ख़ता की ख़लीश

ख़ता की ख़लीश कज़ा बन गई
खुदा से फिर मेरी ठन गई।

दर्द के काफिले बढ़ते गए
तमन्ना के आफ़ाक सिमटते गए।

जिंदगी-ए-ख़ियाबा में ख़जा़ रही
क़िस्सा-ए- इश़्क पर क़यामत ढही।

सज्दा-ए-हक अत्फ़ ना कर पाए
क़मर अपना क़ौल निभा ना पाए।

ख़ुमार-ए-इश़्क कागज़ बन उड़ा
इस्बात प्रेम का मौन बन रहा खड़ा।

इब्रत है, इश़्क-ए-राह अब्र से है लदी
गुज़ारिश, इश़्क में ख़ाक ना करो जिंदगी।

इक़ित्ज़ा, आफ़ताब बन शुक्र की शाखें झूलो
ख़ियाबा-ए- जिंदगी में हमेशा फलो फूलो।

✍️©® डा. सन्तोष चाहार “जोया” 23/02/2019
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शब्दार्थ अगले पेज़ पर
ख़ता* भूल
क़जा* ईश्वरीयदंड़
ख़लीश* चुभन
अत्फ़* भेंट
आफ़ाक* क्षितिज
ख़ियाबा* पुष्प वाटिका
ख़जा़* पतझड़
क़यामत* उथल-पुथल
अत्फ़* भेंट
क़मर* चाँद
कौल* वायदा
ख़ुमार* नशा
इस्बात* साक्ष्य
इब्रत* चेतावनी
अब्र* बादल
ख़ाक* राख
इक़ित्जा* आवश्यकता
आफ़ताब* सूर्य
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