मंजिल

IMG-20191005-WA0011.jpgआज जब कोर्ट से आई तो बहुत थकी हुई थी। जीवन के लम्बें करियर में खूब नाम और मुकाम हासिल किया था। धन दौलत की भी कोई कभी नहीं रही। एक जाना पहचाना नाम था उसका, वकालत के क्षेत्र में। लेकिन पिछले कुछ दिनों के अपने देश के घटनाक्रम ने उसके दिल को झकझोर कर रख दिया था। निर्भया के बलात्कारियों को जिस तरह से कानून के दांव पेच का उपयोग कर उनकी फांसी की सज़ा को लटकाया जा रहा था उससे अनुभा का मन बहुत आहत था। वह स्वयं से ग्लानि महसूस कर रही थी कि एक अच्छी वकील होने का उसका क्या फायदा, यदि वह समाज में लड़कियों के साथ हो रहे जघन्य अपराध पर लगाम नहीं लगवा सकती…

सिर दर्द से फटा जा रहा था। उसने मेड को चाय बनाने के लिए बोला और बालकनी में जाकर बैठ गई। थोड़ी ही देर में मेड चाय के साथ कुछ नाश्ता लेकर आई। अनुभा अपने फ्लैट में अकेली ही रहती थी। उसे करियर में सफल होने की इतनी लगन थी कि शादी की तरफ कभी उसका ध्यान गया ही नहीं। करियर में सफलता की सीढ़ियां चढ़ना ही उसका मुख्य लक्ष्य रहा था। विदेश में पढ़ाई की और वहीं सेटिल हो गई। लेकिन अपने देश की खबरें जरुर फोलो करती थी, खासकर मामला जब महिला अपराधों से जुड़ा हो।

दूर कनाडा में बसी अनुभा का मन आज बहुत विचलित था। काफी देर रात तक खुद से ही तर्क वितर्क करती रही और अंत में एक ठोस निर्णय पर पहुंच गई। उसने ठान लिया था कि, भारत जाकर उन सभी मुकदमों की पैरवी निःशुल्क करनी है, जो भी बलात्कार से जुड़े हैं और आमजन की बेटियों को न्याय दिलवाना है जो इस तरह के मुकदमों की फीस देने में असमर्थ हैं या कानूनी प्रक्रिया का ज्ञान नहीं है। उसने ये भी ठान लिया था कि पी. आई. एल. लगाकर , कानून का जिस तरह से दुरुपयोग ‘निर्भया’ जैसे मामलों में होता है, उसका हल भी ढूंढ़ना है।

अनुभा ने एक महीने के अंदर ही कनाडा छोड़ दिया और  स्वदेश लौट आई। छः महीने के भीतर ही उन सभी परिवारों का डाटा इकट्ठा किया, जो बेटीयों के साथ हुए ऐसे कुकृत्य की मानसिक पीड़ा झेल रहे थे लेकिन केस लड़ने में आर्थिक रूप से असक्ष्म थे। दो साल के भीतर ही अनुभा एक जाना पहचाना नाम था। न्याय मिलने पर परिवार अपनी मर्जी से फीस का कुछ हिस्सा देने की जिद्द करते थे। उन सब की जिद्द के आगे झुकते हुए, अनुभा उस पैसे को स्वीकार तो कर लेती लेकिन उसका सदुपयोग करते हुए एक कोचिंग सेंटर की शुरुआत की जहां गरीब परिवारों की लड़कियों को वकालत के प्रोफ़ेशन के लिए तैयारी करवाई जाती थी।

आज दस साल बाद, जब ये लड़कियां पूरे आत्मविश्वास के साथ वकालत के पेशे को अपना कर महिला अपराधों पर रोक लगाने में कामयाब हो रहीं थीं, तो अनुभा को गर्व महसूस होता है और आत्मिक शांति भी। अनुभा को अपनी मंजिल मिल चुकी थी। जीवन का उद्देश्य पूर्ण हुआ। समाज के लिए बूंद मात्र भी योगदान करने का सकून उसके चेहरे पर मुस्कान बिखेर रहा था।

✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०५/०२/२०२०

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