मोहब्बतें

रविवार का दिन था। रमा, अपनी बहन से मिलने दिल्ली (द्वारीका)उसके घर पहुंची ही थी कि उसने दरवाजे पर ही सुनाई पड़ा कि उसकी बहन दीपा, बेटी ईवा पर जोर जोर से चिल्ला रही थी। दरवाजा चूंकि खुला था तो वह अंदर चली गई । अंदर जाकर देखा तो ईवा की नानी व मामाजी भी आए हुए थे। वे ईवा के रिश्ते के सिलसिले में ही उदयपुर से पहुंचे थे। सबके चेहरों पर हवाईयां उड़ रही थी। दीपा को समझ नहीं आया कि ईवा से ऐसी क्या गलती हुई है। रमा, मां व भाई के साथ बैठे ईवा के पापा को नमस्ते कर वहीं बैठ गई। नानी उठकर, दूसरे कमरे में चली गई, ईवा के पास। रमा ने ईवा के पापा सोमबीर से पूछा, “कि, क्या बात है?” रमा को डर था कहीं भड़क ना जाएं। सोमबीर ने कहा ” ये लड़की, दूसरी जाति के लड़के से शादी करना चाहती है और ऐसा मैं हरगिज़ नहीं होने दूंगा”। रमा आधुनिक ख्यालात की सुलझी हुई महिला थी। उसने सोमबीर से कहा, ” क्या हो गया? दूसरी जाति के लोग क्या इंसान नहीं होते?” सोमबीर के तेवर अब और तीखे हो गए। उनको वैसे भी रमा की आजाद ख्याली पंसद नहीं थी और उन्हें संशय रहता था कि कहीं ,रमा उनकी बेटियों को बहका ना दे। शंकालु प्रवृत्ति के इंसान तो थे ही शुरू से। रमा की भी उनसे बनती नहीं थी। सोमबीर ने कहा, ” गांव के सरपंच की पोती है, ईवा। चौधरी परिवार की आन बान है। यदि इसने जिद की तो मैं, इसकी बोटी बोटी काट दूंगा”। रमा को बहुत अचम्भा हुआ ये सब सुनकर। वैसे भी खाप पंचायतों के फरमान आए दिन अखबारों में पढ़ती रहती थी। घर का माहोल तनाव पूर्ण हो चुका था। ईवा के मामाजी ने सोमबीर और बहन दीपा को समझाने की काफी कोशिश की, लेकिन दोनों टस से मस नहीं हुए। ईवा, बहुत ही सुंदर, शिक्षित इंजीनियर लड़की, घर और रिश्तेदारी में सबसे बड़ी थी। इतने सालों में पहली बार उसने अपनी कोई इच्छा रखी थी। ईवा, संवेदनशील भी बहुत थी और मां बाप की हर बात को शिरोधार्य करती आई थी अबतक। अभी भी बड़ी शालीनता से अपनी बात रखी थी।

सन् 2002 का भारत था, जब लड़कियों की शिक्षा दिक्षा बढ़चढ़ कर हो रही थी। लेकिन गांव/शहर के समाज की सोच में परिवर्तन बहुत ही धीमी गति से हो रहा था। खूब शोर शराबा हुआ उस दिन। ईवा, रमा मौसी को बहुत मानती थी। दोनों ने रातभर बातचीत की क्योंकि इस वक्त उसे ऐसे सबंल की जरूरत थी जो उसकी भावनाओं को समझ सके। रमा को ईवा से पता लगा कि, प्रशांत, इंजीनियरिंग कॉलेज में उसके सीनियर थे और अब विदेश में जॉब कर रहे हैं। ईवा ने बताया कि वे पिछले पांच सालों से संपर्क में हैं। रमा ने उसको नैतिक समर्थन दिया और समझा दिया था, ” कि ये तुम्हारा पारिवारिक मामला है तो दखल नहीं दे सकती लेकिन तुम मजबूती से अपने ‘ इश़्क’ के लिए खड़ी रहो।” सोमबीर की बातें ईवा ने सुन ही ली थी और वह बहुत आहत हुई थी। वह कुछ निश्चय करके सो गई। रमा अगले दिन वापिस अपने घर आ गई थी और बहुत दुखी थी ईवा के लिए। पंद्रह दिन बीत गए तब रमा की छोटी बहन, शिखा का फोन आया कि , “क्या ईवा तुम्हारे पास आई है? वह गाड़ी लेकर निकली थी सुबह और शाम हो गई, घर नहीं पहुंची है। वहां सब परेशान हैं”। रमा का मन भी बहुत विचलित हो रहा था। एक घंटे बाद खबर मिली कि उसकी कार दुर्घटना हो गई है, थोड़ी चोट लगी है लेकिन वैसे ठीक है। रमा, मिलने हॉस्पिटल पंहुची तो ईवा के मां बाप भी वहीं थे। रमा को ईवा ने कहा, ” मौसी, मैं जीना नहीं चाहती थी, इसलिए गाड़ी तेज़ स्पीड़ में चला रही थी।” रमा से अब जज्ब नहीं हुआ और उसने अब सोमबीर और दीपा से लगभग चीखते हुए कहा, ” तुम्हें, बेटी से ज्यादा अपनी झूठी शान प्यारी है। आजतक इसने वही पढ़ा, जो तुम चाहते थे। कभी गलत नहीं चली। आज़, एक ऐसे जीवनसाथी के लिए तुम्हारी इजाजत मांग रही है, जहां वह दिल दिमाग से जुड़ी है। लड़का हैंडसम है, अच्छी जॉब पर है और क्या चाहिए?आज, इसे खुदा ना खास्ता कुछ हो जाता तो अपने वसूल लेकर बैठे रहना”।

सोमबीर को अब समझ में आ गया था कि लड़की अपने जीवन से खिलवाड़ कर सकती है। दीपा ने भी अपने पति को कह दिया कि, ” अब शादी वहीं होगी, जहां ईवा चाहती है”। निर्णय हो चुका था। आज एक मां अपनी बेटी के लिए पति का साथ छोड़ बेटी के साथ खड़ी थी। चार महीने बाद शुभ मुहूर्त देखकर शादी निश्चित हो गई। सोमबीर के दोस्त ने ही सारा इंतजाम किया था और उसकी पत्नी ही खरीदारी करने ईवा के साथ गई थी। सोमबीर अपने दोस्त के सामने फफ़क कर रोया था। उसने कहा था कि, ” मेरी मर्जी से शादी करती तो गहनों से लाद देता। लम्बी गाड़ी में विदा करता”। रमा को सारी बातें पता लगती रहती थी क्योंकि वह भी इस परिवार को जानती थी। समाज को दिखाने के लिए बहुत बढिया शादी की व्यवस्था की गई लेकिन नाममात्र के गहने और कपड़ें दिए गए थे। गाड़ी देने की हैसियत थी लेकिन वह भी नहीं दी, जिद अभी भी कायम थी। रमा, सोमबीर के अड़ियल रवैए से वाकिफ़ थी। ईवा ने कोई जिद नहीं की क्योंकि उसका ‘इश़्क” मुक्म्मल हो रहा था। विदेश जाने की सारी तैयारियां पहले ही हो चुकी थी। वीजा भी लग गया था। शादी के एक सप्ताह बाद ईवा अपने जीवनसाथी के साथ विदेश चली गई। दो हंसों की जोड़ी का मिलन हो चुका था।

सन् 2017 में सोमबीर और दीपा की दूसरी बेटी, मेहा, जो अमेरिका से सुपर स्पेशलिस्ट बनकर आयी थी उसने भी अंतरजातीय प्रेमविवाह ही किया है। लेकिन चूंकि वह थोड़ी प्रैक्टिकल है तो अपने मां बाप को अपने पक्ष में शुरु से ही कर लिया था। पंद्रह साल बाद दूसरी शादी हो रही थी तो अब सोमबीर भी जमाने के साथ ताल मिला रहा था। रमा, बताती है कि, ” मेहा ने डेस्टिनेशन वेडिंग पर सोमबीर का एक करोड़ रुपया खर्च करवा दिया और वे कुछ कह भी नहीं पा रहे थे”। बड़ी बेटी ईवा ने शादी के बाद कभी घर से कुछ नहीं लिया। अमेरिका में अच्छी जॉब पर है। रमा मेरे पास बैठकर कहती है कि, ” एक बाप भी बच्चों में कितना भेदभाव कर देता है। ” पैसे का पूरा नियंत्रण सोमबीर के पास रहता था तो दीपा इस मामले में दखलंदाजी नहीं कर सकती थी। ईवा आत्मकेंद्रित हो चुकी है क्योंकि उसका दिल पिता की तरफ से टूटा था। सुसराल में सास को बहुत सम्मान दिया और प्यार किया था लेकिन वहां से भी सुनने को मिला था कि, ” बहु, हो। ज्यादा बेटी बनने की कोशिश मत करो”। रमा की छोटी भानजी, मेहा, सब बता देती है रमा को, क्योंकि वह रमा की लाड़ली है। सोमबीर और दीपा की दोनों बेटियों ने मनपसंद साथी से विवाह किया और एक नयी सोच की आधारशिला रखी। सोमबीर की दोनों बेटियां अपनी गृहस्थी में सुखी व संतुष्ट हैं। सोमबीर अब अपने दामादों की भूरी भूरी प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि, “मेरी बेटियों की च्वॉइस कम थोड़े ही है’।

रमा का मानना है कि , “लड़कियां जब हर क्षेत्र में सक्षम हैं तो ,उनमें इतनी समझ भी है कि अपना जीवनसाथी चुन सकें। झूठे दम्भ की दीवारें अब गिरनी शुरू हो चुकी हैं।अभी भी लेकिन समाज का बड़ा हिस्सा है जिन्हें ये सब बेमानी लगता है। लेकिन समझने की बात ये है कि बच्चे सक्षम हैं, अच्छी जॉब करने की क्षमता रखते हैं तो क्या जीवनसाथी चुनने की उनकी समझ नहीं है?”

✍️ ©® डा. सन्तोष चाहार “जोया” २५/०३/२०१९

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