अंतहीन सिलसिला

अंतहीन सिलसिला

अजय, सुसराल पहुंचा था, बच्चों से मिलने के लिए। उसकी पत्नी, नीलम एक महीने से अपने मायके आई हुई थी और उसकी एक सात वर्षीय लड़की, रुही, व एक चार साल का बेटा, विक्की भी नानी के घर अपनी मम्मी के साथ आए थे।

नीलम, पति के साथ हुए झगड़ों व हिंसात्मक व्यवहार से तंग आ चुकी थी। अजय, फ़ौज में कैप्टन के पद पर कार्यरत था। शुरू के एक आध साल तो खुशी-खुशी बीते लेकिन फिर , हर रोज़ की मारपीट व गाली गलौज़ का एक अंतहीन सिलसिला शुरू हुआ। नीलम, यही सोचती रही कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा । अजय के साथ तालमेल स्थापित करने का एक ही मुख्य कारण था कि गलती करके वह क्षमा मांग लेता था।

नीलम और अजय की अरेंज्ड मैरिज हुई थी। नीलम ने अंग्रेजी ऑनर्स से स्नातक की डिग्री हासिल की ही थी कि उसकी शादी तय हो गई । उसके अलावा घर में दो बहनें भी थी, रिश्ता बढ़िया मिल रहा था तो उसके माता-पिता ने अवसर हाथ से नहीं जाने दिया। नीलम के तीखे नयन नक्श व गौर वर्ण ने अजय को तो जैसे सम्मोहित ही कर लिया था। उसने तुरंत इस शादी के लिए अपनी रजामंदी दे दी थी। नीलम  से सहमति लेने की कोई आवश्यकता मां बाप ने नहीं समझी। चूंकि लड़का अच्छे ओहदे पर नियुक्त था व गठीला नौजवान था, इसलिए नीलम ने भी मौन सहमति दे दी थी।  

ऑफिसर की पत्नी  होने के नाते, नीलम को किसी भी सुख सुविधा की कमी नहीं थी। एक छोटे से कस्बे से संबंध रखने वाली ,इस लड़की के लिए सब कुछ सपने जैसा था। आफिसर कल्ब की पार्टीयां, नीलम के लिए एकदम नया अनुभव था। धीरे धीरे अपनी झिझक एक तरफ छिटक कर वह वहां के कल्चर से तादात्म्य स्थापित करने में व्यस्त रही। करीने से बंधी साड़ी, कमर पर लहराते लम्बे घने बाल, व होंठों पर खिली मुस्कराहट , किसी को भी आकर्षित करने के लिए काफी थी। उसका सुरीला कंठ, महफ़िल में बहुत वाहवाही बटोरता था। “Once more.. once more”  की अपील पर वह पुरानी फिल्मों के दर्द भरे नगमे , दिलकश अंदाज में गाती थी। शादी के कुछ एक महीनों में  ही उसने  ऑफिसर्स कल्ब में खासी पहचान बना ली थी। नीलम को भी अपनी खूबसूरती व किस्मत पर नाज़ था… लेकिन ये खुशी उसके जीवन में क्षणभंगुर ही रही… अजय विहृस्की के पैग कंठ में उड़ेलने के बाद, अक्सर ही नीलम के साथ किसी न किसी तरह के बहाने ढूंढकर, गाली गलौज़ व मारपीट करता रहता था… ऐसा नहीं था कि नीलम चुप रहती थी , पूरी बहस होती थी और यही बात पुरुष के अहम को चोट पहुंचा गई। अजय का कहना था कि, ” पत्नी होकर , जुबान लड़ाती है?”

पुरुष दंभ , नारी को हमेशा कमतर आंकता है और हमेशा अनुगामी देखना चाहता है। इसमें उसका दोष नहीं है, दोष है नारी जाति की सहनशक्ति का… वह बच्चा, जो आज पुरुष है, अपने घर में उत्पीड़न देखता है… मां को पिटते.. फिर मां बाप में सुलह होते … वही प्रक्रिया दोहराते..उस बच्चे के अवचेतन मस्तिष्क में न चाहते हुए भी सब रजिस्टर होता रहता है… फिर वह बच्चा जब पुरुष बनता है तब, बीबी को सवाल जवाब करते  हुए बर्दाश्त नहीं कर सकता, जिसका परिणाम घरेलू हिंसा…।

समय बदला, लड़कियों की सोच बदली..गृहलक्ष्मी, देवी, सीता, सावित्री की उपाधियों से  वे स्वंय को अलंकृत नहीं करना चाहती… उन्हें चाहिए प्रेम व सम्मान…उनके अवचेतन मस्तिष्क में भी, घर की दहलीज के भीतर होती घरेलू हिंसा  के चित्र अंकित होते हैं और यहीं से मुखर होते हैं उनके विरोधी स्वर…  वे काफी सहन भी करती हैं … लड़कियां, अच्छी तरह समझती हैं, समाज के अलिखित कानून को, जहां उसे ही कटघरे में खड़ा, केवल बाहरी लोग ही नहीं बल्कि स्वंय के मां बाप भी कभी ना कभी करेंगें। इसीलिए नब्बे प्रतिशत महिलाएं खामोशी का दुशाला ओढ़कर जीवन जीती रहती हैं।

नीलम ने जब, खुद को घुटन के उस स्तर पर पाया , जहां सांस लेना भी दुभर  हो रहा था, तब पति के ऑफिस जाने के बाद,  दोनों बच्चों को लेकर, अपने मायके पहुंच गई थी। पिछली रात अजय ने उसे शारीरिक संबंध बनाते समय, जिस भाषा की मर्यादा को लांघा था व दुष्टता का परिचय दिया था, वो  वाक्या, उसकी रुह को छलनी कर गया… निर्णय हो चुका था, जिसपर उसे अडिग रहना था… वही निर्णय उसे आज, मां बाप की चौखट पर ले आया था… किसी भी  शादी शुदा लड़की के लिए यह परिस्थिति सुखद नहीं होती है, लेकिन मजबूरी उसे मायके का रुख करने के लिए बाध्य कर देती है, विशेषतः जब वह नौकरीपेशा न हो…मां ने बेटी की पीठ पर बरसाए कोड़ों के निशान देखे और उसका ममत्व चित्कार कर उठा।

नीलम, हर झगड़े के बाद पति के पास खुद लौट जाती थी, मां बाप भी उसे समझा बुझाकर कर वापिस भेज देते थे, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। नीलम को मायके आए ,एक महीना बीत गया था। अजय, इसीलिए अपनी सुसराल पहुंचा था, लेकिन उस वक्त नीलम, एक आवासीय विद्यालय में शिक्षिका के पद हेतु  साक्षात्कार देने  के लिए जा चुकी थी। अजय को, नीलम की मां ने खूब खरी खोटी सुनाई। उसने कहा,

जब तुम मेरी बेटी को नहीं रख सकते ,तो हम क्यों तुम्हारे बच्चों को रखें। इन्हें, ले जाओ और फिर कभी अपनी सूरत मत दिखाना।”

नीलम की मां ने बच्चों का बैग तैयार किया और दोनों को अजय के साथ कर दिया। वह अपना सा मुंह लेकर वहां से लौट आया, क्योंकि नीलम की मां उसकी कोई दलील सुनने को तैयार नहीं थी और ना ही उसे क्षमा करने का उसका इरादा था… शाम को नीलम घर पहुंची और वस्तुस्थिति का भान हुआ। उसका हृदय, अपने लाड़लों के लिए तड़प उठा, लेकिन उसके सामने कोई विकल्प नहीं था। मां ने चेतावनी दे दी थी कि , “उस राक्षस के बच्चों  के लिए मेरे घर में कोई जगह नहीं है”। नीलम, अब, ऐसे दोराहे पर खड़ी थी, जहां उसे एक ही मार्ग चुनना था। अजय के पास जाने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता था, इसलिए फिलहाल के लिए दूसरा मार्ग ही चुना। उसके पिता ने वकील से मुलाकात की और तलाक का नोटिस अजय को भिजवाया। नीलम की ओर से आए, तलाक के कागज़ देखकर, वह सकते में आ गया। क्रोध, पश्चाताप व बदले की भावना एक साथ उसके मस्तिष्क में घर कर गई। उससे, ये अपमान सहन नहीं हुआ…फिर जारी रहा तारिख पर तारिख का अंतहीन सिलसिला… उसने जिद्द ठान ली थी कि, नीलम को इतनी आसानी से तलाक तो वह नहीं देगा। अदालतों में वैसे भी मुकदमे लंबे चलते हैं, देश की जनसंख्या के हिसाब से अदालतें कम हैं और मुकदमों की तादाद अधिक। पूरी व्यवस्था पंगु होकर रह जाती है..पक्ष/प्रतिपक्ष की तरफ़ से तारिख ले ली जाती हैं…इस सबके बीच पिस रहे थे तो दो मासूम बच्चे, जो अब दादा दादी के पास पल रहे थे। अजय को जिम्मेदारी का अहसास होता तो नौबत यहां तक नहीं आती। उसकी लापरवाही का खामियाजा, उसके वृद्ध मां बाप व बच्चों को भी भुगतना पड़ रहा था।

यहां अब टकराव अजय और नीलम के बीच नहीं रह गया था.. बड़े शामिल हो चुके थे जिन्होंने इसे अपने आत्मसम्मान का प्रश्न बना लिया था…।

अदालत ने, अजय को बच्चों के भरण-पोषण के लिए निर्देश दिया, तब तक नीलम आवासीय विद्यालय में शिक्षिका नियुक्त हो चुकी थी…अजय ने भरण-पोषण देने से बचने के लिए अपनी फौज़ की नौकरी ही छोड़ दी। जमीन भी अपने नाम से उतरवा दी और अदालत में खुद को बेरोजगार प्रस्तुत किया। अजय के पिता के पास कृषि योग्य अच्छी खासी ज़मीन थी, तो आमदनी बढ़िया हो जाती थी। इधर, नीलम, बच्चों की याद में , एक साल अवसादग्रस्त रही। मां बाप ने उसे भी कह दिया था कि, ” अपना खर्च खुद वहन करो… तीन बेटियां हैं। हम किस किस का ख्याल रखें..अपना कमाओ और खाओ”।  माता-पिता की तरफ से चुभते शब्दों ने  नीलम की मानसिक स्थिति को गहरा आघात दिया। एक बेटी को, यदि सुसराल में कष्ट होता है तो वह मायके में स्नेहिल स्पर्श की उम्मीद रखती है। नीलम की बहनों ने उसे काफी संबल प्रदान किया और मनोचिकित्सा दिलवाने में मदद ही नहीं की बल्कि उसकी हर छोटी से छोटी जरूरतों का ध्यान रखा।

समय के साथ , नीलम भी प्राइमरी स्कूल के बच्चों में घुल-मिल कर रहने लगी। उसे प्रंबधन कमेटी ने छात्रावास की वार्डन बना दिया। कमेटी, नीलम की कार्यशैली व परीक्षा परिणामों से बहुत प्रभावित थी। नीलम के केस को अदालत में उलझा हुए एक दशक हो चुका है… अजय  बच्चों को नीलम से नहीं मिलने देता … अदालत के आदेश पर बच्चों को मिलवाने उनके दादा जी लेकर गए तो सही लेकिन बच्चे डरे सहमे हुए रहे। उनके दिलों में नीलम की छवि एक स्वार्थी मां की थी। उनकी बातें सुन कर नीलम के घाव फिर रिसने लगे। नानी के प्रति भी उनके मन मस्तिष्क में ज़हर भरा हुआ था और शिकायतों का अंबार लगा था।  बच्चे मिट्टी के घड़े की मानिंद होते हैं, उन्हें जहां प्यार मिलेगा, वहीं उनकी निष्ठा बन जाती है।  अनेकों बार ऐसा भी होता है कि बच्चे बड़े होकर विद्रोही बन जाते हैं … समाज उन्हें दुश्मन नज़र आता है। माता-पिता की  छत्रछाया से महरूम रहने के कारण उनके हृदय का कोना, एक ऐसे खालीपन का अहसास कराता है , जहां उन्हें, अंधकार के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता।

स्त्री पुरुष के अहम के टकराव का सिलसिला अंतहीन लगता है… जिसमें सबसे अधिक पीड़ा कोई झेलता है तो वह हैं उनकी संतानें… जिन्हें एक तरफ संगी साथियों के कटाक्ष का सामना करना पड़ता है तो दूसरी ओर परिचितों की दिखावटी सहानुभूति से वे आहत होते रहते हैं, जिसका दूरगामी असर उनके भविष्य में काला साया बनकर, साथ साथ चलता है। समाज में इस अंतहीन सिलसिले पर कुठाराघात करने के लिए सभी पक्षों को आत्मलोकन करना होगा।

में©®✍️  डा सन्तोष चाहार ” ज़ोया”२१/०४/२०२०

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