Monthly Archives: May 2019

दस्तक

ये कौन
दस्तक दे रहा
दिल का दरवाजा
स्वतः ही खुल गया
फिज़ाओं में फैली
प्रीतम के
आगमन की महक
खत्म हुआ
मंजिल का इंतजार
ओह! ये मदहोशी का आलम
सब्र का बांध टूटा जाए
वो शायद
उसके शहर में हो चुका दाखिल
तभी तो
ये
दिल की धड़कन
हो रही बेलगाम
सांसो की डोर
में
प्रियतम की सांसें
ऐसे घुल रही
जैसे
दूध में शक्कर
खुद को संवारने
आईना देख
प्रयेसी ने पहनी
चटक गुलाबी रंग की साड़ी
जुड़े में ठूंसा
सुर्ख गुलाब
उसे है याद
सदियों से गुलाब
प्रीतम का पंसदीदा फूल
मोगरे का गज़रा तो वह लायेगा
चूंकिउसे
खुशबूओं से रहा बेपनाह लगाव
भौंरे की तरह
मंडराता तो था कलियों के इर्दगिर्द
कदमों की आहट सुन
प्रयेसी दौड़ी
सजाया आरती का थाल
चंदन की खुशबू से घर दिया महका
कहा ना
उसका प्रीतम
खुशबूओं से होता मदहोश
लेकिन
कदमों की आहट
कानों के दरवाजे पर हुई मद्वम
प्रेयसी उलझन में
शायद
घर के दरवाजे पर करे इंतजार
सोच रहा होगा
कि
उसकी प्रयेसी तो
धड़कन सुनने में चतुर
वह
नव यौवना की
गति से दौड़ना चाहती
ऊफ
ये दर्द करते घुटने
सपने से
जाग चुकी थी
सतर साल की वृद्धा
गर्म चाय के
प्याले में उठी खुशबू में ” दस्तक”
ज़हन में उतरी
आंखों
की कोर
गीली हो प्रेमपुष्प अर्पित कर गयी।

✍️©® डा सन्तोष चाहार “जोया” ३०/०५/२०१९

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गिरहें

टूटे धागों
को जोड़कर
ख्वाब बुनने जब
मैं चली
ढूंढती रही
वह
रेशम की डोरी
जिसमें
गुथे थे प्रेम के मोती
सागर से चुन चुन कर लाए थे तुम
तूफानों से टकराए थे तुम
फिर अचानक
ओढ़ ली
तुमने
खामोशी की चादर
जिंदगी
के चक्रवात में घिरे
हम
पत्तों जूं उड़ गए
तुम गिरे
माली की बगिया
मेरा ठिकाना
बियाबान जंगल
मंजिलें
हो गई जुदा
रेत
सा वजूद जिंदगी का
हाथ से फिसलती ही जा रही थी
कि
अचानक
एक मोड़ पर हुई मुलाकात
पकड़े थे
तुम वह रेशम की डोरी
अनगिनत
गिरहें उसकी
तुम खोल ना पाए
जब
मैंने खोला तो पाया
हर गिरह
तुम्हारे
टूटे आत्मविश्वास
की कहानी दर्ज किए थी
तुम
वो शख्स ही नहीं थे
जिसे टूटकर चाहा था मैंने
स्पष्ट था
मखमली बिछौने पर सोते हुए भी
तुम्हारी अंतर-आत्मा कचोटती हो जैसे
जंगलों
में रहकर
अस्तित्व की लड़ाई लड़
मेरा कद
तुम्हारे से कहीं ज्यादा बड़ा हो गया था
तुम
जीतकर भी हार चुके थे
और
मैंने हारी बाजी
जीत ली थी
क्योंकि
मेरे प्रेम की डोर में गिरहें नहीं थी।

✍️©® डा सन्तोष चाहार “जोया”२७/०५/२०१९

तन्हाई

तन्हाई
और मेरा
बहुत करीब का रिश्ता है
हम दोनों बैठकर
घंटों
तुम्हारी बातें करते हैं
तुम्हारे साथ
बिताए
खुशनुमा पलों को
जो
ख्वाबों के इत्र में भिगो
दिल के संदूक में
यादों का ताला लगा
रुहानी रुमाल में सहेज कर रखें हैं
उन्हें
अक्सर हर रोज़
गुफ्तगू की चाबी से खोलकर
तुम्हारा
दीदार करते हैं
फिर यादें
दिल की धड़कनों पर सवार हो
तुम्हारे
शहर की गलियों में
पर्दानशीं हो
तुम्हारे
नूरानी महल
के बाहर
तारों भरी रात में
एक झलक पाने के लिए
डटी रहती हैं
लेकिन
तुम
रेणुका के आगोश में
बेवफाई की चादर ओढ़
मुझ से
और मेरी तन्हाई से बेपरवाह
रिश्तों की
नयी दुनिया कायम करने में व्यस्त
हमें
फिर तन्हा छोड़ देते हो।
लेकिन
इस बार
मैं और मेरी तन्हाई
भावनाओं के सागर में
डूबते नहीं हैं
बल्कि
कलम की दुनिया का रुख कर
एक रचनात्मक संसार का हिस्सा बन
शब्दों की नक्काशी करते हुए
तुम्हें
हमेशा के लिए
रंग-रसिया की उपाधि से नवाज
सकून की राह पकड़ते हैं।

✍️©® डा सन्तोष चाहार “जोया” २५/०५/२०१९

बुनियाद

तुम
जिसे निभा
रहे हो
परवाना बनकर
वो शमा
क्षण क्षण
तुम्हें जलाती है
उसके
हुस्न का जादू
तुम्हें कैद
किए है
तुम्हारी
हर धड़कन
उसकी
दी हुई खैरात है
तुम्हारी दशा
एक डरे सहमे
कबूतर की है
जो बिल्ली को देख
आंखें बंद कर लेता है
उसके साथ
रिश्ते की बुनियाद
महज़ एक रेतीला टिब्बा है
जिस पर चलते चलते
तुम थक चुके हो
जहां
हरियाली की उम्मीद
आसमां
से तारे तोड़ना जैसा है
मुझे मालूम है
तुम्हारे हर ख्वाब
की मल्लिका
एक
निश्चित फासले पर रहते हुए
तुम्हारी सांसों
को गति देती है
तुम्हारी आंखें
उसके मानसचित्र
को हर पल संजोए हुए है
लेकिन
विडंबना है कि
एक दूजे
के लिए धड़कते दिल
दस्तूरों की हथकड़ियों में जकड़े हैं
और
बेबस प्रेम
संपूर्णता के लिए
अगले जन्म के इंतजार में
एक ठोस बुनियाद गढ़ने में लीन है
ऐसी बुनियाद
जहां प्रेमी हंस
किसी रुढिवादी रवायतों
के सामने बेबसी की सूली
पर नहीं लटकेंगे।

✍️ ©® डा सन्तोष चाहार “जोया” १९/०५/२०१९

इंतिहा

अंतस में
खामोशी का शोर
आंखों से
नहीं बहा सकती नीर
चट्टान सी क्यूँ बनती पीड़
जिंदगी के डभ निराले
रिश्तों का होता
वस्तु ज्यूं इस्तेमाल
भाव
मौन रहना चाहते
नहीं चाहें लिखूं
लहू से वेदना
शब्द
हठ पर
कलम चाहे
चक्रव्यूह को भेदना
पुरुष का दंभ
संतति की उपेक्षा
क्यों हर घर का किस्सा?
मोहभंग
दुनिया के दस्तूरों से
जिंदगी जीना
मुहाल करें
दिखने में भले लोग
फकीरों से
हृदय में शूल सी
चुभती बातें
कहने को जो अपने हैं
जीवन जिन पर
किया निस्सार
पीछ पड़े हैं
पैर पसार
इंतिहा
हो चुकी अब
भ्रम के ढहे किले
अंहकार
हर रिश्ते में अपार
चाहत
बाकी शेष जीवन
करुं खुद
पर वार।

✍️ ©® डा सन्तोष चाहार “जोया” ११/०५/२०१९

डर

जिद्दी
तुम हो
तुनक कर रहना
किसी का ना माने कहना
मर्जी से सोना
मर्जी से उठना
घर में कोई मदद करने से
हमेशा रहता गुरेज़
जो तुम
कमाते हो
मॉल में जाकर उड़ाते
क्रेडिट कॉर्ड
से होती शोपिंग
जेब जब
हो जाती खाली
हाथ पांव तुम्हारे फूलें
एंग्जाइटी करे
तुम्हें परेशान
मां की ममता ले हिलोरे
कर्ज तुम्हारा
छप्पन साल की उम्र में भी उतारे
सात साल की नौकरी में जीरो बैलेंस
पच्चीस लाख के पैकेज से भी गुजारा ना होता
क्या करोगे
लक्ष्मी का यूं अनादर कर
ममता का गला घोंट
अकेले कंधों पर
जिम्मेदारी का बोझ
उठाती आ रही
जब तुम दस साल की थी
क्या कहूं
बिल्कुल अपने पापा की कॉपी हो
सब कुछ छोड़कर
बैठ गए थे
वो भी जिद्दी थे
जिंदगी का थप्पड़
उन्हें रास्ते पर लाया
लेकिन
तब तक बहुत देर हो चुकी थी
मुझे डर है
कहीं ये कहानी
तुम दोहारा ना दो

✍️©® डा सन्तोष चाहार “जोया”११/०५/२०१९

चूहा दौड़

सपनों
का बाजार सजा
हकीकत के अफसाने
दर्द कुछ अपने, कुछ मिले बेगाने

जूस्तजू
तूफानो से
यूं टकरा जाएं
सागर की लहरों पर रचें जैसे नयी ऋचाएं

मंजिल
की आपाधापी
जीवन की ये रवानी
मुखौटों के बाजीगर सब,कैसी पशेमानी

इंसानियत
की नीवं रही
शनैः शनैः धरा से सरक
कौन किस हाल में है, नहीं पड़ता फर्क

चूहा
दौड़ में शामिल
भूले सीधी सादी चाल
भौतिकता की चाह में सब हो रहे बेहाल।

✍️ ©® डा सन्तोष चाहार “जोया” ३०/०४/२०१९

बेवजह

ना हमसफर बने,ना हमनवां बन पाए
ना जाने क्यों फिर भी रोज याद आए

तेरी पलकों में रही कैद मेरी हसरतें
साज़ की धुन पर गाती दर्द भरे नगमें

घुंघराले बालों की गिरफ्त में ये दिल
अधखुले होंठों की पंखुरी जाती मचल

प्रेमदीप जला, खींची लक्ष्मण रेखा
दस्तूरों का जाल महीन गया फेंका

हर पल तेरी सीरत की रही दीवानी
यादों के झूले में झूले ये प्रेम रुहानी

सागर के सीप में ज्यूं मोती बनता
मधुर बातों का सिलसिला यूं चलता

दस्तक देती सदाएं हृदयभुवन हर पल
रात के आगोश में सुनूं तेरी विरह अग्न

दुनिया से हो बेखबर, ख्याल मैं बुनती
धड़कनों में तेरी ,मेरी धड़कन मिलती

तुमसे मिलने की उम्मीद नहीं कोई
बेवजह मैं फिर क्यूँ गीत ये गाती ?

✍️©® डा सन्तोष चाहार “जोया” ०१/०५/२०१९