सौतेली सास

शर्मा दम्पत्ति हमारे ही शहर में रहते थे। डा साहब यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर पद से रिटायर हो चुके थे और उनकी पत्नी डा सरला एक सरकारी कॉलेज से पिछले साल ही रिटायर हुई थी। सरला और मेरा लगभग पिछले दस साल से एक ही कॉलेज में साथ रहा है और इसलिए मैं उसे काफी करीब से जानती हूं। डा शर्मा से उसकी दूसरी शादी थी और शर्मा जी की पत्नी एक हादसे में जान गवां बैठी थी तो डा साहब की भी ये दूसरी शादी ही थी। डा साहब ने सरला के साथ एक समझौता किया था कि ” हमारी इस शादी से कोई दूसरी संतान नहीं होगी। मेरा पंद्रह साल का एक बेटा ही इकलौती संतान रहेगा”। चूंकि सरला दूसरे प्रदेश से थी और मायके के हालात भी अच्छे नहीं थे तो बिना दहेज की इस शादी के लिए तैयार हो गई। शादी के बाद से ही सरला का व्यवहार इस इकलौते बेटे की प्रति बेरुखा ही रहा था और बेटा भी नयी मां के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहा था। रह रहकर उसे अपनी मां याद आती थी। उसकी स्थिति तो ये थे कि पहले मां को खोया और फिर पिता की दूसरी शादी से बाप को भी खो दिया। सरला ने इस इकलौते वारिस को हमेशा अपने बाप से दूर ही रखा। होस्टल में रखकर उसकी शिक्षा दिक्षा पूरी करवायी और फिर करियर के नाम पर उसे विदेश भेज दिया जहां वह डिग्री लेने के बाद वहीं सैटल हो गया। लेकिन सरला का अभी भी पूरा नियंत्रण रहता था और वह विदेश जाती रहती थी। डा साहब तो सरला की सुंदरता के जाल में ऐसे उलझे कि निकल ही नहीं पाए…काफी सीधे स्वभाव के स्वामी थे डा साहब। यूनिवर्सिटी में सेमिनार वगैरा में मुलाकात हो जाती थी। कमाऊ पत्नी मिलने पर उन्होंने पहली पत्नी को तो जैसे एकदम भूला ही दिया था। वैसे भी स्त्रियां ही ज्यादा भावुक होतीं हैं और पति की मृत्यु के बाद अपने बच्चे के सहारे जिंदगी काट लेती हैं।

सरला, एक दिन शादी का कार्ड लेकर घर आई तो पता चला कि सौतेले बेटे की शादी एक महीने के भीतर ही तय हो गई है। सरला ने बताया कि “सब बहुत जल्दी जल्दी हो गया है क्योंकि बेटा विदेश से कुछ दिन की छुट्टी आया है… लड़की डा साहब के दोस्त की जान पहचान से है और कि वे अल्मोड़ा से हैं… शादी यहीं आकर करेंगे… फेरे सादगी से होंगे.. हम लोग रिसेप्शन दे रहे हैं”। शादी में सम्मिलित होने का वायदा लेकर वह चली गई। निश्चित दिन पर हम लोग शादी समारोह में पहुंचे… वहां दूसरे साथी भी आए थे। सब लोग बड़े खुश थे और पुराने साथियों से मिलकर भोज का आंनद ले रहे थे। लेकिन कुछ तो था…डा साहब अकेले ही मेहमानों को रिसीव कर रहे थे..कुछ खामोशी सी…उत्साह की कमी… सरला की अनुपस्थिति खटक रही थी क्योंकि हम साथी तो उसी से ज्यादा परिचित थे। सायं सात बजे का न्यौता था…कुछ साथी तो बगैर सरला से मिले डा साहब को ही शगुन देकर लौट गए थे क्योंकि उन्हें दूसरे शहर जाना था लेकिन हम दो सहेलियां तो डटी रही कि बहू को देखकर ही जाएंगे। रात्रि के दस बजने को हो रहे थे और बहू अभी स्टेज पर भी नहीं पहुंची थी। कुछ और इंतजार के बाद मेरी सहेली विमला ने कहा ” उधर देखो, बहू तो पैदल ही चलकर आ रही है घर से और उसके साथ बस दो औरतें हैं और उनसे पीछे सरला और दुल्हा है”। थोड़ी देर बातों से ध्यान हटा हम दोनों सहेलियां बहू के स्टेज पर बैठने का इंतजार करने लगी। दुल्हा, दुल्हन अब स्टेज पर बैठ चुके थे। कुछ एक फोटोज हुए। जो लोग अभी तक इंतजार कर रहे थे आशिर्वाद देने नयी जोड़ी के पास गए। मेरी नज़र तो स्टेज पर ही गड़ी थी। विमला ने कहा “अब देखती रहेगी या आशिर्वाद भी देने चलेगी?”
“हां, हां। चलो चलते हैं” ऐसा कहकर विमला को लेकर मैं स्टेज पर चढ़ गई जहां बहुत ही औपचारिकता वश सरला हमसे मिली। हम सहेलियों ने नयी जोड़ी को आशिर्वाद स्वरूप उपहार दिया और नीचे सोफे पर बैठ गए। विमला ने कहा “तूने एक बात नोट की?”
“क्या?” मैंने कहा
“देख नहीं रही, कितनी सादा साड़ी पहना रखी है दुल्हन को?”
“हां, देख तो रही हूं… और गहना भी पुराने जमाने का एक हल्का सा हार है… शायद पहली मां की कंठी है… और एक मंगलसूत्र है बस”
” हां, यार। ये सरला तो हमेशा हर साल नये नये गहने बनवा कर पहनती रहती थी… और बहू को कुछ भी नहीं दिया”।
” हां, सही बात है। तूने देखा नहीं शादी के बाद कितनी महंगी साड़ियां पहनती रही है खुद। आज बहू के नाम पर इससे पैसा खर्च नहीं हो रहा”। मैंने भी अपनी उत्कंठा जाहिर की।
प्रोग्राम अभी थोड़ी देर ही चला क्योंकि अधिकतर लोग तो जा चुके थे डा साहब से ही मिलकर, शगुन भी उन्हें ही दे गए थे। रिसेप्शन पर तो लोग बहू देखने ही आते हैं और ये सरला तो बहू को ही इतना देर से लायी थी। हम दोनों सहेलियां भी सरला से अभिवादन कर समारोह से बाहर आ गई। बहू बहुत सुंदर थी लेकिन मुझे तो घर आकर भी एक बात खलती रही कि,” क्या नयी जोड़ी इतनी सादगी से ही शादी करती यदि बहू की असली सास जीवित होती…डा साहब के पास पैसे की भी कोई कमी तो थी नहीं… विदेश में भी रिसर्च फैलोशिप पर रहे हैं… तीन तीन फ्लैट हैं… एक ही दिन तो होता है शादी का जो मेमोरबल होना चाहिए… पैसों को ईंट गारा में ही थोड़ी ही बदलना जीवन का मकसद होना चाहिए… वह भी जब आप सक्षम हैं…1980 के दशक की साड़ी पहना दी बहू को…आजकल लहंगों का रिवाज़ है.. बेटा भी शेरवानी में नहीं था… मुझे वरुण के लिए दुख हुआ… ऐसा भी तो नहीं था कि सरला खुद पर खर्च नहीं करती थी… सर के बाल जब उड़ गए थे तो नयी नयी विग लगाकर घूमती थी”।
खैर, जो भी कई दिन बाद तक ये रिसेप्शन मुझे अजीब लगा, जहां मेहमान, मेजबान से ज्यादा खुश थे। इतना तो निश्चित तौर पर कह सकती हूं कि यदि वरुण की असली मां जीवित होती तो शादी में अलग ही रंग लगता। वरुण तो विदेश लौट गया है, अब ये नहीं पता कि बहू को पति का सानिध्य कब मिलेगा क्योंकि विमला बता रही थी कि अभी तो बहू , यहीं शहर में ही सरला के साथ दिखाई देती है।

✍️ ©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २९/०६/२०१९

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