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Simple and honest. Life is a battle, fight it bravely

दुल्हन की पोटली

दहेज़ लेने से मना कर देने पर,

उन्हें तो सुसराल कुछ लाना था

इसलिए आजकल

दुल्हनें पोटली में बांध कर,

लेकर आती हैं

एजूकेशनल लोन,

लाने की,परंपरा तो निभानी होती है

टोकने पर, पतियों को चुंगल में ले चुकी

ऐसी फेमिनिस्ट लड़कीयां

घरों में तूफान खड़ा करवाती हैं,

शादी के कुछ समय बाद

भेद खुलने पर,

टकराव तो निश्चित होते हैं

घर में बैठकर,

प्रति मिनट की खबर रखने वाली

बेटी के सुसराल में, दखलंदाजी करती माएं

वाकई पढ़ी-लिखी गंवार होती हैं,

बेटीयों की कमाई को ऐसी मांए निंयत्रित करती हैं

और

पतियों की कमाई को,

ये तथाकथित फेमिनिस्ट लड़कियां,

जिन्हें ये नहीं मालूम, कि

फेमिनिज्म का मतलब बदतमीजी नहीं होता,

झूठ और चालाकी नहीं होता

लोन की किस्तों के जाल में उलझाकर

प्रेम में अंधे हुए

लड़कों का करती हैं भरपूर दोहन,

रिंग सेरेमनी से लेकर

विदेशों में हनीमून तक

अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा

लगा देती हैं भावुक माएं,

फिर भी

भड़क जाते हैं ऐसे लड़के

जिन्होंने प्रेम-विवाह किया होता है,

वो

सभी सास फिर बुरी कहलाती हैं,

क्योंकि वे सटीक सवाल उठाती हैं।

ऐसे लड़के

भूल जाते हैं, माएं


जूझ जाती हैं विषम परिस्थितियों से

ताकि बच्चों के सपनों में रुकावटें ना आएं,


वे

समझते क्यों नहीं ?

जो माएं अपने बलबूते पर

बच्चों को कैरियर में स्थापित

करने का दम रखती हैं,

तो

बहू, बेटे की

झूठ, बदतमीजी और चालाकी भी

बर्दाश्त नहीं करेंगी,

क्या ग़लत होता है?

ये कहना,

इन तथाकथित

फेमिनिस्ट लड़कियों के घरवालों से

कि, “दुल्हनें कर्ज़ लेकर नहीं आती”।

दहेज़ नहीं, कर्ज़ भी नहीं

यहीस्वस्थ परंपरा होनी चाहिए।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०७/०७/२०२०

लम्हों की दास्तां

लम्हों की दास्तां

समुंद्र किनारे बैठकर यूं ही कितनी यादें ताजा हो गईं हैं।
आज से बीस साल पहले जब गोवा के रमणीय स्थलों को देखने के पश्चात, मैं एक बालू तट पर आकर बैठ गई थी। समुंद्र में उठती गिरती लहरों में टटोल रही थी, तुम्हारे साथ बिताए लम्हों की दास्तां।

प्रेम का सबसे खूबसूरत अहसास  मेरे मन मस्तिष्क में ऑक्सीजन बनकर जिंदगी को तरोताजा कर गया था। समुंद्र के वक्ष पर इठलाती बलखाती लहरें, हमें एक-दूसरे के कितने समीप ले आईं थीं। तुम्हारी बाहों में सिमटी, मैं प्रेम की पराकाष्ठा तक पहुंचने के लिए लालियत, लहरों के बिछौने पर तुम्हारे अधरो की प्यास बुझाने में अनेकों दूसरे जोड़ों की भांति मदमस्त होकर, अपनी झोली में उन मोतियों को बटोर रही थी, जिनके लिए मैंने इतनी दूर का सफर तय किया था।

तुम्हारे से बिछुड़ने के बाद जिंदगी के रंग फीके होकर मेरे चेहरे पर उदासी की अस्पष्ट लकीरों में उभर आए थे। जिंदगी केवल कर्त्तव्य की नदी पर बह रही थी। किसी ने यह जानना नहीं चाहा, इस नदी में आंसुओ का समुंद्र कहां विलीन हो रहा है। नदी का कर्त्तव्य ही है सींचते जाना, अपने किनारों पर सभ्यताओं को जन्म देना और पोषित करना। तुम जानते हो, कर्त्तव्यों से मैं कभी विमुख नहीं रही लेकिन जिंदगी में कर्त्तव्यों के साथ अधिकार भी तो मिलने चाहिए। अधिकारों के लिए मुझे क्यों जूझना पड़ा? गृहस्थी में सबकुछ परफेक्ट रखने की कोशिश में, कितने ही रंगों से महरूम रही मैं। तुम जानते थे रंगों से मुझे कितना प्रेम है, लेकिन यहां किसी को परवाह नहीं थी। मेरी हसरतें जो तुम्हारे संग आकाश छूने का जनून रखती थी, धीरे धीरे शिथिल होने लगी। एक लड़की, जब विवाह बंधन के पासों में लपेट दी जाती है तो उसके ख्वाबों के पंख कतर दिए जाते हैं। विशेषतः, जहां बेमेल शादियां होती हैं। गृहस्थी के कोल्हू में मुझे खूब इस्तेमाल किया गया। इन्हीं कुछ  जिम्मेदारीयों के बीच, तुम्हारी यादें कुछ सकूं के क्षण लेकर आती थी और तुमसे मिलने की इच्छा बलवती हो जाती थी।

पति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती रही, लेकिन मुझे हर बार महसूस होता था कि, मैं दौड़ना चाहती हूं और वे एक जगह पर जम जाते हैं।  जिंदगी में इतनी तटस्थता, ठहराव मुझे नहीं भाता था क्योंकि मैं दौड़ना ही नहीं उड़ना भी चाहती थी, लेकिन मुझे एक खूंटे से बांध दिया गया था, रस्सी, उतनी ही लम्बी छोड़ी जाती थी जितना उनको मुझे उपयोग करना था और तुम्हें तो मालूम है, मेरे पांवों में तो रोलर्स लगे थे। मैं तेज़ गति से खुले मैदान और बर्फीले पहाड़ों पर रेस लगाने के रोमांच को जीना चाहती थी। तुम्हें  याद तो होगा वो जीत जब ,मैंने पी टी उषा को भी एक बार पीछे छोड़ दिया था, राष्ट्रीय स्तर की स्कूल स्पर्धा में, उस दिन पूरी टीम ने मुझे सर आंखों पर बैठा लिया था। उस दिन तुम कितने खुश थे, जब हरियाणा की एक पत्रिका में मेरी तस्वीर छपी थी और लिखा गया था, ” ये लड़की एक दिन ओलम्पिक खेलों में जाएगी”।
लेकिन, कहां जाने पाई? 1980 के दशक में हमारा समाज खेलों के विषय में जागरुक ही नहीं था। पिता जी का आदेश था, ” पढ़ाई पर ही केंद्रित रहो”। सरकार ने भी कोई सहायता सुनिश्चित नहीं की। तुम लड़के थे, तुम चले गए एन डी ए में। मुझे भी आर्मी में जाना था लेकिन लड़कियों के लिए उस दौर में नहीं थे आप्शन। तुमसे शादी कर आर्मी का हिस्सा बनना चाहा, लेकिन मेरी राय कहां ली गई थी?  जिंदगी के बहुत सारे रंग यूं ही फीके होते चले गए लेकिन तुम्हारे प्रेम का रंग शादी के बाद, मेरे अंतर्मन की गहरी कंदराओं में सिमट गया।  एक खूबसूरत अहसास जो आज भी उतना ही सुगंधित है जितना पहले प्रेम का बीज अंकुरित होने पर था। उतना ही मुलायम है, जितना पहले स्पर्श में था। आत्मीय संबंध हमेशा गहरे होते हैं।

आज भी समुंद्र के किनारे बैठकर पलकें पसारे बैठी हूं, तुम्हारे इंतज़ार में। एक बार दोबारा जीना चाहती हूं, रंगों मे में डूब जाना चाहती हूं। यहां बैठी, इन हवाओं से तुम्हारा पता पूछती रहती हूं, उन लहरों को पकड़ने की कोशिश में रहती हूं, जिन लहरों पर तुम्हारा नाम अपने नाम के साथ लिख दिया था। आसमान में उठती घटाओं में तुम्हारे अक्स को तलाशती हूं, शायद मेरे प्रेम का बादल तुम से मिलकर आया हो। पॉम के लहराते, उन दोनों वृक्षों को भी मिलकर आई हूं , जहां तुमने प्रेम के दस्खत किए थे। यहां बहुत सारी सीपियां चुनकर रखी हैं, उस सीपी को टटोलने के लिए जिस पर तुमने हमारा नाम उकेर कर समुंद्र में डाल दिया था, ये कहते हुए कि, ” हमारा प्रेम भी समुंद्र जितना गहरा है, इसे छुपा देते हैं…एक दिन ये सीपी जब किनारे पर आएगी, उस दिन हम दुबारा मिलेंगे।” आज, मैं समुंद्र किनारे, उसी सीपी को तलाश रही हूं। बालू पर एक घरौंदा भी बना लिया है, ठीक उसी जगह, जहां हम दोनों ने मिलकर बनाया था। तुम्हारा चित्र अपने चित्र के साथ उकेर दिया है। देखो, इस चित्र में हम दोनों वृद्धावस्था में पहुंच चुके हैं, लेकिन हृदय अभी भी युवा है, जहां हमारे दिलों की तरंगें फिर मिलने को आतुर हैं। मुझे विश्वास है, जब मैं सीपी को ढूंढने में कामयाब हो जाऊंगी, उसी समय तुम यहां पहुंच जाओगे। तब तक मेरी प्रतिक्षा की घड़ियां टिक टिक करती रहेंगीं।
©® ✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०२/०७/२०२०

अविवाहित लड़कियां

वे बंधी होती हैं अपने सपनों से
चूड़ियों की खनक की जगह
उन्हें सुनाई देती है कोयल की कूक,
उनके स्वास में घुली होती है
फूलों की वादियों की महक,
पायल की झंकार की जगह
वो सुनती हैं
बहते झरने का संगीत,
नदियों के संगम का आहृलादित स्वर
भरता है उनकी रगों में जोश,
पहाड़ों की ऊंचाई से सीखती हैं
वे सीना तान कर खड़ा रहना,
मस्तक पर बिंदी की जगह
उन्हें लुभाता है
आत्मसम्मान का वृहद टीका,
मंगलसूत्र की जगह
वे पहनती हैं
उपलब्धियों की माला,
लक्ष्मण रेखा के परे
वो देखती हैं विस्तृत गगन,
बाज़ सम नापती हैं नभ
बादलों से ऊपर उड़कर
आंकती हैं हुनर की क्षमता,
वे बेफिक्री से लगी रहती हैं
सपनों को हकीकत में बदलने में
समाज में उठाए गए सवालों को
कर दरकिनार,
बढ़ती हैं मंजिल की ओर
अविवाहित रहने वाली लड़कियां
इसलिए अविवाहित नहीं रहती कि,
उन्हें कोई पसंद नहीं करता,
वे शादी करेंगी
उन पुरुषों से, जिन्हें वे पसंद करेंगी
ऐसे पुरुष
जो सही मायने में उनकी उड़ान में संग संग उड़े।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २९/०६/२०२०

ग्रहण

आजकल के सामाजिक परिदृश्य में बहुत सारे उदाहरण सामने आते हैं, जहां शादियां निभाई नहीं जा रही। तलाक के केस बहुत बढ़ते जा रहे हैं। कुछ शादियां छः महीने टिकती हैं तो कोई कोई साल से दस साल तक भी चलती हैं, और फिर तलाक फॉइल हो जाते हैं। कहीं पर लड़के की कमी गिनाई जाती है तो कहीं लड़की हावी रहती है। कारण जो भी हो, जिस रफ्तार से शादीयां टूट रही हैं, वह चिंताजनक स्थिति है।  शादी की संस्था पर तलाक एक ऐसा ग्रहण है, जो समाज के ताने-बाने को एक दिन पूरा निगल जाएगा, रह जाएंगे कुंठाग्रस्त लोग, जो अपनी खुशी कहीं कहीं ढूंढते फिरेंगें। लेकिन खुशी तो हमेशा भीतर होती है, उसे हम व्यक्ति में तलाशते रहते हैं। आज की पीढ़ी को ज़रा सा भी इल्म नहीं होता, कि तलाक लेकर, वे अपने माता-पिता की भावनाओं को कितना ठेस पहुंचाते हैं। जिंदगी भर की पूंजी बच्चों के लालन-पालन, पढ़ाई व शादी में खर्च करने के पश्चात, बुढ़ापे की ओर  कदम रखते मां बाप पर एक और परेशानी आन पड़ती है। आजकल की पीढ़ी, केवल अपना स्वार्थ देखती है और कुछ भी दिक्कत उठाने को तैयार नहीं होती। कामकाजी महिलाएं, तलाक लेकर, अपने बच्चों को मां बाप के पास छोड़कर, अपने कार्य में व्यस्त रहती हैं या किसी अन्य व्यक्ति में प्रेम ढूंढ़ती हैं।
जो माता पिता अब उम्रदराज हो चुके हैं, उन्होंने अपने जीवन-काल में अनेकों कष्ट उठा कर बच्चों की परवरिश की है। ये उस दौर के लोग हैं जिन्होंने अपने माता-पिता की हर बात को शिर्योधार्य किया लेकिन अब बच्चों की सुन रहे हैं। यदि बच्चों को सुना जा रहा है तो इसका, ये मतलब तो नहीं कि बच्चे बड़े होकर सिर्फ अपने लिए जीना सीखें। कभी कभी तो लगता है कि, हमारी ही परवरिश में गलती रही, जहां हर सुविधा तश्तरी में डाल कर दे दी गई, फिर भी बच्चों को वे सुविधाएं भी कम लगती हैं। अधिकतर, लड़कियां बहुत डिमांडिंग हो गई हैं। आज़ादी के साथ , जिम्मेदारियां भी आती हैं, ये उन्हें सोचना चाहिए। मां बाप ने, बेटी को बेटों की तरह पाला है तो इसका मतलब यह कदापि नहीं होना चाहिए कि, तर्क कुतर्क कर, उनका अपमान किया जाए। हमने अपने माता-पिता की सुनी, तो बहुत सही रहे, उन्होंने जो गलती कभी की होगी ,तो उसी अनुभव से सीखकर ही मार्गदर्शन किया। आज भी, यदि माता-पिता मार्गदर्शन करना चाहते हैं तो, उन्हें भी जीवन अनुभव से सीखा है। आजकल के बच्चे टेक्नोलॉजी में होशियार हो सकते हैं, ज्यादा आमदनी कमाना जानते हों, लेकिन अनुभव तो उम्र के साथ ही आता है।
मैं, यहां बात आम मध्यम वर्ग की कर रही हूं, जहां जीवन मूल्यों को संजोकर रखा जाता था लेकिन अब इस वर्ग में भी तलाक आम बात होती जा रही है। एकदम, सब कुछ हासिल करने की होड़, त्याग व समर्पण का अवसान, भागती-दौड़ती जिंदगी में कहीं ठहराव नहीं और फिर होती है विचारों की टक्कर। ठीक है, तलाक एक अॉपशन  रखा गया था समाज में, ताकि विकट स्थितियां बनने पर अलग हो सकें। लेकिन, आजकल, मेरे संज्ञान में बहुत से केस ऐसे भी आ रहे हैं, जहां दोनों लोग कुछ समय निभाते हैं, उसमें भी अपने अपने हित साध रहे होते हैं। फिर किसी को अपनी एक्स की याद आती है तो कोई और मोटी पार्टी से दिल लगा बैठते हैं। अनेकों कारण, सिर उठाकर खड़े हो जाते हैं। समाज की संरचना जब से हुई है, बहुत से किस्से कहानियां होती थीं, लेकिन पति पत्नी, एक-दूसरे को क्षमा कर आगे बढ़ जाते थे, समाज का ढांचा बना रहता था। क्षमा करने पर डोर और भी मजबूत हो जाती थी।
आज की पीढ़ी को थोड़ा ठहरकर सोचने की जरूरत है।  जीवन अमूल्य है, इसका उपयोग कुछ रचनात्मक करने के लिए करें, परिवार के लिए कुछ बेहतर सोचें। तलाक, इस बात की गारंटी नहीं कि, आगे का जीवन सुखमय ही होगा। दूसरे व्यक्ति के साथ शादी, जरुरी नहीं सकूं ही दे। मेरे समक्ष ऐसे बहुत उदाहरण हैं, जहां मनपसंद, दूसरी शादी भी टिक ना सकी। कुछ समय, स्वंय का आत्मलोकन करने पर ,हम एक स्वस्थ समाज के योगदान में अहम भूमिका निभा सकते हैं। जिम्मेदारी, अब युवा कंधों पर है, वे कैसे समाज में रहना चाहते हैं, उन्हें ही सोचना है।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २६/०६/२०२०

दीवारें

सुना है दीवारों के कान होते हैं,
लेकिन मैं कहती हूं
दीवारों की आंखें भी होती हैं,
दीवारें गवाह होती हैं
वीभत्स घटनाओं की
खामोशी की चीखों की,
वे सुनती हैं
उस अंतर्नाद को
जिसे, अपनों के कान नहीं सुनते
उन सिसकियों को,
जिन्हें लोग
कमजोर व्यक्तित्व का ठप्पा लगाकर
छोड़ देते हैं अकेले,
फिर सुनती हैं
उस रुदन को
जिसमें आवाज़ नहींं होती,
ना ही गिरता है, आंख से आंसू
दीवारें गवाह रहती हैं
प्रेमियों की गुफ्तगू की,
तब वे थोड़ा सहम जाती हैं
उनके पकड़े जाने के डर से,
दीवारें, प्रेमपूर्ण व
वीभत्स घटनाओं की सदीयों से रही हैं गवाह।

लेकिन ये दीवारें
चुप रहते रहते
गूंगी हो गई हैं
चींखें सुनते सुनते बहरी
ये दीवारें घरों से लेकर बड़े बंगलों ,
छोटे गांव से लेकर
बड़े शहरों तक उग आई हैं।
लेकिन, एक दिन यकायक
ये चीखकर बिखर जाएंगी
रह जाएंगी बस बिखरी पड़ी ईंटें
जिनको उठा उठा कर
घुटे घुटे लोग
एक दूसरे पर मारेंगें।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१६/०६/२०२०

सृष्टि चक्र#मां

मांए
कसकर बांध देती हैं
सारी तकलीफें चोटी में,
और
हर सुबह लग जाती हैं
बच्चों के सपने पूरे करने,
रोटी बेलते वक्त
आकार देती हैं, उनकी
छोटी-छोटी खुशियों को,
गर्म दूध में बोर्नविटा के साथ
घोल देती हैं अपने स्नेह की उर्जा
पति के लिए,
चाय खौलते वक्त
खौल देती हैं पिछली रात की कहासुनी ,
सभी के लिए टिफिन लगाते वक्त
छुपा देती हैं
पौष्टिक आहार के साथ दुआएं,
घर लौटने पर,
उतारती हैं सबकी नज़र
मांए
कभी थकती नहीं हैं,
लेकिन वो थकती हैं
जब उनसे कहा जाता है
“घर में सारा दिन तुम करती ही क्या हो?”
वे थकती हैं
जब, बच्चे बड़े  होने पर कहने लगें
“आप चुप रहो, हमें मालूम है सही ग़लत “
मां को थकने मत दो,
मां थक गई तो सृष्टि चक्र रुक जाएगा
जो निर्मित हुआ है वह ढ़ह जाएगा
ढ़हने से बचना है तो
मां का सम्मान करो,
उसे थकने मत दो।
©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१६/०६/२०२०

खंडहर

प्रेम के खंडहरों से आती सिसकियों की आवाज़ सुनी है कभी? चलो आज तुम्हें ले चलती हूं, उस गहरे कुएं की तरफ़, उस नदी के किनारे की तरफ़, उस पहाड़ी की खाई की तरफ या फिर रुद्रप्रयाग के पुल पर झूलते झूले की तरफ़, जहां से ना जाने कितनी बार सोचा था कि कूद जाऊं, यहां से, अपना लूं मौत को, ताकि मैं, यूं सिसक सिसक कर फर्श पर सिर पटकना बंद कर देती। तुम चले गए और पीछे छोड़ गए मुझे तिल तिल मरने के लिए और फिर भी जीवित रहने को विवश। तुम ने अपनी दुनिया को सुरक्षित रखा और परेशानी मेरे हिस्से में छोड़ गए। अवसाद की गहरी खाई में धकेलकर कर कितने खुश रह पाए होगे, ये तो नहीं जानती, लेकिन इतना जानती हूं कि, किसी का दिल तोड़कर अपनी दुनिया आबाद करने वालों ने सिसकती जिंदगी के श्राप के बारे में ठीक से नहीं जाना। प्रेम, वह नहीं था, जो तुमने किया। तुम गुनगुनाते तो बहुत थे, पाकिज़ा फिल्म का गाना,
“प्यार किया तो डरना क्या” लेकिन पहली ही चोट को बर्दाश्त नहीं कर पाए, और  अपने सुरक्षा कवच में घुस कर आंनद मग्न रहे। मेरे ऊपर अंगुली उठाने वाले की अंगुली काट कर रखने का सामर्थ्य नहीं रखते थे, तो प्रेम की आग से खेलना भी नहीं चाहिए था। तुम्हारे जैसे निष्ठुर हृदय ही, प्रेम को बदनाम करते हैं। प्रेम कोई कॉफी का मग तो नहीं कि चुस्की लेते लेते कॉफी खत्म होने पर प्रेम भी खत्म हुआ। मैंने अपना सबकुछ दांव पर लगाकर, तुमसे प्रेम किया था, लेकिन अब उसके खंडहर ही शेष हैं, क्योंकि मेरे सपनों की ईंटों से तो तुमने अपना महल खड़ा कर लिया। खंडहरों का अपना इतिहास होता है। मेरी सिसकियों की हृदयभेदी पुकार, एक दिन तुम्हें  प्रेम के खंडहरों में लेकर आएगी । सम्मोहित से तुम चले आओगे, अप्सरा का तिलिस्म टूट चुका होगा। खंडित पत्थरों को छूने पर  तुम्हें पहले प्रेम की सिसकियां सुनाई देंगी। तुम वहां भटकते रहोगे और बाहर निकलने का रास्ता दिखाई नहीं देगा। यही तुम्हारा श्राप होगा, जन्म जन्मांतर।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १२/०६/२०२०

रात की रानी

प्रेम पर लिखी गई सारी कविताएं
रात की रानी की लताएं होती हैं
जिनपर खिले पुष्प
चारों दिशाओं में सुगंध फैलाते हैं,
जब फूल मुरझा कर गिरते हैं
तब रोता है प्रेमी हृदय,
पुष्प के सूख जाने पर
मरने लगता है प्रेम,
सूखे पुष्पों को बटोर कर
फिर कोई प्रेमी
उनमें बसी शेष सुंगध में
टटोलता है अपना अक्स,
लगाता है अपने आंगन में
रात की रानी का पौधा,
सींचता है
उसे पीड़ा मिश्रित एहसासों से,
एहसासों की नमी पाकर
फिर खिलते हैं
रात की रानी पर प्रेम पुष्प ,
ये चक्र
अनवरत जारी रहता है
तभी तो
प्रेम कविताएं हमेशा  महकती रहती हैं।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १०/०६/२०२०

मछली

रीति रिवाजों
के धागों में उलझी
स्त्री
वैसे ही होती है
जैसे, जाल में फंसी मछली
संस्कारों की तपती भट्टी में
तपाकर
परोस दी जाती है
एक अजनबी शख्स की थाली में
जैसे
परोस दी जाती है
कड़ाही में तली मछली,
फिर वह उसे
छुरी कांटे से खाए,
या साबुत निगल जाए
सवाल कौन करेगा?
जब
सवाल नहीं किए जाते,
तब
मर जाती है एक स्त्री,
जीवित होता है बस,एक मांस का लोथड़ा
पिंजरे में कैद रुह
छटपटाती है,
यंत्रणागृह से ताकती है
विस्तृत आसमान,
लेकिन
मुक्ती भी तो देह छूटने पर ही मिलती है।

©®डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०३/०६/२०२०

दुआ

दुआओं का कोई छोर नहीं होता
बरसने लगती हैं तब
कट जाते हैं
सारे पाप
रब की रहमत बरसती है
तो मां मिलती है
मां की दुआ बरसती है तो
हर लेती है
सारे संताप।

मैंने देखा है
मां को मंदिर में
दंडवत हो
मेरे लिए दुआ मांगते
मैं
मां के पैर पखार कर
बटोर लेती हूं दुआएं।

सब कहते हैं मां
बूढ़ी हो चली,
मैं कहती हूं
मांए कभी
बूढ़ी नहीं होती
उनकी तो
उम्र बढ़ती है।
©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २०/०५/२०२०