Monthly Archives: June 2019

सौतेली सास

शर्मा दम्पत्ति हमारे ही शहर में रहते थे। डा साहब यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर पद से रिटायर हो चुके थे और उनकी पत्नी डा सरला एक सरकारी कॉलेज से पिछले साल ही रिटायर हुई थी। सरला और मेरा लगभग पिछले दस साल से एक ही कॉलेज में साथ रहा है और इसलिए मैं उसे काफी करीब से जानती हूं। डा शर्मा से उसकी दूसरी शादी थी और शर्मा जी की पत्नी एक हादसे में जान गवां बैठी थी तो डा साहब की भी ये दूसरी शादी ही थी। डा साहब ने सरला के साथ एक समझौता किया था कि ” हमारी इस शादी से कोई दूसरी संतान नहीं होगी। मेरा पंद्रह साल का एक बेटा ही इकलौती संतान रहेगा”। चूंकि सरला दूसरे प्रदेश से थी और मायके के हालात भी अच्छे नहीं थे तो बिना दहेज की इस शादी के लिए तैयार हो गई। शादी के बाद से ही सरला का व्यवहार इस इकलौते बेटे की प्रति बेरुखा ही रहा था और बेटा भी नयी मां के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहा था। रह रहकर उसे अपनी मां याद आती थी। उसकी स्थिति तो ये थे कि पहले मां को खोया और फिर पिता की दूसरी शादी से बाप को भी खो दिया। सरला ने इस इकलौते वारिस को हमेशा अपने बाप से दूर ही रखा। होस्टल में रखकर उसकी शिक्षा दिक्षा पूरी करवायी और फिर करियर के नाम पर उसे विदेश भेज दिया जहां वह डिग्री लेने के बाद वहीं सैटल हो गया। लेकिन सरला का अभी भी पूरा नियंत्रण रहता था और वह विदेश जाती रहती थी। डा साहब तो सरला की सुंदरता के जाल में ऐसे उलझे कि निकल ही नहीं पाए…काफी सीधे स्वभाव के स्वामी थे डा साहब। यूनिवर्सिटी में सेमिनार वगैरा में मुलाकात हो जाती थी। कमाऊ पत्नी मिलने पर उन्होंने पहली पत्नी को तो जैसे एकदम भूला ही दिया था। वैसे भी स्त्रियां ही ज्यादा भावुक होतीं हैं और पति की मृत्यु के बाद अपने बच्चे के सहारे जिंदगी काट लेती हैं।

सरला, एक दिन शादी का कार्ड लेकर घर आई तो पता चला कि सौतेले बेटे की शादी एक महीने के भीतर ही तय हो गई है। सरला ने बताया कि “सब बहुत जल्दी जल्दी हो गया है क्योंकि बेटा विदेश से कुछ दिन की छुट्टी आया है… लड़की डा साहब के दोस्त की जान पहचान से है और कि वे अल्मोड़ा से हैं… शादी यहीं आकर करेंगे… फेरे सादगी से होंगे.. हम लोग रिसेप्शन दे रहे हैं”। शादी में सम्मिलित होने का वायदा लेकर वह चली गई। निश्चित दिन पर हम लोग शादी समारोह में पहुंचे… वहां दूसरे साथी भी आए थे। सब लोग बड़े खुश थे और पुराने साथियों से मिलकर भोज का आंनद ले रहे थे। लेकिन कुछ तो था…डा साहब अकेले ही मेहमानों को रिसीव कर रहे थे..कुछ खामोशी सी…उत्साह की कमी… सरला की अनुपस्थिति खटक रही थी क्योंकि हम साथी तो उसी से ज्यादा परिचित थे। सायं सात बजे का न्यौता था…कुछ साथी तो बगैर सरला से मिले डा साहब को ही शगुन देकर लौट गए थे क्योंकि उन्हें दूसरे शहर जाना था लेकिन हम दो सहेलियां तो डटी रही कि बहू को देखकर ही जाएंगे। रात्रि के दस बजने को हो रहे थे और बहू अभी स्टेज पर भी नहीं पहुंची थी। कुछ और इंतजार के बाद मेरी सहेली विमला ने कहा ” उधर देखो, बहू तो पैदल ही चलकर आ रही है घर से और उसके साथ बस दो औरतें हैं और उनसे पीछे सरला और दुल्हा है”। थोड़ी देर बातों से ध्यान हटा हम दोनों सहेलियां बहू के स्टेज पर बैठने का इंतजार करने लगी। दुल्हा, दुल्हन अब स्टेज पर बैठ चुके थे। कुछ एक फोटोज हुए। जो लोग अभी तक इंतजार कर रहे थे आशिर्वाद देने नयी जोड़ी के पास गए। मेरी नज़र तो स्टेज पर ही गड़ी थी। विमला ने कहा “अब देखती रहेगी या आशिर्वाद भी देने चलेगी?”
“हां, हां। चलो चलते हैं” ऐसा कहकर विमला को लेकर मैं स्टेज पर चढ़ गई जहां बहुत ही औपचारिकता वश सरला हमसे मिली। हम सहेलियों ने नयी जोड़ी को आशिर्वाद स्वरूप उपहार दिया और नीचे सोफे पर बैठ गए। विमला ने कहा “तूने एक बात नोट की?”
“क्या?” मैंने कहा
“देख नहीं रही, कितनी सादा साड़ी पहना रखी है दुल्हन को?”
“हां, देख तो रही हूं… और गहना भी पुराने जमाने का एक हल्का सा हार है… शायद पहली मां की कंठी है… और एक मंगलसूत्र है बस”
” हां, यार। ये सरला तो हमेशा हर साल नये नये गहने बनवा कर पहनती रहती थी… और बहू को कुछ भी नहीं दिया”।
” हां, सही बात है। तूने देखा नहीं शादी के बाद कितनी महंगी साड़ियां पहनती रही है खुद। आज बहू के नाम पर इससे पैसा खर्च नहीं हो रहा”। मैंने भी अपनी उत्कंठा जाहिर की।
प्रोग्राम अभी थोड़ी देर ही चला क्योंकि अधिकतर लोग तो जा चुके थे डा साहब से ही मिलकर, शगुन भी उन्हें ही दे गए थे। रिसेप्शन पर तो लोग बहू देखने ही आते हैं और ये सरला तो बहू को ही इतना देर से लायी थी। हम दोनों सहेलियां भी सरला से अभिवादन कर समारोह से बाहर आ गई। बहू बहुत सुंदर थी लेकिन मुझे तो घर आकर भी एक बात खलती रही कि,” क्या नयी जोड़ी इतनी सादगी से ही शादी करती यदि बहू की असली सास जीवित होती…डा साहब के पास पैसे की भी कोई कमी तो थी नहीं… विदेश में भी रिसर्च फैलोशिप पर रहे हैं… तीन तीन फ्लैट हैं… एक ही दिन तो होता है शादी का जो मेमोरबल होना चाहिए… पैसों को ईंट गारा में ही थोड़ी ही बदलना जीवन का मकसद होना चाहिए… वह भी जब आप सक्षम हैं…1980 के दशक की साड़ी पहना दी बहू को…आजकल लहंगों का रिवाज़ है.. बेटा भी शेरवानी में नहीं था… मुझे वरुण के लिए दुख हुआ… ऐसा भी तो नहीं था कि सरला खुद पर खर्च नहीं करती थी… सर के बाल जब उड़ गए थे तो नयी नयी विग लगाकर घूमती थी”।
खैर, जो भी कई दिन बाद तक ये रिसेप्शन मुझे अजीब लगा, जहां मेहमान, मेजबान से ज्यादा खुश थे। इतना तो निश्चित तौर पर कह सकती हूं कि यदि वरुण की असली मां जीवित होती तो शादी में अलग ही रंग लगता। वरुण तो विदेश लौट गया है, अब ये नहीं पता कि बहू को पति का सानिध्य कब मिलेगा क्योंकि विमला बता रही थी कि अभी तो बहू , यहीं शहर में ही सरला के साथ दिखाई देती है।

✍️ ©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २९/०६/२०१९

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हंसते जख्म

“एक पैदाइशी पागल से तुम लोगों ने मेरी शादी कर दी। क्यों मां क्यों?” विभा आज अपनी अस्सी वर्षीय बुजुर्ग मां से झगड़ रही थी। विभा के सब्र का बांध टूट चुका था और उसका और किसी पर बस नहीं चला तो मां के पास मायके में बूढ़ी मां को उल्हाना दे रही थी। वह स्वयं भी छप्पन वर्ष की प्रौढ़ महिला, दो सयाने बच्चों की मां, अपने दिल में उठ रहे विरोध के अतिरेक को जज्ब नहीं कर पा रही थी। तेईस साल की उम्र से ही गजेटेड आफिसर के पद पर कार्यरत विभा पति के चौंतीस साल से जब तब होते हिंसात्मक व्यवहार से सख्त नाराज थी। मां ने धैर्य बंधाते हुए कहा कि ” बेटी, परिवार तो अच्छा ही देखा था। कमाऊ पूत था। घर में सबसे बड़ा। हमने तो यही सोचा था कि तुम्हारी इज्ज़त रहेगी बड़ी होने के नाते। देखने में इतना खूबसूरत जवान था कि तेरे पिता को एकदम पंसद आ गया…बेटी किसी के अंदर क्या है उसको तो भांपने का कोई यंत्र नहीं था हमारे पास।” विभा भी समझती तो सब थी। बचपन से ही हमेशा मां बाप की इज्ज़त करती आई थी। उनके संघर्ष को सलाम करती रही थी। चार बहनों में दूसरे नंबर की विभा, समझदारी में सबसे बड़ी ही लगती थी और यही कारण था कि आंख मूंद कर मां बाप की हर आज्ञा को शिरोधार्य किया था, इतने सालों तक और कभी अपनी तकलीफ भी नहीं बताई थी किसी को भी। लेकिन आज उसका दिल रो रहा था क्योंकि बेटे की सगाई से लौटते वक्त जो ड्रामा उसके पति विनेश ने किया था वह उसके लिए असहनयी था। यूं तो वह जानती है कि स्वयं की शादी से लेकर चौंतीस साल के वैवाहिक जीवन में परिवार व रिश्तेदारी में कोई प्रोग्राम ऐसा नहीं था जब विनेश ने ड्रामा ना किया हो…और विभा को ये सब अशोभनीय लगता था क्योंकि उसके संस्कार बहुत उच्च स्तरीय रहे थे और वह हर खुशी के पल को अपने जहन में कैद कर लेना चाहती थी लेकिन यहां ये महाशय सारी खुशी पर पानी फेर देते थे। पिछले बीस साल से तो वह गृहस्थी की गाड़ी अकेले अपने कंधों पर उठा रही थी क्योंकि विनेश पर “बुरी नजर” का तांत्रिक से करवाया हुआ टोटका किसी ने ऐसा किया था कि वह सचमुच में ही पागल हो गया था और विभा की ही हिम्मत थी कि उसे झेलते हुए संभव सब इलाज करवाया… और अंततः विनेश इस हद तक ठीक हो गया था कि पिछले चार पांच साल से फिर से लोगों से मिलने जुलने लगा था। विनेश के पागलपन का दौर ऐसा था कि उसका असर विभा के बच्चों पर भी पड़ा लेकिन दोनों बच्चे फिर भी आजकल की सख्त प्रतिस्पर्धा में अव्वल हो अपने मुकाम को हासिल कर चुके थे और इसीलिए विभा भी थोड़ा खुश रहने लगी थी। विभा का पति के प्रति आगाध प्रेम और समर्पण ही था जो उसने हिम्मत नहीं हारी थी जबकि वह स्वयं डिप्रेशन की दवाएं ले रही थी। एक पागल व्यक्ति को अकेले संभालते संभालते उसकी खुद की दवाई शुरू हो गई थी। विभा के जज्बे व हिम्मत की, सुसराल वाले भी दाद देते थे लेकिन आज तो वह बिफर गई थी मां के सामने। विभा की मां बहुत ही सरल स्वभाव की महिला रही हैं, जिसने खुद चुनौती भरा जीवन जीया था लेकिन पति के इंतकाल के बाद वह भी पिछले आठ साल से काफी हिल चुकी थीं। बड़ी बेटी से उनका बहुत लगाव भी था और सहारा भी यद्यपि एकमात्र बेटा किसी तरह की कमी नहीं रहने देता था।
विभा, बेटी के साथ मां से मिलने गई थी। मां तो विभा की तकलीफ से वाकिफ थी क्योंकि डिप्रेशन के फेज़ में विभा गुमसुम रहती थी लेकिन नौकरी पर जाती रही थी क्योंकि दो बच्चों की जिम्मेदारी उसके कंधों पर थी। विभा को मां ने काफी सांतवना दी लेकिन आज तो उसे जैसे भूली हुई बातें भी ताज़ा हो गई थी। विभा ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा कि ” मां, विनेश ने शादी के तीसरे दिन थप्पड़ मारा था क्योंकि सब्जी में मिर्च तेज हो गई थी और उसे नहीं मालूम था कि वह सादा सब्जी पंसद करता है… नयी बहु को सास को बताना चाहिए था… मां शादी से लेकर आजतक एक दिन ऐसा नहीं गया होगा जब मेरी आंख से आंसू ना गिरा हो… तीन महीने की बेटी जब पलंग से गिर गई थी तो मेरी लापरवाही बताते हुए उसे कुएं में डालने भागा था.. बच्चे टी वी देखने की जिद्द करते तो उठा कर उनका सिर टी वी से दे मारते थे…एक और तीन साल के नन्हें दो बच्चे… मां ये पागलपन नहीं तो और क्या है… ज्यादा रोने पर अनाज की टंकी में बंद करना, चाहे दो मिनट ही सही लेकिन बच्चों के दिमाग पर असर तो पड़ता है… थोड़ा बड़े होने पर बहन भाई में झगड़ा हो जाए तो घर से बाहर निकाल कर गेट बंद कर लेना और मुझे भी धमकी देना… ये पागलपन नहीं तो और क्या है? ” विभा की आंखों के सामने तो चलचित्र की भांति पिछले पैंतीस साल के वैवाहिक जीवन की रील जैसे चल निकली हो। विभा को अपनी नानी से ऐसे शिकायत करते देख विभा की बेटी नीना ने उसे चुप कराते हुए कहा कि ” मां, बहुत परेशान कर लिया नानी को। अब चुप करो। आपको इस शादी से हम दो प्यारे प्यारे बच्चे तो मिले हैं। खुश रहो। अब पापा की आदतों को आप बदल तो नहीं सकती। ” विभा बेटी की बात से सहमत थी बच्चे तो वाकई बहुत प्यारे हैं। वे केवल सुंदर ही नहीं हैं बल्कि उनकी सोच भी उम्दा दर्जे की है। विभा ने फिर बूढ़ी मां के हाथ पैर की मालिश की व सिर में तेल लगाकर बाल गूंथे। एक सप्ताह का समय बिताने के बाद वह मां को वायदा करके लौटी थी कि वह अपने जख्मों को हंसते हंसते सहन करती रहेगी लेकिन फिर कभी शिकायत नहीं करेगी क्योंकि अब नयी पीढ़ी को मनोबल और खुशहाल रखने का समय आ चुका है।

✍️©® डा सन्तोष चाहार “ज़ोया” २७/०६/२०१९

रुहानी चिरमिलन

आंखों की कोर से मोती सा आंसू लुढ़का और कंपकपाते हाथों से जूड़े से सफेद गुलाब निकाल कर शुभ्रा ने शंशाक की बूढ़ी अंगुली में दबा दिया…
शशांक को हार्ट सर्जरी के बाद मेदांता अस्पताल के प्राईवेट वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया था। वहां पर उसका आवसीय विद्यालय का साथी रोहित, सर्जन के रुप में विख्यात था और उसकी ही टीम ने शशांक की सर्जरी की थी, लेकिन अभी थोड़ा खतरा था इसलिए डा. रोहित हर वक्त शशांक की प्रोग्रस मोनीटर कर रहा था। शशांक की दोनों बेटियां अपनी मां को संबल देने के लिए विदेश से लौट चुकी थी। डा. रोहित ने शशांक की पत्नी व बेटियों को आराम करने के लिए उसी शहर में उनके घर भेज दिया था। शशांक के अन्य दो लंगोटिया यारों ने भी मेंदाता में ही जिगरी दोस्त की देखभाल का जिम्मा संभाल रखा था। पांच दिन के बाद शशांक की हालत में थोड़ा सुधार हुआ। परिचित सभी मिलकर जा रहे थे और हर संभव मदद का वायदा शशांक के परिवार वालों से कर रहे थे।
एक दिन रात्रि के दस बजे थे जब शंशाक ने डा. रोहित को पास बुलाया और एक कागज कलम के लिए ईशारा किया। रोहित ने तुरंत जेब से पेन निकाल कर एक कागज शशांक को दे दिया। सर्जरी की वजह से हालत बहुत अच्छी नहीं थी। काफी कमज़ोरी आ चुकी थी लेकिन पेन को संभालते हुए शशांक ने एक नाम उस पर लिख दिया। डा. रोहित ने जैसे ही पढ़ा ,” call Shubhra” तो वह गंभीर हो गया क्योंकि जिसका नाम लिखा था वह शंशाक की पहली “प्रीत” थी जिससे उसका संपर्क सालों पहले एक गलतफहमी की वजह से टूट चुका था… शंशाक की पत्नी शंकालु स्वभाव की थी और शुभ्रा और शशांक ने सालों पहले दूरी बना ली थी यद्यपि दोनों टेक्नोलॉजी में आए बदलाव के बाद कक्षा के समूह “याराना” में मेम्बर थे। शंशाक की सर्जरी की खबर समूह में ही शुभ्रा को भी पता चली थी लेकिन वह अपने वायदे से बंधी थी यद्यपि मन ही मन उसने अपने इष्ट देव से उसके लिए मंगलकामना की थी। डा रोहित जानते थे कि इस वक्त मरीज की मांग को पूरा करना उसके स्वास्थ्य के लिए बहुत अहम है। डा रोहित के पास शुभ्रा का व्यक्तिगत मोबाइल नंबर था तो उसने तुरंत शुभ्रा को वटसप किया।
“शुभ्रा, it’s Rohit here. Please reach hospital tomorrow morning at 11am. It’s urgent…”
” Is everything alright? How is Shshank? I hope nothing serious…”
” Everything in control, but please do come”
” Ok, I will be there in time”
शुभ्रा दूसरे शहर में रहती थी इसलिए रोहित ने सुबह आने के लिए कहा था। शुभ्रा सेवानिवृत्त हो चुकी थी और घर पर अकेली रहती थी। उसके पति दो साल पहले ही उसे छोड़कर दुनिया से अलविदा कह चुके थे।
रातभर, शुभ्रा के दिलोदिमाग पर शंशाक के साथ बिताया समय आंखों के सामने तैर गया… वह पल जब पहली बार इश्क़ ने दस्तक दी थी…वो रुमानी ख्याल जो दोनों का सांझा सपना था… वो पहला चुम्बन जो उसके हृदय को झंकृत कर गया था… समाज की वह संकीर्ण मानसिकता जिसकी वजह से हुई थी जुदाई… वर्षों बाद संपर्क हुआ तो दोस्ती का बढ़ाया हुआ हाथ शंकालु पत्नी की भेंट चढ़ा… वह मानसिक आघात जिसने उसे तोड़कर रख दिया था… पति के साथ हुए झगड़े… निश्छल प्रेम जो वह उसकी पत्नी और बच्चों पर न्यौछावर कर गई थी … उसकी शंशाक से कभी ना मिलने की कसम…क्योंकि उसने इस समाज में रहते ये जाना था कि आधुनिक वस्त्र और खानपान, रहनसहन के आवरण के पीछे जो इंसान जीवित हैं, उनकी सोच अभी भी बहुत संकीर्ण है… एक मासूम रुहानी प्रेम के लिए जहां स्थान नहीं है…शुभ्रा उहापोह में थी कि मेंदाता जाए या ना जाए…वह अंततः ये निर्णय लेकर सो गई कि शंशाक से मिलने जाना ही होगा… क्योंकि शंशाक ही वह शख्स था जिसने “इश्क़” की खुशबू से उसका परिचय करवाया था…नहीं तो इतने खूबसूरत अहसास से वह महरूम ही रहती…।

शुभ्रा ने शौफर को सुबह फोन लगाया और जल्दी पहुंचने के लिए आदेश दिया। ठीक 11 बजे वह रोहित से मिली जो कि बेसब्री से उसका इंतजार कर रहा था। रोहित , शुभ्रा को लेकर शंशाक के कक्ष में गया जो कि अभी छत की तरफ ताक रहा था। रोहित के साथ शुभ्रा को देखकर उसकी आंखों की कोर से मोती समान आंसू लुढ़का, जिसे शुभ्रा ने अपनी अंजुली में लेकर कहा, ” शंशाक, तुम बहुत हैंडसम हो…you are an amazing person” ये वही शब्द थे जो शुभ्रा ने हमेशा उसे कहे थे जब वक्त ने उन्हें जुदा किया। शुभ्रा की आवाज़ सुनते ही शंशाक के होंठों पर मुस्कान तैर गई और आंखों में चमक। शुभ्रा एक घंटे तक शशांक के पास उसका हाथ अपने हाथ में लिए बैठी रही… दोनों की मोहब्बत को कभी शब्दों की बैसाखी की जरुरत नहीं पड़ी थी… एक घंटे की मुलाकात में दोनों ने पूरी जिंदगी जी ली थी। रोहित को धन्यवाद देकर शुभ्रा घर वापिस लौट आयी…।
शाम के समय फिर फोन की घंटी घनघना उठी। उस वक्त वह चाय का प्याला पकड़े टेलीविजन पर भारत पाकिस्तान का मैच देख रही थी और उसकी वफादार “मैड” रात के खाने की तैयारी कर रही थी। रोहित का नम्बर सक्रीन पर शोर कर रहा था। चाय का कप एक तरफ रखते हुए, शुभ्रा ने कांपते हाथों से मोबाइल उठाया। रोहित ने सूचना दी थी कि ” शंशाक is no more”😢😢। शुभ्रा को अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। रोहित ने बताया कि “तुम जब मिलकर गई थी उसके एक घंटे बाद ही शंशाक की तबीयत नासाज़ हो गई। हमारी पूरी कोशिश के बाद भी हमारी टीम उसे बचा नहीं पायी..शायद शंशाक तुमसे मिलने के लिए ही अपने दिल को संभाले हुए था…।”😢😢 शुभ्रा ने अपनी सहेली कविता से बात कि , ” कविता, कल दोनों चलेंगे शंशाक की पत्नी व बेटियों से मिलने”। कविता, शुभ्रा की खास सहेली , उसी शहर में रहती थी। शुभ्रा के लिए रात काटे नहीं कट रही थी …असमंजस में थी कि ,पता नहीं शशांक की पत्नी कैसे रेस्पॉन्स करेगी… घड़ी टिक टिक कर अपने वजूद की ओर इंगित कर रही थी लेकिन शुभ्रा को तो लग रहा था जैसे समय ठहर गया है… तकिया पूरा आंसुओं से भीग चुका था… कब नींद आयी उसे नहीं पता। सुबह उसकी “मैड काकी” चाय देने के लिए उसके शयनकक्ष में गई… आवाज़ लगाई…लेकिन कोई प्रतिक्रिया ना पाकर हाथ से झिंझोड़ा… शुभ्रा की गर्दन एक तरफ लुढ़क गई… “मैड” जो एक काकी समान थी सहम गई और तुरंत शुभ्रा के बेटे को फोन लगाया है… दूसरा फोन उसकी सहेली कविता को किया जो तुरंत अपने पति के साथ शुभ्रा के घर पहुंच गई… शुभ्रा की मुठ्ठी बंद थी। कविता ने खोला तो देखा उसके हाथ में वह सफेद गुलाब था जो शंशाक ने विदा होते समय अपने सिराहने रखे गुलदस्ते से निकाल कर उसे भेंट किया था। “याराना” समूह में खबर आग की तरह फैल गई… एक तरफ शंशाक को मुखाग्नि दी जा रही थी तो दूसरे शहर में शुभ्रा इश्क़ की चादर ओढ़े चिता की लपटों में अंतिम यात्रा की ओर बढ़ गई थी…। दोस्तों में चर्चा का विषय था शुभ्रा और शंशाक का रूहानी चिरमिलन, जो इस समाज व दुनिया के बंधनों से मुक्त हो आसमां में दो चमकते सितारों के रूप में देदीप्यमान हो चुके था।
रुहानी इश्क़ की खुशबू को फैलने से कोई नहीं रोक सकता। ये समाज, दो प्रेमीयों को एक साथ जीवन जीने में अवरोध उत्पन्न कर सकता है लेकिन जिस इश्क़ में रुहानी इत्र की सुंगध है उसे नष्ट करने की ताकत इस धरती पर किसी के पास नहीं है…नापाक हैं वो जिन्हें इश्क़ के सही मायने समझ में नहीं आते।

✍️©® डा सन्तोष चाहार “जोया”१६/०६/२०१९

बेहिसाब मोहब्बत

बेहिसाब मोहब्बत की सज़ा हुई कुछ यूं मुकर्रर
जलते अंगारों पर चलती रहे वफ़ा जूं उम्र भर

तारीख ऐलान करेगी मेरी मोहब्बत का फ़साना
तेरी बेवफाई पर एक दिन जमकर हंसेगा जमाना

भ्रमर जूं मंडराते रहे बागों में तितलियों संग तुम
मधु के अतिरेक से एक दिन हो जाओगे खुद बेदम

घमंड के बादलों पर होकर सवार जो चले हो तुम
मेरी पीड़ की बरखा ना करेगी तेरी गुहार पर रहम

उम्र के साठवें साल ने दी है तेरे दरवाजे पर दस्तक
अल्हड़ सी, आदतें नहीं की हैं अभी तुमने रुखसत

विषपान कर हमेशा तुम्हें दिया ममता का आंचल
घुंघरू तोड़कर चली, न खनकेंगी तेरे नाम की पायल

अंतिम सांसो की माला जब तेरी होने लगेगी मद्वम मद्वम
चलचित्र की भांति, तेरे हृदयपटल पर चुभेगी मेरी कलम।

✍️©® डा सन्तोष चाहार “जोया” १३/०६/२०१९

दरार

तेरी मोहब्बत में फ़ना होकर हम जिंदगी भर रोए
आसमां का चांद देखते रहे, हम पल भर ना सोए

जमाना सच कहता रहा कि चांद में भी है दाग़
मोहब्बत की फिर भी सीने में जलती रही आग

गैरों की महफिलों में गाते रहे तुम प्रणय गीत
नग्मों के सागर में ढूंढती रही “वो” पहली प्रीत

बेखबर हो तुम डूबे रहे चांदनी की झिलमिल में
भूले तुम, ये रोशनी तपते “सूरज” की रहनुमाई से

तुम्हारी जिद्द कि, रखूं प्रीत को दुनिया से छुपा कर
मेरी जिद्द, सुनाऊं हमारी मोहब्बत की दास्तां गाकर

“मोहब्बत की तो डरना क्या” ये था तुम्हारा ही करार
हकीकत में दुनिया से डरे तुम,पड़ गई दिलों में दरार

मोहब्बत में फ़ना होने का भी एक खूबसूरत अंजाम
कलम को मिलती रही स्याही और दुनिया को पैगाम।

✍️©® डा सन्तोष चाहार “जोया”१४/०६/२०१९