रुह के परिंदे

रुह के परिंदे हर रोज़ उड़ान भर कर उन पगडंडियों के वृहद वृक्षों पर बैठकर तुम्हारा इंतजार करते हैं जहां इश्क़ की पहली नज्म गुनगुनाई थी तुमने… याद है मुझे, मेरे शांत हृदय सागर में तब उठी थी प्रेम लहरें…फासले तय कर, आंखों में सिमट गया था तुम्हरा और मेरा वजूद। धड़कते दिलों के महासागर में कसमें वादे कश्तीयां बन, तूफानी रफ्तार से दमघोंटू बेड़ियों को काटने को आतुर थे।
ख्वाबों की जमीन पर कदमताल करते हुए हम दोनों ने एक हकीकत की दुनिया बनानी चाही…समय पंख लगाकर उड़ रहा था और हमारे सपने भी जवां हो रहे थे। सब कुछ कितना हंसी था… तुम्हारी मोहब्बत ने मुझे जिस एहसास से छुआ था उसकी खूबसूरती और गहराई इतनी थी कि मेरे रोम रोम से प्रेम का सोता फूटा था… हृदय के बगीचे में रसिक भंवरा गुंजन कर ,मधु चखता हुआ मन की कलियों पर मंडरा कर मेरी नींद भी चुरा ले गया था… इश्क़ में फ़ना हम दोनों ने प्रेम को शब्दों से नहीं नवाजा था लेकिन हम दोनों ही जानते थे कि हमें जिंदगी साथ गुजारनी है और मूक स्वीकृति हम एक दूसरे को दे चुके थे… लेकिन विधाता का लिखा आजतक कोई मिटा नहीं पाया… हमारी राहें जुदा हुई चूंकि संस्कार से बंधे थे हम। मां बाप की खुशी के लिए सामाजिक मूल्यों के हवनकुंड में निश्छल प्रेम की आहुति दे कर्त्तव्य पथ पर अग्रसर हो एक दूजे के लिए गुम हो गये थे.. यही तो कसम थी तुम्हारी…। जिंदगी अपनी रफ़्तार से चलती रहती है और हमें भी उसके साथ कदम मिलाना होता है नहीं तो बहुत कुछ पीछे छूट जाता है और फिर चाहकर भी हम उसे हासिल नहीं कर सकते।
गृहस्थ आश्रम में अपने फ़र्ज़ के प्रति सजग हम दोनों ही तो समाज द्वारा निर्धारित मापदंड तय करते हुए बुढ़ापे की दहलीज पर पहुंच गए हैं.. जुदा हुए तो बहुत कुछ बदला था। नई दुनिया, नए दोस्त,नए नाते रिश्तेदार… बस जो कुछ नहीं बदला था तो वो था मोहब्बत का एहसास… ये तो वह अनमोल निधि थी जिसे कोई चुरा ही नहीं सकता था , ठीक उसी तरह जैसे कोई शिक्षा दीक्षा को नहीं चुरा सकता… सब कुछ समाप्त भी हो जाए तो भी शिक्षा रुपी धन हमें दुबारा सक्षम बना सकता है… यही धन हमारे माता-पिता ने दिया था… ये वह दौर था जब 1970 के दशक में गांव में लड़कियों की शिक्षा दीक्षा ना के बराबर थी। तुम भी तो किसान पुत्र थे और सभी भाईयों में छोटे होने के नाते ही तुम्हें शिक्षा का अवसर मिला था। तुम्हारे दो भाई तो खेती ही करते थे…ना तुम अपने बापू के सामने हमारे प्रेम की बात कह सके और ना ही मैं। लड़की होने के नाते कहने की सोच भी नहीं सकती थी… लेकिन जीवन के छः दशकों का निष्कर्ष यही कहता है कि जहां रुहानी रिश्ते होते हैं वे बने रहते हैं… ऐसे रिश्तों पर फरिश्तों का पहला रहता है इसलिए तो मन तरंगों के माध्यम से तुम्हारे संदेश मुझे मिलते रहते हैं और मेरा प्रेम यूं ही जवां रहता है। मुझे कभी लगा ही नहीं तुम मुझसे दूर हो…जब कभी भी दुविधा में पाया तब मैं खुद से ही सवाल करती थी कि फलां स्थिति में तुम्हारी क्या राय होती… ऐसा नहीं है कि तुम्हारी बांहों के आगोश में आने को मन नहीं मचलता था… शरीर एक माध्यम है पूर्ण रूप से प्रेम को महसूस करने के लिए… लेकिन only one नहीं है… एहसास , एक अहम किरदार निभाता है प्रेम प्राप्ति में। इसी एहसास को महसूस कर, जब सब निंद्रा का आंनद ले रहे होते हैं, तब मेरे कमरे में सिर्फ मैं और तुम होते हो… मेरे एहसास , कभी कविता तो कभी कहानी बनकर कलम से कागज़ पर हमारे इश्क़ की इबादत करते हैं और मेरी रुह के परिंदे तुम्हारे हृदय के आकाश पर पंख फैला कर ऊंची उड़ान भरते हैं…तब मुझे तृप्ति का अहसास होता है।
✍️©® डा. सन्तोष चाहार ” ज़ोया” 06/12/2019

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