बचपन के मेले

खेलती थी मैं

गांव की लड़कियों के संग,

तालाब से निकाली गई गारा से बनाते थे

हाथी ,घोड़े और बघी ,

हाथी की सवारी करते हुए

मेरी गुड़िया बन जाती थी राजकुमारी,

घोड़े पर चलते थे उसके अंगरक्षक

माचिस की डिब्बयों से ,

बनाए जाते थे सोफा-सेट

कतरनों से बनाते थे गुड़ा गुड़िया,

नन्हे हाथों से बने मिट्टी के बर्तनों में

बना लेते थे हम झूठ-मूठ का खाना,
गुड़ा- गुड़िया का रचाते थे ब्याह,

पोलिश की डिब्बयों से
बना लेते थे तराजू ,

आंगन में लगे नीम की निंबोलीयों
की सजती थी दुकान,

छोटे भाई बहनों के लिए

झुका देती थी मैं स्नेह का पलड़ा,

कागज़ से बना लिए जाते थे रुपए

इमली की गुठलीयां, बन जाती थी छुट्टे पैसे,

सारी निंबोली बेचकर

साहूकार सा मिलता था आंनद
खेल खेल में सीख लिया था जीवन का गणित,

तख्ती बन जाती थी बल्ला

मां की पुरानी ओढ़नी से बना लेते थे गेंद,
जमकर खेलते थे टीम बना कर
सीखा था टीम वर्क का महत्व,
जब शहर से

पिताजी लाए थे, छोटी बंदूक
दनादन टीन के डब्बे पर लगे निशान पर
होता था फायर
लक्ष्य पर फोकस करना तभी सीखा,

टेढ़ी लकड़ी ढूंढ कर, लड़के बनाते थे खुलिया

हॉकी तब भी जाती थी खेली

लेकिन एक दूसरे की टांगें नहीं तोड़ी जाती थी,

लड़कों के साथ भी होता था कंचों का खेल
सीखा था लक्ष्य पर केंद्रित रहना,

उस समय का समाज संकीर्णता से परे था

गांव की बेटी होती थी सबकी इज्जत,

रेलवे ट्रैक से ढूंढ कर लाते थे
छुक छुक गाड़ी के ड्राइवर द्वारा फेंका गोल चक्कर,

लोहे की तार से चलाते हुए

गांव की स्टेशन जाती सड़क पर लगती थी दौड़,

सहज ही सीख लिया था
जिंदगी की दौड़ का नियम,

रेल की पटरी से घिसकर लाते थे टुग्गे

खेल खेल में सीखा जीवन में संतुलन का पाठ,
तभी तो सुसराल में कर पाए सामंजस्य स्थापित,

गृहकार्य कर जमकर खेलते थे खेल,

कागज़ का हवाई जहाज़ बना कर


सपनों की उड़ान

लेते थे भर,

बारिश के दिनों में

गांव की गलियों में उतारते थे कश्तियां,

कश्तियों में सवार कर देते थे मकोड़ों को

मनमोहक होते थे

खड़े पानी में उठते बूंदों के बुलबुले,

अंका डंका, चोर सिपाही सभी थे जीवित किरदार

इन्हीं खेलों में रोपे गए हसरतों के खिलौने,

आज सब पाकर भी कितने हैं अकेले

आधुनिक खिलौनों की तरह
खोखले हो रही है जीवनशैली,


लुट

चुके हैं बचपन में बनाए मेले।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १४/०७/२०२०

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