Category Archives: हौंसला

एहसास

तुम्हें,
एहसास नहीं,
तुम्हारे द्वारा फेंकें गए
एक एक पत्थर को चुन चुन कर,
यथार्थ की धरती पर,
टूटे सपनों को
उसने
हकीकत में बदला।
तुमने
सोचा था, कि
पाषाण हृदय से टकरा कर
वह
चूर चूर हो जाएगी।
वक्त
बना गवाह,
कुरीतियों के
पत्थर तोड़कर
सदियों से अंतस में दफ़न
हौंसले का बीज
पनपकर
विशाल वृक्ष बना।
उसकी,
शाखाओं पर
नारी शक्ति के हरे पत्ते
नित नये फूट कर
करते रहे
दमघोंटू वातावरण में,
नयी ऊर्जा
नये पैमाने
नयी सोच की,
ऑक्सीजन का
उत्सृजन।
ये हरे पत्ते
सोखते रहे
परंपरा
की, जहरीली
कॉर्बन डाई ऑक्साइड
व निर्मित करते
वृहदाकार शीतल छांव।
इस
छांव तले,
बेटीयां,
जिंदगी के पन्नों पर,
करती
स्वाभिमान के हस्ताक्षर।
वे, जो
राहें चुनती,

हासिल करती,
होती
उनके सुमुख,
पितृसत्ता भी नतमस्तक।
तुम्हें
एहसास हो या ना हो
मंजिल की ओर
बढ़े
नारी के ये कदम
मुकाम
हासिल कर
विलक्षण क्षमता का
देती रहेंगी यूं ही परिचय।
✍️©® डा.सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०६/१०/२०१९

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हिचकी

संघर्षों
की सड़क से
गुजरने के बाद
बूढ़ी अम्मा
आज
नितांत अकेली है,
हां अकेली
भरेपूरे परिवार में,
हैं खोए
सब अपनी धुन में।
घर में
हैं सब सुख-सुविधा
लेकिन मन टटोलने
की फुर्सत किसे?
बेटा -बहू , पोता -पोतबहू व्यस्त
स्वयं की गृहस्थी में।
जीवनसाथी
वर्षों पहले
जा चुके अनंत यात्रा पर
बूढ़ी
अम्मा को हर पल, कमी
उनकी खलती।
अम्मा
रखती तो है
स्वयं को,
रोजमर्रा की दिनचर्या में व्यस्त,
सुबह,
पूजा का दीप जलाकर
तुलसी है सींचती
कांपते हाथों से
रसोई बना कर
पहली रोटी गाय को खिलाती,
फिर,
पक्षियों के लिए दाना डाल
करती हर रोज गीता-पाठ
बाबा ने सिखाये
जो हिज्जे,
बने अकेलेपन में,
अम्मा की अनमोल पूंजी।
अम्मा,
नियम से
संध्या का दीप जला,
बाबा से
बातचीत करने
पहुंचती है पुराने घर,
जो उन्होंने बनाया था।
वहां बैठकर
सुनाती है उन्हें,
सब बेटियों के सुख-दुख के किस्से
अम्मा,
कभी हंसती
तो कभी आंसू पोंछती पल्लू से,
कहती है,
“अच्छा किया तुमने.. बेटियों को पढ़ाकर
मेरा दिल खुश है… वे किसी पर निर्भर नहीं…
तुमने, शिक्षा की जो अलख जगाई.. बेटियों ने भी अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा दिलवाई… वे मायके से कुछ नहीं लेती”
घर के पास खेलते
बच्चों को होता कोतहूल
पूछते एक दूसरे से
अम्मा क्यों आंसू बहाती
वो तो हमेशा बिखेरती मुस्कान।
एक दिन,
उसी घर की दहलीज पर
राहगीरों ने देखा
महिला-सतसंग की टोली
अम्मा को घेरकर है बैठी
पूछने पर पता चला,
देखा था
अम्मा को, बाबा से इशारों में
बातचीत करते,
आयी थी एक हिचकी,
उसके बाद से ही
अम्मा
एकतरफ लुढ़क गई
और
उनकी दिव्य-आत्मा
अंनत यात्रा की ओर बढ़ गई
अब
बेटियां मायके कम जाती हैं
मां नहीं तो मायका कैसा?
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २६/०९/२०१९

मुस्तक़बिल

मुझे
नाज़ है अपने
छोटे छोटे कदमों पर
राह में आई हों
कितनी ही दुश्वारियां
चलना पड़ा चाहे अंगारों पर
भंवर में उलझी चाहे
जिंदगी की नाव
जीर्ण शीर्ण हुआ हो ये जिस्म
मेरे नन्हें कदम
चाहे चले कछुए की चाल
ये रुके नहीं
थके नहीं
बढ़ते रहे मंजिल की ओर
बांध बन रोकते रहे
आंसुओं का सैलाब
इकट्ठा कर
टूटे दिल की किरचें
बढ़ते रहे लक्ष्य की ओर
हार कर
रुक जाना चाही जब धड़कन
अदृश्य शक्ति की मानिंद
फूंकते रहे प्राण
रात के स्याह बदन से
तोड़कर ला पाई थी तब
सफलता के सितारे
सधे कदमों ने
मिटा दिया था
जमीं आसमां का फासला
लिखी गई थी फिर
विलक्षण क्षमता की ऋचाएं
यूं ही चलते चलते
कदम
करेंगे तय
मेरा मुस्तक़बिल।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१५/०९/२०१९

मुमकिन

है मुमकिन
स्नेह की चादर पर
रिश्तों के मोती सजाना
थोड़ा झुक कर
थोड़ा मुस्कुरा कर

है मुमकिन
बुजुर्गों से लेना
आशिर्वाद
थोड़ा उन्हें सुनकर
थोड़ी सेवा कर
लगा पाएं जख्मों पर मरहम

है मुमकिन
बेटियो के सपनों को
मिलना परवाज़
गर मुक्त हो
उनके कदम
दोहरे मापदंड से

है मुमकिन
शिक्षित हो समाज
दीप से दीप जले
मिट जाए
गहन अंधकार
निभाएं हम इंसानियत धर्म

है मुमकिन
कृषक बन जाए
खुशहाल
अपनी उपज़
का दाम तय
करने का हो अधिकार

है मुमकिन
वंचित को मिले
योजनाओं का लाभ
भ्रष्टाचार
का भस्मासुर
गर स्मूल नष्ट कर दिया जाए

है मुमकिन
लेना शुद्ध हवा में स्वास
गर ठान लें
जन जन
विस्तार दे जंगलों को
रोपण कर एक एक वृक्ष

बूंद बूंद
योगदान दे कर
मुमकिन है
राष्ट्र को कर पाएं
स्थापित
गगनचुंबी मुकाम पर।
✍️ ©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २८/०८/२०१९

टंकार

उदासी
के पंजों से
छीनी खुशियां अपार
रात के
रुखे रुखे पतों से
छीना अपना अधिकार
छांव के
जख्मों से छीना
सीना तान चलने का व्यवहार
जिंदगी के
कोहरे से छीना
निज़ अस्तित्व का आधार
राह की
दुश्वारियों से छीना
मंजिल का ओजस्वी संसार
पतझड़ के
मौसम से छीनी
बंसत की रंगीन बहार
बैचेनी के
मेघों से छीनी
आंनद की सौंधी फुहार
मुश्किलों के
पर्वत से छीनी
हौंसलों की तलवार
जीवन के
मरुस्थल में उगाए
आत्मविश्वास के गुंचें
पितृसत्ता
की तोड़ी
असंख्य कंटीली बेड़ियां
सूरज को
हथेली पर उगाया
चांद को खिलौना बनाया
तारों से सुंदर परिधान सजाया
मैं
इक्कीसवीं
सदी की बेटी हूँ
समुंद्र में दीप जलाती हूँ।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २०/०८/२०१९

हंसते जख्म

“एक पैदाइशी पागल से तुम लोगों ने मेरी शादी कर दी। क्यों मां क्यों?” विभा आज अपनी अस्सी वर्षीय बुजुर्ग मां से झगड़ रही थी। विभा के सब्र का बांध टूट चुका था और उसका और किसी पर बस नहीं चला तो मां के पास मायके में बूढ़ी मां को उल्हाना दे रही थी। वह स्वयं भी छप्पन वर्ष की प्रौढ़ महिला, दो सयाने बच्चों की मां, अपने दिल में उठ रहे विरोध के अतिरेक को जज्ब नहीं कर पा रही थी। तेईस साल की उम्र से ही गजेटेड आफिसर के पद पर कार्यरत विभा पति के चौंतीस साल से जब तब होते हिंसात्मक व्यवहार से सख्त नाराज थी। मां ने धैर्य बंधाते हुए कहा कि ” बेटी, परिवार तो अच्छा ही देखा था। कमाऊ पूत था। घर में सबसे बड़ा। हमने तो यही सोचा था कि तुम्हारी इज्ज़त रहेगी बड़ी होने के नाते। देखने में इतना खूबसूरत जवान था कि तेरे पिता को एकदम पंसद आ गया…बेटी किसी के अंदर क्या है उसको तो भांपने का कोई यंत्र नहीं था हमारे पास।” विभा भी समझती तो सब थी। बचपन से ही हमेशा मां बाप की इज्ज़त करती आई थी। उनके संघर्ष को सलाम करती रही थी। चार बहनों में दूसरे नंबर की विभा, समझदारी में सबसे बड़ी ही लगती थी और यही कारण था कि आंख मूंद कर मां बाप की हर आज्ञा को शिरोधार्य किया था, इतने सालों तक और कभी अपनी तकलीफ भी नहीं बताई थी किसी को भी। लेकिन आज उसका दिल रो रहा था क्योंकि बेटे की सगाई से लौटते वक्त जो ड्रामा उसके पति विनेश ने किया था वह उसके लिए असहनयी था। यूं तो वह जानती है कि स्वयं की शादी से लेकर चौंतीस साल के वैवाहिक जीवन में परिवार व रिश्तेदारी में कोई प्रोग्राम ऐसा नहीं था जब विनेश ने ड्रामा ना किया हो…और विभा को ये सब अशोभनीय लगता था क्योंकि उसके संस्कार बहुत उच्च स्तरीय रहे थे और वह हर खुशी के पल को अपने जहन में कैद कर लेना चाहती थी लेकिन यहां ये महाशय सारी खुशी पर पानी फेर देते थे। पिछले बीस साल से तो वह गृहस्थी की गाड़ी अकेले अपने कंधों पर उठा रही थी क्योंकि विनेश पर “बुरी नजर” का तांत्रिक से करवाया हुआ टोटका किसी ने ऐसा किया था कि वह सचमुच में ही पागल हो गया था और विभा की ही हिम्मत थी कि उसे झेलते हुए संभव सब इलाज करवाया… और अंततः विनेश इस हद तक ठीक हो गया था कि पिछले चार पांच साल से फिर से लोगों से मिलने जुलने लगा था। विनेश के पागलपन का दौर ऐसा था कि उसका असर विभा के बच्चों पर भी पड़ा लेकिन दोनों बच्चे फिर भी आजकल की सख्त प्रतिस्पर्धा में अव्वल हो अपने मुकाम को हासिल कर चुके थे और इसीलिए विभा भी थोड़ा खुश रहने लगी थी। विभा का पति के प्रति आगाध प्रेम और समर्पण ही था जो उसने हिम्मत नहीं हारी थी जबकि वह स्वयं डिप्रेशन की दवाएं ले रही थी। एक पागल व्यक्ति को अकेले संभालते संभालते उसकी खुद की दवाई शुरू हो गई थी। विभा के जज्बे व हिम्मत की, सुसराल वाले भी दाद देते थे लेकिन आज तो वह बिफर गई थी मां के सामने। विभा की मां बहुत ही सरल स्वभाव की महिला रही हैं, जिसने खुद चुनौती भरा जीवन जीया था लेकिन पति के इंतकाल के बाद वह भी पिछले आठ साल से काफी हिल चुकी थीं। बड़ी बेटी से उनका बहुत लगाव भी था और सहारा भी यद्यपि एकमात्र बेटा किसी तरह की कमी नहीं रहने देता था।
विभा, बेटी के साथ मां से मिलने गई थी। मां तो विभा की तकलीफ से वाकिफ थी क्योंकि डिप्रेशन के फेज़ में विभा गुमसुम रहती थी लेकिन नौकरी पर जाती रही थी क्योंकि दो बच्चों की जिम्मेदारी उसके कंधों पर थी। विभा को मां ने काफी सांतवना दी लेकिन आज तो उसे जैसे भूली हुई बातें भी ताज़ा हो गई थी। विभा ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा कि ” मां, विनेश ने शादी के तीसरे दिन थप्पड़ मारा था क्योंकि सब्जी में मिर्च तेज हो गई थी और उसे नहीं मालूम था कि वह सादा सब्जी पंसद करता है… नयी बहु को सास को बताना चाहिए था… मां शादी से लेकर आजतक एक दिन ऐसा नहीं गया होगा जब मेरी आंख से आंसू ना गिरा हो… तीन महीने की बेटी जब पलंग से गिर गई थी तो मेरी लापरवाही बताते हुए उसे कुएं में डालने भागा था.. बच्चे टी वी देखने की जिद्द करते तो उठा कर उनका सिर टी वी से दे मारते थे…एक और तीन साल के नन्हें दो बच्चे… मां ये पागलपन नहीं तो और क्या है… ज्यादा रोने पर अनाज की टंकी में बंद करना, चाहे दो मिनट ही सही लेकिन बच्चों के दिमाग पर असर तो पड़ता है… थोड़ा बड़े होने पर बहन भाई में झगड़ा हो जाए तो घर से बाहर निकाल कर गेट बंद कर लेना और मुझे भी धमकी देना… ये पागलपन नहीं तो और क्या है? ” विभा की आंखों के सामने तो चलचित्र की भांति पिछले पैंतीस साल के वैवाहिक जीवन की रील जैसे चल निकली हो। विभा को अपनी नानी से ऐसे शिकायत करते देख विभा की बेटी नीना ने उसे चुप कराते हुए कहा कि ” मां, बहुत परेशान कर लिया नानी को। अब चुप करो। आपको इस शादी से हम दो प्यारे प्यारे बच्चे तो मिले हैं। खुश रहो। अब पापा की आदतों को आप बदल तो नहीं सकती। ” विभा बेटी की बात से सहमत थी बच्चे तो वाकई बहुत प्यारे हैं। वे केवल सुंदर ही नहीं हैं बल्कि उनकी सोच भी उम्दा दर्जे की है। विभा ने फिर बूढ़ी मां के हाथ पैर की मालिश की व सिर में तेल लगाकर बाल गूंथे। एक सप्ताह का समय बिताने के बाद वह मां को वायदा करके लौटी थी कि वह अपने जख्मों को हंसते हंसते सहन करती रहेगी लेकिन फिर कभी शिकायत नहीं करेगी क्योंकि अब नयी पीढ़ी को मनोबल और खुशहाल रखने का समय आ चुका है।

✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २७/०६/२०१९

तेरे बगैर

गम
तन्हा रातें
भीगी पलकें
प्रेम पथ बना दुश्वार
दौलत की खड़ी ऊंची दीवार
चाहत की परियों की ठहरी उड़ान
छीनी थी कभी तुमने मेरे होंठों की मुस्कान
हर आहट पर बढ़ती थी यूं दिल की धड़कन
खुमार इश़्क भेंट किया फिर होलीका दहन
दिल में राख प्रेम अग्न,सीखा जीना तेरे बगैर।
तूने
खामोशी
की ओढ़ी चादर
समाज की खातिर
इश्क़ की खाली हुई गागर
जख्मों की उम्र तेरा अंहकार
वक्त मरहम, नहीं तेरा इंतजार
सबक, धूमिल होता छिछला प्यार
स्व सर्वोपरि, उथलों से ना सरोकार
परव़ाज दी सपनों को हमेशा तेरे बगैर।
होली
का त्योहार
साथियों की पुकार
रंगों की खूब होती बौछार
छप्पन की उम्र की सबने पार
युवा मन सा उमड़े दिलों में प्यार
जिंदगानी तेरी से ना रहा सरोकार
जिंदगी से गायब हुए यूं जैसे कोई चोर
होली के रंगों सी रंग ली जिंदगी मैंने हर छोर
खुशियां बटोरी मैंने हर पल हंसकर तेरे बगैर।

✍️©® डा. सन्तोष चाहार “जोया” 18/03/2019

यादों की कश्ती

यादों की कश्ती के चप्पू ताउम्र चलते रहते हैं और रह रह कर उस मंजिल की ओर रुख करते हैं जहां प्रेमसागर के एकांत टापू पर कभी इश़्क की तहरीरें दिल की तख्ती पर लिखी गईं थी। माही और सुरभि का प्रेम इस बात से बेखबर था कि उन परवान चढ़ता इश़्क एक उस अंधेरी कोठरी की ओर बढ़ रहा है जहां दर्द के काफ़िले कभी उनका पीछा नहीं छोड़ेंगे।

माही , एक बहुउद्देश्यीय कम्पनी में सी। ई ।ओ। के पद पर आसीन बखूबी अपनी जिम्मेदारी को निभाते हुए, कम्पनी के ऊंच अधिकारियों की नज़रों में निश्चित स्थान बना चुका था। ऊंच आंकाक्षाओं के चलते माही ने कभी शादी के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा था। चालीस वर्ष की उम्र में अब उसकी शादी की कोई इच्छा शेष नहीं थी। सुरभि एक आत्मविश्वास से लबरेज़ पैंतीस वर्षीय महिला दो महीने पहले ही माही की कम्पनी में चीफ़ मैनेजर बनकर आई थी। सुरभि की सुझबूझ , कार्य क्षमता व दक्षता ने सभी के मन में एक खास जगह बना ली थी। माही और सुरभि का मेलजोल बढ़ रहा था और एक साल में वे एक दूसरे के काफी करीब आए। एक सुखद भविष्य की कल्पना से दोनों प्रेम की कश्ती में सवार हो प्रेमासागर में विहार कर रहे थे। समय पंख लगाकर उड़ने लगा और रंगीन सपने क्षितिज छूने की चाह लिए उड़ान भर रहे थे।
दोनों उम्र के उस पड़ाव पर थे जहां शादी विवाह को वे बहुत सादगी पूर्ण तरीके से सम्पन्न करने में विश्वास रखते थे। अजातीय प्रेम विवाह होने की वज़ह से दोनों के घर वाले बहुत खुश नहीं थे क्योंकि मूल रूप से उनकी जड़ें गांव से जुड़ीं थी। माही के परिवार ने तो सुरभि को स्वीकार कर लिया था लेकिन सुरभि के घरवालों ने सभी संपर्क सूत्र काट लिए थे और पग फेरा के लिए भी वह अपनी सहेली के यहां गई थी। उसकी सहेली काफी आधुनिक विचारों की थी जो इंसान को इंसान के रूप में ही महत्व देती थी। समय बीता और सुरभि और माही के आंगन में नन्ही परी का आगमन हुआ। अब सुरभि ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया था क्योंकि वह अपनी बेटी की परवरिश के लिए केवल ‘आया’ पर भरोसा नहीं कर सकती थी। कितने ही किस्से सुने थे उसने कि किस तरह आया लोग छोटे बच्चों को कुछ हल्का नशीला पदार्थ सुंघाकर कर सुला देते थे। माही ने काफी बचत कर रखी थी और एक सपनों का घर खरीद लिया था। दोनों की जिंदगी में खुशहाली थी। नन्ही परी भी अब तीन वर्ष की हो चली थी। उसकी तुतलाती प्यारी बातें सबका मन मोह लेती थी। माही के माता पिता पुश्तैनी जमीन व मकान छोड़कर शहर आने को राज़ी नहीं थे। अतः सुरभि ने अभी दुबारा नौकरी ज्वाइन नहीं की थी।

माही बहुत ही मेहनती व सफल इंसान था। महत्वाकांक्षी भी बहुत था, इसलिए जल्द ही कम्पनी में प्रेजिडेंट के पद पर पहुंच गया था। सुरभि और माही की शादी को अब दस साल हो चुके थे। माही ने दोस्तों के साथ मिलकर काफी जमीन मेट्रो सिटी में खरीदी। लेकिन ये जमीन आगे चलकर घाटे का सौदा साबित हुई। माही को एक करोड़ रुपयों का चूना लग चुका था और वह इस नुकसान को झेल नहीं पाया। परिणाम ये हुआ कि माही गहरे अवसाद में चला गया और शराब को अपनी संगनी बना लिया। सुरभि के लिए ये बहुत कठिन दौर था। मायके वाले तो पहले ही शादी के विरुद्ध थे, अब कष्ट की घड़ी में सुसराल वालों ने भी किनारा कर लिया। सुरभि और दोस्तों ने लाख समझया कि मनोचिकित्सक से सलाह ले ली जाए लेकिन माही तो ये मानने को ही तैयार नहीं हुआ कि उसे मनोचिकित्सा की आवश्यकता है। असल में भारतीय समाज में अभी भी मानसिक स्वास्थ्य को लेकर लोग सजग नहीं हैं और ऐसी चिकित्सा लेने वाले लोगों को पागल घोषित कर दिया जाता है। यही कारण है कि लोग मनोचिकित्सक के पास जाने से कतराते हैं। सुरभि के लिए जिंदगी का सबसे कठिन दौर था। उसने हिम्मत नहीं हारी और दोबारा नौकरी ज्वाइन कर ली। बेटी अब पांच साल की हो चुकी थी, उसे डे बोर्डिंग में करवा दिया गया। ऑफिस से लौटते वक्त वह अपनी बेटी को स्कूल से ले लेती थी। माही की मनोस्थिति को जानकर, खुद मरीज़ बनकर मनोचिकित्सक से मिलती और दवाओं को सब्जी में डालकर माही को देती ताकि रात की नींद माही चैन से सो सके। इसी तरह उनके जीवन के चार साल बीत गए। लेकिन जब मरीज डाक्टर से खुद नहीं मिलता तो बीमारी पकड़ से बाहर रहती है। माही का अवसाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था। बेटी की शिक्षा, अपनी नौकरी, मानसिक रूप से बीमार पति की तीमारदारी ने सुरभि को अंदर तक हिला दिया और फिर एक दिन वही हुआ जिसकी आंशका थी। माही ने बिमारी से परेशान हो अपनी नशें ब्लेड से काट डाली। सुरभि घर लौटी तो माही को मृत पाया। सुरभि की दुनिया लुट चुकी थी। माही के घरवालों को सूचित किया गया। सबने सुरभि को कटघरे में खड़ा कर दिया और अनेकों आरोप उस पर मढ़ दिए गए। तेरवहीं की रस्म अदायगी के बाद सब अपने पुश्तैनी घर लौट गए, सुरभि और उसकी बेटी को छोड़कर।

सुरभि के लिए जिंदगी दुश्वारियां लेकर आयी। लेकिन बेटी के लिए जीना तो था। एक आत्मविश्वासी लड़की कहीं अंदर तक हिल चुकी थी। वक्त के घाव वक्त की मरहम से भरते हैं और सुरभि भी अपने दिल पर लगे गहरे घावों को भरने में सफल रही थी। शेष थी तो माही की यादें और उसका जिद्दी स्वभाव। मनोचिकित्सा के अभाव की परिणिति थी कि आज सुरभि रिश्तों नातों से भरी दुनिया में स्वयं को अकेला पाती है। एक दो सहेलियां हैं जो सुरभि का हौंसला बढ़ाती हैं। सुरभि के माता पिता तो ऊंच जाति से थे और उनपर जातिवाद का चश्मा ऐसा चढ़ा था कि बेटी के दुख से भी उतर नहीं पाया। सुरभि भी उन्हीं का अंश है तो वह भी कठोरता ओढ़े कभी स्वयं के द्वारा लिए निर्णय पर अडिग रही। उसने भी अपने मां बाप से किसी तरह की उम्मीद नहीं रखी है। अपनी बेटी को पालने में वह सक्षम है और पहले से ज्यादा मजबूत भी। माही की यादों के साथ अपनी जीवन यात्रा पर अग्रसर सुरभि बहुत सारी महिलाओं के लिए प्ररेणा स्त्रोत भी है।

✍️ ©® डा. सन्तोष चाहार “जोया” 17/03/2019

उड़ान

क्षितिज छूने को अब नारी बेताब
सजग वर्दी का पूरा सुनहरा ख्वाब
शिक्षा जगत में फहराया जो परचम
उड़ चली है नारी पथ संकरे व दुरगम।

परंपरा की संकीर्णता के बंधन तोड़
अब आसमां से लगी है नारी की होड़
अतीत की घुटन का निकला निचोड़
छूना है आसमां ऊंचा दहलीज़ को छोड़।

पायल जो करती रही नित झंकार
चूडियां खनकाने से नारी का इंकार
पायलट बन उड़ाती वायुसेना विमान
नये मुकाम पर बनाती नारी पहचान।

कोमल नारी हृदय बना कठोर फौलादी
सीने में धधकती पल पल ज्वाला इरादी
दुश्मन की छाती पर करती हमला बर्बादी
समूल मिटाती, नारी हर वक्त दंभ कट्टरवादी।

सदियों के दर्द से नारी का अब इंकार
मातृभूमि पर न्यौछावर होने को तैयार
देश की मिट्टी से जुड़े हृदय वीणा के तार
नारी ने गौरव गाथा रचने का किया इकरार।

नारी, उपार्जन करे परिवार की रोटी
अंहकारी की नोच सकती बोटी बोटी
हौंसलों के दीप से प्रज्वलित वर्दी को
देश की हर महिला का नमन कोटि कोटि।

✍️©®डा. सन्तोष चाहार ” जोया” 09/03/2019

जाने क्यूं

जाने क्यूं
लड़ती रहती हूं
पंरपरा के घोडों से
निपट मूर्ख निगोड़ों से
स्व का ढ़ोल पीटते भगोड़ों से।

जाने क्यूं
टकर लेती रहती
संकीर्णता के घेरों से
दंभ में चूर पहरों से
अतीत के घाव गहरों से।

जाने क्यूं
उठा लेती हूं
तख्ती कलम दवात
धनुष तीर टंकार
धरा पर नहीं मैं भार।

जाने क्यूं
कर्म की प्रहरी बन
सज़ाती ख़्वाब धुन
ठोकती हूं ताल मैदान
जीतती निज स्वाभिमान।

जाने क्यूं
खोल फेंकती हूं पायल
बंधन जो करते हृदय घायल
होती हूं स्व दृष्टि की कायल
मोड़ना चाहती हूं वक्त का डायल।

जाने क्यूं
चाहती निजता का अंश
उड़ना चाहती गगन बिन दंश
घर बाहर के तालमेल का पंख
सीमाओं की छाती में फूंक शंख।

#नारी शक्ति # नारी स्वाभिमान #देश बने महान

✍️©® डा.सन्तोष चाहार “जोया” 08/03/2019