Monthly Archives: March 2019

मोहब्बतें

रविवार का दिन था। रमा, अपनी बहन से मिलने दिल्ली (द्वारीका)उसके घर पहुंची ही थी कि उसने दरवाजे पर ही सुनाई पड़ा कि उसकी बहन दीपा, बेटी ईवा पर जोर जोर से चिल्ला रही थी। दरवाजा चूंकि खुला था तो वह अंदर चली गई । अंदर जाकर देखा तो ईवा की नानी व मामाजी भी आए हुए थे। वे ईवा के रिश्ते के सिलसिले में ही उदयपुर से पहुंचे थे। सबके चेहरों पर हवाईयां उड़ रही थी। दीपा को समझ नहीं आया कि ईवा से ऐसी क्या गलती हुई है। रमा, मां व भाई के साथ बैठे ईवा के पापा को नमस्ते कर वहीं बैठ गई। नानी उठकर, दूसरे कमरे में चली गई, ईवा के पास। रमा ने ईवा के पापा सोमबीर से पूछा, “कि, क्या बात है?” रमा को डर था कहीं भड़क ना जाएं। सोमबीर ने कहा ” ये लड़की, दूसरी जाति के लड़के से शादी करना चाहती है और ऐसा मैं हरगिज़ नहीं होने दूंगा”। रमा आधुनिक ख्यालात की सुलझी हुई महिला थी। उसने सोमबीर से कहा, ” क्या हो गया? दूसरी जाति के लोग क्या इंसान नहीं होते?” सोमबीर के तेवर अब और तीखे हो गए। उनको वैसे भी रमा की आजाद ख्याली पंसद नहीं थी और उन्हें संशय रहता था कि कहीं ,रमा उनकी बेटियों को बहका ना दे। शंकालु प्रवृत्ति के इंसान तो थे ही शुरू से। रमा की भी उनसे बनती नहीं थी। सोमबीर ने कहा, ” गांव के सरपंच की पोती है, ईवा। चौधरी परिवार की आन बान है। यदि इसने जिद की तो मैं, इसकी बोटी बोटी काट दूंगा”। रमा को बहुत अचम्भा हुआ ये सब सुनकर। वैसे भी खाप पंचायतों के फरमान आए दिन अखबारों में पढ़ती रहती थी। घर का माहोल तनाव पूर्ण हो चुका था। ईवा के मामाजी ने सोमबीर और बहन दीपा को समझाने की काफी कोशिश की, लेकिन दोनों टस से मस नहीं हुए। ईवा, बहुत ही सुंदर, शिक्षित इंजीनियर लड़की, घर और रिश्तेदारी में सबसे बड़ी थी। इतने सालों में पहली बार उसने अपनी कोई इच्छा रखी थी। ईवा, संवेदनशील भी बहुत थी और मां बाप की हर बात को शिरोधार्य करती आई थी अबतक। अभी भी बड़ी शालीनता से अपनी बात रखी थी।

सन् 2002 का भारत था, जब लड़कियों की शिक्षा दिक्षा बढ़चढ़ कर हो रही थी। लेकिन गांव/शहर के समाज की सोच में परिवर्तन बहुत ही धीमी गति से हो रहा था। खूब शोर शराबा हुआ उस दिन। ईवा, रमा मौसी को बहुत मानती थी। दोनों ने रातभर बातचीत की क्योंकि इस वक्त उसे ऐसे सबंल की जरूरत थी जो उसकी भावनाओं को समझ सके। रमा को ईवा से पता लगा कि, प्रशांत, इंजीनियरिंग कॉलेज में उसके सीनियर थे और अब विदेश में जॉब कर रहे हैं। ईवा ने बताया कि वे पिछले पांच सालों से संपर्क में हैं। रमा ने उसको नैतिक समर्थन दिया और समझा दिया था, ” कि ये तुम्हारा पारिवारिक मामला है तो दखल नहीं दे सकती लेकिन तुम मजबूती से अपने ‘ इश़्क’ के लिए खड़ी रहो।” सोमबीर की बातें ईवा ने सुन ही ली थी और वह बहुत आहत हुई थी। वह कुछ निश्चय करके सो गई। रमा अगले दिन वापिस अपने घर आ गई थी और बहुत दुखी थी ईवा के लिए। पंद्रह दिन बीत गए तब रमा की छोटी बहन, शिखा का फोन आया कि , “क्या ईवा तुम्हारे पास आई है? वह गाड़ी लेकर निकली थी सुबह और शाम हो गई, घर नहीं पहुंची है। वहां सब परेशान हैं”। रमा का मन भी बहुत विचलित हो रहा था। एक घंटे बाद खबर मिली कि उसकी कार दुर्घटना हो गई है, थोड़ी चोट लगी है लेकिन वैसे ठीक है। रमा, मिलने हॉस्पिटल पंहुची तो ईवा के मां बाप भी वहीं थे। रमा को ईवा ने कहा, ” मौसी, मैं जीना नहीं चाहती थी, इसलिए गाड़ी तेज़ स्पीड़ में चला रही थी।” रमा से अब जज्ब नहीं हुआ और उसने अब सोमबीर और दीपा से लगभग चीखते हुए कहा, ” तुम्हें, बेटी से ज्यादा अपनी झूठी शान प्यारी है। आजतक इसने वही पढ़ा, जो तुम चाहते थे। कभी गलत नहीं चली। आज़, एक ऐसे जीवनसाथी के लिए तुम्हारी इजाजत मांग रही है, जहां वह दिल दिमाग से जुड़ी है। लड़का हैंडसम है, अच्छी जॉब पर है और क्या चाहिए?आज, इसे खुदा ना खास्ता कुछ हो जाता तो अपने वसूल लेकर बैठे रहना”।

सोमबीर को अब समझ में आ गया था कि लड़की अपने जीवन से खिलवाड़ कर सकती है। दीपा ने भी अपने पति को कह दिया कि, ” अब शादी वहीं होगी, जहां ईवा चाहती है”। निर्णय हो चुका था। आज एक मां अपनी बेटी के लिए पति का साथ छोड़ बेटी के साथ खड़ी थी। चार महीने बाद शुभ मुहूर्त देखकर शादी निश्चित हो गई। सोमबीर के दोस्त ने ही सारा इंतजाम किया था और उसकी पत्नी ही खरीदारी करने ईवा के साथ गई थी। सोमबीर अपने दोस्त के सामने फफ़क कर रोया था। उसने कहा था कि, ” मेरी मर्जी से शादी करती तो गहनों से लाद देता। लम्बी गाड़ी में विदा करता”। रमा को सारी बातें पता लगती रहती थी क्योंकि वह भी इस परिवार को जानती थी। समाज को दिखाने के लिए बहुत बढिया शादी की व्यवस्था की गई लेकिन नाममात्र के गहने और कपड़ें दिए गए थे। गाड़ी देने की हैसियत थी लेकिन वह भी नहीं दी, जिद अभी भी कायम थी। रमा, सोमबीर के अड़ियल रवैए से वाकिफ़ थी। ईवा ने कोई जिद नहीं की क्योंकि उसका ‘इश़्क” मुक्म्मल हो रहा था। विदेश जाने की सारी तैयारियां पहले ही हो चुकी थी। वीजा भी लग गया था। शादी के एक सप्ताह बाद ईवा अपने जीवनसाथी के साथ विदेश चली गई। दो हंसों की जोड़ी का मिलन हो चुका था।

सन् 2017 में सोमबीर और दीपा की दूसरी बेटी, मेहा, जो अमेरिका से सुपर स्पेशलिस्ट बनकर आयी थी उसने भी अंतरजातीय प्रेमविवाह ही किया है। लेकिन चूंकि वह थोड़ी प्रैक्टिकल है तो अपने मां बाप को अपने पक्ष में शुरु से ही कर लिया था। पंद्रह साल बाद दूसरी शादी हो रही थी तो अब सोमबीर भी जमाने के साथ ताल मिला रहा था। रमा, बताती है कि, ” मेहा ने डेस्टिनेशन वेडिंग पर सोमबीर का एक करोड़ रुपया खर्च करवा दिया और वे कुछ कह भी नहीं पा रहे थे”। बड़ी बेटी ईवा ने शादी के बाद कभी घर से कुछ नहीं लिया। अमेरिका में अच्छी जॉब पर है। रमा मेरे पास बैठकर कहती है कि, ” एक बाप भी बच्चों में कितना भेदभाव कर देता है। ” पैसे का पूरा नियंत्रण सोमबीर के पास रहता था तो दीपा इस मामले में दखलंदाजी नहीं कर सकती थी। ईवा आत्मकेंद्रित हो चुकी है क्योंकि उसका दिल पिता की तरफ से टूटा था। सुसराल में सास को बहुत सम्मान दिया और प्यार किया था लेकिन वहां से भी सुनने को मिला था कि, ” बहु, हो। ज्यादा बेटी बनने की कोशिश मत करो”। रमा की छोटी भानजी, मेहा, सब बता देती है रमा को, क्योंकि वह रमा की लाड़ली है। सोमबीर और दीपा की दोनों बेटियों ने मनपसंद साथी से विवाह किया और एक नयी सोच की आधारशिला रखी। सोमबीर की दोनों बेटियां अपनी गृहस्थी में सुखी व संतुष्ट हैं। सोमबीर अब अपने दामादों की भूरी भूरी प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि, “मेरी बेटियों की च्वॉइस कम थोड़े ही है’।

रमा का मानना है कि , “लड़कियां जब हर क्षेत्र में सक्षम हैं तो ,उनमें इतनी समझ भी है कि अपना जीवनसाथी चुन सकें। झूठे दम्भ की दीवारें अब गिरनी शुरू हो चुकी हैं।अभी भी लेकिन समाज का बड़ा हिस्सा है जिन्हें ये सब बेमानी लगता है। लेकिन समझने की बात ये है कि बच्चे सक्षम हैं, अच्छी जॉब करने की क्षमता रखते हैं तो क्या जीवनसाथी चुनने की उनकी समझ नहीं है?”

✍️ ©® डा. सन्तोष चाहार “जोया” २५/०३/२०१९

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दुल्हन

शुभा के दोनों बच्चे प्रदेश में एम।एन।सी। में जॉब कर रहे हैं। पति की असमय मृत्यु के बाद से ही शुभा पर गृहस्थी की सारी जिम्मेदारी आ गई थी। वह पिछले साल ही बैंक मेनेजर पद से रिटायर हुई है। शुभा अभी रात के खाने की तैयारी कर रही थी कि फोन की घंटी घनघना उठी। देखा तो बेटे का फोन था।
“मां, आपसे बात करनी है” अमन की आवाज़ थी।
“हां, बेटा। कहो क्या कहना चाहते हो” शुभा उसे आश्वस्त कर रही थी।
“मां, आप जीवनसाथी पर रिश्ते देखना बंद कर दो”
“क्यों, क्या हुआ” शुभा चिंतित थी। अभी उससे बात करने के बाद ही तो प्रोफाइल बनाया था।
” मां, मेरी एक अच्छी दोस्त है रिया। यहीं पूना में ही जॉब करती है। हम दोनों ने इस विषय पर सोचा है कि हम चूंकि एक दूसरे को अच्छे से जानते हैं, तो क्यों ना हम जीवनसाथी बन जाएं। आपकी व दीदी की राय क्या है?”
शुभा ने रिया की सारी जानकारी ली अमन से। दोनों की समकक्ष योग्यता थी और बढ़िया पैकेज भी। शुभा को बस एक बात थोड़ी खटक रही थी कि रिया सजातिय नहीं थी और बी। सी। कैटगरी से थी। अमन के दादा जी इस विवाह के लिए बिल्कुल तैयार नहीं होंगे। शुभा की बात एक जाट परिवार से चल रही थी, लड़की खूबसूरत, लम्बा कद और नौकरीपेशा थी। शुभा ने अमन को भी फोटो भेजा था। तब अमन ने कहा था, “आपकी मर्जी”। शुभा ने कहा था अमन को, ” जिंदगी तुम्हें साथ बितानी है। हर बात तुम परिवार के हिसाब से करते आए हो। बेटा, ये जिंदगी का अहम निर्णय है। इसमे हिचकना नहीं है, तुम्हारी कोई पंसद हो तो बता देना”
शुभा द्वारा दिए हौंसले की वजह से ही आज अमन ने अपनी इच्छा बताई है। अपनी दीदी,नूर,को वह बहुत अहमियत देता था। नूर एक ऊंचे औहदे पर एम।एन।सी। में जॉब कर रही थी। शुभा ने नूर के साथ इस रिश्ते पर चर्चा की। नूर ने लड़की से बात कर सब जानकारी परिवार के बारे में जुटाई। नूर को लड़की अच्छी लगी। लेकिन अमन के दादाजी व चाचा तैयार नहीं थे। उधर शुभा, नूर और अमन ने फैसला कर लिया था कि रिया को ही घर की बहू बनाएंगे। लड़की के घर वाले भी रिश्ते से राज़ी थे। कुंडली भी उन्होंने मिलवा ली थी। अमन के दादाजी ने कहा,” गांव में सब बात बनाएंगे। लड़की हमारी जाति की नहीं है। मैं क्या जवाब दूंगा…हमारी यहां इज्ज़त क्या रह जाएगी… आदि”।
शुभा, लेकिन मन बना चुकी थी। वह उस गलती को दोहराना नहीं चाहती थी जब उसने अपनी शादी के वक्त सिर झुका कर पिता के चरणों में अपने इश़्क की बलि दे दी थी। समाज़ में इज्ज़त के डर से, पिताजी के सम्मान की खातिर, एक रुहानी प्रेम को बलिदान कर दिया था, जिसकी टीस ता उम्र उसे चुभन देती रही थी। वह नहीं चाहती थी कि बेटा भी इस दर्द से गुजरे। उसे समझ थी कि इंसान की एक ही जात है ‘इंसानियत’। जहां आपके विचार मिलते हैं, रिश्तों को लेकर एक समझ है तो जीवन सरल हो जाता है। अमन के दादा जी को भी इस रिश्ते के लिए मनाया। बेटी ने भी प्रेम विवाह किया था लेकिन तब दादाजी को मनाना आसान था क्योंकि नूर का रिश्ता जाट परिवार में ही हुआ था। लेकिन अमन के रिश्ते में ये जाति का भेद आड़े आ रहा था। खैर, जो भी हो , शुभा ने परिस्थिति को अमन के पक्ष में कर लिया था यद्यपि सबको तैयार करने में उसे काफी महीने लगे। अमन और रिया को जब निर्णय से अवगत करवाया गया तो उनकी खुशी नयनों से छलक गई। शादी की तैयारियां दोनों तरफ से शुरु हो गई…।
शहनाई की धुन वातावरण में गूंज रही थी। नववधू के चरण घर में चिंहित हो रहे थे। चूड़ियों की खनक और पायल की झंकार शुभा को अपने अतीत में ले जाती है जब वह दुल्हन बनकर इस घर में आई थी। आज उसका प्रेम, बेटे की शादी में पुष्पित पल्लवित हो रहा था।

✍️©® डा. सन्तोष चाहार “जोया”१९/०३/२०१९

इक़रार

दिल-ए-मुज़्तर ख्वाहिश इश़्क-ए-दीदार
सुख़न-ए-अल्फ़ाज़ में बयां हुआ इक़रार
आसमां से बरसा खुदा का नूरानी फ़जल
मोहब्बत में फ़ना जोड़ी के नयन सजल।

✍️©® डा. सन्तोष चाहार “जोया”१९/०३/२०१९

सुख़न-ए-अल्फ़ाज़*गज़ल

दिल,-ए-मुज़्तर*अधीर हृदय

फ़जल*कृपा

तेरे बगैर

गम
तन्हा रातें
भीगी पलकें
प्रेम पथ बना दुश्वार
दौलत की खड़ी ऊंची दीवार
चाहत की परियों की ठहरी उड़ान
छीनी थी कभी तुमने मेरे होंठों की मुस्कान
हर आहट पर बढ़ती थी यूं दिल की धड़कन
खुमार इश़्क भेंट किया फिर होलीका दहन
दिल में राख प्रेम अग्न,सीखा जीना तेरे बगैर।
तूने
खामोशी
की ओढ़ी चादर
समाज की खातिर
इश्क़ की खाली हुई गागर
जख्मों की उम्र तेरा अंहकार
वक्त मरहम, नहीं तेरा इंतजार
सबक, धूमिल होता छिछला प्यार
स्व सर्वोपरि, उथलों से ना सरोकार
परव़ाज दी सपनों को हमेशा तेरे बगैर।
होली
का त्योहार
साथियों की पुकार
रंगों की खूब होती बौछार
छप्पन की उम्र की सबने पार
युवा मन सा उमड़े दिलों में प्यार
जिंदगानी तेरी से ना रहा सरोकार
जिंदगी से गायब हुए यूं जैसे कोई चोर
होली के रंगों सी रंग ली जिंदगी मैंने हर छोर
खुशियां बटोरी मैंने हर पल हंसकर तेरे बगैर।

✍️©® डा. सन्तोष चाहार “जोया” 18/03/2019

यादों की कश्ती

यादों की कश्ती के चप्पू ताउम्र चलते रहते हैं और रह रह कर उस मंजिल की ओर रुख करते हैं जहां प्रेमसागर के एकांत टापू पर कभी इश़्क की तहरीरें दिल की तख्ती पर लिखी गईं थी। माही और सुरभि का प्रेम इस बात से बेखबर था कि उन परवान चढ़ता इश़्क एक उस अंधेरी कोठरी की ओर बढ़ रहा है जहां दर्द के काफ़िले कभी उनका पीछा नहीं छोड़ेंगे।

माही , एक बहुउद्देश्यीय कम्पनी में सी। ई ।ओ। के पद पर आसीन बखूबी अपनी जिम्मेदारी को निभाते हुए, कम्पनी के ऊंच अधिकारियों की नज़रों में निश्चित स्थान बना चुका था। ऊंच आंकाक्षाओं के चलते माही ने कभी शादी के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा था। चालीस वर्ष की उम्र में अब उसकी शादी की कोई इच्छा शेष नहीं थी। सुरभि एक आत्मविश्वास से लबरेज़ पैंतीस वर्षीय महिला दो महीने पहले ही माही की कम्पनी में चीफ़ मैनेजर बनकर आई थी। सुरभि की सुझबूझ , कार्य क्षमता व दक्षता ने सभी के मन में एक खास जगह बना ली थी। माही और सुरभि का मेलजोल बढ़ रहा था और एक साल में वे एक दूसरे के काफी करीब आए। एक सुखद भविष्य की कल्पना से दोनों प्रेम की कश्ती में सवार हो प्रेमासागर में विहार कर रहे थे। समय पंख लगाकर उड़ने लगा और रंगीन सपने क्षितिज छूने की चाह लिए उड़ान भर रहे थे।
दोनों उम्र के उस पड़ाव पर थे जहां शादी विवाह को वे बहुत सादगी पूर्ण तरीके से सम्पन्न करने में विश्वास रखते थे। अजातीय प्रेम विवाह होने की वज़ह से दोनों के घर वाले बहुत खुश नहीं थे क्योंकि मूल रूप से उनकी जड़ें गांव से जुड़ीं थी। माही के परिवार ने तो सुरभि को स्वीकार कर लिया था लेकिन सुरभि के घरवालों ने सभी संपर्क सूत्र काट लिए थे और पग फेरा के लिए भी वह अपनी सहेली के यहां गई थी। उसकी सहेली काफी आधुनिक विचारों की थी जो इंसान को इंसान के रूप में ही महत्व देती थी। समय बीता और सुरभि और माही के आंगन में नन्ही परी का आगमन हुआ। अब सुरभि ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया था क्योंकि वह अपनी बेटी की परवरिश के लिए केवल ‘आया’ पर भरोसा नहीं कर सकती थी। कितने ही किस्से सुने थे उसने कि किस तरह आया लोग छोटे बच्चों को कुछ हल्का नशीला पदार्थ सुंघाकर कर सुला देते थे। माही ने काफी बचत कर रखी थी और एक सपनों का घर खरीद लिया था। दोनों की जिंदगी में खुशहाली थी। नन्ही परी भी अब तीन वर्ष की हो चली थी। उसकी तुतलाती प्यारी बातें सबका मन मोह लेती थी। माही के माता पिता पुश्तैनी जमीन व मकान छोड़कर शहर आने को राज़ी नहीं थे। अतः सुरभि ने अभी दुबारा नौकरी ज्वाइन नहीं की थी।

माही बहुत ही मेहनती व सफल इंसान था। महत्वाकांक्षी भी बहुत था, इसलिए जल्द ही कम्पनी में प्रेजिडेंट के पद पर पहुंच गया था। सुरभि और माही की शादी को अब दस साल हो चुके थे। माही ने दोस्तों के साथ मिलकर काफी जमीन मेट्रो सिटी में खरीदी। लेकिन ये जमीन आगे चलकर घाटे का सौदा साबित हुई। माही को एक करोड़ रुपयों का चूना लग चुका था और वह इस नुकसान को झेल नहीं पाया। परिणाम ये हुआ कि माही गहरे अवसाद में चला गया और शराब को अपनी संगनी बना लिया। सुरभि के लिए ये बहुत कठिन दौर था। मायके वाले तो पहले ही शादी के विरुद्ध थे, अब कष्ट की घड़ी में सुसराल वालों ने भी किनारा कर लिया। सुरभि और दोस्तों ने लाख समझया कि मनोचिकित्सक से सलाह ले ली जाए लेकिन माही तो ये मानने को ही तैयार नहीं हुआ कि उसे मनोचिकित्सा की आवश्यकता है। असल में भारतीय समाज में अभी भी मानसिक स्वास्थ्य को लेकर लोग सजग नहीं हैं और ऐसी चिकित्सा लेने वाले लोगों को पागल घोषित कर दिया जाता है। यही कारण है कि लोग मनोचिकित्सक के पास जाने से कतराते हैं। सुरभि के लिए जिंदगी का सबसे कठिन दौर था। उसने हिम्मत नहीं हारी और दोबारा नौकरी ज्वाइन कर ली। बेटी अब पांच साल की हो चुकी थी, उसे डे बोर्डिंग में करवा दिया गया। ऑफिस से लौटते वक्त वह अपनी बेटी को स्कूल से ले लेती थी। माही की मनोस्थिति को जानकर, खुद मरीज़ बनकर मनोचिकित्सक से मिलती और दवाओं को सब्जी में डालकर माही को देती ताकि रात की नींद माही चैन से सो सके। इसी तरह उनके जीवन के चार साल बीत गए। लेकिन जब मरीज डाक्टर से खुद नहीं मिलता तो बीमारी पकड़ से बाहर रहती है। माही का अवसाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था। बेटी की शिक्षा, अपनी नौकरी, मानसिक रूप से बीमार पति की तीमारदारी ने सुरभि को अंदर तक हिला दिया और फिर एक दिन वही हुआ जिसकी आंशका थी। माही ने बिमारी से परेशान हो अपनी नशें ब्लेड से काट डाली। सुरभि घर लौटी तो माही को मृत पाया। सुरभि की दुनिया लुट चुकी थी। माही के घरवालों को सूचित किया गया। सबने सुरभि को कटघरे में खड़ा कर दिया और अनेकों आरोप उस पर मढ़ दिए गए। तेरवहीं की रस्म अदायगी के बाद सब अपने पुश्तैनी घर लौट गए, सुरभि और उसकी बेटी को छोड़कर।

सुरभि के लिए जिंदगी दुश्वारियां लेकर आयी। लेकिन बेटी के लिए जीना तो था। एक आत्मविश्वासी लड़की कहीं अंदर तक हिल चुकी थी। वक्त के घाव वक्त की मरहम से भरते हैं और सुरभि भी अपने दिल पर लगे गहरे घावों को भरने में सफल रही थी। शेष थी तो माही की यादें और उसका जिद्दी स्वभाव। मनोचिकित्सा के अभाव की परिणिति थी कि आज सुरभि रिश्तों नातों से भरी दुनिया में स्वयं को अकेला पाती है। एक दो सहेलियां हैं जो सुरभि का हौंसला बढ़ाती हैं। सुरभि के माता पिता तो ऊंच जाति से थे और उनपर जातिवाद का चश्मा ऐसा चढ़ा था कि बेटी के दुख से भी उतर नहीं पाया। सुरभि भी उन्हीं का अंश है तो वह भी कठोरता ओढ़े कभी स्वयं के द्वारा लिए निर्णय पर अडिग रही। उसने भी अपने मां बाप से किसी तरह की उम्मीद नहीं रखी है। अपनी बेटी को पालने में वह सक्षम है और पहले से ज्यादा मजबूत भी। माही की यादों के साथ अपनी जीवन यात्रा पर अग्रसर सुरभि बहुत सारी महिलाओं के लिए प्ररेणा स्त्रोत भी है।

✍️ ©® डा. सन्तोष चाहार “जोया” 17/03/2019

अधूरे से

रिश्तों का इस दुनिया में अजब रेला
घुटन व स्वार्थ सिद्धि की बेला
आंगन में बुजुर्ग अकेला
जीवन निस्सार किया
निर्मोही संतान
भार लगे
जनक
रहे अधूरे से
जीवन की कश्ती डोल रही बीच सागर
सपनों की छलकती रही गागर
आदर्श के चप्पू से कश्ती रही
उफनते झंझावतों से टकरा
अपने सब रुठे
संगी सब छूटे
राह
रहे अधूरे से
दोस्ताना सबंधों में ज़हर घुल रहा चहुंओर
मुखौटे दर मुखौटे पहन इंसान पकड़े छोर
सरल इंसान का जीना हुआ मुहाल
नित उठ रहे अनेकों सवाल
समझ ना आए दुनिया
की टेढ़ी
चाल
रहे अधूरे से
प्रेमपुष्प अब बहार आने से पहले रहे मुरझा
टूटकर चाहने वाला ना मिले कोई सखा
हर घड़ी भावनाओं का लगे मोल
बागों में भवरों के गुंजन का
मिले ना कोई शोर
उलझन में
तितली
रहे अधूरे से
✍️©® डा.सन्तोष चाहार “जोया” 15/03/2019

यूं न गवां

घर
सुखद बसेरा
आशाओं का नित सवेरा
रिश्तों की मिठास का अद्भुत बसेरा
भाग्यशाली को मिलता है सुरक्षा का ये घेरा
इसे यूं न गवां।

संतान
ईश्वरीय देन
चहल पहल से घर में चैन
सपनों पर उनके न लगाओ बैन
संस्कार सिंचित करने का ये सही रैन
इसे यूं न गवां।

रिश्तों
की महिमा
जिसने समझी व जानी
दुनिया में कोई नहीं उसका सानी
दंभ में होते हैं रिश्ते सदियों से चूर चूर
इन्हें यूं न गवां।

दोस्ती
का उंचा दर्जा
विश्वास की डगर फलता फूलता
शंकाओं के बादलों से हमेशा ही टूटता
दोस्ती में प्रेम-सरोवर का झरना फूटता
इसे यूं न गवां।

प्रेम
रसधार में
डूबे हैं नायब मोती
त्याग व समर्पण इसकी ज्योति
मिली है सौगात ईश्वर के दरबार से
इसे यूं न गवां।

जीवन
सुंदर सौगात
नयी राहों का लिखो प्रभात
क्षमताओं का परिचय हो दिन रात
सुंदर सुवासित हो रीत का मधुर संगीत
इसे यूं न गवां।

✍️©® डा. सन्तोष चाहार “जोया”14/03/2019

जख्मों की उम्र

सफ़र
रहा अधूरा
जख्मों की उम्र
इश़्क की न खब़र
कुछ लोगों की बुरी नज़र।

नाम
की रही
मेरी दुनिया कायल
हुस्न परी लेकिन हुई घायल
बदनामी मेरी का घुमा दिया डायल।

बीते
बीस साल
पूछा ना हाल
वक्त की घूमी धुरी
कष्टों से अब वह जूझ रही।

सड़क
सरपट दौड़
गाड़ी का लगा ब्रेक
हुस्न पर काली छाया
हाल देख दिल मेरा घबराया।

स्नेह
फिर बना
उफनता सागर
दिल से दिल ने भरी गागर
अश्रुधारा का मिलन महासागर।

घड़ी
मिलन रही
फिर अधूरा सफ़र
लांछन लगे थे कभी कड़े
दिल के टूटे तार मजबूती से फिर ना जुड़े।

धर्म
इंसानियत
निभा मैं चली
ठिठके कदम उसकी गली
अफ़सोस के बादलों से वह अब घिरी।

✍️ ©® डा.सन्तोष चाहार ” जोया” 11/03/2019

ख्याल बुनती हूं

ढलती सांझ
जिंदगी बांझ
तन्हा लम्हें
रूठा स्नेह
रुहानी प्यास
सुखद कयास।

हीर रांझा
दुख सांझा
महज़बी सोच
प्रेम रही नोच
अधूरे अरमान
दरके आसमान।

लंबा इंतजार
खोया करार
प्रीत के झूले
डगर हैं भूले
सकूं के लिए
गरल हैं पिए।

मन हरजाई
भीड़ तन्हाई
जिंदगी रण
मन का हिरण
विरह कण कण।

ख्याल बुनती हूं
शब्द पिरोती हूं
तुम्हारी सुनती हूं
खिलकर हंसती हूं
सपनों में मिलती हूं।

✍️ ©® डा.सन्तोष चाहार ” जोया” 10/03/2019