यादों की कश्ती

यादों की कश्ती के चप्पू ताउम्र चलते रहते हैं और रह रह कर उस मंजिल की ओर रुख करते हैं जहां प्रेमसागर के एकांत टापू पर कभी इश़्क की तहरीरें दिल की तख्ती पर लिखी गईं थी। माही और सुरभि का प्रेम इस बात से बेखबर था कि उन परवान चढ़ता इश़्क एक उस अंधेरी कोठरी की ओर बढ़ रहा है जहां दर्द के काफ़िले कभी उनका पीछा नहीं छोड़ेंगे।

माही , एक बहुउद्देश्यीय कम्पनी में सी। ई ।ओ। के पद पर आसीन बखूबी अपनी जिम्मेदारी को निभाते हुए, कम्पनी के ऊंच अधिकारियों की नज़रों में निश्चित स्थान बना चुका था। ऊंच आंकाक्षाओं के चलते माही ने कभी शादी के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा था। चालीस वर्ष की उम्र में अब उसकी शादी की कोई इच्छा शेष नहीं थी। सुरभि एक आत्मविश्वास से लबरेज़ पैंतीस वर्षीय महिला दो महीने पहले ही माही की कम्पनी में चीफ़ मैनेजर बनकर आई थी। सुरभि की सुझबूझ , कार्य क्षमता व दक्षता ने सभी के मन में एक खास जगह बना ली थी। माही और सुरभि का मेलजोल बढ़ रहा था और एक साल में वे एक दूसरे के काफी करीब आए। एक सुखद भविष्य की कल्पना से दोनों प्रेम की कश्ती में सवार हो प्रेमासागर में विहार कर रहे थे। समय पंख लगाकर उड़ने लगा और रंगीन सपने क्षितिज छूने की चाह लिए उड़ान भर रहे थे।
दोनों उम्र के उस पड़ाव पर थे जहां शादी विवाह को वे बहुत सादगी पूर्ण तरीके से सम्पन्न करने में विश्वास रखते थे। अजातीय प्रेम विवाह होने की वज़ह से दोनों के घर वाले बहुत खुश नहीं थे क्योंकि मूल रूप से उनकी जड़ें गांव से जुड़ीं थी। माही के परिवार ने तो सुरभि को स्वीकार कर लिया था लेकिन सुरभि के घरवालों ने सभी संपर्क सूत्र काट लिए थे और पग फेरा के लिए भी वह अपनी सहेली के यहां गई थी। उसकी सहेली काफी आधुनिक विचारों की थी जो इंसान को इंसान के रूप में ही महत्व देती थी। समय बीता और सुरभि और माही के आंगन में नन्ही परी का आगमन हुआ। अब सुरभि ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया था क्योंकि वह अपनी बेटी की परवरिश के लिए केवल ‘आया’ पर भरोसा नहीं कर सकती थी। कितने ही किस्से सुने थे उसने कि किस तरह आया लोग छोटे बच्चों को कुछ हल्का नशीला पदार्थ सुंघाकर कर सुला देते थे। माही ने काफी बचत कर रखी थी और एक सपनों का घर खरीद लिया था। दोनों की जिंदगी में खुशहाली थी। नन्ही परी भी अब तीन वर्ष की हो चली थी। उसकी तुतलाती प्यारी बातें सबका मन मोह लेती थी। माही के माता पिता पुश्तैनी जमीन व मकान छोड़कर शहर आने को राज़ी नहीं थे। अतः सुरभि ने अभी दुबारा नौकरी ज्वाइन नहीं की थी।

माही बहुत ही मेहनती व सफल इंसान था। महत्वाकांक्षी भी बहुत था, इसलिए जल्द ही कम्पनी में प्रेजिडेंट के पद पर पहुंच गया था। सुरभि और माही की शादी को अब दस साल हो चुके थे। माही ने दोस्तों के साथ मिलकर काफी जमीन मेट्रो सिटी में खरीदी। लेकिन ये जमीन आगे चलकर घाटे का सौदा साबित हुई। माही को एक करोड़ रुपयों का चूना लग चुका था और वह इस नुकसान को झेल नहीं पाया। परिणाम ये हुआ कि माही गहरे अवसाद में चला गया और शराब को अपनी संगनी बना लिया। सुरभि के लिए ये बहुत कठिन दौर था। मायके वाले तो पहले ही शादी के विरुद्ध थे, अब कष्ट की घड़ी में सुसराल वालों ने भी किनारा कर लिया। सुरभि और दोस्तों ने लाख समझया कि मनोचिकित्सक से सलाह ले ली जाए लेकिन माही तो ये मानने को ही तैयार नहीं हुआ कि उसे मनोचिकित्सा की आवश्यकता है। असल में भारतीय समाज में अभी भी मानसिक स्वास्थ्य को लेकर लोग सजग नहीं हैं और ऐसी चिकित्सा लेने वाले लोगों को पागल घोषित कर दिया जाता है। यही कारण है कि लोग मनोचिकित्सक के पास जाने से कतराते हैं। सुरभि के लिए जिंदगी का सबसे कठिन दौर था। उसने हिम्मत नहीं हारी और दोबारा नौकरी ज्वाइन कर ली। बेटी अब पांच साल की हो चुकी थी, उसे डे बोर्डिंग में करवा दिया गया। ऑफिस से लौटते वक्त वह अपनी बेटी को स्कूल से ले लेती थी। माही की मनोस्थिति को जानकर, खुद मरीज़ बनकर मनोचिकित्सक से मिलती और दवाओं को सब्जी में डालकर माही को देती ताकि रात की नींद माही चैन से सो सके। इसी तरह उनके जीवन के चार साल बीत गए। लेकिन जब मरीज डाक्टर से खुद नहीं मिलता तो बीमारी पकड़ से बाहर रहती है। माही का अवसाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था। बेटी की शिक्षा, अपनी नौकरी, मानसिक रूप से बीमार पति की तीमारदारी ने सुरभि को अंदर तक हिला दिया और फिर एक दिन वही हुआ जिसकी आंशका थी। माही ने बिमारी से परेशान हो अपनी नशें ब्लेड से काट डाली। सुरभि घर लौटी तो माही को मृत पाया। सुरभि की दुनिया लुट चुकी थी। माही के घरवालों को सूचित किया गया। सबने सुरभि को कटघरे में खड़ा कर दिया और अनेकों आरोप उस पर मढ़ दिए गए। तेरवहीं की रस्म अदायगी के बाद सब अपने पुश्तैनी घर लौट गए, सुरभि और उसकी बेटी को छोड़कर।

सुरभि के लिए जिंदगी दुश्वारियां लेकर आयी। लेकिन बेटी के लिए जीना तो था। एक आत्मविश्वासी लड़की कहीं अंदर तक हिल चुकी थी। वक्त के घाव वक्त की मरहम से भरते हैं और सुरभि भी अपने दिल पर लगे गहरे घावों को भरने में सफल रही थी। शेष थी तो माही की यादें और उसका जिद्दी स्वभाव। मनोचिकित्सा के अभाव की परिणिति थी कि आज सुरभि रिश्तों नातों से भरी दुनिया में स्वयं को अकेला पाती है। एक दो सहेलियां हैं जो सुरभि का हौंसला बढ़ाती हैं। सुरभि के माता पिता तो ऊंच जाति से थे और उनपर जातिवाद का चश्मा ऐसा चढ़ा था कि बेटी के दुख से भी उतर नहीं पाया। सुरभि भी उन्हीं का अंश है तो वह भी कठोरता ओढ़े कभी स्वयं के द्वारा लिए निर्णय पर अडिग रही। उसने भी अपने मां बाप से किसी तरह की उम्मीद नहीं रखी है। अपनी बेटी को पालने में वह सक्षम है और पहले से ज्यादा मजबूत भी। माही की यादों के साथ अपनी जीवन यात्रा पर अग्रसर सुरभि बहुत सारी महिलाओं के लिए प्ररेणा स्त्रोत भी है।

✍️ ©® डा. सन्तोष चाहार “जोया” 17/03/2019

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