Category Archives: नारी शक्ति

अविवाहित लड़कियां

वे बंधी होती हैं अपने सपनों से
चूड़ियों की खनक की जगह
उन्हें सुनाई देती है कोयल की कूक,
उनके स्वास में घुली होती है
फूलों की वादियों की महक,
पायल की झंकार की जगह
वो सुनती हैं
बहते झरने का संगीत,
नदियों के संगम का आहृलादित स्वर
भरता है उनकी रगों में जोश,
पहाड़ों की ऊंचाई से सीखती हैं
वे सीना तान कर खड़ा रहना,
मस्तक पर बिंदी की जगह
उन्हें लुभाता है
आत्मसम्मान का वृहद टीका,
मंगलसूत्र की जगह
वे पहनती हैं
उपलब्धियों की माला,
लक्ष्मण रेखा के परे
वो देखती हैं विस्तृत गगन,
बाज़ सम नापती हैं नभ
बादलों से ऊपर उड़कर
आंकती हैं हुनर की क्षमता,
वे बेफिक्री से लगी रहती हैं
सपनों को हकीकत में बदलने में
समाज में उठाए गए सवालों को
कर दरकिनार,
बढ़ती हैं मंजिल की ओर
अविवाहित रहने वाली लड़कियां
इसलिए अविवाहित नहीं रहती कि,
उन्हें कोई पसंद नहीं करता,
वे शादी करेंगी
उन पुरुषों से, जिन्हें वे पसंद करेंगी
ऐसे पुरुष
जो सही मायने में उनकी उड़ान में संग संग उड़े।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २९/०६/२०२०

सृष्टि चक्र#मां

मांए
कसकर बांध देती हैं
सारी तकलीफें चोटी में,
और
हर सुबह लग जाती हैं
बच्चों के सपने पूरे करने,
रोटी बेलते वक्त
आकार देती हैं, उनकी
छोटी-छोटी खुशियों को,
गर्म दूध में बोर्नविटा के साथ
घोल देती हैं अपने स्नेह की उर्जा
पति के लिए,
चाय खौलते वक्त
खौल देती हैं पिछली रात की कहासुनी ,
सभी के लिए टिफिन लगाते वक्त
छुपा देती हैं
पौष्टिक आहार के साथ दुआएं,
घर लौटने पर,
उतारती हैं सबकी नज़र
मांए
कभी थकती नहीं हैं,
लेकिन वो थकती हैं
जब उनसे कहा जाता है
“घर में सारा दिन तुम करती ही क्या हो?”
वे थकती हैं
जब, बच्चे बड़े  होने पर कहने लगें
“आप चुप रहो, हमें मालूम है सही ग़लत “
मां को थकने मत दो,
मां थक गई तो सृष्टि चक्र रुक जाएगा
जो निर्मित हुआ है वह ढ़ह जाएगा
ढ़हने से बचना है तो
मां का सम्मान करो,
उसे थकने मत दो।
©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१६/०६/२०२०

दुआ

दुआओं का कोई छोर नहीं होता
बरसने लगती हैं तब
कट जाते हैं
सारे पाप
रब की रहमत बरसती है
तो मां मिलती है
मां की दुआ बरसती है तो
हर लेती है
सारे संताप।

मैंने देखा है
मां को मंदिर में
दंडवत हो
मेरे लिए दुआ मांगते
मैं
मां के पैर पखार कर
बटोर लेती हूं दुआएं।

सब कहते हैं मां
बूढ़ी हो चली,
मैं कहती हूं
मांए कभी
बूढ़ी नहीं होती
उनकी तो
उम्र बढ़ती है।
©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २०/०५/२०२०

उत्तरदायित्व।

तेरे मेरे बीच

एक गहरी खाई पनप चुकी है,

मैं जिस छोर पर खड़ी हूं

वहां, पहुंचने से पहले

तुम्हें

मेरी ,हर काली रात का ,उत्तरदायित्व लेना होगा।

मेरे सपनों को मसलकर

ये तुमने , जो ख्याति प्राप्त की है,

सदियां गवाह हैं,

मेरे वजूद को, असंख्य जंजीरों में जकड़

त्याग, समर्पण व करुणा की देवी जैसे

पाशों में लपेट,

मेरी ज्ञानचक्षु की पुतली में आग लगा

मेरे अस्तित्व, पर हमला कर,

अंहकार में चूर,

तुम , रावण सम, अट्टाहास करते रहे,

इस बात से, बेखबर

कि

अग्नि की तपिश को सहते हुए

मैं, तुम्हारी

लंका में विचरण करती रही

और,

हौंसलौं के दम पर, तुम्हारे बनाए ऊसलों को,

खाक करने पर रही आमादा।

कुछ, समय दिया था तुम्हें

कि, भूल सुधार करोगे

लेकिन

तुम्हें, स्वनिर्मित अभेद्य सुरक्षा कवच पर, था

अति अंहकार,

यही , तुम्हारी

पराजय का कारण बना

इस बार,

मर्यादा पुरुषोत्तम राम नहीं,

बल्कि

स्वंय माता सीता की अनुजा ने

तुम्हरा संहार किया है

और

स्व के अस्तित्व को

एक नयी पहचान दी है।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २६/०४/२०२०

परछाई

परछाई#औरत।

उसने कहा,

परछाई बनना मेरी नियति,

मैंने कहा

परछाई बनना, तुम्हारी नियति नहीं

बल्कि ,पस्त हौसलों का है स्वरुप

उसने कहा,

परछाई बनना मेरी विविशता,

मैंने कहा

नहीं , मैंने

विविशता के घोर अंधेरों में भी,

सपने पलते देखें हैं

देखा है, उन्हें आकार लेते

जैसे,

दीवारों के छिद्र में से

सृजन का बीज लिए

पीपल का वृक्ष

जैसे

कटे हुए वृक्ष के ठूंठ से

एक टहनी होती प्रस्फुटित

और

उस पर लगा होता है

एक फल।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”२५/०४/२०२०

अंतहीन सिलसिला

अंतहीन सिलसिला

अजय, सुसराल पहुंचा था, बच्चों से मिलने के लिए। उसकी पत्नी, नीलम एक महीने से अपने मायके आई हुई थी और उसकी एक सात वर्षीय लड़की, रुही, व एक चार साल का बेटा, विक्की भी नानी के घर अपनी मम्मी के साथ आए थे।

नीलम, पति के साथ हुए झगड़ों व हिंसात्मक व्यवहार से तंग आ चुकी थी। अजय, फ़ौज में कैप्टन के पद पर कार्यरत था। शुरू के एक आध साल तो खुशी-खुशी बीते लेकिन फिर , हर रोज़ की मारपीट व गाली गलौज़ का एक अंतहीन सिलसिला शुरू हुआ। नीलम, यही सोचती रही कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा । अजय के साथ तालमेल स्थापित करने का एक ही मुख्य कारण था कि गलती करके वह क्षमा मांग लेता था।

नीलम और अजय की अरेंज्ड मैरिज हुई थी। नीलम ने अंग्रेजी ऑनर्स से स्नातक की डिग्री हासिल की ही थी कि उसकी शादी तय हो गई । उसके अलावा घर में दो बहनें भी थी, रिश्ता बढ़िया मिल रहा था तो उसके माता-पिता ने अवसर हाथ से नहीं जाने दिया। नीलम के तीखे नयन नक्श व गौर वर्ण ने अजय को तो जैसे सम्मोहित ही कर लिया था। उसने तुरंत इस शादी के लिए अपनी रजामंदी दे दी थी। नीलम  से सहमति लेने की कोई आवश्यकता मां बाप ने नहीं समझी। चूंकि लड़का अच्छे ओहदे पर नियुक्त था व गठीला नौजवान था, इसलिए नीलम ने भी मौन सहमति दे दी थी।  

ऑफिसर की पत्नी  होने के नाते, नीलम को किसी भी सुख सुविधा की कमी नहीं थी। एक छोटे से कस्बे से संबंध रखने वाली ,इस लड़की के लिए सब कुछ सपने जैसा था। आफिसर कल्ब की पार्टीयां, नीलम के लिए एकदम नया अनुभव था। धीरे धीरे अपनी झिझक एक तरफ छिटक कर वह वहां के कल्चर से तादात्म्य स्थापित करने में व्यस्त रही। करीने से बंधी साड़ी, कमर पर लहराते लम्बे घने बाल, व होंठों पर खिली मुस्कराहट , किसी को भी आकर्षित करने के लिए काफी थी। उसका सुरीला कंठ, महफ़िल में बहुत वाहवाही बटोरता था। “Once more.. once more”  की अपील पर वह पुरानी फिल्मों के दर्द भरे नगमे , दिलकश अंदाज में गाती थी। शादी के कुछ एक महीनों में  ही उसने  ऑफिसर्स कल्ब में खासी पहचान बना ली थी। नीलम को भी अपनी खूबसूरती व किस्मत पर नाज़ था… लेकिन ये खुशी उसके जीवन में क्षणभंगुर ही रही… अजय विहृस्की के पैग कंठ में उड़ेलने के बाद, अक्सर ही नीलम के साथ किसी न किसी तरह के बहाने ढूंढकर, गाली गलौज़ व मारपीट करता रहता था… ऐसा नहीं था कि नीलम चुप रहती थी , पूरी बहस होती थी और यही बात पुरुष के अहम को चोट पहुंचा गई। अजय का कहना था कि, ” पत्नी होकर , जुबान लड़ाती है?”

पुरुष दंभ , नारी को हमेशा कमतर आंकता है और हमेशा अनुगामी देखना चाहता है। इसमें उसका दोष नहीं है, दोष है नारी जाति की सहनशक्ति का… वह बच्चा, जो आज पुरुष है, अपने घर में उत्पीड़न देखता है… मां को पिटते.. फिर मां बाप में सुलह होते … वही प्रक्रिया दोहराते..उस बच्चे के अवचेतन मस्तिष्क में न चाहते हुए भी सब रजिस्टर होता रहता है… फिर वह बच्चा जब पुरुष बनता है तब, बीबी को सवाल जवाब करते  हुए बर्दाश्त नहीं कर सकता, जिसका परिणाम घरेलू हिंसा…।

समय बदला, लड़कियों की सोच बदली..गृहलक्ष्मी, देवी, सीता, सावित्री की उपाधियों से  वे स्वंय को अलंकृत नहीं करना चाहती… उन्हें चाहिए प्रेम व सम्मान…उनके अवचेतन मस्तिष्क में भी, घर की दहलीज के भीतर होती घरेलू हिंसा  के चित्र अंकित होते हैं और यहीं से मुखर होते हैं उनके विरोधी स्वर…  वे काफी सहन भी करती हैं … लड़कियां, अच्छी तरह समझती हैं, समाज के अलिखित कानून को, जहां उसे ही कटघरे में खड़ा, केवल बाहरी लोग ही नहीं बल्कि स्वंय के मां बाप भी कभी ना कभी करेंगें। इसीलिए नब्बे प्रतिशत महिलाएं खामोशी का दुशाला ओढ़कर जीवन जीती रहती हैं।

नीलम ने जब, खुद को घुटन के उस स्तर पर पाया , जहां सांस लेना भी दुभर  हो रहा था, तब पति के ऑफिस जाने के बाद,  दोनों बच्चों को लेकर, अपने मायके पहुंच गई थी। पिछली रात अजय ने उसे शारीरिक संबंध बनाते समय, जिस भाषा की मर्यादा को लांघा था व दुष्टता का परिचय दिया था, वो  वाक्या, उसकी रुह को छलनी कर गया… निर्णय हो चुका था, जिसपर उसे अडिग रहना था… वही निर्णय उसे आज, मां बाप की चौखट पर ले आया था… किसी भी  शादी शुदा लड़की के लिए यह परिस्थिति सुखद नहीं होती है, लेकिन मजबूरी उसे मायके का रुख करने के लिए बाध्य कर देती है, विशेषतः जब वह नौकरीपेशा न हो…मां ने बेटी की पीठ पर बरसाए कोड़ों के निशान देखे और उसका ममत्व चित्कार कर उठा।

नीलम, हर झगड़े के बाद पति के पास खुद लौट जाती थी, मां बाप भी उसे समझा बुझाकर कर वापिस भेज देते थे, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। नीलम को मायके आए ,एक महीना बीत गया था। अजय, इसीलिए अपनी सुसराल पहुंचा था, लेकिन उस वक्त नीलम, एक आवासीय विद्यालय में शिक्षिका के पद हेतु  साक्षात्कार देने  के लिए जा चुकी थी। अजय को, नीलम की मां ने खूब खरी खोटी सुनाई। उसने कहा,

जब तुम मेरी बेटी को नहीं रख सकते ,तो हम क्यों तुम्हारे बच्चों को रखें। इन्हें, ले जाओ और फिर कभी अपनी सूरत मत दिखाना।”

नीलम की मां ने बच्चों का बैग तैयार किया और दोनों को अजय के साथ कर दिया। वह अपना सा मुंह लेकर वहां से लौट आया, क्योंकि नीलम की मां उसकी कोई दलील सुनने को तैयार नहीं थी और ना ही उसे क्षमा करने का उसका इरादा था… शाम को नीलम घर पहुंची और वस्तुस्थिति का भान हुआ। उसका हृदय, अपने लाड़लों के लिए तड़प उठा, लेकिन उसके सामने कोई विकल्प नहीं था। मां ने चेतावनी दे दी थी कि , “उस राक्षस के बच्चों  के लिए मेरे घर में कोई जगह नहीं है”। नीलम, अब, ऐसे दोराहे पर खड़ी थी, जहां उसे एक ही मार्ग चुनना था। अजय के पास जाने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता था, इसलिए फिलहाल के लिए दूसरा मार्ग ही चुना। उसके पिता ने वकील से मुलाकात की और तलाक का नोटिस अजय को भिजवाया। नीलम की ओर से आए, तलाक के कागज़ देखकर, वह सकते में आ गया। क्रोध, पश्चाताप व बदले की भावना एक साथ उसके मस्तिष्क में घर कर गई। उससे, ये अपमान सहन नहीं हुआ…फिर जारी रहा तारिख पर तारिख का अंतहीन सिलसिला… उसने जिद्द ठान ली थी कि, नीलम को इतनी आसानी से तलाक तो वह नहीं देगा। अदालतों में वैसे भी मुकदमे लंबे चलते हैं, देश की जनसंख्या के हिसाब से अदालतें कम हैं और मुकदमों की तादाद अधिक। पूरी व्यवस्था पंगु होकर रह जाती है..पक्ष/प्रतिपक्ष की तरफ़ से तारिख ले ली जाती हैं…इस सबके बीच पिस रहे थे तो दो मासूम बच्चे, जो अब दादा दादी के पास पल रहे थे। अजय को जिम्मेदारी का अहसास होता तो नौबत यहां तक नहीं आती। उसकी लापरवाही का खामियाजा, उसके वृद्ध मां बाप व बच्चों को भी भुगतना पड़ रहा था।

यहां अब टकराव अजय और नीलम के बीच नहीं रह गया था.. बड़े शामिल हो चुके थे जिन्होंने इसे अपने आत्मसम्मान का प्रश्न बना लिया था…।

अदालत ने, अजय को बच्चों के भरण-पोषण के लिए निर्देश दिया, तब तक नीलम आवासीय विद्यालय में शिक्षिका नियुक्त हो चुकी थी…अजय ने भरण-पोषण देने से बचने के लिए अपनी फौज़ की नौकरी ही छोड़ दी। जमीन भी अपने नाम से उतरवा दी और अदालत में खुद को बेरोजगार प्रस्तुत किया। अजय के पिता के पास कृषि योग्य अच्छी खासी ज़मीन थी, तो आमदनी बढ़िया हो जाती थी। इधर, नीलम, बच्चों की याद में , एक साल अवसादग्रस्त रही। मां बाप ने उसे भी कह दिया था कि, ” अपना खर्च खुद वहन करो… तीन बेटियां हैं। हम किस किस का ख्याल रखें..अपना कमाओ और खाओ”।  माता-पिता की तरफ से चुभते शब्दों ने  नीलम की मानसिक स्थिति को गहरा आघात दिया। एक बेटी को, यदि सुसराल में कष्ट होता है तो वह मायके में स्नेहिल स्पर्श की उम्मीद रखती है। नीलम की बहनों ने उसे काफी संबल प्रदान किया और मनोचिकित्सा दिलवाने में मदद ही नहीं की बल्कि उसकी हर छोटी से छोटी जरूरतों का ध्यान रखा।

समय के साथ , नीलम भी प्राइमरी स्कूल के बच्चों में घुल-मिल कर रहने लगी। उसे प्रंबधन कमेटी ने छात्रावास की वार्डन बना दिया। कमेटी, नीलम की कार्यशैली व परीक्षा परिणामों से बहुत प्रभावित थी। नीलम के केस को अदालत में उलझा हुए एक दशक हो चुका है… अजय  बच्चों को नीलम से नहीं मिलने देता … अदालत के आदेश पर बच्चों को मिलवाने उनके दादा जी लेकर गए तो सही लेकिन बच्चे डरे सहमे हुए रहे। उनके दिलों में नीलम की छवि एक स्वार्थी मां की थी। उनकी बातें सुन कर नीलम के घाव फिर रिसने लगे। नानी के प्रति भी उनके मन मस्तिष्क में ज़हर भरा हुआ था और शिकायतों का अंबार लगा था।  बच्चे मिट्टी के घड़े की मानिंद होते हैं, उन्हें जहां प्यार मिलेगा, वहीं उनकी निष्ठा बन जाती है।  अनेकों बार ऐसा भी होता है कि बच्चे बड़े होकर विद्रोही बन जाते हैं … समाज उन्हें दुश्मन नज़र आता है। माता-पिता की  छत्रछाया से महरूम रहने के कारण उनके हृदय का कोना, एक ऐसे खालीपन का अहसास कराता है , जहां उन्हें, अंधकार के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता।

स्त्री पुरुष के अहम के टकराव का सिलसिला अंतहीन लगता है… जिसमें सबसे अधिक पीड़ा कोई झेलता है तो वह हैं उनकी संतानें… जिन्हें एक तरफ संगी साथियों के कटाक्ष का सामना करना पड़ता है तो दूसरी ओर परिचितों की दिखावटी सहानुभूति से वे आहत होते रहते हैं, जिसका दूरगामी असर उनके भविष्य में काला साया बनकर, साथ साथ चलता है। समाज में इस अंतहीन सिलसिले पर कुठाराघात करने के लिए सभी पक्षों को आत्मलोकन करना होगा।

में©®✍️  डा सन्तोष चाहार ” ज़ोया”२१/०४/२०२०

उसका वेलेंटाइन

जिंदगी की तपती, सुलगती रेत पर वह चलती जा रही थी।
उसके पांव के छाले, जीवन की असीम कठिनाईयों और संघर्ष की पीड़ा की ओर इशारा कर रहे थे। आंखों के काले घेरे उसके बैचेन मन की कंदराओं में टूटे सपने को रेखांकित कर रहे थे। वह आज फिर  प्रेम की पचासवीं वर्षगांठ पर उस रेत के टीले पर बैठी थी, जहां वर्षों पहले गांव के ठाकुर की कुदृष्टि, “उस हसीन जोड़े” पर कुपित हुई थी और अपने कारिंदों से उन्हें अगवा कर लिया गया था। युवक को तो दिन दहाड़े सबके सामने पेड़ पर फांसी से लटका दिया गया था।  गांव में किसी की हिम्मत नहीं थी इस जघन्य कृत्य को ललकारे। मृगनयनी को ठकुराइन की देखरेख में  नज़रबंद कर लिया था ताकि वह पुलिस को सूचना देने की हिमाकत ना करें। चूंकि ये जोड़ा परदेशी था तो गांव वालों को भी इस हत्या से कुछ लेना-देना नहीं था।
मृगनयनी के हुस्न पर ठाकुर की कुचेष्टा रहती थी लेकिन ठकुराइन की भी कड़ी नजर ठाकुर पर रहती थी। मृगनयनी को उस वक्त दो माह का गर्भ था। इसलिए ठकुराइन ने उसे अपनी  देखरेख में रखा था। मृगनयनी ठकुराइन की विशाल हृदयता की मुरीद हो गई थी और उसकी सेवा सुश्रुषा में उसके दिन बीतने लगे। समय बीता और मृगनयनी को एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई…।

मृगनयनी का समय अब बच्चे की देखभाल में व्यतीत होने लगा और पति बिछोह की पीड़ा बेटे की किलकारियों से कुछ कम होने लगी। दर्द को थोड़ा कम करने में बच्चे की मीठी मुस्कान मददगार साबित होने लगी…अंश अब दो साल का हो गया था और अपनी तोतली आवाज़ में सबका मन मोह लेता था। एक दिन मृगनयनी ने ठकुराइन से विनम्र निवेदन किया कि वह अब शहर लौट जाना चाहती है… उसे डर है कि ठाकुर की कुचेष्टा उसे कभी अपना शिकार बना सकती है।  ठकुराइन  भी अब मृगनयनी की जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहती थी। उसे भी यह लगने लगा था कि वह अब तक मृगनयनी का सुरक्षा कवच बनी रहेगी। ठकुराइन ने अच्छे मानस का परिचय देते हुए, मृगनयनी को   उसके सेवा भाव से खुश होकर कुछ रुपए  दिए और अपनी प्रियतम सहेली के नाम चिठ्ठी देकर , एक विश्वास पात्र दासी के  साथ  शहर भेज दिया। ठकुराइन की ये सहेली एक विद्यालय की प्रिंसिपल थी। इस तरह से मृगनयनी को वहां चपरासी का काम भी मिल गया और रहने के लिए एक कमरा, प्रिंसीपल साहिबा की कोठी  के बेकयार्ड में। मृगनयनी स्वाभिमानी महिला थी और वह प्रिंसीपल के घर का कामकाज कर, गुजर-बसर करने लगी। अंश की पढ़ाई का जिम्मा प्रिंसीपल महोदया ने ले लिया था। अंश शुरू से ही बहुत होशियार था…।

ठकुराइन राजरानी ने मृगनयनी को शहर भेजने के लिए उपयुक्त समय चुना। उन दिनों  ठाकुर ज़ोरावर सिंह एक सप्ताह के लिए जंगलों में शिकार पर गया हुआ था।  लौटने पर, मृगनयनी को हवेली में ना पाकर, ठाकुर ज़ोरावर सिंह ने ठकुराइन  से पूछताछ की। पचास साल की प्रौढा़ ठकुराइन जानती थी कि ठाकुर क्यों आसमान सिर पर उठाए है। वह ठाकुर की कुचेष्टा से वाकिफ थी।  उसके साथ रहते हुए वह गांव और इलाके की भोलीऔर गरीब प्रजा पर अनेकों प्रकार के जुल्म होते देख चुकी थी। आज उसकी आत्मा ने उसे झकझोर दिया और ठकुराइन राजरानी ने ठाकुर को अंजाम भुगतने की चेतावनी दे डाली। हमेशा से चुप रहने वाली ठकुराइन की बुलंद आवाज़ से ज़ोरावर सिंह सहम गया था। वह जानता था कि यदि ठकुराइन अपनी जिद्द पर आ गई तो उसे सलाखों के पीछे भिजवा देगी। ज़ोरावर सिंह की जवानी तो रंगीन मिज़ाज में बीती थी, अब वह बुढ़ापे की दहलीज पर कदम रख चुका था। इसलिए पुलिस और मुकदमों के चक्कर से बचना चाहता था। रात के अंधेरे में जब मृगनयनी के पति मणिरत्नम को गांव की मर्यादा भंग के जुर्म में पेड़ पर लटका कर सजा ए मौत  दी गई थी तब, ठकुराइन हवेली की गुप्त खिड़की से सब देख चुकी थी…।

मृगनयनी का मणिरत्नम के सिवाय इस दुनिया में कोई नहीं था। मणिरत्नम से उसकी मुलाकात एक मेले में हुई थी। मणिरत्नम मंत्रमुग्ध हो उस वक्त मृगनयनी की रस्सी पर चलने की कला को देख रहा था… तमाशा खत्म होने के बाद मणिरत्नम की सीटी की आवाज़ से मृगनयनी का ध्यान उस तरफ गया। नज़रें एक दूसरे में समा चुकी थी। नटों के मुखिया से इजाजत ले मृगनयनी, मणिरत्नम के साथ मेला घूमने लगी और फिर कभी डेरे में लौट कर नहीं गई। दो साल तक युवा जोड़ा एक अंजान शहर में, जिंदगी की छोटी-छोटी खुशियों में जीवन का आनंद लेता रहा । एक दिन मृगनयनी ने   मणिरत्नम के साथ  रेगिस्तान में,  रेत के टीले देखने की योजना बनाई। उस साल वहां ऊंटों का उत्सव भी होना था। शहर से कमाई कुछ पूंजी जमा थी और मणिरत्नम अपनी पत्नी/ प्रेयसी को रेगिस्तान के रेतीले टीलों की सुंदरता और भव्य सूर्यास्त का नजारा दिखाने के लिए जैसलमेर पहुंच गया।  वहां उन्होंने देखा कि बहुत से विदेशी सैलानी भी टीलों पर बने तम्बूओं में  राजस्थान प्रवास का पूरा आनंद ले रहे थे।
उसी दिन वहां से ठाकुर ज़ोरावर सिंह, बग्घी में सवारी करते हुए निकल रहा था। युवा जोड़ा सूर्यास्त के नज़ारे को अपनी आंखों में कैद करने में लीन था। ठाकुर की बग्घी की ओर उनका ध्यान नहीं गया।  वैसे भी वो ठहरे परदेशी, उन्हें वहां की परम्परा का भान भी नहीं था। लेकिन ठाकुर ने इसे अपना अपमान समझा और पीछे  उसकी सुरक्षा में घोड़े पर सवार  लठैतों को, युवा जोड़े को उठाने का निर्देश दिया…  मणिरत्नम को  ठाकुर ज़ोरावर सिंह के अहम की वजह से अंजाम भुगतना पड़ा और  मृगनयनी को जीवनसाथी की मृत्यु का आघात।

घटनाक्रम को बीते सालों गुज़र गए  लेकिन मृगनयनी आज भी इन्हीं रेत के टीलों में अपने प्रेमी की खुशबू तलाशने आती है। अंश पढ़-लिख बड़ा अफसर बन चुका है और बेटा ही मृगनयनी को गाड़ी में लेकर आता है… शायद वह भी पिता का आशीर्वाद प्राप्त करने आता है और ममता का कर्ज चुकाने का प्रयास भर करता है।
©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१४/०२/२०२०

एहसास

तुम्हें,
एहसास नहीं,
तुम्हारे द्वारा फेंकें गए
एक एक पत्थर को चुन चुन कर,
यथार्थ की धरती पर,
टूटे सपनों को
उसने
हकीकत में बदला।
तुमने
सोचा था, कि
पाषाण हृदय से टकरा कर
वह
चूर चूर हो जाएगी।
वक्त
बना गवाह,
कुरीतियों के
पत्थर तोड़कर
सदियों से अंतस में दफ़न
हौंसले का बीज
पनपकर
विशाल वृक्ष बना।
उसकी,
शाखाओं पर
नारी शक्ति के हरे पत्ते
नित नये फूट कर
करते रहे
दमघोंटू वातावरण में,
नयी ऊर्जा
नये पैमाने
नयी सोच की,
ऑक्सीजन का
उत्सृजन।
ये हरे पत्ते
सोखते रहे
परंपरा
की, जहरीली
कॉर्बन डाई ऑक्साइड
व निर्मित करते
वृहदाकार शीतल छांव।
इस
छांव तले,
बेटीयां,
जिंदगी के पन्नों पर,
करती
स्वाभिमान के हस्ताक्षर।
वे, जो
राहें चुनती,

हासिल करती,
होती
उनके सुमुख,
पितृसत्ता भी नतमस्तक।
तुम्हें
एहसास हो या ना हो
मंजिल की ओर
बढ़े
नारी के ये कदम
मुकाम
हासिल कर
विलक्षण क्षमता का
देती रहेंगी यूं ही परिचय।
✍️©® डा.सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०६/१०/२०१९

हिचकी

संघर्षों
की सड़क से
गुजरने के बाद
बूढ़ी अम्मा
आज
नितांत अकेली है,
हां अकेली
भरेपूरे परिवार में,
हैं खोए
सब अपनी धुन में।
घर में
हैं सब सुख-सुविधा
लेकिन मन टटोलने
की फुर्सत किसे?
बेटा -बहू , पोता -पोतबहू व्यस्त
स्वयं की गृहस्थी में।
जीवनसाथी
वर्षों पहले
जा चुके अनंत यात्रा पर
बूढ़ी
अम्मा को हर पल, कमी
उनकी खलती।
अम्मा
रखती तो है
स्वयं को,
रोजमर्रा की दिनचर्या में व्यस्त,
सुबह,
पूजा का दीप जलाकर
तुलसी है सींचती
कांपते हाथों से
रसोई बना कर
पहली रोटी गाय को खिलाती,
फिर,
पक्षियों के लिए दाना डाल
करती हर रोज गीता-पाठ
बाबा ने सिखाये
जो हिज्जे,
बने अकेलेपन में,
अम्मा की अनमोल पूंजी।
अम्मा,
नियम से
संध्या का दीप जला,
बाबा से
बातचीत करने
पहुंचती है पुराने घर,
जो उन्होंने बनाया था।
वहां बैठकर
सुनाती है उन्हें,
सब बेटियों के सुख-दुख के किस्से
अम्मा,
कभी हंसती
तो कभी आंसू पोंछती पल्लू से,
कहती है,
“अच्छा किया तुमने.. बेटियों को पढ़ाकर
मेरा दिल खुश है… वे किसी पर निर्भर नहीं…
तुमने, शिक्षा की जो अलख जगाई.. बेटियों ने भी अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा दिलवाई… वे मायके से कुछ नहीं लेती”
घर के पास खेलते
बच्चों को होता कोतहूल
पूछते एक दूसरे से
अम्मा क्यों आंसू बहाती
वो तो हमेशा बिखेरती मुस्कान।
एक दिन,
उसी घर की दहलीज पर
राहगीरों ने देखा
महिला-सतसंग की टोली
अम्मा को घेरकर है बैठी
पूछने पर पता चला,
देखा था
अम्मा को, बाबा से इशारों में
बातचीत करते,
आयी थी एक हिचकी,
उसके बाद से ही
अम्मा
एकतरफ लुढ़क गई
और
उनकी दिव्य-आत्मा
अंनत यात्रा की ओर बढ़ गई
अब
बेटियां मायके कम जाती हैं
मां नहीं तो मायका कैसा?
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २६/०९/२०१९

मुस्तक़बिल

मुझे
नाज़ है अपने
छोटे छोटे कदमों पर
राह में आई हों
कितनी ही दुश्वारियां
चलना पड़ा चाहे अंगारों पर
भंवर में उलझी चाहे
जिंदगी की नाव
जीर्ण शीर्ण हुआ हो ये जिस्म
मेरे नन्हें कदम
चाहे चले कछुए की चाल
ये रुके नहीं
थके नहीं
बढ़ते रहे मंजिल की ओर
बांध बन रोकते रहे
आंसुओं का सैलाब
इकट्ठा कर
टूटे दिल की किरचें
बढ़ते रहे लक्ष्य की ओर
हार कर
रुक जाना चाही जब धड़कन
अदृश्य शक्ति की मानिंद
फूंकते रहे प्राण
रात के स्याह बदन से
तोड़कर ला पाई थी तब
सफलता के सितारे
सधे कदमों ने
मिटा दिया था
जमीं आसमां का फासला
लिखी गई थी फिर
विलक्षण क्षमता की ऋचाएं
यूं ही चलते चलते
कदम
करेंगे तय
मेरा मुस्तक़बिल।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१५/०९/२०१९