उसका वेलेंटाइन

जिंदगी की तपती, सुलगती रेत पर वह चलती जा रही थी।
उसके पांव के छाले, जीवन की असीम कठिनाईयों और संघर्ष की पीड़ा की ओर इशारा कर रहे थे। आंखों के काले घेरे उसके बैचेन मन की कंदराओं में टूटे सपने को रेखांकित कर रहे थे। वह आज फिर  प्रेम की पचासवीं वर्षगांठ पर उस रेत के टीले पर बैठी थी, जहां वर्षों पहले गांव के ठाकुर की कुदृष्टि, “उस हसीन जोड़े” पर कुपित हुई थी और अपने कारिंदों से उन्हें अगवा कर लिया गया था। युवक को तो दिन दहाड़े सबके सामने पेड़ पर फांसी से लटका दिया गया था।  गांव में किसी की हिम्मत नहीं थी इस जघन्य कृत्य को ललकारे। मृगनयनी को ठकुराइन की देखरेख में  नज़रबंद कर लिया था ताकि वह पुलिस को सूचना देने की हिमाकत ना करें। चूंकि ये जोड़ा परदेशी था तो गांव वालों को भी इस हत्या से कुछ लेना-देना नहीं था।
मृगनयनी के हुस्न पर ठाकुर की कुचेष्टा रहती थी लेकिन ठकुराइन की भी कड़ी नजर ठाकुर पर रहती थी। मृगनयनी को उस वक्त दो माह का गर्भ था। इसलिए ठकुराइन ने उसे अपनी  देखरेख में रखा था। मृगनयनी ठकुराइन की विशाल हृदयता की मुरीद हो गई थी और उसकी सेवा सुश्रुषा में उसके दिन बीतने लगे। समय बीता और मृगनयनी को एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई…।

मृगनयनी का समय अब बच्चे की देखभाल में व्यतीत होने लगा और पति बिछोह की पीड़ा बेटे की किलकारियों से कुछ कम होने लगी। दर्द को थोड़ा कम करने में बच्चे की मीठी मुस्कान मददगार साबित होने लगी…अंश अब दो साल का हो गया था और अपनी तोतली आवाज़ में सबका मन मोह लेता था। एक दिन मृगनयनी ने ठकुराइन से विनम्र निवेदन किया कि वह अब शहर लौट जाना चाहती है… उसे डर है कि ठाकुर की कुचेष्टा उसे कभी अपना शिकार बना सकती है।  ठकुराइन  भी अब मृगनयनी की जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहती थी। उसे भी यह लगने लगा था कि वह अब तक मृगनयनी का सुरक्षा कवच बनी रहेगी। ठकुराइन ने अच्छे मानस का परिचय देते हुए, मृगनयनी को   उसके सेवा भाव से खुश होकर कुछ रुपए  दिए और अपनी प्रियतम सहेली के नाम चिठ्ठी देकर , एक विश्वास पात्र दासी के  साथ  शहर भेज दिया। ठकुराइन की ये सहेली एक विद्यालय की प्रिंसिपल थी। इस तरह से मृगनयनी को वहां चपरासी का काम भी मिल गया और रहने के लिए एक कमरा, प्रिंसीपल साहिबा की कोठी  के बेकयार्ड में। मृगनयनी स्वाभिमानी महिला थी और वह प्रिंसीपल के घर का कामकाज कर, गुजर-बसर करने लगी। अंश की पढ़ाई का जिम्मा प्रिंसीपल महोदया ने ले लिया था। अंश शुरू से ही बहुत होशियार था…।

ठकुराइन राजरानी ने मृगनयनी को शहर भेजने के लिए उपयुक्त समय चुना। उन दिनों  ठाकुर ज़ोरावर सिंह एक सप्ताह के लिए जंगलों में शिकार पर गया हुआ था।  लौटने पर, मृगनयनी को हवेली में ना पाकर, ठाकुर ज़ोरावर सिंह ने ठकुराइन  से पूछताछ की। पचास साल की प्रौढा़ ठकुराइन जानती थी कि ठाकुर क्यों आसमान सिर पर उठाए है। वह ठाकुर की कुचेष्टा से वाकिफ थी।  उसके साथ रहते हुए वह गांव और इलाके की भोलीऔर गरीब प्रजा पर अनेकों प्रकार के जुल्म होते देख चुकी थी। आज उसकी आत्मा ने उसे झकझोर दिया और ठकुराइन राजरानी ने ठाकुर को अंजाम भुगतने की चेतावनी दे डाली। हमेशा से चुप रहने वाली ठकुराइन की बुलंद आवाज़ से ज़ोरावर सिंह सहम गया था। वह जानता था कि यदि ठकुराइन अपनी जिद्द पर आ गई तो उसे सलाखों के पीछे भिजवा देगी। ज़ोरावर सिंह की जवानी तो रंगीन मिज़ाज में बीती थी, अब वह बुढ़ापे की दहलीज पर कदम रख चुका था। इसलिए पुलिस और मुकदमों के चक्कर से बचना चाहता था। रात के अंधेरे में जब मृगनयनी के पति मणिरत्नम को गांव की मर्यादा भंग के जुर्म में पेड़ पर लटका कर सजा ए मौत  दी गई थी तब, ठकुराइन हवेली की गुप्त खिड़की से सब देख चुकी थी…।

मृगनयनी का मणिरत्नम के सिवाय इस दुनिया में कोई नहीं था। मणिरत्नम से उसकी मुलाकात एक मेले में हुई थी। मणिरत्नम मंत्रमुग्ध हो उस वक्त मृगनयनी की रस्सी पर चलने की कला को देख रहा था… तमाशा खत्म होने के बाद मणिरत्नम की सीटी की आवाज़ से मृगनयनी का ध्यान उस तरफ गया। नज़रें एक दूसरे में समा चुकी थी। नटों के मुखिया से इजाजत ले मृगनयनी, मणिरत्नम के साथ मेला घूमने लगी और फिर कभी डेरे में लौट कर नहीं गई। दो साल तक युवा जोड़ा एक अंजान शहर में, जिंदगी की छोटी-छोटी खुशियों में जीवन का आनंद लेता रहा । एक दिन मृगनयनी ने   मणिरत्नम के साथ  रेगिस्तान में,  रेत के टीले देखने की योजना बनाई। उस साल वहां ऊंटों का उत्सव भी होना था। शहर से कमाई कुछ पूंजी जमा थी और मणिरत्नम अपनी पत्नी/ प्रेयसी को रेगिस्तान के रेतीले टीलों की सुंदरता और भव्य सूर्यास्त का नजारा दिखाने के लिए जैसलमेर पहुंच गया।  वहां उन्होंने देखा कि बहुत से विदेशी सैलानी भी टीलों पर बने तम्बूओं में  राजस्थान प्रवास का पूरा आनंद ले रहे थे।
उसी दिन वहां से ठाकुर ज़ोरावर सिंह, बग्घी में सवारी करते हुए निकल रहा था। युवा जोड़ा सूर्यास्त के नज़ारे को अपनी आंखों में कैद करने में लीन था। ठाकुर की बग्घी की ओर उनका ध्यान नहीं गया।  वैसे भी वो ठहरे परदेशी, उन्हें वहां की परम्परा का भान भी नहीं था। लेकिन ठाकुर ने इसे अपना अपमान समझा और पीछे  उसकी सुरक्षा में घोड़े पर सवार  लठैतों को, युवा जोड़े को उठाने का निर्देश दिया…  मणिरत्नम को  ठाकुर ज़ोरावर सिंह के अहम की वजह से अंजाम भुगतना पड़ा और  मृगनयनी को जीवनसाथी की मृत्यु का आघात।

घटनाक्रम को बीते सालों गुज़र गए  लेकिन मृगनयनी आज भी इन्हीं रेत के टीलों में अपने प्रेमी की खुशबू तलाशने आती है। अंश पढ़-लिख बड़ा अफसर बन चुका है और बेटा ही मृगनयनी को गाड़ी में लेकर आता है… शायद वह भी पिता का आशीर्वाद प्राप्त करने आता है और ममता का कर्ज चुकाने का प्रयास भर करता है।
©®✍️ डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१४/०२/२०२०

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