Monthly Archives: August 2019

मुमकिन

है मुमकिन
स्नेह की चादर पर
रिश्तों के मोती सजाना
थोड़ा झुक कर
थोड़ा मुस्कुरा कर

है मुमकिन
बुजुर्गों से लेना
आशिर्वाद
थोड़ा उन्हें सुनकर
थोड़ी सेवा कर
लगा पाएं जख्मों पर मरहम

है मुमकिन
बेटियो के सपनों को
मिलना परवाज़
गर मुक्त हो
उनके कदम
दोहरे मापदंड से

है मुमकिन
शिक्षित हो समाज
दीप से दीप जले
मिट जाए
गहन अंधकार
निभाएं हम इंसानियत धर्म

है मुमकिन
कृषक बन जाए
खुशहाल
अपनी उपज़
का दाम तय
करने का हो अधिकार

है मुमकिन
वंचित को मिले
योजनाओं का लाभ
भ्रष्टाचार
का भस्मासुर
गर स्मूल नष्ट कर दिया जाए

है मुमकिन
लेना शुद्ध हवा में स्वास
गर ठान लें
जन जन
विस्तार दे जंगलों को
रोपण कर एक एक वृक्ष

बूंद बूंद
योगदान दे कर
मुमकिन है
राष्ट्र को कर पाएं
स्थापित
गगनचुंबी मुकाम पर।
✍️ ©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २८/०८/२०१९

Advertisements

टंकार

उदासी
के पंजों से
छीनी खुशियां अपार
रात के
रुखे रुखे पतों से
छीना अपना अधिकार
छांव के
जख्मों से छीना
सीना तान चलने का व्यवहार
जिंदगी के
कोहरे से छीना
निज़ अस्तित्व का आधार
राह की
दुश्वारियों से छीना
मंजिल का ओजस्वी संसार
पतझड़ के
मौसम से छीनी
बंसत की रंगीन बहार
बैचेनी के
मेघों से छीनी
आंनद की सौंधी फुहार
मुश्किलों के
पर्वत से छीनी
हौंसलों की तलवार
जीवन के
मरुस्थल में उगाए
आत्मविश्वास के गुंचें
पितृसत्ता
की तोड़ी
असंख्य कंटीली बेड़ियां
सूरज को
हथेली पर उगाया
चांद को खिलौना बनाया
तारों से सुंदर परिधान सजाया
मैं
इक्कीसवीं
सदी की बेटी हूँ
समुंद्र में दीप जलाती हूँ।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २०/०८/२०१९

आवाज़

यादों के
गलियारों से
क्यों आवाज़ देकर
मेरी कोशिश को पंगु करते हो
मैं
टूटे ख्वाबों को
खंडित वजूद के सहारे ही सही
समेटने का भरसक प्रयत्न कर रही हूं
मेरे
कदमों में लगे
उम्मीद के पंखों को
रवायतों के
महीन मांझे से कतर
तुम
रंगीन महफ़िलों के
आसमां का ‘चांद’ बन गए
लेकिन
भूल गए शायद
तुम्हारी
‘चांदनी ‘ की दमक
सूरज के वजूद से है
और
मैं वह सूरज हूं।
इश़्क
की बाज़ी हार कर भी मैं जीती
खबर है
मेरे रचे नग्मों
पर
तुम हर महफ़िल में
ढ़ोल की धाप पर थिरकते हो
मुकम्मल इश़्क
का साक्ष्य
इससे बढ़कर क्या?
तुम
कहते थे
इश़्क
वो स्वाति की बूंद है
जिसकी चाह में
चातक टकटकी लगाए
मेघों को ताकता है
जानते हो
वही बूंद
मेरे रग रग में
तुम्हारी रुह को समेटे
मोती बन चुकी है
इसलिए
तुम अब
यादों के गलियारों से
आवाज़ ना दो
मुझे
इस दुर्लभ मोती संग
ही जीने दो।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” १७/०८/२०१९

फ़ना मोहब्बत

तेरे
हिस्से का वक्त
मेरी जिंदगी की घड़ी में
चुपके से यादों की बौछार करता है
और मैं रुह तक भीग जाती हूं
तेरे संग
आंखों रुपी कैमरे से ली तस्वीरें
खामोशी से शोर मचाती हैं
और मैं
दिल के कानों
पर हाथ रख लेती हूं
परमंपराओं
के पहाड़ ढ़ोते ढ़ोते
इश़्क की दास्तां बूढ़ी हो चली
मोहब्बत में फ़ना होने का जज्बा
आज़ भी जवां है।
✍️©® डा. सन्तोष चाहार “ज़ोया” ०८/०८/२०१९

राहें

वो राह
कहीं छूट गई
जिस राह पर
दो कदम साथ चले
हम और तुम

रह गए
शेष
टूटे दिलों पर
कसमें वादों के
आंसुओं से उकेरे निशां

जुदाई
के दशकों बाद भी
तेरे आशियाने तक
जाती हुई राह
पर गुजरते हुए
कदम
आज भी
ठिठक जाते हैं

बूढी
हसरतों में
उदासियों के कंकड़
आज भी
शूल से चुभते हैं

स्नेहिल
रिश्तों में जमी
आहों की बर्फ
ठिठुरन बन
पहली प्रीत के
निश्छल संवाद पर
नागफ़नी सी उग आई थी

फिर
आया था
बागबां इश़्क में
पतझड़ का मौसम
मासूम इरादों
के पीले पते
उस राह पर
आज भी बिखरे पड़े हैं
जहां से
तुम्हारे और मेरे घर का पता
तुम और हम
जानबूझकर भूले
ताकि
पनप सके
विश्वास का कल्पवृक्ष
और
निश्चिंत हो सकें
हमारे
सात फेरों के जीवनसाथी

लेकिन
क्या कोई ताकत
मिटा सकी है
उन पवित्र राहों को
जिनके किनारों पर
हर क्षण
खिलते हैं
इश़्क के आत्मीय पुष्प

ये राहें
दिल की नाजुक
पगडंडियों से होकर गुजरती हैं
जिन पर
रंग बदलती
दुनिया के दस्तूर
बेमानी हैं
जहां
होता है
हुस्न-ओ-इश्क़
का
एकछत्र शासन
और सजती है
रुमानियत की भव्य रंगशाला।
✍️©® डा.सन्तोष चाहार “ज़ोया”०३/०८/२०१९