ख़त

ख़त

जानते हो?
मेरी जिंदगी ,एक खत बनकर रह गई है
खत का, एक एक वाक्य
जैसे तुम्हारे दिल की धड़कन,
एक एक लफ्ज़,
जैसे
मेरी पलकों में ठहरा आंसू
और
आंसू में ठहरी गहन पीड़ा
जिससे, तुम सरोकार नहीं रखते
तुमने
कभी जानना ही नहीं चाहा
कि, कैसे दर्द की कंदराओं में
एक घाव है, जो भरता ही नहीं
तुम जानते हो?
उस पर, तुम्हारे अगूंठे की छाप है,
उसको
कैसे झूठलावोगे?
जब कभी, मैं
प्रेम की कचहरी में,
मुकदमा दर्ज करवाऊंगी
तब, तुम्हारी हार निश्चित है
अंगूठे की छाप,
तुम्हारे विरुद्ध गवाही देगी।
©®डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १२/०५/२०२०

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