फिर कब मिलोगे?

गोवा एक्सप्रेस निर्धारित समय पर स्टेशन पहुंचने वाली थी। अदिति सपरिवार, गोवा घूमने गई थी और वहीं से बेलगाम में अपने ख़ास दोस्त के घर तीन दिन ठहरने के बाद दिल्ली लौट रही थी। अदिति के पति विनोद सिगरेट पीने के बहाने थोड़ा दूर चहलकदमी कर रहे थे। दोनों बच्चे  गोवा यात्रा में विचरण किए स्थानों पर मासूम विवेचना में उलझे हुए थे। अदिति, कर्नल मंयक के साथ खड़ी , विदाई के शिष्टाचार में व्यस्त थी। मयंक अदिति से छोटे छोटे वाक्यों में वार्तालाप कर रहा था। उसकी आंखों में अदिति ने प्रेम की वही झलक देखी, जो बीस वर्ष पहले, उसकी नींद व चैन चुरा ले गए थे। तब, जिंदगी ने, दोनों को एक मोड़ पर लाकर छोड़ दिया था, जहां से उनके रास्ते अलग जरुर हुए लेकिन प्रेम की लौ कुंद नहीं हुई थी। दो दशकों की जुदाई ओर पिछले साल से दूरभाष संपर्क ने, जलती हुई प्रेमाग्न को बढ़ा दिया था। दोनों, समाज़ की अलिखित बेड़ियों में जकड़े, आज़ भी उसी दोराहे पर खड़े थे। दोनों की अपनी गृहस्थी थी और परिवारों के प्रति समर्पण भी, लेकिन इस सबके बावजूद एक टीस जरूर थी कि मुलाकातें होती रहें। राह आसान नहीं थी। कर्नल की पत्नी नंदिता शंकालु प्रवृत्ति की थी और मयंक पर पूरा नियंत्रण रखती थी। बल्कि, यहां ये कहना ग़लत नहीं होगा कि वह मंयक को जीने की स्पेस नहीं देती थी। जिसे हम आप ‘व्यक्तिगत स्पेस’ कहते हैं। अदिति, मयंक के घर रहकर ,इस बात को संज्ञान में ले चुकी थी। अदिति ने फिर भी पूछा था, “फिर कब मिलोगे?” मयंक की आंखों में विविशता, उत्तर दे चुकी थी। आंखें, शायद कह रही हो , “ हम आपके हैं कौन?”
अश्रु, दोनों की पलकों पर ठहर चुके थे।

रेलगाड़ी प्लेटफार्म पर पहुंची। दस मिनट का स्टेशन पर ठहराव था। सारा ल्गेज़ विनोद ने सीटों के नीचे सही ढंग से लगा दिया। अदिति खिड़की वाली सीट पर आकर बैठ गई। गाड़ी ने भी धीरे धीरे गति पकड़ी। मंयक ने गाड़ी के साथ-साथ दौड़ते हुए कहा,

अगले जन्म में हम जरुर मिलेंगें”।
अदिति, मंयक और अपने बीच बढ़ते फासले को रेलगाड़ी के दरवाज़े पर खड़ी देखती रही। मयंक भी तब तक हाथ हिलाता रहा जब तक, अदिति उसकी आंखों से ओझल नहीं हो गई। विनोद बहुत ही खुश मिजाज़ व्यक्ति, जो पत्नी अदिति व मयंक की प्रेम को समझते थे। अदिति ऊपर वाली सीट पर लेटकर आंसू पौंछ रही थी। तभी पति विनोद के शब्द कानों में गूंजे, “ दो हंसो का जोड़ा बिछुड़ गया रे, गजब ….”।

प्रेम के इस स्वरुप को समाज कुछ भी नाम दे सकता है लेकिन लेखक ने साहित्यिक यज्ञ में एक आहुति डाल ही दी।

©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”०६/०५/२०२०

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s