पस्त हौसलों का है स्वरुप

उसने कहा,

परछाई बनना मेरी विविशता,

मैंने कहा

नहीं , मैंने

विविशता के घोर अंधेरों में भी,

सपने पलते देखें हैं

देखा है, उन्हें आकार लेते

जैसे,

दीवारों के छिद्र में से

सृजन का बीज लिए

पीपल का वृक्ष

जैसे

कटे हुए वृक्ष के ठूंठ से

एक टहनी होती प्रस्फुटित

और

उस पर लगा होता है

एक फल।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”२५/०४/२०२०

कमाई

कमाई

कालोनी की औरतें , अनुभा के विषय में चर्चा करती रहती  हैं और समय समय पर नयी नयी उपाधियों से अलंकृत करती रहती  हैं। कोई उसे “पागल” तो, कोई “बेवकूफ” बताता रहता है। कभी कभी तो ये महिलाएं उसे सीधे तौर पर भी कह देती थी, “तुम इन बाई लोगों को बिगाड़ रही हो”, लेकिन अनुभा की जीवनशैली में कोई फर्क नहीं पड़ता था…।

अनुभा पढ़-लिख कर, अच्छे ओहदे पर बहुत संघर्ष करने के पश्चात पहुंची थी। उसके लिए कर्म ही पूजा अर्चना थी … हमने कभी उसे मंदिर जाते नहीं देखा। बस साल में एक आध बार मुख्य अवसरों पर ही शिरकत करती थी।  व्रत उपवास में भी उसका खासा रुझान देखने को नहीं मिला… महाशिवरात्रि पर्व पर जरुर हमने उसे मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते देखा है… यूं नहीं है कि वह नास्तिक है… उसके घर से, प्रतिदिन सुबह शाम, घर के मंदिर की घंटी जरुर सुनाई देती है और दीपक/कपूर की महक भी आती है .. लेकिन इस सबके पीछे उसका मकसद पूजा अर्चना कम, बल्कि वातावरण  की शुद्धता कारक होता है… चूंकि मेरा घर उसके बगल में ही है तो यदा-कदा मेरा जाना लगा रहता है… वैसे है वह , अंतर्मुखी स्वभाव की,  बहुत गपशप नहीं करती है… कालोनी की कुछ महिलाएं, इसीलिए उसे घमंडी भी कह देती हैं… लेकिन उसकी नेकी के किस्से एक बाई से होते हुए दूसरी बाई तक पहुंचते रहते हैं और वहां से कालोनी की महिलाओं तक…।

अनुभा की विशिष्ट जीवनशैली रही है। पिछले तीस वर्षों से वह इस सेक्टर में रह रही है…हम सभी युवा थे जब हमने अपने घर यहां बनाए थे, तो पहचान पुरानी है। अनुभा के घर में  बाई /माली / धोबी/  आदि सभी  हमने शुरू से ही देखें हैं। उसे  बागवानी का भी बहुत शौक है और आफिस से आते ही खुद भी बगीचे में लगी रहती है और यही कारण है कि इतने वर्षों से सेक्टर में सब उसके बगीचे को देखकर उसकी प्रशंसा भी करते हैं… पर्यावरण संरक्षण में उसकी ये छोटी सी आहुति है।

हां , तो बात ये हो रही थी कि कालोनी की महिलाएं उसे पागल/बेवकूफ क्यों कहते हैं। अरे, भाई वो काम ही ऐसे करती रहती है। आजतक ना जाने घर में से कितनी चीजें , जिनमें, कुलर/पंखा/ सोफे/ पुराना टेलीविजन/वाशिंग मशीन/ डेस्कटॉप/ घड़ी/कालीन/सिलाई मशीन/दहेज की संदूक आदि… बहुत लम्बी फेहरिस्त है… साड़ी/सूट/चद्दर/गद्दे  की तो गिनती ही नहीं है। जब भी वह घर में कुछ नया लाती है तो  पुराना(यानी दस साल) सबसे पहले, अपने यहां लगे हेल्प से पूछती है और उन्हें एक पैसा लिए बगैर दे देती है जबकि बाजार में रिसेल में अच्छे दाम मिल सकते हैं… लेकिन नहीं। उसका एक ही मंत्र है ” जो वस्तु किसी गरीब के काम आ सकती है तो उससे पैसे बनाने की क्या जरूरत है?”
कभी मैं उसे टोक भी देती हूं,
” अनुभा, क्यों इन सबकी आदत खराब करती हो? मुफ्त की वस्तु का लोग आदर नहीं करते हैं…”। 
उसका स्पष्ट सा उत्तर होता है:
” ऐसा है, मैं कभी चंदे आदि की रसीद /या मंदिर की दान पेटियों में तो  रुपए डालती नहीं हूं… तो मेरा फंडा है कि जो आपके सामने है उसकी मदद करो… तसल्ली भी रहती है कि मदद सही जगह हो रही है…जब देश में बाढ़ या अन्य संकट आता है तो, तुम्हें मालूम है तनख्वाह में से कट ही जाता है… मधु तूझे पता तो है , रामप्यारी(मेड) मेरे यहां बीस साल से काम कर रही है… आदमी निक्कमा है, दो बेटियों की शादी में ही तो दिए थे सोफे व संदूक पोलिश करवा कर…साथ में दोनों लड़कियों को सिलाई मशीन दिलवा दी ताकि वो घर पर ही कुछ कमाई कर सकें…आज वो खुश हैं, अपना गुजर-बसर कर रही हैं… मिलने भी आती हैं। मुझे संतुष्टि मिलती है , थोड़ी मदद इस तरह मैं कर पाई”।
“अरे, भाई तुमने वो डेस्कटॉप भी तो अपने ड्राइवर को दे दिया… बच्चों के लिए लेपटाप लेना था तो, वह तेरे काम आ जाता?”
” देख, मधु, उसकी बेटी चौथी कक्षा में है और अब विद्यालयों में कम्प्यूटर जरुरी कर दिया है… एक बेटी वह भी सीख जाएगी , इसमें क्या हर्ज है?”।
“अरे, पिछली बार आंटी आईं थीं, तो वो भी तो मेरे सामने तेरी शिकायत कर रही थी , ‘मधु बेटी , इसने तो दहेज की संदूक भी दे दी… कोई  संदूक भी देता है क्या ?’

“अरे, छोड़ मां की बात। उन्हीं से तो सीखा है। बचपन से देखती आ रही हूं… कभी किसी को मना नहीं करते देखा…”

घर पर आकर, मैं भी बहुत देर तक सोचती रहती कि ,अनुभा कहती तो ठीक है , सोचती हूं कि, नौकरीपेशा है, इसीलिए ये मदद कर पाती है। एक दिन मैंने उससे पूछ ही लिया
” सुनो, अनु। तुम्हारे पतिदेव , तुम्हे कभी कुछ कहते नहीं? ऐसे चीजें बांटती रहती हो।”
” हां, कहते हैं ना…कि तेरे शौक बहुत महंगे हैं… फ़ालतू में बांटती रहती है, नयी चीज लाने का चाव रहता है… तेरा बस चले तो तू मुझे भी बदल दे( हंसती है)”।
“फिर?”
“फिर, क्या। मैं कह देती हूं , मेरा अपना ज्वेलरी/कास्मेटिक आदि का कोई खर्च नहीं है। इतना तो मैं कर ही सकती हूं… जनाब दुआएं कमाओ, यही साथ चलेंगीं… पैसे का क्या है…ढलती फिरती छांव है…आज है, कल नहीं”।

अनुभा के जीवन में भी एक ऐसा मोड़ आया कि उसकी हंसती खेलती गृहस्थी बिखरी… नहीं टूटा था तो बस उसका हौंसला और खुद पर विश्वास। अमन, अनुभा के पति,एक सड़क दुघर्टना में ऐसे चोटिल हुए कि चारपाई पकड़ ली.. रीढ़ की हड्डी में चोट थी, जिसका असर दिमाग तक गया.. अनुभा के कंधों पर भारी बोझ आन पड़ा लेकिन उसने हार नहीं मानी… परिस्थितियां विपरीत जरुर थी लेकिन उसके हौंसले को डिगा नहीं पाई…।

अनुभा के पति बीस साल की सेवा/इलाज के बाद, आज  चल फिर लेते हैं और चारपाई से उठ गए हैं लेकिन नौकरी तो छूट ही गई थी। अनुभा के बच्चे पढ़-लिखकर अच्छे ओहदे पर हैं। अनुभा के साथ साथ मैं भी बूढ़ी हो चली हूं ।  अनुभा की बहू बहुत सुलक्षणी है , दामाद भी  उसकी बहुत इज्जत करता है।  जिंदगी का विश्लेषण करती हूं तो इस निष्कर्ष पर ही पहुंचती हूं , अनुभा ने जो दुआएं कमाई थी, उन्हीं ने उसे संकट से उबारने में मदद की है।

वास्तव में यही नेक कमाई है। आज भी उसका माली जो अस्सी साल का हो गया है और उसकी बाईं( रामप्यारी) उससे मिलने आते रहते हैं। अनुभा, उन्हें अभी भी कभी खाली हाथ नहीं जाने देती…उनके पोते/दोहता/दोहती के लिए कुछ ना कुछ भेजती रहती है…  रिटायरमेंट के बाद से ही एक घंटा कालोनी की मेडस के बच्चों  का होमवर्क पूरा करवाने में सहयोग करती है…कमाई अभी भी जारी है।
©®✍️ डा सन्तोष चाहार ” ज़ोया”०८/०४/२०२०