Category Archives: हूनर

मुस्तक़बिल

मुझे
नाज़ है अपने
छोटे छोटे कदमों पर
राह में आई हों
कितनी ही दुश्वारियां
चलना पड़ा चाहे अंगारों पर
भंवर में उलझी चाहे
जिंदगी की नाव
जीर्ण शीर्ण हुआ हो ये जिस्म
मेरे नन्हें कदम
चाहे चले कछुए की चाल
ये रुके नहीं
थके नहीं
बढ़ते रहे मंजिल की ओर
बांध बन रोकते रहे
आंसुओं का सैलाब
इकट्ठा कर
टूटे दिल की किरचें
बढ़ते रहे लक्ष्य की ओर
हार कर
रुक जाना चाही जब धड़कन
अदृश्य शक्ति की मानिंद
फूंकते रहे प्राण
रात के स्याह बदन से
तोड़कर ला पाई थी तब
सफलता के सितारे
सधे कदमों ने
मिटा दिया था
जमीं आसमां का फासला
लिखी गई थी फिर
विलक्षण क्षमता की ऋचाएं
यूं ही चलते चलते
कदम
करेंगे तय
मेरा मुस्तक़बिल।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१५/०९/२०१९

Advertisements

जाने क्यूं

जाने क्यूं
लड़ती रहती हूं
पंरपरा के घोडों से
निपट मूर्ख निगोड़ों से
स्व का ढ़ोल पीटते भगोड़ों से।

जाने क्यूं
टकर लेती रहती
संकीर्णता के घेरों से
दंभ में चूर पहरों से
अतीत के घाव गहरों से।

जाने क्यूं
उठा लेती हूं
तख्ती कलम दवात
धनुष तीर टंकार
धरा पर नहीं मैं भार।

जाने क्यूं
कर्म की प्रहरी बन
सज़ाती ख़्वाब धुन
ठोकती हूं ताल मैदान
जीतती निज स्वाभिमान।

जाने क्यूं
खोल फेंकती हूं पायल
बंधन जो करते हृदय घायल
होती हूं स्व दृष्टि की कायल
मोड़ना चाहती हूं वक्त का डायल।

जाने क्यूं
चाहती निजता का अंश
उड़ना चाहती गगन बिन दंश
घर बाहर के तालमेल का पंख
सीमाओं की छाती में फूंक शंख।

#नारी शक्ति # नारी स्वाभिमान #देश बने महान

✍️©® डा.सन्तोष चाहार “जोया” 08/03/2019

अभिनंदन

सेना
अद्भुत शौर्य
साहस की बानगी
राह-ए-देशप्रेम बेनज़ीर जज्ब़ा।
*****************
अभिनंदन
देश का गौरव
सूर्यवीर ताज का कौल
जन जन का ख़ुमार व खुदा-ए-फज़ल।
*****************
तख़्त
का फ़हम
अज़ीम जन सैलाब फाख़िर
नौबहार सा आगाज़ वतन -ए-चिराग़।
******************
बाग
में परिंदें
फ़खर का बसेरा
हर तरफ़ जफ़र व तबस्सुम का जिय़ा।
********************
✍️©® डा.सन्तोष चाहार ” जोया” 01/03/2019
☆★★★★★★★★★☆★★★☆★★☆★
बेनज़ीर* अनुपम
ख़ुमार* नशा
ताज* मुकुट
कौल*वायदा
फ़जल* कृपा
तख़्त* सिंहासन
फ़हम* समझ
अज़ीम*विशाल
फ़ाखिर*अभिमानी
नौबाहर*वसंत
आग़ाज़* आरम्भ
फ़खर*यश
जफ़र*विजय
तब्बसुम* प्रसन्नता
जिय़ा* प्रकाश, धूमधाम
★★★★★★★★★☆☆★★☆☆★★☆★

क्षणिकाएं

इश़्क
की कलम
ख़्वाब-ए-गुल की स्याही
लफ़्जों की फुलवारी का उपवन।
*********
उम्र
के काग़ज
नसीब-ए-सितम
ठहर गई तमन्नाओं की मंजिल।
***********
हुस्न
का ज़ाल
रफ़ाकतों का भ्रम
अहम और अंहकार के ऊंट।
***********
अंतर्दद्व
को झटक कर
थाम हौंसले की डोर
कागज़, कलम और दवात का
विस्तृत, रोमांचक व अद्भुत संसार।

✍️ ©® डा. सन्तोष चाहार ” जोया” 26/02/2019

रफ़ाकतों* मेलजोल

यादों की ईद

यादों की ईद
पूनम की रात
मीठे जज्बात
उनींदे ख्वाब
रंगीन हिजाब
हुस्न व शबाब
हसीं महताब
जीते खिताब
जीवन किताब
खुदा का रकाब।

✍️©® डा. सन्तोष चाहार ” जोया” 25/02/2019

हुंकार

युवाओं
पथ अपना प्रशस्त करो
सपने सजा़ए आंखो में
उन्हें ना बोझिल करो
शक्ति को पहचान
जिंदगी से जंग करो।

इंटरनेट
एक आभासी दुनिया
समय ना व्यर्थ करो
कौशल को तराशो
जीविका सुरक्षित करो।

काम
कोई नहीं होता छोटा
क्षमता अनुसार राह चुनो
निपुणता भी होगी हासिल
हुनर को तराशते चलो।

छोटी छोटी मंजिले
पथ पर तुम डट चलो
हौंसलों को बुलंद कर
मिला कर कदम तुम चलो।

कम्प्यूटर का
ज्ञान जरूरी
गति पकड़
दिनचर्या होती पूरी
सीख बारिकियों को
राह अपनी आसान करो।

ईश्वर ने
सभी को नवाजा है
एक गुण विशेष
पहचान कर उसे
सही उपयोग करो।

दूसरों से कर तुलना
कभी ना हीन भावना भरो
प्रत्येक व्यक्ति की
अपनी जीवन किताब
कोई प्रथम सीढ़ी पर
कोई चमके बन महताब।

✍️©® “जोया” 31/01/2019

औरत की कहानी

पहला परिदृश्य

औरत की ये अज़ब कहानी

दुनिया करती आई मनमानी।

दोयम दर्जा दिया पुरुषों ने

नित किया अपमान नये हथकंडों ने।

लक्ष्मण रेखा की पहेरेदारी
कभी ना की सुखों की सवारी।
सुबह से हो जाती शाम
कभी ना होते खत्म घर के काम।

खेत खलिहान को भी जोतती

कष्टों को नित वह भोगती।

खाकर रुखी सूखी सो जाती

कभी कभी तो रह जाती भूखी।

परिवार पर रहती हरदम न्यौछावर

सिर पर ढ़ोती नीर सरोवर।

ईर्ष्या उसकी को खूब भुनाया

औरत को औरत से टकराया।

नारी को नारी के खिलाफ किया खड़ा

इस तरह पुरुष बना रहा बहुत बड़ा।

होती रही वासना का शिकार

पीडा़ का नहीं कोई पारावार।

दूसरा परिदृश्य

परंपराओं की जंजीर से जकड़ी
सपनों की डोर फिर भी पकड़ी।
शिक्षित होने वह अब निकली
नहीं ओढ़ती नकाब वो नकली।
खेल जगत में मुकाम बनाया
देश का गौरव नित बढ़ाया।
छूती अब गगन तारिकाएं
झंडा देश का चोटी पर लहराएं।
बन फौजी देश का गौरव बढा़ती
बाधाओं से नहीं अब घबराती।
बन पायलट वह विमान उड़ाती

दुश्मनों के छक्के अब छुड़ाती।

बनकर आई एस अधिकारी

योजनाएं बनाती न्यारी न्यारी।

सी.ई.ओ बन योग्यता का परचम फहराती

डिजिटल भारत का तिरंगा लहराती।

शिक्षाजगत की दुनिया उसकी अनोखी

महिला शिक्षादिक्षा में महारत उसकी चोखी।

बढ़े कदम बनाते नित नयी डगर

मिट जाएगा अब मन का तिमिर।

✍️©® “जोया” 22/01/2019

स्मृति की चादर

मधु ने बहुत ही संघर्षों में अपनी इकलौती बेटी को पढ़ा लिखा कर सक्षम बनाया था। पति की कैंसर की बीमारी ने लगभग सारी जमा पूंजी खर्च करवा दी थी और परिवार उन्हें चाह कर भी बचा नहीं पाया था। मधु खुद भी शुरु से नौकरी पेशा थी, शहर के ही प्रतिष्ठित स्कूल में अध्यापिका के पद पर कार्यरत थी। उस समय उसकी बेटी नौवीं कक्षा में थी जब बाप का साया सिर से उठ गया था। मधु को खुद को संभालने में वर्षों लग गए थे। वो तो मायके वालों का नैतिक समर्थन मिलता रहता था। आर्थिक मदद की पेशकश को तो मधु ने ठुकरा दिया था क्योंकि उसका मानना था कि अपनी चादर में हीपैर पसारने चाहिए। बेटी को भी अच्छे संस्कार और अच्छी शिक्षा दिलवाई थी। एम.बी. ए. करने के तुरंत बाद ही अच्छी कम्पनी में मैनेजर के पद पर नौकरी भी मिल गई थी। बेटी, मेघा ने पहला तोफा मां को ही दिया था।

छ: महीने पश्चात मधु के भतीजे की शादी निश्चित हो गई थी । दिसम्बर का महीना था और सभी बहनें अपने बच्चों के साथ पहुंच चुकी थी। मधु की तीन बहनें व एक भाई था। मेघा मुम्बई से आई थी। सभी उसी का इंतजार कर रहे थे क्योंकि हर महफिल की वह जान होती थी। चेहरे पर हर वक्त मुस्कान लिए सभी के दिलों को जीत लिया था उसने। मेघा को लिवाने स्वयं उसका मामा गया था। शाम के समय सब इक्ठ्ठा बैठे थे तो मधु ने अपना सूटकेस खोला और सबसे पहले अपनी नानी को उपहार स्वरूप शाल दिया और फिर बड़ी मौसी, छोटी मौसी,मामा, मामी, सभी कज़न और दुल्हे के लिए खास तोफा। एक के बाद एक उपहार उसके पिटारे में से निकलते जा रहे थे। एक पूरी तंख्वाह मेघा ने बहुत सलीके से चुने हुए उपहार पर खर्च कर दी थी। मधु के लिए भी बढिया साड़ी और महंगा पर्स लेकर आयी थी। मामा सभी बच्चों का प्रिय मामा था। नाना तो बहुत साल पहले गुज़र गए थे लेकिन उनके बताए रास्ते को अपना कर सभी बच्चे उन्हें याद करते थे। नानी ने तो उसी दिन कहा था, ” मेघा जितना बड़ा दिल किसी का नहीं है”। उस दिन के बाद सभी मेघा को सैंटा ही बुलाते थे। बेटे की शादी के बाद, विदा होते वक्त मेघा के मामा ने भी उसे खास उपहार दिया था। मैं और मधु तो खास सहेली होने के नाते एक दूसरे के मायके में विवाह समारोह आदि में एक बेटी की हैसियत से ही जाते रहते हैं।

मधु के लिए तो वह हमेशा सैंटा ही बनी रही। जब से नौकरी लगी है बेटी मेघा की लायी हुई साड़ी, पर्स और पेन इस्तेमाल करती आई है। छोटी छोटी चीज़ें जो कभी मधु को आकर्षित करती थी सब घर में लाकर सज़ा दी।घर का कोई कोना ऐसा नहीं था जहां मेघा द्वारा लाई गई वस्तुएं ना हो। मधु अब लगभग साठ वर्ष की हो गई है लेकिन बेटी के उपहार लाने का सिलसिला निरंतर जारी है। ऐसा नहीं है कि मधु उसके लिए कुछ नहीं लाती। जब भी जरूरत होती है वह उसे देती रहती है, खासकर मधु को सोने में निवेश करना ठीक लगता है क्योंकि ये औरतों के लिए गहना भी रहता है और आड़े वक्त में काम भी आ जाता है।…

दो साल पहले मधु की भानज़ी की शादी थी, डेस्टिनेशन वेडिंग थी। मधु तो जाने में हिचक रही थी कि शादी के हिसाब से कपड़े भी बढ़िया होने चाहिए और वह ज्यादा खर्च करना नहीं चाहती थी। तब बेटी मेघा दिल्ली आ चुकी थी और मधु को अपने साथ मॉल में लेकर गई और पंसदीदा प्लोज़ो सूट व सरारा आदि दिलवाया। मेंहदी के वक्त पहनने के लिए धोती सलवार । सब दिलवाने के बाद कहती है,” अब मैं सन्तुष्ट हूँ कि आपकी शोपिंग हो गई”। मधु तो मेरी खास सहेली है और हमारे घर भी पास पास हैं तो हम लगभग हर रोज़ सैर के समय मिल लेतें हैं…।

मेघा को कम्पनी की तरफ से एक सप्ताह के लिए चीन जाने का अवसर मिला तो मधु थोड़ा घबराई हुई थी लेकिन हम सबने कहा कि आज़कल बच्चे बाहर जाते रहते हैं तो घबराओ नहीं। एक सप्ताह बाद लौटी तो चीन से भी काफी उपहार मधु और नानी के लिए लाई थी। मधु बताती है कि ” मेघा, नानी को कभी नहीं भूलती।”। चूंकि मेघा की नानी पूजा पाठ करती है तो उनके मंदिर के लिए घंटी, दीपक और अलग अलग खशबू की अग़रबती इत्यादि लाती रहती है। यूं तो नानी के लिए सभी बहनों के बच्चे कुछ ना कुछ लाते रहते हैं लेकिन मेघा की तो बात ही अलग है। बचपन में छ महीने नानी की गोद में पली थी चूंकि उस वक्त मेघा दूसरे राज्य में नौकरी करती थी। शायद वही जुड़ाव है नानी और दोहती का। पति की बिमारी की वज़ह से मधु ने सरकारी नौकरी छोड़कर उसी शहर में एक नामी स्कूल में ज्वाइन कर लिया था और पति की खूब सेवा की थी लेकिन जिंदगी में मधु और बेटी को छोड़कर वे परलोक सिधार गए थे और मधु अपने में ही सिमटकर रह गई थी। लेकिन अब मेघा हर खुशी अपनी मां के चरणों में डाल देना चाहती है।..

पिछले क्रिसमस पर तो मेघा अपनी सहेली के साथ राजस्थान में निमराना गई थी और बेडशीट, कम्फर्टर, कढ़ाई वाली जूतीयां, हैंडबैग आदी आदी। उस वक्त मैं भी मधु के घर ही बैठी थी तो एक वॉल हेंगिंग मुझे भी दिया और फिर अपनी मां को एक एक चीज़ बहुत उत्साहित होकर दे रही थी। सब वस्तुओं को देने के बाद कहती है,” मम्मा और कुछ चाहिए , आज़ आपका सांटा आया है”। उस वक्त मेघा को आशीर्वाद देते हुए मैं अपने घर लौट आई और सोचती रही “काश मेरी भी बेटी होती, जो अपनी मां के ऐसे ही सैंटा बनती”।

✍️©®”जोया” 25/12/2018

कलाकार की मौत

सुमी पांच बहनों में सबसे छोटी। रंगरुप सब बढिया केवल कद ठिगना रह गया था। लेकिन विधाता ने इस कमी को पूरा किया था कला की कूची देकर। पिता की छोटी से नौकरी। फिर भी सभी बेटियों को पढा़या और विवाह भी करते चले गए। लड़कियां होशियार तो थी हीं 1985 के दशक में भ्रष्टाचार इतना नहीं था।इसलिए एक के बाद एक बेटी नौकरी भी लगती चली गयी। माता व पिताजी की खुशी की सीमा न थी।

सुमी ने भी परास्नातक की डिग्री हासिल की और एक स्कूल में शिक्षिका लग गई।उसके कद की वजह से अभी शादी निश्चित नहीं हुई थी। बहुत सारी पेंटिंग्स बनाई थी सुमी ने शादी से पहले। कोई भी फोटो दिखा दो, उसको हुबहु बना देती थी। पैंसिल स्कैच हो या आयल पैंटिग, हर विधा दी थी भगवान ने। किसी से नहीं सीखा था।स्वयं ही बना लेती थी। भगवान का दिया उपहार था उसके हाथों में।

पांच बेटियों की शिक्षा और शादियों के बाद पिता अब जीवन से थक चुके थे। स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता था। सुमी की शादी एक सुंदर शिक्षक से तय कर दी जिसके पास जमीन भी काफी थी लेकिन साथ मे तीन बहन भाईयों की शादियों की जिम्मेदारी भी। सुमी ने सभी जिम्मेदारी अच्छे से निभाई। लेकिन उसकी कला की परख किसी को न थी। न ही पति ने कोई प्रतोसाहन दिया।

दो बेटों के जन्म के बाद सुमी उन्हीं के लालनपालन में व्यस्त हो गई। बहनों ने उपहार में जो पेंटिंग बोर्ड व रंग दीये थे वे गृहस्थी की चक्की में धूल फांक रहे थे। पति मनमौजी प्रवृत्ति का इंसान था और नाम के अनुरूप कृष्ण की भूमिका में ही रहता था। खासकर जब बहन भाईयों की जिम्मेदारी से मुक्त हो गया। सुमी और गोविंद की अक्सर लडा़ई रहने लगी थी क्योंकि वह गाँव में भाभीयों की समीपता अधिक रखता था व सुमी पर घरेलू हिंसा करता रहता था। एकबार तो चारपाई के नीचे उसके कलाकार हाथों को रखकर उपर बैठ गया था। सुमी के दुख का कोई पारावार नहीं था। लेकिन उसकी आत्मा उसे जरूर धिक्कारती थी। जो हाथ सुंदर तस्वीरों का संकलन कर सकते थे उनकी इस बेकद्री से सुमी के अंतर्मन पर गहरी चोट आयी थी।

सुमी के दुख के बादल छटने का नाम नहींं ले रहे थे। चालीस साल की उम्र में उसके पति को हृदयाघात हुआ और वह सुमी और दो बच्चों को छोड़कर चले गए। अब सुसराल वाले पति की मृत्यु के लिए सुमी को जिम्मेदार ठहराने लगे। उसका पति द्वारा बनाए घर में रहना दुभर हो गया और वह गांव छोड़कर बहनों के सहारे शहर आ गई। सुमी की बड़ी बहन काफी पैसे वाली थी तो वह भी पति से छुपा कर सुमी की मदद करती रही। सुमी ने टयूशन सेंटर खोलकर अपने बच्चों की पढा़ई का खर्च उठाना शुरू किया। हाथों में जो कला थी वह तो गृहस्थी की गाडी खिंचने में दब कर रह गई। पति की पारिवारिक पैंसन जो की मासिक पंद्रह हजार रूपये थी क्या होता उससे। दिल्ली जैसी महंगाई। पति कुछ छोड़कर गए नहीं।

आठ साल बाद पति की जगह नौकरी मिली तो गृहस्थी की गाड़ी अच्छी चल पड़ी। अच्छे प्रोफेशनल कालेज़ म़े दाखिला भी दोनो लड़को को मिला। लेकिन बाप का साया न होने से बेटे बड़े होकर सुमी को परेशान करने लगे। पढा़ई बीच में छोड़कर बैठ गए कि बहुत जमीन है।

सुमी फिर बहुत परेशान रहने लगी। फिर अंत मे सब्र कर के बैठ गई। बहनों ने भी कहा अपने स्वास्थ्य का ध्यान रख। ये भी खो दिया तो कौन संम्भालेगा।

मैं उसकी बहन भावना सोचती रहती हूँ कैसे गृहस्थी की चक्की में आम परिवारों में जो प्रतिभा है वह दम घोट जाती है। सुमी को यदि परिवार व पति का साथ मिला होता तो उसकी प्रतिभा इतनी थी कि बहुत बड़ी बड़ी कला गैलरी का आयोजन कर सकती थी। लेकिन परिवार यदि लीक से हटकर अपने परिवार में कला कौशल से लबरेज व्यक्ति का साथ दे तो किसी कलाकार की कला दम न तोड़े।

✍️©® ” जोया” १५/११/२०१८

भंवर

दीपा – हां यही तो नाम था उसका।

दीपा मेरे पड़ोस में रहने वाली बहुत ही सुशील और नेकदिल लड़की। नाम के अनुरूप हमेशा जीवन रोशनी से भरपूर। कालेज हम साथ ही जाते थे। वह अपने माता पिता की इकलौती सन्तान बड़ी नाज़ से पली पढ़ी थी। संगीत, चित्रकारी और साहित्यिक कृतियों में उसका गुण निखर कर झलकता था। शिक्षा दिक्षा पूरी होने के बाद हमारे रास्ते अलग हो गए। उसकी शादी सेना में मेज़र से तय हो गई थी और मैं भी शादी के बाद अपनी घर गृहस्थी मे व्यस्त हो गई। पत्राचार हमारे बीच काफी साल जारी रहा फिर धीरे धीरे वह भी कम हो गया।
समय पंख लगा कर उड़ रहा था। बच्चे बड़े होकर शादी शुदा जिंदगी में जम गए थे। पति भी रिटायर हो गए थे। मैं स्वयं भी बैंक अधिकारी के पद से रिटायर हो गई थी। अब मेरे पास काफी समय था और मैं एक स्ंस्था हुनरमंद से जुड़ गई जहां कम पढ़ीलिखी महिलाओं को उनके हुनर के हिसाब से आत्मनिर्भर बनाने में सहायता की जाती थी। बैंक में कार्य करने का मेरा अनुभव काफी काम आया और लोन वगैरा दिलवाने में मैं इन सब औरतों की मदद करती थी। धीरे धीरे मेरी जान पहचान औरतों के हक में आवाज़ बुलंद करने वाली संस्थाओं बढ़ गई थी।

एक दिन हुनरमंद संस्था का वार्षिक उत्सव मनाया जा रहा था तब कार्यक्रम के बीच में मुख्य अतिथि के पास एक महिला आकर बैठ गई। क्योंकि कार्यक्रम संयोजक का जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई थी तो मैं स्टेज़ के पास ही खड़ी थी। मेरी नज़र बार बार इस महिला पर केंद्रित हो रही थी। कुछ जानी पहचानी सूरत। चाय पान के समय हम दोनों एक दूसरे को पहचान की कोशिश कर रही थीं। अचानक दोनो ने एकसाथ बोला”संजना‘ ‘दीपाऔर हम यादों में खो गए। दीपा जीवन के दौर में महिला सशक्तीकरण संस्था से जुड़ी थी।

घर आने का न्यौता देकर दीपा चली गई। एक सप्ताह बाद ही उसका फोन आया और हम दोनों सहेलियां जीवन के मुख्य पलों को सांझा कर रही थी। दीपा ने बताया कि वह पति से अलग रह रही है। मेरे पूछने पर उसने बताया कि शादी को दो ही साल हुए थे जब उसके पति का प्रमोशन होना था। उनके घर पर बड़े अफ़सर सौरभ के साथ डिनर चल रहा था और बढिय़ा वाइन तो फौजी घरों में आम बात थी। हंसी मज़ाक का दौर चल रहा था। दीपा भी वाइन लेती थी क्योंकि ये बहुत आम बात थी उस परिवेश में। उस दिन सभी ने कुछ ज्यादा ही ले ली थी और रात के एक बज़ गए थे। दीपा के पति अजय ने सौरभ को वहीं रूकने के लिए कहा। दीपा ने बताया कि वाइन का आखिरी पैग पीने के बाद उसे कुछ नशा ज्यादा हो गया था और सिर में थोड़े चक्कर महसूस कर रही थी, इसलिए वह अपने कमर मे जाकर सो गई।

दूसरे दिन सुबह नींद खुली तो अपने बिस्तर पर सौरभ को पाकर परेशान हो गई। और वह जोऱ से चीखने लगी। सौरभ की नींद भी खुल चुकी थी और वह मंद मंद मुसकरा रहा था।पति अजय सुबह की सैर के लिए निकल चुका था। सौरभ ने कहा ” आज़ रात को मुझे तृप्त करने के लिए शुक्रीया। तुम वाकई बहुत हसींन हो”। दीपा अपने को ठगा सा महसूस कर रही थी और रात की कुछ धुंधली यादें दिमाग़ में अक्स ले रही थी…और वह ग्लानि से भर चुकी थी। सौरभ जा चुका था और पति अजय घर में दाखिल हुए थे। दोनों के बीच खूब झगड़ा हुआ और अजय ने कहा ” क्या हुआ यदि मेरे प्रमोशन के लिए सौरभ को एक रात खुश कर दिया ?”

दीपा ने बताया कि उसी दिन वह अजय को छोड़कर चली आयी थी। जख्म गहरे थे। तलाक की प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसने अपने आप को इस संस्था के कार्य में झौंक दिया था। पैसे की दिक्कत नहीं थी। मां बाप ने उसे पूरा सहारा दिया था। अच्छे मनोचिकित्सक से उसका इलाज़ करवाया था। लेकिन दीपा ने बताया कि उसके साथ जो विश्वासघात हुआ उसके निशान इतने साल बाद भी अंकित हैं यद्यपि वह सब भूलना चाहती है पर कभी न कभी उसके मन मस्तिष्क पर सब कुछ छा जाता है और वह चीख चीख कर कहती हैमी टू

दीपा जैसी कहानी हमारे आसपास, हर गांव, कसबे, शहर व हर वर्ग में घटती रहती हैं लेकिन उन औरतों में अभी हौंसला नहीं है अपनी कहानी शेयर करने का, क्योंकिमी टू के भंवर में उलझकर गृहस्थी की नींव को हिलाना नहीं चाहती और दूसरा कारण ये भी हो सकता है कि अभी आत्मनिर्भर भी नहीं हैं जो इस भंवर में उलझें। तीसरा कारण ये भी है कि न्यायालय में फाइलों के अंबार पहले ही हैं और उन्हें नहीं लगता कि उनके जीते जी न्याय मिल जाए। फिर कोइ साक्ष्य थोड़े ही उन्होंने रखें होगें जो अब आवाज़ उठाएं। लेकिन जो लोग ये सोचते हैं कि उसी वक्त आवाज़ उठानी चाहिए थी तो मेरा मानना ये है की “ जो इन हादसों से गुज़रता है वही समझ सकता है कि अपराध बोध, ग्लानि, आत्मविश्वास की टूटन के भंवर से निकलने मे वर्षों लग सकते हैं।

एक फेसबुक पोस्ट मैं पढ़ रही थी। किसी ने लिखा था-
” काम निकलवाना हो तो ‘ Sweetu’ और काम निकल जाए तो ‘Me Too'”
मेरा सवाल ये है कि ” काम करने के लिए क्या पुरूष एक औरत की अस्मिता से खेलेंगे?”
विचारणीय प्रश्न है। सोचिए जरा।

✍️©️”जोया”14/10/2018.

IMG_20181214_003746.jpg