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दुल्हन की पोटली

दहेज़ लेने से मना कर देने पर,

उन्हें तो सुसराल कुछ लाना था

इसलिए आजकल

दुल्हनें पोटली में बांध कर,

लेकर आती हैं

एजूकेशनल लोन,

लाने की,परंपरा तो निभानी होती है

टोकने पर, पतियों को चुंगल में ले चुकी

ऐसी फेमिनिस्ट लड़कीयां

घरों में तूफान खड़ा करवाती हैं,

शादी के कुछ समय बाद

भेद खुलने पर,

टकराव तो निश्चित होते हैं

घर में बैठकर,

प्रति मिनट की खबर रखने वाली

बेटी के सुसराल में, दखलंदाजी करती माएं

वाकई पढ़ी-लिखी गंवार होती हैं,

बेटीयों की कमाई को ऐसी मांए निंयत्रित करती हैं

और

पतियों की कमाई को,

ये तथाकथित फेमिनिस्ट लड़कियां,

जिन्हें ये नहीं मालूम, कि

फेमिनिज्म का मतलब बदतमीजी नहीं होता,

झूठ और चालाकी नहीं होता

लोन की किस्तों के जाल में उलझाकर

प्रेम में अंधे हुए

लड़कों का करती हैं भरपूर दोहन,

रिंग सेरेमनी से लेकर

विदेशों में हनीमून तक

अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा

लगा देती हैं भावुक माएं,

फिर भी

भड़क जाते हैं ऐसे लड़के

जिन्होंने प्रेम-विवाह किया होता है,

वो

सभी सास फिर बुरी कहलाती हैं,

क्योंकि वे सटीक सवाल उठाती हैं।

ऐसे लड़के

भूल जाते हैं, माएं


जूझ जाती हैं विषम परिस्थितियों से

ताकि बच्चों के सपनों में रुकावटें ना आएं,


वे

समझते क्यों नहीं ?

जो माएं अपने बलबूते पर

बच्चों को कैरियर में स्थापित

करने का दम रखती हैं,

तो

बहू, बेटे की

झूठ, बदतमीजी और चालाकी भी

बर्दाश्त नहीं करेंगी,

क्या ग़लत होता है?

ये कहना,

इन तथाकथित

फेमिनिस्ट लड़कियों के घरवालों से

कि, “दुल्हनें कर्ज़ लेकर नहीं आती”।

दहेज़ नहीं, कर्ज़ भी नहीं

यहीस्वस्थ परंपरा होनी चाहिए।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०७/०७/२०२०

लम्हों की दास्तां

लम्हों की दास्तां

समुंद्र किनारे बैठकर यूं ही कितनी यादें ताजा हो गईं हैं।
आज से बीस साल पहले जब गोवा के रमणीय स्थलों को देखने के पश्चात, मैं एक बालू तट पर आकर बैठ गई थी। समुंद्र में उठती गिरती लहरों में टटोल रही थी, तुम्हारे साथ बिताए लम्हों की दास्तां।

प्रेम का सबसे खूबसूरत अहसास  मेरे मन मस्तिष्क में ऑक्सीजन बनकर जिंदगी को तरोताजा कर गया था। समुंद्र के वक्ष पर इठलाती बलखाती लहरें, हमें एक-दूसरे के कितने समीप ले आईं थीं। तुम्हारी बाहों में सिमटी, मैं प्रेम की पराकाष्ठा तक पहुंचने के लिए लालियत, लहरों के बिछौने पर तुम्हारे अधरो की प्यास बुझाने में अनेकों दूसरे जोड़ों की भांति मदमस्त होकर, अपनी झोली में उन मोतियों को बटोर रही थी, जिनके लिए मैंने इतनी दूर का सफर तय किया था।

तुम्हारे से बिछुड़ने के बाद जिंदगी के रंग फीके होकर मेरे चेहरे पर उदासी की अस्पष्ट लकीरों में उभर आए थे। जिंदगी केवल कर्त्तव्य की नदी पर बह रही थी। किसी ने यह जानना नहीं चाहा, इस नदी में आंसुओ का समुंद्र कहां विलीन हो रहा है। नदी का कर्त्तव्य ही है सींचते जाना, अपने किनारों पर सभ्यताओं को जन्म देना और पोषित करना। तुम जानते हो, कर्त्तव्यों से मैं कभी विमुख नहीं रही लेकिन जिंदगी में कर्त्तव्यों के साथ अधिकार भी तो मिलने चाहिए। अधिकारों के लिए मुझे क्यों जूझना पड़ा? गृहस्थी में सबकुछ परफेक्ट रखने की कोशिश में, कितने ही रंगों से महरूम रही मैं। तुम जानते थे रंगों से मुझे कितना प्रेम है, लेकिन यहां किसी को परवाह नहीं थी। मेरी हसरतें जो तुम्हारे संग आकाश छूने का जनून रखती थी, धीरे धीरे शिथिल होने लगी। एक लड़की, जब विवाह बंधन के पासों में लपेट दी जाती है तो उसके ख्वाबों के पंख कतर दिए जाते हैं। विशेषतः, जहां बेमेल शादियां होती हैं। गृहस्थी के कोल्हू में मुझे खूब इस्तेमाल किया गया। इन्हीं कुछ  जिम्मेदारीयों के बीच, तुम्हारी यादें कुछ सकूं के क्षण लेकर आती थी और तुमसे मिलने की इच्छा बलवती हो जाती थी।

पति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती रही, लेकिन मुझे हर बार महसूस होता था कि, मैं दौड़ना चाहती हूं और वे एक जगह पर जम जाते हैं।  जिंदगी में इतनी तटस्थता, ठहराव मुझे नहीं भाता था क्योंकि मैं दौड़ना ही नहीं उड़ना भी चाहती थी, लेकिन मुझे एक खूंटे से बांध दिया गया था, रस्सी, उतनी ही लम्बी छोड़ी जाती थी जितना उनको मुझे उपयोग करना था और तुम्हें तो मालूम है, मेरे पांवों में तो रोलर्स लगे थे। मैं तेज़ गति से खुले मैदान और बर्फीले पहाड़ों पर रेस लगाने के रोमांच को जीना चाहती थी। तुम्हें  याद तो होगा वो जीत जब ,मैंने पी टी उषा को भी एक बार पीछे छोड़ दिया था, राष्ट्रीय स्तर की स्कूल स्पर्धा में, उस दिन पूरी टीम ने मुझे सर आंखों पर बैठा लिया था। उस दिन तुम कितने खुश थे, जब हरियाणा की एक पत्रिका में मेरी तस्वीर छपी थी और लिखा गया था, ” ये लड़की एक दिन ओलम्पिक खेलों में जाएगी”।
लेकिन, कहां जाने पाई? 1980 के दशक में हमारा समाज खेलों के विषय में जागरुक ही नहीं था। पिता जी का आदेश था, ” पढ़ाई पर ही केंद्रित रहो”। सरकार ने भी कोई सहायता सुनिश्चित नहीं की। तुम लड़के थे, तुम चले गए एन डी ए में। मुझे भी आर्मी में जाना था लेकिन लड़कियों के लिए उस दौर में नहीं थे आप्शन। तुमसे शादी कर आर्मी का हिस्सा बनना चाहा, लेकिन मेरी राय कहां ली गई थी?  जिंदगी के बहुत सारे रंग यूं ही फीके होते चले गए लेकिन तुम्हारे प्रेम का रंग शादी के बाद, मेरे अंतर्मन की गहरी कंदराओं में सिमट गया।  एक खूबसूरत अहसास जो आज भी उतना ही सुगंधित है जितना पहले प्रेम का बीज अंकुरित होने पर था। उतना ही मुलायम है, जितना पहले स्पर्श में था। आत्मीय संबंध हमेशा गहरे होते हैं।

आज भी समुंद्र के किनारे बैठकर पलकें पसारे बैठी हूं, तुम्हारे इंतज़ार में। एक बार दोबारा जीना चाहती हूं, रंगों मे में डूब जाना चाहती हूं। यहां बैठी, इन हवाओं से तुम्हारा पता पूछती रहती हूं, उन लहरों को पकड़ने की कोशिश में रहती हूं, जिन लहरों पर तुम्हारा नाम अपने नाम के साथ लिख दिया था। आसमान में उठती घटाओं में तुम्हारे अक्स को तलाशती हूं, शायद मेरे प्रेम का बादल तुम से मिलकर आया हो। पॉम के लहराते, उन दोनों वृक्षों को भी मिलकर आई हूं , जहां तुमने प्रेम के दस्खत किए थे। यहां बहुत सारी सीपियां चुनकर रखी हैं, उस सीपी को टटोलने के लिए जिस पर तुमने हमारा नाम उकेर कर समुंद्र में डाल दिया था, ये कहते हुए कि, ” हमारा प्रेम भी समुंद्र जितना गहरा है, इसे छुपा देते हैं…एक दिन ये सीपी जब किनारे पर आएगी, उस दिन हम दुबारा मिलेंगे।” आज, मैं समुंद्र किनारे, उसी सीपी को तलाश रही हूं। बालू पर एक घरौंदा भी बना लिया है, ठीक उसी जगह, जहां हम दोनों ने मिलकर बनाया था। तुम्हारा चित्र अपने चित्र के साथ उकेर दिया है। देखो, इस चित्र में हम दोनों वृद्धावस्था में पहुंच चुके हैं, लेकिन हृदय अभी भी युवा है, जहां हमारे दिलों की तरंगें फिर मिलने को आतुर हैं। मुझे विश्वास है, जब मैं सीपी को ढूंढने में कामयाब हो जाऊंगी, उसी समय तुम यहां पहुंच जाओगे। तब तक मेरी प्रतिक्षा की घड़ियां टिक टिक करती रहेंगीं।
©® ✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०२/०७/२०२०

अविवाहित लड़कियां

वे बंधी होती हैं अपने सपनों से
चूड़ियों की खनक की जगह
उन्हें सुनाई देती है कोयल की कूक,
उनके स्वास में घुली होती है
फूलों की वादियों की महक,
पायल की झंकार की जगह
वो सुनती हैं
बहते झरने का संगीत,
नदियों के संगम का आहृलादित स्वर
भरता है उनकी रगों में जोश,
पहाड़ों की ऊंचाई से सीखती हैं
वे सीना तान कर खड़ा रहना,
मस्तक पर बिंदी की जगह
उन्हें लुभाता है
आत्मसम्मान का वृहद टीका,
मंगलसूत्र की जगह
वे पहनती हैं
उपलब्धियों की माला,
लक्ष्मण रेखा के परे
वो देखती हैं विस्तृत गगन,
बाज़ सम नापती हैं नभ
बादलों से ऊपर उड़कर
आंकती हैं हुनर की क्षमता,
वे बेफिक्री से लगी रहती हैं
सपनों को हकीकत में बदलने में
समाज में उठाए गए सवालों को
कर दरकिनार,
बढ़ती हैं मंजिल की ओर
अविवाहित रहने वाली लड़कियां
इसलिए अविवाहित नहीं रहती कि,
उन्हें कोई पसंद नहीं करता,
वे शादी करेंगी
उन पुरुषों से, जिन्हें वे पसंद करेंगी
ऐसे पुरुष
जो सही मायने में उनकी उड़ान में संग संग उड़े।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २९/०६/२०२०

सृष्टि चक्र#मां

मांए
कसकर बांध देती हैं
सारी तकलीफें चोटी में,
और
हर सुबह लग जाती हैं
बच्चों के सपने पूरे करने,
रोटी बेलते वक्त
आकार देती हैं, उनकी
छोटी-छोटी खुशियों को,
गर्म दूध में बोर्नविटा के साथ
घोल देती हैं अपने स्नेह की उर्जा
पति के लिए,
चाय खौलते वक्त
खौल देती हैं पिछली रात की कहासुनी ,
सभी के लिए टिफिन लगाते वक्त
छुपा देती हैं
पौष्टिक आहार के साथ दुआएं,
घर लौटने पर,
उतारती हैं सबकी नज़र
मांए
कभी थकती नहीं हैं,
लेकिन वो थकती हैं
जब उनसे कहा जाता है
“घर में सारा दिन तुम करती ही क्या हो?”
वे थकती हैं
जब, बच्चे बड़े  होने पर कहने लगें
“आप चुप रहो, हमें मालूम है सही ग़लत “
मां को थकने मत दो,
मां थक गई तो सृष्टि चक्र रुक जाएगा
जो निर्मित हुआ है वह ढ़ह जाएगा
ढ़हने से बचना है तो
मां का सम्मान करो,
उसे थकने मत दो।
©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१६/०६/२०२०

मछली

रीति रिवाजों
के धागों में उलझी
स्त्री
वैसे ही होती है
जैसे, जाल में फंसी मछली
संस्कारों की तपती भट्टी में
तपाकर
परोस दी जाती है
एक अजनबी शख्स की थाली में
जैसे
परोस दी जाती है
कड़ाही में तली मछली,
फिर वह उसे
छुरी कांटे से खाए,
या साबुत निगल जाए
सवाल कौन करेगा?
जब
सवाल नहीं किए जाते,
तब
मर जाती है एक स्त्री,
जीवित होता है बस,एक मांस का लोथड़ा
पिंजरे में कैद रुह
छटपटाती है,
यंत्रणागृह से ताकती है
विस्तृत आसमान,
लेकिन
मुक्ती भी तो देह छूटने पर ही मिलती है।

©®डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०३/०६/२०२०

अखंड ज्योत

अधूरे प्रेम
के, अधूरे अफ़सानों
में,
कलम
की
सीढ़ियां चढ़,
उतर
आते हैं प्रेमी,
कविता,
कहानी के किस्सों में,
रुठे
जज़्बातों के
तिल -तिल
सुलगते हिस्सों में।

अखंड ज्योत सा, जलता रहता है अधूरा प्रेम, ताउम्र।

©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१८/०५/२०२०

उत्तरदायित्व।

तेरे मेरे बीच

एक गहरी खाई पनप चुकी है,

मैं जिस छोर पर खड़ी हूं

वहां, पहुंचने से पहले

तुम्हें

मेरी ,हर काली रात का ,उत्तरदायित्व लेना होगा।

मेरे सपनों को मसलकर

ये तुमने , जो ख्याति प्राप्त की है,

सदियां गवाह हैं,

मेरे वजूद को, असंख्य जंजीरों में जकड़

त्याग, समर्पण व करुणा की देवी जैसे

पाशों में लपेट,

मेरी ज्ञानचक्षु की पुतली में आग लगा

मेरे अस्तित्व, पर हमला कर,

अंहकार में चूर,

तुम , रावण सम, अट्टाहास करते रहे,

इस बात से, बेखबर

कि

अग्नि की तपिश को सहते हुए

मैं, तुम्हारी

लंका में विचरण करती रही

और,

हौंसलौं के दम पर, तुम्हारे बनाए ऊसलों को,

खाक करने पर रही आमादा।

कुछ, समय दिया था तुम्हें

कि, भूल सुधार करोगे

लेकिन

तुम्हें, स्वनिर्मित अभेद्य सुरक्षा कवच पर, था

अति अंहकार,

यही , तुम्हारी

पराजय का कारण बना

इस बार,

मर्यादा पुरुषोत्तम राम नहीं,

बल्कि

स्वंय माता सीता की अनुजा ने

तुम्हरा संहार किया है

और

स्व के अस्तित्व को

एक नयी पहचान दी है।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २६/०४/२०२०

उसका वेलेंटाइन

जिंदगी की तपती, सुलगती रेत पर वह चलती जा रही थी।
उसके पांव के छाले, जीवन की असीम कठिनाईयों और संघर्ष की पीड़ा की ओर इशारा कर रहे थे। आंखों के काले घेरे उसके बैचेन मन की कंदराओं में टूटे सपने को रेखांकित कर रहे थे। वह आज फिर  प्रेम की पचासवीं वर्षगांठ पर उस रेत के टीले पर बैठी थी, जहां वर्षों पहले गांव के ठाकुर की कुदृष्टि, “उस हसीन जोड़े” पर कुपित हुई थी और अपने कारिंदों से उन्हें अगवा कर लिया गया था। युवक को तो दिन दहाड़े सबके सामने पेड़ पर फांसी से लटका दिया गया था।  गांव में किसी की हिम्मत नहीं थी इस जघन्य कृत्य को ललकारे। मृगनयनी को ठकुराइन की देखरेख में  नज़रबंद कर लिया था ताकि वह पुलिस को सूचना देने की हिमाकत ना करें। चूंकि ये जोड़ा परदेशी था तो गांव वालों को भी इस हत्या से कुछ लेना-देना नहीं था।
मृगनयनी के हुस्न पर ठाकुर की कुचेष्टा रहती थी लेकिन ठकुराइन की भी कड़ी नजर ठाकुर पर रहती थी। मृगनयनी को उस वक्त दो माह का गर्भ था। इसलिए ठकुराइन ने उसे अपनी  देखरेख में रखा था। मृगनयनी ठकुराइन की विशाल हृदयता की मुरीद हो गई थी और उसकी सेवा सुश्रुषा में उसके दिन बीतने लगे। समय बीता और मृगनयनी को एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई…।

मृगनयनी का समय अब बच्चे की देखभाल में व्यतीत होने लगा और पति बिछोह की पीड़ा बेटे की किलकारियों से कुछ कम होने लगी। दर्द को थोड़ा कम करने में बच्चे की मीठी मुस्कान मददगार साबित होने लगी…अंश अब दो साल का हो गया था और अपनी तोतली आवाज़ में सबका मन मोह लेता था। एक दिन मृगनयनी ने ठकुराइन से विनम्र निवेदन किया कि वह अब शहर लौट जाना चाहती है… उसे डर है कि ठाकुर की कुचेष्टा उसे कभी अपना शिकार बना सकती है।  ठकुराइन  भी अब मृगनयनी की जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहती थी। उसे भी यह लगने लगा था कि वह अब तक मृगनयनी का सुरक्षा कवच बनी रहेगी। ठकुराइन ने अच्छे मानस का परिचय देते हुए, मृगनयनी को   उसके सेवा भाव से खुश होकर कुछ रुपए  दिए और अपनी प्रियतम सहेली के नाम चिठ्ठी देकर , एक विश्वास पात्र दासी के  साथ  शहर भेज दिया। ठकुराइन की ये सहेली एक विद्यालय की प्रिंसिपल थी। इस तरह से मृगनयनी को वहां चपरासी का काम भी मिल गया और रहने के लिए एक कमरा, प्रिंसीपल साहिबा की कोठी  के बेकयार्ड में। मृगनयनी स्वाभिमानी महिला थी और वह प्रिंसीपल के घर का कामकाज कर, गुजर-बसर करने लगी। अंश की पढ़ाई का जिम्मा प्रिंसीपल महोदया ने ले लिया था। अंश शुरू से ही बहुत होशियार था…।

ठकुराइन राजरानी ने मृगनयनी को शहर भेजने के लिए उपयुक्त समय चुना। उन दिनों  ठाकुर ज़ोरावर सिंह एक सप्ताह के लिए जंगलों में शिकार पर गया हुआ था।  लौटने पर, मृगनयनी को हवेली में ना पाकर, ठाकुर ज़ोरावर सिंह ने ठकुराइन  से पूछताछ की। पचास साल की प्रौढा़ ठकुराइन जानती थी कि ठाकुर क्यों आसमान सिर पर उठाए है। वह ठाकुर की कुचेष्टा से वाकिफ थी।  उसके साथ रहते हुए वह गांव और इलाके की भोलीऔर गरीब प्रजा पर अनेकों प्रकार के जुल्म होते देख चुकी थी। आज उसकी आत्मा ने उसे झकझोर दिया और ठकुराइन राजरानी ने ठाकुर को अंजाम भुगतने की चेतावनी दे डाली। हमेशा से चुप रहने वाली ठकुराइन की बुलंद आवाज़ से ज़ोरावर सिंह सहम गया था। वह जानता था कि यदि ठकुराइन अपनी जिद्द पर आ गई तो उसे सलाखों के पीछे भिजवा देगी। ज़ोरावर सिंह की जवानी तो रंगीन मिज़ाज में बीती थी, अब वह बुढ़ापे की दहलीज पर कदम रख चुका था। इसलिए पुलिस और मुकदमों के चक्कर से बचना चाहता था। रात के अंधेरे में जब मृगनयनी के पति मणिरत्नम को गांव की मर्यादा भंग के जुर्म में पेड़ पर लटका कर सजा ए मौत  दी गई थी तब, ठकुराइन हवेली की गुप्त खिड़की से सब देख चुकी थी…।

मृगनयनी का मणिरत्नम के सिवाय इस दुनिया में कोई नहीं था। मणिरत्नम से उसकी मुलाकात एक मेले में हुई थी। मणिरत्नम मंत्रमुग्ध हो उस वक्त मृगनयनी की रस्सी पर चलने की कला को देख रहा था… तमाशा खत्म होने के बाद मणिरत्नम की सीटी की आवाज़ से मृगनयनी का ध्यान उस तरफ गया। नज़रें एक दूसरे में समा चुकी थी। नटों के मुखिया से इजाजत ले मृगनयनी, मणिरत्नम के साथ मेला घूमने लगी और फिर कभी डेरे में लौट कर नहीं गई। दो साल तक युवा जोड़ा एक अंजान शहर में, जिंदगी की छोटी-छोटी खुशियों में जीवन का आनंद लेता रहा । एक दिन मृगनयनी ने   मणिरत्नम के साथ  रेगिस्तान में,  रेत के टीले देखने की योजना बनाई। उस साल वहां ऊंटों का उत्सव भी होना था। शहर से कमाई कुछ पूंजी जमा थी और मणिरत्नम अपनी पत्नी/ प्रेयसी को रेगिस्तान के रेतीले टीलों की सुंदरता और भव्य सूर्यास्त का नजारा दिखाने के लिए जैसलमेर पहुंच गया।  वहां उन्होंने देखा कि बहुत से विदेशी सैलानी भी टीलों पर बने तम्बूओं में  राजस्थान प्रवास का पूरा आनंद ले रहे थे।
उसी दिन वहां से ठाकुर ज़ोरावर सिंह, बग्घी में सवारी करते हुए निकल रहा था। युवा जोड़ा सूर्यास्त के नज़ारे को अपनी आंखों में कैद करने में लीन था। ठाकुर की बग्घी की ओर उनका ध्यान नहीं गया।  वैसे भी वो ठहरे परदेशी, उन्हें वहां की परम्परा का भान भी नहीं था। लेकिन ठाकुर ने इसे अपना अपमान समझा और पीछे  उसकी सुरक्षा में घोड़े पर सवार  लठैतों को, युवा जोड़े को उठाने का निर्देश दिया…  मणिरत्नम को  ठाकुर ज़ोरावर सिंह के अहम की वजह से अंजाम भुगतना पड़ा और  मृगनयनी को जीवनसाथी की मृत्यु का आघात।

घटनाक्रम को बीते सालों गुज़र गए  लेकिन मृगनयनी आज भी इन्हीं रेत के टीलों में अपने प्रेमी की खुशबू तलाशने आती है। अंश पढ़-लिख बड़ा अफसर बन चुका है और बेटा ही मृगनयनी को गाड़ी में लेकर आता है… शायद वह भी पिता का आशीर्वाद प्राप्त करने आता है और ममता का कर्ज चुकाने का प्रयास भर करता है।
©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१४/०२/२०२०

रुह के परिंदे

रुह के परिंदे हर रोज़ उड़ान भर कर उन पगडंडियों के वृहद वृक्षों पर बैठकर तुम्हारा इंतजार करते हैं जहां इश्क़ की पहली नज्म गुनगुनाई थी तुमने… याद है मुझे, मेरे शांत हृदय सागर में तब उठी थी प्रेम लहरें…फासले तय कर, आंखों में सिमट गया था तुम्हरा और मेरा वजूद। धड़कते दिलों के महासागर में कसमें वादे कश्तीयां बन, तूफानी रफ्तार से दमघोंटू बेड़ियों को काटने को आतुर थे।
ख्वाबों की जमीन पर कदमताल करते हुए हम दोनों ने एक हकीकत की दुनिया बनानी चाही…समय पंख लगाकर उड़ रहा था और हमारे सपने भी जवां हो रहे थे। सब कुछ कितना हंसी था… तुम्हारी मोहब्बत ने मुझे जिस एहसास से छुआ था उसकी खूबसूरती और गहराई इतनी थी कि मेरे रोम रोम से प्रेम का सोता फूटा था… हृदय के बगीचे में रसिक भंवरा गुंजन कर ,मधु चखता हुआ मन की कलियों पर मंडरा कर मेरी नींद भी चुरा ले गया था… इश्क़ में फ़ना हम दोनों ने प्रेम को शब्दों से नहीं नवाजा था लेकिन हम दोनों ही जानते थे कि हमें जिंदगी साथ गुजारनी है और मूक स्वीकृति हम एक दूसरे को दे चुके थे… लेकिन विधाता का लिखा आजतक कोई मिटा नहीं पाया… हमारी राहें जुदा हुई चूंकि संस्कार से बंधे थे हम। मां बाप की खुशी के लिए सामाजिक मूल्यों के हवनकुंड में निश्छल प्रेम की आहुति दे कर्त्तव्य पथ पर अग्रसर हो एक दूजे के लिए गुम हो गये थे.. यही तो कसम थी तुम्हारी…। जिंदगी अपनी रफ़्तार से चलती रहती है और हमें भी उसके साथ कदम मिलाना होता है नहीं तो बहुत कुछ पीछे छूट जाता है और फिर चाहकर भी हम उसे हासिल नहीं कर सकते।
गृहस्थ आश्रम में अपने फ़र्ज़ के प्रति सजग हम दोनों ही तो समाज द्वारा निर्धारित मापदंड तय करते हुए बुढ़ापे की दहलीज पर पहुंच गए हैं.. जुदा हुए तो बहुत कुछ बदला था। नई दुनिया, नए दोस्त,नए नाते रिश्तेदार… बस जो कुछ नहीं बदला था तो वो था मोहब्बत का एहसास… ये तो वह अनमोल निधि थी जिसे कोई चुरा ही नहीं सकता था , ठीक उसी तरह जैसे कोई शिक्षा दीक्षा को नहीं चुरा सकता… सब कुछ समाप्त भी हो जाए तो भी शिक्षा रुपी धन हमें दुबारा सक्षम बना सकता है… यही धन हमारे माता-पिता ने दिया था… ये वह दौर था जब 1970 के दशक में गांव में लड़कियों की शिक्षा दीक्षा ना के बराबर थी। तुम भी तो किसान पुत्र थे और सभी भाईयों में छोटे होने के नाते ही तुम्हें शिक्षा का अवसर मिला था। तुम्हारे दो भाई तो खेती ही करते थे…ना तुम अपने बापू के सामने हमारे प्रेम की बात कह सके और ना ही मैं। लड़की होने के नाते कहने की सोच भी नहीं सकती थी… लेकिन जीवन के छः दशकों का निष्कर्ष यही कहता है कि जहां रुहानी रिश्ते होते हैं वे बने रहते हैं… ऐसे रिश्तों पर फरिश्तों का पहला रहता है इसलिए तो मन तरंगों के माध्यम से तुम्हारे संदेश मुझे मिलते रहते हैं और मेरा प्रेम यूं ही जवां रहता है। मुझे कभी लगा ही नहीं तुम मुझसे दूर हो…जब कभी भी दुविधा में पाया तब मैं खुद से ही सवाल करती थी कि फलां स्थिति में तुम्हारी क्या राय होती… ऐसा नहीं है कि तुम्हारी बांहों के आगोश में आने को मन नहीं मचलता था… शरीर एक माध्यम है पूर्ण रूप से प्रेम को महसूस करने के लिए… लेकिन only one नहीं है… एहसास , एक अहम किरदार निभाता है प्रेम प्राप्ति में। इसी एहसास को महसूस कर, जब सब निंद्रा का आंनद ले रहे होते हैं, तब मेरे कमरे में सिर्फ मैं और तुम होते हो… मेरे एहसास , कभी कविता तो कभी कहानी बनकर कलम से कागज़ पर हमारे इश्क़ की इबादत करते हैं और मेरी रुह के परिंदे तुम्हारे हृदय के आकाश पर पंख फैला कर ऊंची उड़ान भरते हैं…तब मुझे तृप्ति का अहसास होता है।
✍️©® डा. सन्तोष चाहार ” ज़ोया” 06/12/2019

एहसास

तुम्हें,
एहसास नहीं,
तुम्हारे द्वारा फेंकें गए
एक एक पत्थर को चुन चुन कर,
यथार्थ की धरती पर,
टूटे सपनों को
उसने
हकीकत में बदला।
तुमने
सोचा था, कि
पाषाण हृदय से टकरा कर
वह
चूर चूर हो जाएगी।
वक्त
बना गवाह,
कुरीतियों के
पत्थर तोड़कर
सदियों से अंतस में दफ़न
हौंसले का बीज
पनपकर
विशाल वृक्ष बना।
उसकी,
शाखाओं पर
नारी शक्ति के हरे पत्ते
नित नये फूट कर
करते रहे
दमघोंटू वातावरण में,
नयी ऊर्जा
नये पैमाने
नयी सोच की,
ऑक्सीजन का
उत्सृजन।
ये हरे पत्ते
सोखते रहे
परंपरा
की, जहरीली
कॉर्बन डाई ऑक्साइड
व निर्मित करते
वृहदाकार शीतल छांव।
इस
छांव तले,
बेटीयां,
जिंदगी के पन्नों पर,
करती
स्वाभिमान के हस्ताक्षर।
वे, जो
राहें चुनती,

हासिल करती,
होती
उनके सुमुख,
पितृसत्ता भी नतमस्तक।
तुम्हें
एहसास हो या ना हो
मंजिल की ओर
बढ़े
नारी के ये कदम
मुकाम
हासिल कर
विलक्षण क्षमता का
देती रहेंगी यूं ही परिचय।
✍️©® डा.सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०६/१०/२०१९