Category Archives: Daughter Love

मोहब्बतें

रविवार का दिन था। रमा, अपनी बहन से मिलने दिल्ली (द्वारीका)उसके घर पहुंची ही थी कि उसने दरवाजे पर ही सुनाई पड़ा कि उसकी बहन दीपा, बेटी ईवा पर जोर जोर से चिल्ला रही थी। दरवाजा चूंकि खुला था तो वह अंदर चली गई । अंदर जाकर देखा तो ईवा की नानी व मामाजी भी आए हुए थे। वे ईवा के रिश्ते के सिलसिले में ही उदयपुर से पहुंचे थे। सबके चेहरों पर हवाईयां उड़ रही थी। दीपा को समझ नहीं आया कि ईवा से ऐसी क्या गलती हुई है। रमा, मां व भाई के साथ बैठे ईवा के पापा को नमस्ते कर वहीं बैठ गई। नानी उठकर, दूसरे कमरे में चली गई, ईवा के पास। रमा ने ईवा के पापा सोमबीर से पूछा, “कि, क्या बात है?” रमा को डर था कहीं भड़क ना जाएं। सोमबीर ने कहा ” ये लड़की, दूसरी जाति के लड़के से शादी करना चाहती है और ऐसा मैं हरगिज़ नहीं होने दूंगा”। रमा आधुनिक ख्यालात की सुलझी हुई महिला थी। उसने सोमबीर से कहा, ” क्या हो गया? दूसरी जाति के लोग क्या इंसान नहीं होते?” सोमबीर के तेवर अब और तीखे हो गए। उनको वैसे भी रमा की आजाद ख्याली पंसद नहीं थी और उन्हें संशय रहता था कि कहीं ,रमा उनकी बेटियों को बहका ना दे। शंकालु प्रवृत्ति के इंसान तो थे ही शुरू से। रमा की भी उनसे बनती नहीं थी। सोमबीर ने कहा, ” गांव के सरपंच की पोती है, ईवा। चौधरी परिवार की आन बान है। यदि इसने जिद की तो मैं, इसकी बोटी बोटी काट दूंगा”। रमा को बहुत अचम्भा हुआ ये सब सुनकर। वैसे भी खाप पंचायतों के फरमान आए दिन अखबारों में पढ़ती रहती थी। घर का माहोल तनाव पूर्ण हो चुका था। ईवा के मामाजी ने सोमबीर और बहन दीपा को समझाने की काफी कोशिश की, लेकिन दोनों टस से मस नहीं हुए। ईवा, बहुत ही सुंदर, शिक्षित इंजीनियर लड़की, घर और रिश्तेदारी में सबसे बड़ी थी। इतने सालों में पहली बार उसने अपनी कोई इच्छा रखी थी। ईवा, संवेदनशील भी बहुत थी और मां बाप की हर बात को शिरोधार्य करती आई थी अबतक। अभी भी बड़ी शालीनता से अपनी बात रखी थी।

सन् 2002 का भारत था, जब लड़कियों की शिक्षा दिक्षा बढ़चढ़ कर हो रही थी। लेकिन गांव/शहर के समाज की सोच में परिवर्तन बहुत ही धीमी गति से हो रहा था। खूब शोर शराबा हुआ उस दिन। ईवा, रमा मौसी को बहुत मानती थी। दोनों ने रातभर बातचीत की क्योंकि इस वक्त उसे ऐसे सबंल की जरूरत थी जो उसकी भावनाओं को समझ सके। रमा को ईवा से पता लगा कि, प्रशांत, इंजीनियरिंग कॉलेज में उसके सीनियर थे और अब विदेश में जॉब कर रहे हैं। ईवा ने बताया कि वे पिछले पांच सालों से संपर्क में हैं। रमा ने उसको नैतिक समर्थन दिया और समझा दिया था, ” कि ये तुम्हारा पारिवारिक मामला है तो दखल नहीं दे सकती लेकिन तुम मजबूती से अपने ‘ इश़्क’ के लिए खड़ी रहो।” सोमबीर की बातें ईवा ने सुन ही ली थी और वह बहुत आहत हुई थी। वह कुछ निश्चय करके सो गई। रमा अगले दिन वापिस अपने घर आ गई थी और बहुत दुखी थी ईवा के लिए। पंद्रह दिन बीत गए तब रमा की छोटी बहन, शिखा का फोन आया कि , “क्या ईवा तुम्हारे पास आई है? वह गाड़ी लेकर निकली थी सुबह और शाम हो गई, घर नहीं पहुंची है। वहां सब परेशान हैं”। रमा का मन भी बहुत विचलित हो रहा था। एक घंटे बाद खबर मिली कि उसकी कार दुर्घटना हो गई है, थोड़ी चोट लगी है लेकिन वैसे ठीक है। रमा, मिलने हॉस्पिटल पंहुची तो ईवा के मां बाप भी वहीं थे। रमा को ईवा ने कहा, ” मौसी, मैं जीना नहीं चाहती थी, इसलिए गाड़ी तेज़ स्पीड़ में चला रही थी।” रमा से अब जज्ब नहीं हुआ और उसने अब सोमबीर और दीपा से लगभग चीखते हुए कहा, ” तुम्हें, बेटी से ज्यादा अपनी झूठी शान प्यारी है। आजतक इसने वही पढ़ा, जो तुम चाहते थे। कभी गलत नहीं चली। आज़, एक ऐसे जीवनसाथी के लिए तुम्हारी इजाजत मांग रही है, जहां वह दिल दिमाग से जुड़ी है। लड़का हैंडसम है, अच्छी जॉब पर है और क्या चाहिए?आज, इसे खुदा ना खास्ता कुछ हो जाता तो अपने वसूल लेकर बैठे रहना”।

सोमबीर को अब समझ में आ गया था कि लड़की अपने जीवन से खिलवाड़ कर सकती है। दीपा ने भी अपने पति को कह दिया कि, ” अब शादी वहीं होगी, जहां ईवा चाहती है”। निर्णय हो चुका था। आज एक मां अपनी बेटी के लिए पति का साथ छोड़ बेटी के साथ खड़ी थी। चार महीने बाद शुभ मुहूर्त देखकर शादी निश्चित हो गई। सोमबीर के दोस्त ने ही सारा इंतजाम किया था और उसकी पत्नी ही खरीदारी करने ईवा के साथ गई थी। सोमबीर अपने दोस्त के सामने फफ़क कर रोया था। उसने कहा था कि, ” मेरी मर्जी से शादी करती तो गहनों से लाद देता। लम्बी गाड़ी में विदा करता”। रमा को सारी बातें पता लगती रहती थी क्योंकि वह भी इस परिवार को जानती थी। समाज को दिखाने के लिए बहुत बढिया शादी की व्यवस्था की गई लेकिन नाममात्र के गहने और कपड़ें दिए गए थे। गाड़ी देने की हैसियत थी लेकिन वह भी नहीं दी, जिद अभी भी कायम थी। रमा, सोमबीर के अड़ियल रवैए से वाकिफ़ थी। ईवा ने कोई जिद नहीं की क्योंकि उसका ‘इश़्क” मुक्म्मल हो रहा था। विदेश जाने की सारी तैयारियां पहले ही हो चुकी थी। वीजा भी लग गया था। शादी के एक सप्ताह बाद ईवा अपने जीवनसाथी के साथ विदेश चली गई। दो हंसों की जोड़ी का मिलन हो चुका था।

सन् 2017 में सोमबीर और दीपा की दूसरी बेटी, मेहा, जो अमेरिका से सुपर स्पेशलिस्ट बनकर आयी थी उसने भी अंतरजातीय प्रेमविवाह ही किया है। लेकिन चूंकि वह थोड़ी प्रैक्टिकल है तो अपने मां बाप को अपने पक्ष में शुरु से ही कर लिया था। पंद्रह साल बाद दूसरी शादी हो रही थी तो अब सोमबीर भी जमाने के साथ ताल मिला रहा था। रमा, बताती है कि, ” मेहा ने डेस्टिनेशन वेडिंग पर सोमबीर का एक करोड़ रुपया खर्च करवा दिया और वे कुछ कह भी नहीं पा रहे थे”। बड़ी बेटी ईवा ने शादी के बाद कभी घर से कुछ नहीं लिया। अमेरिका में अच्छी जॉब पर है। रमा मेरे पास बैठकर कहती है कि, ” एक बाप भी बच्चों में कितना भेदभाव कर देता है। ” पैसे का पूरा नियंत्रण सोमबीर के पास रहता था तो दीपा इस मामले में दखलंदाजी नहीं कर सकती थी। ईवा आत्मकेंद्रित हो चुकी है क्योंकि उसका दिल पिता की तरफ से टूटा था। सुसराल में सास को बहुत सम्मान दिया और प्यार किया था लेकिन वहां से भी सुनने को मिला था कि, ” बहु, हो। ज्यादा बेटी बनने की कोशिश मत करो”। रमा की छोटी भानजी, मेहा, सब बता देती है रमा को, क्योंकि वह रमा की लाड़ली है। सोमबीर और दीपा की दोनों बेटियों ने मनपसंद साथी से विवाह किया और एक नयी सोच की आधारशिला रखी। सोमबीर की दोनों बेटियां अपनी गृहस्थी में सुखी व संतुष्ट हैं। सोमबीर अब अपने दामादों की भूरी भूरी प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि, “मेरी बेटियों की च्वॉइस कम थोड़े ही है’।

रमा का मानना है कि , “लड़कियां जब हर क्षेत्र में सक्षम हैं तो ,उनमें इतनी समझ भी है कि अपना जीवनसाथी चुन सकें। झूठे दम्भ की दीवारें अब गिरनी शुरू हो चुकी हैं।अभी भी लेकिन समाज का बड़ा हिस्सा है जिन्हें ये सब बेमानी लगता है। लेकिन समझने की बात ये है कि बच्चे सक्षम हैं, अच्छी जॉब करने की क्षमता रखते हैं तो क्या जीवनसाथी चुनने की उनकी समझ नहीं है?”

✍️ ©® डा. सन्तोष चाहार “जोया” २५/०३/२०१९

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निर्णय

सविता अपने पिता की सबसे लाडली बेटी थी। वह स्वभाव से भी बहुत ही विनम्र होने की वजह से अपनी सहेलियों मे भी बहुत लोकप्रिय थी। कालेज मे हमेशा अव्वल रहते हुए स्नातकोत्तर डिग्री हासिल करने के पश्चात वह एक बोर्डिंग स्कूल में शिक्षिका के पद पर चयनित हो गई। गजब की सुंदरता की धनी थी वह। एक से एक बढिय़ा रिश्ते आये उसके लिए लेकिन उसके पिताजी को पंसद नही आते थे। ये 1986 के दशक की कहानी है। विदेश मे स्थापित अच्छे लड़को के रिश्ते भी आये लेकिन सविता के पिताजी उसे अपने से दूर नहीं भेज़ना चाहते थे।

सविता की शादी फिर एक आर्मी अफसर से तय कर दी गई। सभी आश्चर्यचकित थे कि सविता जैसी सुंदर पत्नी मिली है कैप्टन राजेश को। सविता के लिए ये शादी लेकिन अभिशाप बनकर आयी थी क्योंकि सुहागरात वाले दिन से ही राजेश अलग कमरे मे सोता था। राजेश ने सविता को उस सुख से वंचित रखा जिसके लिए लड़की कितने ही हसीन ख्वाब देखती है। सविता ने शर्म की वज़ह से इस के बारे मे किसी से कुछ नही कहा।लेकिन वह एक घुटन में जिंदगी जी रही थी। वह एक ब्याही हुई भी कुवांरी रहने को अभिशप्त थी।

मायके मे किसी से कुछ नही बता पायी क्योंकि अभी उसकी छोटी बहन की शादी होनी थी और उसने सोचा कि यदि वह तलाक लेती है तो बहन की शादी नही हो पायेगी। पिता तो निश्चितं थे कि आर्मी वाले मेडिकल फिट होते हैं।…इस उहापोह की जिन्दगी में उसके तीन साल बीत गए। कभी कभी तो आत्महत्या तक के विचार आते थे। पति साथ होते हुए भी कभी संसर्ग नहीं हो पाता था क्योंकि पति काम से थक कर लौटते और एकदम बिस्तर पर आते ही खराटे लेते हुए नींद के आगोश मे चले जाते।

स्कूल की छुट्टियों में राजेश के साथ सविता आर्मी कल्ब की पार्टियों में भी जाती थी जंहा दूसरे अफसर उसे हसरत भरी निगाहों से देखते थे। सविता इन पार्टियों की जान होती थी और जिस तरह से वह महफिल को सज़ाती थी सब उसके दिवाने होते चले गए। आर्मी आफिसर उसके साथ डांस पर थिरकते थे तो राजेश मन ही मन कुठ़ा से ग्रसित रहते थे क्योंकि अपनी कमजोरी से वाकिफ थे। सविता ने इन तीन सालों में बहुत बार कहा कि सैक्सोलोजिष्ट से मिल लेते हैं। लेकिन राजेश साफ मना कर देते थे क्योंकि यह उसके अहम व पुरूषत्व पर चोट थी।परेशान होकर सविता ने पूछा कि फिर आपने मुझसे शादी ही क्यों की? कैप्टन राजेश का एक ही उत्तर था कि मां बाप की खुशी के लिए।

सविता छुट्टी खत्म होने पर अपने बोर्डिंग स्कूल में अपने निवास पर आ जाती थी। इस बीच छोटी बहन की भी शादी हो गई थी। सविता का धैर्य जवाब देता जा रहा था। उसकी बडी़ बहन दूसरे प्रदेश में नौकरी पर थी। इस शादी मे उनकी मुलाकात हुई तब सविता के सब्र का बांध टूट गया और उसने सारी बातें अपनी बड़ी बहन कविता से सांझा की।कविता हमेशा से ही समाज़ से टक्कर लेती आयी थी। उसने सब बातें अपने पिता से शेयर की । पिता अपनी बेटी के दुःख से बहुत परेशान हुए। वे कविता पर बहुत विश्वास करते थे और मानते थे कि वह कभी झूठ नही बोलेगी। संयुक्त परिवार मे कुछ सदस्यों का ये भी मानना था कि हो सकता है दोनों बहनें कोई और योजना बना रही हों। परिवार के दूसरे बुजुर्गों से सलाह मशवरा किया गया। बड़े ताऊ व पिताजी ने तो तुरंत निर्णय किया कि बेटी को और परेशान नहीं देख सकते।
पंचायत लेकर वे राजेश के घर वालों से मिले। उन दिनों राजेश भी छुट्टी आया हुआ था। उसके माता पिता ये मानने को तैयार ही नहीं थे कि उनके बेटे में कमी है। राजेश भी मां बाप के सामने चुप रहा और राजेश की बहने सविता की ही कमीयां गिनवाने लग गई। कितना आसान होता है बहू को दोषी ठहराना, जबकि राजेश के परिवार वाले जानते थे कि सुहागरात वाले दिन भी राजेश दोस्तों के साथ समय बीता कर भोर के समय लौटा था। और उसकी दुल्हन इंतजार करके आंसू पीकर सो गई थी। लेकिन समाज़ पुरूष प्रधान है और बहुत सी महिलाएं भी जाने अनजाने पित्तरात्मक सता की वाहक बन जाती हैं क्योंकि उन्हें बचपन से ही इस तरह के संस्कारों की घुट्टी पिलाई जाती है।

लेकिन सविता के घर वालों ने तलाक की अर्जी लगा दी थी। कोर्ट में जिस तरह से राजेश के वकील बहस कर रहे थे तो ऐसा लग रहा था जैसे भरी सभा में सविता का चीरहरण हो रहा हो। लेकिन सविता घबराई नहीं और अपने निर्णय पर अडिग रही। राजेश और सविता को छह महीने का समय दिया गया तालमेल बिठाने के लिए। लेकिन यहां तो कभी ताल ही नही मिली थी तो मेल कैसे होता।

छ महीने पश्चात आखिर दोनों को मयूचवल तलाक की इजाज़त मिल गई। सविता ने राहत की सांस ली । उसे ये महसूस हो रहा था जैसे कैद से रिहा हुई हो। अब उसका लक्ष्य था अपने कर्मक्षेत्र में नाम कमाने का। वह बहुत लगन से बोर्डिंग स्कूल मे पढ रहे छात्रों के साथ मेहनत करती रही। पिताजी ने दूसरी शादी के लिए उससे राय ली क्योंकि वह अपनी सबसे लाड़ली बेटी के दुख से टूट चुके थे। उन्होंने ने उस ज़माने में तलाक दिलवाया जब समाज़ तलाकशुदा लड़की को स्वीकार नहीं करता था।

लेकिन अहम बात ये थी सविता शिक्षित होने की वज़ह से आत्मनिर्भर थी और उसने अपने जीवन को शिक्षा के प्रति समर्पित कर दिया। माता पिता की सेवा करके उनके आशीर्वाद की हकदार बनी रही और जीवन के नये आयाम गढे़। आज़ सविता के द्ववारा पढाये हुए बच्चे देश विदेश में नाम कमा रहे हैं। वे हमेशा सविता के संम्पर्क में रहते हैं और आभार प्रकट करते हैं कि उनके जीवन का सही मार्गदर्शन किया। इस तरह सविता का परिवार बहुत बडा़ है जहाँ प्रेम की जलधारा निरन्तर बहती रहती है। एक शिक्षक के लिए इससे बड़ी क्या उपलब्धि हो सकती हे।

✍️©® “जोया” 20/09/2018)

आत्मसम्मान

कृष्ण जन्माष्टमी के अगले दिन ही मेरी सुसराल में गोगा पीर का मेला भरता है और आसपास के गांव से भी अनगिनत लोग इस मेले में धोक लगाने और पीर पर चादर चढा़ने आते हैं।इस बार मैं भी गई थी शहर से इस मेले मे शरीक होने के लिए। पूजा अर्चना के बाद मैं मेले मे अपनी अपनी फड़ी लगाए सामान बेचने वालों के बीच पहुंच गई। वहां पर मेरी नज़र रंग बिरंगी चूडियां लिए एक औरत पर पड़ी जो जमीन पर बैठकर चूडियां बेचने के लिए लोगों को बुला रही थी। यद्धपि मैं चूडिय़ां केवल त्योहार पर ही पहनती हूं लेकिन ये रंग बिरंगी चूडियां मुझे बहुत आकर्षित करती हैं।

अभी चूंकि बहुत खरीदार वहां नहीं थे तो मैंने उस चूड़ी बेचने वाली औरत से बातचीत शुरू कर दी। बातों ही बातों में मुझे पता लगा कि उसकी शादी कम उम्र ही हो गई थी।और कि उसकी दो लड़कियां हैं जो स्कूल जाती हैं।उसका पति शराब पीने का आदी थे और इसी आदत की वजह से उसका लीवर खराब हो गया था। घर मे जो जमा पूंजी थी वह भी इलाज पर खर्च हो गई और अंत मे वही अंजाम हुआ जो नशेडियों का होता है। उसका पति बीच मझधार में उसे छोड़ कर चल बसा।

अब दोनों बेटियों की जिम्मेदारी इस महिला पर आन पडी़। आजकल रिश्ते नातेदार कौन किसका बोझ उठाता है। सुसराल में पांच बीघा जम़ीन थी लेकिन अब उसके देवर ने कब्जा कर रखा था। भतेरी पढी़ लिखी नहीं थी इसलिए वह कुछ कर नही पायी। फिर उसने बताया कि कैसे उसने चूडिय़ां गांव गांव बेचकर अपनी जीविका कमानी शुरू कि और बेटियों को स्कूल में भेज़ना शुरु किया। मैने कहा
“तुम बेटियों को क्यों पढा़ना चाहती हो?”

” मैं चहाती हूं कि मेरी बेटी पढ़ लिखकर आपकी तरह अफसर बने”

मैंने उसकी लग़न देखते हुए कहा कि चलो
“तुम्हारी बेटी का पढ़ाई का खर्च मैं उठाती हूं”
उसने तुरंत कहा ः
“डा. साहब आपका बहुत बहुत धन्यवाद। लेकिन मैं अपनी बेटियों को अपनी मेहनत की कमाई से ही पढ़ाऊंगी, ताकि मेरी बेटियों को धन, समय और मेहनत की कीमत पता चले।
मैंने बात को आगे बढा़ते हुए कहा कि
“तुमने चूडिय़ां बेचने का फैसला ही क्यों लिया?”
भतेरी ने मुस्कुराते हुए कहा..
“मैं चाहती हूं कि ये रंग बिरंगी चूडिय़ां हर युवती, महिला और प्रौढ़ा के जीवन में हमेशा रंग भरती रहें और उनका सुहाग बना रहे।

मैं उस सादाहरण लिबास में बेठी उस महिला की समझ और आशावादी दृष्टिकोण की कायल हो गई। ये शब्द मैं एक ऐसी महिला से सुन रही थी जो स्वंय विधवा का दंश झेल रही थी। जहां बहुत सारी महिलाएं तो अपना दुखड़ा ही रोती रहती हैं , यहाँ मैं एक ऐसी महिला से रूबरू थी जो सबके लिए मंगल कामना करती हुई हंस कर जिन्दगी का सामना कर रही थी।

उस दिन मैंने अपने लिए भी कई दर्जन चूडिय़ां खरीदी क्योंकि इन चूडियों मे इस महिला की दुआएँ छिपी थी। उसको मैं अपना पता देकर आयी थी कभी जरूरत पड़े तो मुझ से संमपर्क कर लेना।….

समय बीतता गया और मैं भी बेटे के साथ विदेश जा बसी थी। बेटे के विवाह के बाद आज़ में फिर गोगा पीर पर धोक लगाने आयी थी। मेले में मेरी निगाहें भतेरी को ही ढूंढ रही थी। फिर मेरी नज़र उस पर पडी़। वह दो महिला पुलिसकर्मीयों से बातें कर रही थी। बेटे बहू के साथ मैं उसके पास गई। उसने भी मुझे तुरन्त पहचान लिया और कुशलक्षेम पूछी। फिर उसने उन महिला पुलिसकर्मीयों को इशारा करके अभिवादन के लिए कहा। वह मेरी जिज्ञासा समझ चुकी थी। उसने कहा..
” ये मेरी दोनों बेटियां हैं जो पढ़ लिखकर अब महिला सुरक्षा का दायित्व सम्भाल रही हैं”

मैंने उन्हें गले से लगाते हुए सुखी जीवन का आशीर्वाद दिया।
भतेरी के त्याग, समझ और जिजीविषा की उस दिन मुरीद हो गई थी। उसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया था कि कठिनाई हमारे रास्ते में बाधा नहीं बन सकती और औरत यदि चाहे तो अपनी कहानी खुद लिख सकती है। और एक स्वस्थ समाज़ के निर्माण में अहम भूमिका निभा सकती है। शुरुआत कितनी भी छोटी हो, सपने छोटे नहीं होने चाहिएं।

✍️©®”जोया” 02/10/2018

चुप हुई शहनाई

मधु और रोहित एक मध्यम वर्गीय परिवार से आते थे। उन्होंने शहर में अपना छोटा सा घर बना लिया था। मधु बहुत ही सुघड़ गृहिणी थी और पति की आय से सलीके से गृहलक्ष्मी की भूमिका निभा रही थी। मधु ने बेटी के जन्म से ही उसकी शादी के लिए पैसे जमा करने शुरु कर दिये थे ताकि विवाह के समय किसी तरह की परेशानी ना आए। दोनों पति पत्नी ने निर्णय लिया था कि एक ही संतान की अच्छे से परवरिश करेंगे इसलिए उन्होंने दूसरी संतान के बारे में सोचा भी नहीं। इस तरहं से बेटी नूर पर ही पूरा ध्यान केंद्रित था। बढ़िया से बढ़िया पब्लिक स्कूल में उसे पढ़ाया और स्नातक डिग्री हासिल करने के लिए देश की राजधानी के सबसे अच्छे कालेज़ में प्रवेश दिलवा दिया। नूर भी बहुत परिश्रमी लड़की थी और पढ़ाई के अलावा हर गतिविधि में हिस्सा लेती थी। एम. बी. ए. का कोर्स करने के लिए मधु ने उसे इंग्लैंड भेज़ दिया था। नूर देश वापिस लौट कर अच्छी कम्पनी में मैनेजर के पद पर आसीन हो गई।

हर माता पिता का सपना होता है अपनी औलाद को समय पर शादी के बंधन में बांधकर कर अपने कर्तव्य से मुक्त होने का। मधु ने तो इन वर्षों में एक से एक सुंदर गहने बनवा कर रख लिए थे अपनी प्यारी बिटिया के लिए और जहां भी घूमने जाती थी उस राज्य की अद्भुत कला कृतियां और साड़ियां लेकर आती ताकि अच्छा सा संग्रह बन जाए और जब बेटी की शादी हो तो उसके फ्लैट को सज़ा दिया जाए। मधु सोचती थी सुंदर साड़ियां बेटी विवाह के पश्चात पार्टियों में पहन लेगी क्योंकि बेटी को त्योहार आदि पर पारंपरिक वेशभूषा पहनने का चाव रहता था। नूर की नौकरी लगते ही रिश्ते भी अच्छे आने लगे। जब नूर से बात की गई तो उसने कहा अभी दो साल तक वह शादी नहीं करना चाहती। मधु फिर दो साल शांत बैठ गई और अपने तरीके से नूर के लिए एक से बढिय़ा गहना बनवाती रही।उसे सोने में निवेश करना अच्छा लगता था क्योंकि उसका मानना था कि ये गहने औरत की मल्कियत होते हैं और आड़े समय में काम भी आते हैं। समय बीता और दो साल बाद फिर बेटी नूर से विवाह को लेकर बातचीत की। नूर ने कहा ” मैं अपनी पंसद से शादी करूंगी”। मधु तो खुश थी कि ये शादी हो जाए लेकिन दादा और पिता इस रिश्ते से नाखुश थे। उनकी बेटी का पद ऊंचा था और लड़का, रमन,भी उन्हें ज्यादा जचा नहीं क्योंकि वह माडिलंग क्षेत्र में अभी हाथपांव मार रहा था। फिर भी बेटी की जिद्द के आगे सबने घुटने टेक दिए। मधु तो शादी की शहनाई सुनने को बेताब थी, इसलिए उसने शादी की तैयारियां शुरु कर दी। अभी शादी में पन्द्रह दिन शेष थे कि नूर ने कहा” मैं अब कोई शादी नहीं कर रही हूं”। परिवार वाले सभी सदमे में थे कि ये क्या हुआ। कार्ड भी बंट चुके हैं सारी बुकिंग हो चुकी हैं।

मधु ने अपनी बेटी से मिलने पूना गई और प्यार से पूछा” बेटा क्या हुआ?”। मां को देखकर नूर फूट फूट कर रोने लगी। फिर शांत होने पर बताया कि रमन ने तो चुपके चुपके अपनी दूसरी दोस्त चंचल से शादी कर ली है। रमन की इस दोस्त ने ही बताया कि ” रमन ने केवल तुम्हारी भावनाओं से खिलवाड़ किया है, वह तो हमेशा से ही मेरा था”। अपनी बात की पुष्टि के लिए चंचल ने कोर्ट मैरिज़ के दस्तावेज की फोटोकॉपी भी भेज़ दी थी।नूर जो कि पिछले दो साल से पूरे भरोसे के साथ, रिश्ते की गहराई तक जा चुकी थी, टूट जाती है और उसे शादी के नाम से ही नफरत हो जाती है। गहरे अवसाद में डूब रही बिटिया को मधु नौकरी से इस्तीफा दिलवा कर घर ले आती है। उसकी मनोचिकित्सक से ईलाज़ करवाती है। मां बाप के स्पोर्ट से नूर जल्द ही ठीक हो जाती है और फिर से बढ़िया मल्टीनेशनल कंपनी में उंचे पद पर आसीन हो जाती है जहां अब वह दिल लगा कर मेहनत करती है क्योंकि अब उसने अपना लक्ष्य बना लिया था कि कार्पेट जगत में मुकाम बनाना है।शादी के नाम को बेटी नूर ने हमेशा के लिए काटा मार दिया था।मधु के कानों में बेटी जन्म से बज़ती शहनाई की धुन चुप हो चुकी थी।
✍️© ” जोया” 2/12/2018

बधाई

प्यारी बिटिया तुम्हें मुबारक ये खुशी
जीवन तुम्हारा बीते हंसी हंसी
अपनी कर्मभूमि में रहना लीन
मेरी दुआएं,तुम कभी ना रहो दुखी या दीन।

अपनी क्षमता का लोहा तुम मनवाओ
ऊंचाई के शिखर पर चढ़ती जाओ
मुश्किलों से कभी ना घबराओ
ज्ञान की लहर पर तैरती जाओ।

हौंसलों की भरो उड़ान
हमेशा रहो सीना तान
सपनों को चढ़ाओ परवान
खूब बढ़ाओ अपना मान सम्मान।

जीवन मनुष्य का बहुत दुर्लभ
संचित करो कर्म सदभावना के नारी सुलभ
गहरे सागर सा रहे चित वल्लभ
चुन चुन लाओ मोती व शंख दुर्लभ।

चुनौतियां जीवन में आती अनेक
लेकिन कार्य करते जाना नेक
मिलेंगे अवसर तुम्हें अनेक
दुर्व्यवहार के आगे कभी ना देना घुटने टेक।

मेहनतकश व्यक्ति बन जाता कंचन
तपता, निखरता और संवरता जीवन
बाधाओं से कभी न घबराना
हिम्मत से उनसे टकरा जाना।

हर्षित, पुल्लकित रहे तुम्हारा जीवन
मां करती ईश से है वंदन
बगिया तुम्हारे हृदय की महकती रहे
बिटिया हमारी हमेशा चहकती रहे।

✍️©®”जोया”19-09-2018

परी

डग़र की ओर बढ़ते कदम

ठिठक कर रूक जाते हैं

और ताकते रहते हैं

कंटीले मार्ग को।

नयन रफ़ता रफ़ता

देखते हैं चहुं ओर

कि कहीं, कोई विषधर

फन फैलाए तो नही बैठा है।

कौंधती बिजली

रूकती हृदयगति

शाम ढलने को़

है अमावस्या की अंधेरी रात

एक कली चटकती है

हवा में खुशबू महकती है

एक परी खन खन कर के

उड़न खटोले पर विराजमान

नभ से उतरती है

और अपनी जादुई छड़ी से

निकाल फैंकती है उस दंश को

जो कहीं अंतर्मन मेंं गड़ा हुआ था

और बिछ़ा देती है सुर्ख

लाल, पीले व हरे नीले फूल।

अब उठ चलते हैं

रूके हुए कदम

अपनी मंजिल की ओर

कभी ना रूकने के लिए।

जानते हो ये परी कौन है?

मेरी बेटी, मेरी लाडली

मेरी जा़न मेरा जीवन

मेरी हमसफर, मेरी राज़दार।

“जोया”