ग्रहण

आजकल के सामाजिक परिदृश्य में बहुत सारे उदाहरण सामने आते हैं, जहां शादियां निभाई नहीं जा रही। तलाक के केस बहुत बढ़ते जा रहे हैं। कुछ शादियां छः महीने टिकती हैं तो कोई कोई साल से दस साल तक भी चलती हैं, और फिर तलाक फॉइल हो जाते हैं। कहीं पर लड़के की कमी गिनाई जाती है तो कहीं लड़की हावी रहती है। कारण जो भी हो, जिस रफ्तार से शादीयां टूट रही हैं, वह चिंताजनक स्थिति है।  शादी की संस्था पर तलाक एक ऐसा ग्रहण है, जो समाज के ताने-बाने को एक दिन पूरा निगल जाएगा, रह जाएंगे कुंठाग्रस्त लोग, जो अपनी खुशी कहीं कहीं ढूंढते फिरेंगें। लेकिन खुशी तो हमेशा भीतर होती है, उसे हम व्यक्ति में तलाशते रहते हैं। आज की पीढ़ी को ज़रा सा भी इल्म नहीं होता, कि तलाक लेकर, वे अपने माता-पिता की भावनाओं को कितना ठेस पहुंचाते हैं। जिंदगी भर की पूंजी बच्चों के लालन-पालन, पढ़ाई व शादी में खर्च करने के पश्चात, बुढ़ापे की ओर  कदम रखते मां बाप पर एक और परेशानी आन पड़ती है। आजकल की पीढ़ी, केवल अपना स्वार्थ देखती है और कुछ भी दिक्कत उठाने को तैयार नहीं होती। कामकाजी महिलाएं, तलाक लेकर, अपने बच्चों को मां बाप के पास छोड़कर, अपने कार्य में व्यस्त रहती हैं या किसी अन्य व्यक्ति में प्रेम ढूंढ़ती हैं।
जो माता पिता अब उम्रदराज हो चुके हैं, उन्होंने अपने जीवन-काल में अनेकों कष्ट उठा कर बच्चों की परवरिश की है। ये उस दौर के लोग हैं जिन्होंने अपने माता-पिता की हर बात को शिर्योधार्य किया लेकिन अब बच्चों की सुन रहे हैं। यदि बच्चों को सुना जा रहा है तो इसका, ये मतलब तो नहीं कि बच्चे बड़े होकर सिर्फ अपने लिए जीना सीखें। कभी कभी तो लगता है कि, हमारी ही परवरिश में गलती रही, जहां हर सुविधा तश्तरी में डाल कर दे दी गई, फिर भी बच्चों को वे सुविधाएं भी कम लगती हैं। अधिकतर, लड़कियां बहुत डिमांडिंग हो गई हैं। आज़ादी के साथ , जिम्मेदारियां भी आती हैं, ये उन्हें सोचना चाहिए। मां बाप ने, बेटी को बेटों की तरह पाला है तो इसका मतलब यह कदापि नहीं होना चाहिए कि, तर्क कुतर्क कर, उनका अपमान किया जाए। हमने अपने माता-पिता की सुनी, तो बहुत सही रहे, उन्होंने जो गलती कभी की होगी ,तो उसी अनुभव से सीखकर ही मार्गदर्शन किया। आज भी, यदि माता-पिता मार्गदर्शन करना चाहते हैं तो, उन्हें भी जीवन अनुभव से सीखा है। आजकल के बच्चे टेक्नोलॉजी में होशियार हो सकते हैं, ज्यादा आमदनी कमाना जानते हों, लेकिन अनुभव तो उम्र के साथ ही आता है।
मैं, यहां बात आम मध्यम वर्ग की कर रही हूं, जहां जीवन मूल्यों को संजोकर रखा जाता था लेकिन अब इस वर्ग में भी तलाक आम बात होती जा रही है। एकदम, सब कुछ हासिल करने की होड़, त्याग व समर्पण का अवसान, भागती-दौड़ती जिंदगी में कहीं ठहराव नहीं और फिर होती है विचारों की टक्कर। ठीक है, तलाक एक अॉपशन  रखा गया था समाज में, ताकि विकट स्थितियां बनने पर अलग हो सकें। लेकिन, आजकल, मेरे संज्ञान में बहुत से केस ऐसे भी आ रहे हैं, जहां दोनों लोग कुछ समय निभाते हैं, उसमें भी अपने अपने हित साध रहे होते हैं। फिर किसी को अपनी एक्स की याद आती है तो कोई और मोटी पार्टी से दिल लगा बैठते हैं। अनेकों कारण, सिर उठाकर खड़े हो जाते हैं। समाज की संरचना जब से हुई है, बहुत से किस्से कहानियां होती थीं, लेकिन पति पत्नी, एक-दूसरे को क्षमा कर आगे बढ़ जाते थे, समाज का ढांचा बना रहता था। क्षमा करने पर डोर और भी मजबूत हो जाती थी।
आज की पीढ़ी को थोड़ा ठहरकर सोचने की जरूरत है।  जीवन अमूल्य है, इसका उपयोग कुछ रचनात्मक करने के लिए करें, परिवार के लिए कुछ बेहतर सोचें। तलाक, इस बात की गारंटी नहीं कि, आगे का जीवन सुखमय ही होगा। दूसरे व्यक्ति के साथ शादी, जरुरी नहीं सकूं ही दे। मेरे समक्ष ऐसे बहुत उदाहरण हैं, जहां मनपसंद, दूसरी शादी भी टिक ना सकी। कुछ समय, स्वंय का आत्मलोकन करने पर ,हम एक स्वस्थ समाज के योगदान में अहम भूमिका निभा सकते हैं। जिम्मेदारी, अब युवा कंधों पर है, वे कैसे समाज में रहना चाहते हैं, उन्हें ही सोचना है।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २६/०६/२०२०

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