Monthly Archives: April 2019

मृगतृष्णा

रेत
के टीले
पर बैठकर
बालू का घरौंदा
बनाने की निरंतर कोशिश में एक बच्चा
मुठ्ठी में
भरा रेत
अंगुलियों
से झरता
बच्चा
फिर
दुबारा
उसी कोशिश में जुट जाता
जिंदगी
एक टक
देखती
ये अनवरत सिलसिला
मुठ्ठी में
रेत सी इच्छाएं
बांधने
की आदमी की लाख कोशिशें
फिसलती
रहती बार बार
वक्त
की सुई घूमती रहती अनवरत
भागते
दौड़ते
आदमी के हाथ
खाली
ही
संसार
से लेते विदा
एक दिन
और
बन जाते
उसी
मिट्टी का वजूद
जिससे पायी थी ये देह।

✍️ ©® डा संतोष चाहार “जोया” १४/०४/२०१९

मोड़

मोड़
मुड़ गए थे तुम
चलकर साथ दो कदम
दर्द दे
जुदा हुए
डरे थे तुम
दुनिया के दस्तूरों से
दोराहे पर
छोड़ अकेला
भीड़ का हिस्सा बन गए।

प्रेम
करते थे तुम
पर दुनिया से डरते थे
मेरा प्रेम
शाश्वत
मधुर
अंंनत
सदियों से बहती धारा सा

एंकात
मुझे भाता
स्वीकार नहीं मुझे
अस्तित्वहीन भीड़ का वजूद
मेरा प्रेम
मीरा सा
राधा सा
निश्छल
निर्लिप्त।

आज भी
मेरी रुह
का हिस्सा हो तुम
फिर कहां जुदा हो तुम
इस मोड़ पर
दस्तूरों के सब दरवाजे बंद है
ना खोने का डर है ना मिलने का भ्रम
प्रगाढ़ प्रेम की धारा बहती यूं बन दुर्लभ।
✍️ ©® डा सन्तोष चाहार “जोया” १२/०४/२०१९

बगावत

“हैलो बेटा जूही”
रमा ने शाम सात बजे अपनी बेटी जूही को फोन लगाया। लेकिन अभी लाइन व्यस्त का संदेश आ रहा था। रमा ने सोचा थोड़ी देर में दुबारा मिला लूंगी और वह किचन में रात के खाने की तैयारी में जुट गई। रमा बेटी के साथ मित्रवत ही रहती थी।
जूही, एक सुंदर, आत्मविश्वासी लड़की, जो कि पिछले तीन साल से एम।एन।सी। में मुम्बई में मैनेजर के पद पर कार्यरत
थी। रमा की पहली संतान, खूब दुलार से पली पढ़ी और उच्च संस्थानो से एम। बी।ए। कर अच्छे पैकेज पर कैंपस प्लेसमेंट लेकर अपनी क्षमता का लोहा मनवा रही थी। जॉब के तीन साल तक रमा और शशांक ने उसे कभी शादी के लिए बाध्य नहीं किया था। लेकिन अब शशांक का स्वास्थ्य भी ज्यादा ठीक नहीं रहता था क्योंकि एक साल पहले ही हॉर्ट सर्जरी हुई थी और समय से पहले रिटायरमेंट ले लिया था। इकलौती संतान थी तो रमा के सास ससुर भी चाहते थे कि शादी धूमधाम से हो जाए चूंकि उन्हें भी पोती की शादी का बहुत चाव था। दूसरी बात ये भी थी कि रिश्ते नातेदार भी कभी ना कभी अहसास करा ही देते थे कि, “लड़की की उम्र निकली जा रही है और शादी नहीं कर रहे हो क्या?”

“हैलो मम्मा” इस बार जूही ने फोन लगाया था।
” हां, बेटा, कैसी हो?”
“बहुत खुश हूं मम्मा” अभी अपने ऑफिस से निकली हूं। मेरी दोस्त नीना का फोन आया हुआ था , जूही बताती चली।
“बेटा, एक बहुत बढ़िया रिश्ता आया है, उसी के संबंध में बातचीत करनी है” रमा ने अपना पासा फेंकने की कोशिश की।
” मम्मा आपको पता है, मैं इस तरह की एरेंजड़ मैरिज में विश्वास नहीं करती… मैं किसी भी अजनबी से शादी कैसे कर सकती हूं… मुझे पहले बताओ कौन है, क्या करता है। कहाँ से शिक्षा हुई है.. कितना पैकेज है…?” जूही की लम्बी लिस्ट थी सवालों की और रमा समझ नहीं पा रही थी, इतना कम बोलने वाली जूही इतने प्रश्न उठा रही है।
” बेटा, लड़का पूना में इंफोसिस में चीफ मैनेजर है। सुंदर, गठीला शरीर और बढिया व्यक्तित्व का धनी है। तीस लाख का पैकेज है….गोत्र भी नहीं मिलते हैं…तेरे पापा के एक दोस्त ने रिश्ता बताया है…वे लोग घर आए थे और रिश्ते के लिए तैयार हैं… हमने ही कहा था कि एक बार बेटी से बात कर लेते हैं…।”
” मम्मा, ऐसा है, मैं अभी कुछ नहीं कह सकती जब तक लड़के से मिलकर बातचीत ना हो जाए… उसको समझ ना लूं… ऐसे कैसे शादी कर लूं”।
“ऐसा है, बेटा, किसी को भी आप सारी जिंदगी भी नहीं समझ सकते… क्या समझ लोगी कुछ दिनों में..तेरे पापा को ही मैं समझ नहीं पायी इतने सालों में.. हमारे स्वयं के विचार भी बदलते रहते हैं… शादी ब्याह में बड़ों की पारखी नज़र होती है… दादा जी भी चाहते हैं ये रिश्ता हो जाए… ” इस बार रमा अपनी पूरी कोशिश कर रही थी।
” मम्मा, बस अब और नहीं सुनना मुझे… पढ़ लिखकर क्या हमारी समझ इतनी विकसित नहीं है कि अपना भला बुरा सोच सकें… आप लड़के का बॉयोडाटा वटसप कर दें…लिंकड़न पर मैं सारा चैक कर लूंगी… और यदि लड़का बातचीत करना चाहता है तो उसका नंबर मुझे दे देना…”।

“ठीक है, बेटा, भेज देती हूं लेकिन मुझे नहीं लगता वे बातचीत में रूचि दिखाएगा… शायद उसके मां बाप को भी ये बात पंसद ना आए” रमा ने हिचकते हुए कहा।
” मम्मा, फिर ठीक है ना। जो लड़का अभी भी मां बाप की ही अंगुली पकड़ कर चलना चाहता है तो बात करने का क्या मतलब है… शादी जीवन भर का बंधन है और यदि एक पढ़ा लिखा व्यक्ति अपना खुद का वजूद नहीं रखता तो ऐसे व्यक्ति से बातचीत किसलिए… मैं मानती हूं मां बाप का आशिर्वाद लेना चाहिए लेकिन उसके अपने भी कुछ ख्यालात होगें शादी के संबंध को लेकर… अच्छा मम्मा मैं रखती हूं, अभी जिम जाना है… बॉय”। जूही की बेबाकी से एकबारगी तो रमा अचम्भे में थी लेकिन शांत मन से सोचा तो लगा कि ठीक ही तो कह रही है। रमा जीवन के तीस साल पीछे चली जाती है जब वह अपनी कोई पंसद नापंसद नहीं बता पायी थी। हिम्मत ही नहीं होती थी उस जमाने में। जहां पिता, ताऊ व चाचा ने रिश्ता तय किया, चुपचाप शिरोधार्य था। पढ़ीलिखी तो वह भी थी, लेकिन मज़ाल अपनी कोई बात रख सकें। शादी के बाद भी कोई परेशानी होती तो यही कहा जाता था कि, ” अब वही तुम्हारा घर है। एडजस्ट करो”। रमा को याद है उसके बाद सारी उम्र एडजस्टमेंट में ही गुज़री थी…पहले अपने मायके की इज्ज़त की खातिर, फिर अपनी बच्ची की खातिर…।

शंशाक ने भोजन करने के पश्चात पूछा था रमा से…इस रिश्ते को लेकर। रमा ने जो बातचीत हुई थी जस की तस बता दी थी। शशांक कुछ नहीं बोले। रमा ने कहा, ” आप चिंता ना करें… क्या मालूम बातचीत करने से जूही को लड़का पंसद आ जाए”। शशांक ने अपने दोस्त को सारी स्थिति से अवगत करवाया और जूही को बातचीत के लिए मोबाइल नंबर दे दिया गया। मुंबई और पूना की दूरी भी बहुत अधिक नहीं थी, सो जूही ने नीलेश से मिलने का प्लान बनाया। दो चार बार वे एक दूसरे से लंच पर मिले, जिंदगी व शादी के फलसफे पर चर्चा हुई। नीलेश मुंबई भी आया। एक महीने बाद जूही ने अपनी मम्मा को फोन कर सारी बातचीत का निष्कर्ष बताया।
” मम्मा, मैं इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हूं”
“क्यों, बेटा। क्या हुआ?” रमा परेशान हुई।
” नीलेश, दिखने में तो बहुत आधुनिक है। बेरेंड सूटबूट है। महंगे होटल्स में खाने का शौकीन है। घूमने फिरने का भी शौक है…” जूही बताती जा रही थी।
” फिर , दिक्कत कहां है?” रमा ने सीधा सवाल किया क्योंकि उसे घुमा फिराकर कहना पंसद नहीं था।
” मम्मा, नीलेश की सोच वही पुरुष प्रधान मानसिकता वाली है… उसके हर एक एक्शन से साबित हो रहा था कि पढ़ने लिखने से उसके ज्ञानचक्षु नहीं खुले हैं…ये डिग्रीयां केवल अच्छे ओहदे पर पहुंचने के लिए हैं उसके लिए.. चूंकि मैं शादी से पहले सब बातें रखना चाहती थी तो मैंने अपनी साथी दोस्तों के बारे में बताया तो उसके चेहरे पर ईर्ष्या के भाव स्पष्ट थे…और उसने ये भी कहा कि शादी के बाद ये पुरुषमित्रों से वास्ता नहीं रखना है…।”
” बेटा, ये सब बातें उससे कहने की क्या जरूरत थी। पुरुषों को ईर्ष्या होती ही है…”
” मम्मा , ऐसा है। जो व्यक्ति शादी की नींव ही अविश्वास पर रखना चाहता है तो मैं ऐसे व्यक्ति से शादी नहीं कर सकती.. चाहे मुझे ताउम्र अविवाहित रहना हो…।”
रमा को बहुत तनाव हो रहा था क्योंकि रिश्ता खुद चलकर आया था और वह तो सोच रही थी, ये शादी की जिम्मेवारी भी पूरी हो जाए तो गंगा नहा लें। लेकिन इस लड़की के बगावती तेवर के सामने किसी का बस नहीं चलेगा। ये तो घर में सब जानते थे कि बचपन से ही जिस बात पर अड़ जाती तो किसी चेतावनी से भी नहीं डरती थी। अपने बाप पर गई थी। बाप की तरह काम में होशियार तो थी ही, सोशल सर्कल का दायरा भी विस्तृत था और इसीलिए, उसके दोस्तों की फेरहिस्त में लड़के व लड़कियां दोनों शामिल थे। जूही में कभी जैंडर बॉयस नहीं था। हर रिश्ते में क्लेरिटी चाहती थी बस।
रमा ने शाम को शशांक को वस्तुस्थिति से अवगत कराया। दादा जी तो बहुत गुस्से में थे लेकिन शशांक बेटी की जिद्द के आगे झुक गए। वे समझते थे कि नया जमाना है इसके साथ कदम मिलाना ही बेहतर है। जूही ने ये भी स्पष्ट कर दिया था कि वह शादी अपनी पंसद से ही करेगी। दो साल इस तरह और बीत गए और फिर एक दिन जूही ने रमा को फोन करके बताया कि वह निशांत से शादी करना चाहती है। निशांत सजातिय नहीं था। दादाजी पुराने ख्यालात के आदमी थे।.घर में खूब हंगामा किया लेकिन जूही ने कहा कि, ” आप लोग यदि शादी नहीं करेंगे तो हम दोनों कोर्ट मैरिज कर लेगें। निशांत सुलझा हुआ लड़का है और अच्छे पद पर उसके ही ऑफिस में चीफ मैनेजर है। उसके घर वाले भी शादी के लिए तैयार हैं”। इकलौती बेटी की शादी के खूब सुनहरे ख्वाब देखे थे रमा और शशांक ने। जूही निशांत को मिलवाने घर लाई थी। बातचीत करके शशांक ने फैसला किया कि शादी धूमधाम से होगी। बेटी की खुशी से बढ़कर उनके लिए कुछ नहीं है। पढ़ा लिखा परिवार मिल रहा था। शुभ मुहूर्त देखकर दोनों पक्षों के रीति रिवाज से शादी संपन्न हो गई। जूही और निशांत की जॉब भी विदेश में अच्छी कंपनी में निश्चित हो गई थी। अपने सपनों को साकार करने दोनों विदेश चले गए। दोनों को ही दुनिया भ्रमण का शौक था। जूही पांच साल बाद निशांत के साथ देश वापिस लौट आई। रमा और शशांक नाना नानी बन चुके थे। नातिन को देखकर दोनों का दिल गदगद हो रहा था। बिल्कुल नन्ही जूही ही थी और उन्हें इस बात का डर भी था कि उनकी नातिन भी एक दिन जूही और निशांत के फैसलों पर बगावत करेगी। खैर जो भी हो अभी वे उसके बचपन को एन्जॉय कर रहे थे।
✍️©® डा सन्तोष चाहार “जोया”०२/०४/२०१९