Monthly Archives: July 2019

बेजुबां इश़्क

सरेराह
मिलकर गुज़रा वो
अज़ीज हसरतों का गुंचा लिए
डायरी के सफ़हों सी उजली
उसकी मासूम तमन्ना
जो
पिंजरबंद रही
ऊसलों के शहर
बंद मुठ्ठी में रेत सी
उसके
इश़्क की कहानी
शाख़
से टूटे पतों सा नसीब
कुछ लम्हें रीत गए
कुछ यूं ही बीत गए
एक
खास लम्हा
ख़त की सांसे बन
जीने की राह दिखा गया
बेजुबां इश़्क
का उजला ये पहर रहा।

सफ़र-ए-इश़्क
कुछ यूं तय हुआ
जूं
रात की मुठ्ठी में दिन निहित
और हो
घने अंधेरों से गुजरना चिन्हित
समर्पित
दिलों की दास्तां
रवायतों के
महीन धागों में
यूं उलझी
जूं
कूकुन में तितली
इश़्क के
सब्र का पहिया
अदब से फिर
नया मोड़ मुड़ गया
वक्त
की छैनी से
तराशता रहा
प्रेम पत्थरों को
रुह
का रुह से
जारी रहा मौन संवाद
मिसाल -ए- इश़्क
की
लिखी गई
यूं
अद्वितीय गाथा
फिर भी
हसीं दिलों में ठहर सी गई
मिलन की कसक
चाहतों के परिंदे
भर उड़ान
चूमना चाहें
एक दूजे का माथा।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २६/०७/२०१९

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उधेड़बुन

रिश्तों की
स्वेटर उधड़ती रही,
वह लड़की
कर्तव्यों के धागों
से पेबंद लगाती गई
इसी उधेड़बुन में
दुल्हन से
मां, काकी, ताई
से दादी, नानी
तक का सफर
पूरा हुआ
बुढ़ापे
की दहलीज पर
आभास हुआ
खुद के लिए
जीवन जीया ही नहीं
और
जिंदगी ने
अनंत सफर की
तैयारी कर ली
स्वास
अंदर खिंचा
लेकिन
बाहर नहीं आया
आत्मा
जर्जर देह को त्याग
नया चोला
पहनने की तैयारी में
आंगन के बीच
चहलकदमी कर रही थी
विस्मित हो
दहाड़े मारते
सगे संबधियों को
सुन रही थी
उसके
गुणों के
कसीदे पढ़े जा रहे थे
हर कोई
एक अदद बीबी
मां, काकी ताई को
जर्जर देह में तलाश रहा था
चीखें
सन्नाटें में बदल गई
आंखों के आंसू
सूख चुके थे…
रह गए थे केवल
पश्चाताप व
आत्मग्लानि के अंगारे
अंनत सफ़र पर निकली
सूक्ष्म आत्मा
सबके
दुख से दुखी
उनकी सांत्वना के लिए
फिर
उधेड़बुन में
व्यस्त हो गई।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २०/०७/२०१९

प्रेम पींग

आज
हवाओं ने फिर
खामोश शोर मचाया
ऐसा लगा
शहर में दीवाना
दस्तक लाया
रुठे साज़ों ने
हठ छोड़, छेड़ी
वही पुरानी तान
धड़कते
हंसी दिलों के
थिरके थे जब अरमान।

जुदाई
की ऋतु में
जहाज़ -ए इश़्क
टक्कराता रहा
तूफानी लहरों के प्रचंड वेग से
दिल के
खामोश आंगन में
बरसे थे
विरह के बादल
टिप टिप टिप
आंखों की कोरों से
टपकी थी यादें
अश्रु बन।

प्रीत
डोर की
उलझी गाठें
सुलझीं,
जात,धर्म, बिरादरी
की ढही दीवारें
शनैः शनैः
दमघोंटू
परम्पराओं के
कुंद हुए हथौड़े
नयी राहें
इंगित करती
नये उज़ाले
नयी मंजिलें
जीवन पतंग
ने छुआ
इंसानियत का
विस्तृत गगन।

समरसता
की सुरमई बेला
प्रेमी युगलों
के हिस्से की
बंद झरोखों से
छन छन
आने लगी धूप
इंतजार
की घड़ियां हुई रुख्सत
प्रेम तरु
पर डल गई पींगें
मन पंछी के
रात दिन लगे महकने
दिल- ए-बागबां की
चिड़िया लगी चहकने।
✍️©® डा. सन्तोष चाहार “ज़ोया”२०/०७/२०१९

जिद्दी यादें

येंं
यादें ना
जिद्दी हैं बहुतं
रात के
अंधेरे में
बेखौफ
टहलने निकल जाती हैं,
दुनिया
से बेखबर
टटोलती हैं
दिल का आंगन
सुरक्षित है जहां
वह
रुहानी ख़त
जो साक्षी रहा
इज़हार-ए-मोहब्बत का…।
यादें
बड़ी शिद्दत से ढूंढती हैं
उन
ख़तों के पुर्ज़ों को
जहां
इश़्क ने
कभी लिखी थी
वफ़ा की इबारत
और
हुस्न की आंखों में
तैरने लगी थी
सपनों की रंगीन तितलियां…।
यादों
के गलियारे में
अचानक
अमावस का हुआ बसेरा
मानसपटल
पर उग आए
कड़वी
यादों के कैक्टस
और
शूल की तरहं
चुभने लगी
वक्त की नुकीली सुईयां
लेकिन
यादें जिद्दी हैं
ठहर गई हैं
उसी मुकाम पर
जहां
हुआ था इक़रार
फिर
जुदा हुई थी राहें…।
यादें
घूमती रही
धरती की झिलमिल छत पर
जब
उग आया था चांद
सितारों से घिरा
तब
इश़्क और हुस्न
सिमट गए थे
एक दूजे की बाहों में…।
यादों
के ज़हन में
अटक गए
प्रेमपूर्ण
ख़तो के पन्ने
जो
फड़फड़ा कर
देना चाहें
रुहानी मोहब्बत
की ठोस गवाही
जब
हुस्न और इश़्क ने
बसाया था
प्रेमरस से सरोबार
स्वप्निली आशियाना…
यादें
जिद्दी हैं
सबसे बेफिक्र
रचाती इश़्क
की मेंहदी,
इश़्क
शिद्दत से
भरता हुस्न की मांग
रुमानियत के परदे में
सुहाग
की सज़ती सेज़
दुनिया के
संकीर्ण बंधनों से दूर
क्योंकि
यादें जिद्दी हैं
वे
कभी ना मानती हार।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया”१४/०७/२०१९