वक्त के पायदान

घर में शहनाई की मधुर ध्वनि से पूरा आंगन खुशनुमा हो रहा था। गुलाबी सर्दी का मौसम पिंक सिटी जयपुर की भव्यता को बढ़ा रहा था। खास मेहमान आ चुके थे। इन्द्र फूली नहीं समा रही थी। उसके पोते की शादी जो है। तीन मंजिला कोठी को बेहतरीन सजावट से दुल्हन की तरह सजाया गया था। अभी पिछले साल ही तो बेटे ने ये भव्य मकान बनाया था। चारों बेटियां अपने परिवार के साथ मायके भतीजे की शादी में शामिल होने पहुंच चुकी थी। बड़ी नातिन भी अमेरिका से बच्चों के साथ कज़न के विवाह समोरह के लिए पहुंच चुकी थी। इन्द्र को बस आज़ कमी खल रही है तो अपने जीवन साथी लखीराम की जो कि चार साल पहले दुनिया छोड़कर जा चुके थे। घर में काफी गहमागहमी और खुशी का आलम था। कल बारात चढ़नी है। संगीत के बाद रात्रिभोज़ करने के पश्चात सब अपनी अपनी टोली मे मस्त हो गए।
इन्द्र भी थककर लेट जाती है। 84 बसंत देख चुकी वह समयचक्र के सतर साल पहले पहुंच गई जब वह चौदह साल की दुल्हन बनकर गांव के छोटे से कच्चे घर में लखी की दुल्हन बनकर आई थी। लखीराम को सब लखी ही बुलाते थे। ये 1940 के दशक और अंग्रेजों की गुलामी का समय था। इंद्र बिन मां बाप की लड़की, चारों बहन भाईयों में बड़ी, पड़ोस के दादा दादी की देखरेख में पली व ब्याही गई। जी हां उस समय का जमाना ही बढिय़ा था। जीवन मूल्य थे इसीलिए इन्द्र और उसके बहन भाईयों की शादी की जिम्मेदारी पडोसियों ने निभाई थी। घर और जमीन अच्छी थी तो पैसे के लिहाज से ज्यादा परेशानी नहीं आई। इन्द्र के दादा की बनाई बड़ी हवेली थी। कुछ जेवर भी थे घर मे और बच्चे भी महेनती थे व बुजुर्गों का सम्मान करते थे।भाग्य की विडंबना ही कहेंगे ,सुसराल आयी तो यहां पर भी सासू मां का साया नहीं था और ससुर भी दो साल बाद चल बसे।
उस वक्त लखी ने दसवीं कक्षा पास की थी। बहन भाइयों में सबसे पढ़ालिखा वही था। किसानी से परिवार की गुजर बसर होती थी। अनपढ़ता की वज़ह से सूदखोर का मूल कभी चुकता नहीं हो पाता था। लखी के पिता पर तीन बड़ी बहनों की शादी का कर्ज था। एक बहन की शादी अभी रहती थी। लखी का बड़ा भाई कवलसिंह पांच एकड़ जमीन जोतता था। लखी ने पढा़ई छोड़कर किसी जानकार के माध्यम से राजस्थान के उदयपुर में कलर्क की नौकरी की शुरुआत की। घर से 900 किमी दूर। दोनों पत्नी पति पर दुर्भाग्य से मां बाप का साया नहीं और गरीबी में सब मुंहु फेर लेते हैं। इन्द्र ने छोटी नन्द की शादी में अपना सारा देहज़ व पांच किलो चांदी जो मायके से लाई थी दे दी। जेठानी ने तो कोई मदद की नही। बहन की शादी करके लखी काफी राहत महसूस कर रहा था। नाजुक कंधों पर बहुत बड़ा बोझ था फिर भी कर्तव्यनिष्ठ बेटे ने दौड़धूप में कोई कमी नहीं छोड़ी भाग्य से वर भी सुयोग्य मिल गया। कुछ जमा पूंजी करके सूदखोर का कर्ज चुकाया । पढा़ लिखा होने की वज़ह से सूदखोर अब गड़बड़ी नहीं कर सकता था। लखीराम ने नियम बनाया था कि कर्ज, फर्ज और मर्ज को सबसे अधिक ध्यान देना है।
धीरे धीरे गांव के साहूकार का कर्ज उतारने के बाद पक्का घर बनवाया और इन्द्र ने गांव मे ही रहकर संयुक्त परिवार में योगदान दिया। पति प्रदेश और घर में जेठानी की सियासत। देवर लखी नौकरी से जब साल मे दो बार छुट्टी आता तो ढेर सारी झूठी शिकायतें। पति पत्नी में फिर कलह। बुजुर्गों का साया तो था नहीं जो सच झूठ को देख सकें। इन्द्र जाए तो कहां जाए। न मायका था न ससुराल में कोई सुनने वाला। मायके में भी भाभीयों का साम्राज्य हो चुका था। भाई तो जैसे बीबीयों के गुलाम ही बन गए थे। पुत्रों की मांए होने का दोनों भाभीयों ने पूरा फायदा उठाया। कुछ महीने ठहरकर काम करें तो चार सूट सिलवा देते इन्द्र के लिए और ऊपर से चार बेटियों की मां होने का ताना। इन्द्र को दूसरे नम्बर पर बेटा दिया था भगवान ने लेकिन कमजोर होने की वजह से फिर तीसरा मौका भी लिया लेकिन फिर बेटी पैदा हो गई। मायके में जमीन काफी थी लेकिन बेटियों को कौनसा हक होता है उसमें? बहुत धैर्य से कष्ट के दिन निकाले। सुसराल में इन्द्र की बड़ी नन्द ने कहा” एक आंख का क्या खोलना, क्या बंद करना” इस तरह बेटे की उम्मीद में दो बेटियां और आ गईं। बड़े भाई की दो ही संतान थी। एक लड़की और एक लड़का। संयुक्त परिवार में आए दिन खर्च को लेकर झगड़ा बढ़ने लगा। भाई कमल ने लखी से कहा ” तेरे बच्चों का खर्च ज्यादा है और कि मैं लड़कियों की पढा़ई पर भी खर्च नहीं करुंगा”। सब बातें आजतक लखी ने सुनी थी लेकिन बच्चों की खर्चों की बात हज़म न कर सके। घर के बीच दीवार खींच गई।
बेटियों के लिए अलग भैंस बांधकर लखी बेटे को जो दूसरी कक्षा से ही उनके साथ ही राजस्थान में पढ रहा था अपनी नौकरी पर चला गया और खास निर्देश थे कि लड़कियों की पढा़ई में कोई रुकावट नहीं होनी चाहिए। इन्द्र तो पहले से ही चाहती थी कि बेटीयों को पढा़ई का अवसर मिले। लड़कियों का ताऊ अब भी कटाक्ष करता था कि ” छोरीयां ने पढा़कर, क्या इंन्दरागांधी बनाएगा।” ये 1975 के दशक की बात है। देश आज़ाद हो चुका था और साथ मे आज़ाद थी लखी और इन्द्र की सोच जो बेटियों के जीवन की नयी परिभाषा लिख रहे थे। सीमित साधनों में भी सभी बेटियां उच्च शिक्षा ग्रहण करने के साथ नौकरी भी लगती गई। क्योंकि लगन थी कि घर की आर्थिक स्थिति को बदलना है। उस जमाने में सरकारी नौकरी में भ्रष्टाचार आजकल की तरह नहीं था। लायक बेटियां थी तो रिश्ते भी मिलते चले गए। सब बेटियां घरबारी हो गई और सशक्त भी। देश के निमार्ण में उनका योगदान जो हो रहा था। कमल ने तो लखी को फिर कहा, ” लड़कियों को पढा़ कर, तूने तो दूसरों का घर बनाया है”। लेकिन लखी व इन्द्र बेटियों की खुशहाली में ही खुश थे।
साधनों की कमी के बावजूद कोई फिजूलखर्ची न करके धीरे धीरे जयपुर शहर में लखी व इन्द्र ने दो प्लाट लिए और एक ठीकठाक मकान भी बना लिया। इस बीच बेटा भी अफसर बन गया और जयपुर में ही माता पिता के साथ रह रहा था। उसकी सारी शिक्षा दिक्षा राजस्थान में पिता के साथ रहते हुए हुई थी।चूंकि दूसरी कक्षा से ही पिताजी के साथ शहर मे पढा़ था तो बहुत साल खुद रोटियां बनायी था। शादी के रिश्ते आए तो यही कहा बस सुघड़ गृहिणी हो। सो बारहवीं पास लड़की का रिश्ता ले लिया। रिश्ता जानकारी से था तो मना भी नहीं किया। बहु सुशील वाकई सुघड़ गृहिणी थी। लेकिन जब उसने देखा कि सारी नन्दे पढ़ीलिखी और नौकरीपेशा हैं तो पढ़ाई जारी रखने की इच्छा जताई। बहू को भी बेटियों की तरह पढा़या और इन्द्र फिर घर के काम में व्यस्त रहती और बहू को पढ़ने का पूरा समय देती। बहु सुशील ने भी स्नातकोत्तर हिन्दी विषय से कर लिया। पहलोठी का पोता हुआ था लखी की खुशी का कोई पारावार न था। खुश होकर उसका नाम आंनद रखा। दूसरी पोती हुई और उसकी भी नज़र उतारी गई।
समय उड़ता चला गया। लखीराम ने रिटायर होकर बेटे को सारी जिम्मेदारी सम्भलवा दी। बेटियों के बच्चे भी बड़े हुए। नारी शिक्षा की लौ जो लखी और इन्द्र ने लगाई थी वह उसकी बेटियों ने भी जारी रखी। उसका परिणाम ये रहा कि सभी बेटियों के बेटा व बेटी शिक्षित होकर बड़ी बड़ी कम्पनी में काम करने लगे। बड़ी नातिन तो अमेरिका में ही बस गई है। दूसरी डाक्टरी पढ़कर देश सेवा के लिए अमेरिका से वापिस आकर अपने देश के शिशुओं के रोगों का उपचार कर रही है। दूसरी बेटी के बच्चे तो विदेश जाना ही नहीं चाहते। उनका कहना है “अपना देश तो अपना है। यहीं बहुत अपनापन है। हमे दूसरे दर्जे का नागरिक नहीं बनना।” लखीराम तो 80 साल की उम्र में देह पूरी कर गए थे लेकिन इन्द्र का आशिर्वाद सभी नाती , नातिन व पोता व पोती को मिलता रहता है। सारे बच्चे भी कोई काम नया शुरू करने से पहले नानी से जरूर आशिर्वाद लेतें हैं।
चारपाई पर लेटी हुई इन्द्र 84 साल का लेखा जोखा करती है तो सोचती है वक्त के कितने पायदानों पर पग रखती हुए आखिर मंजिल आज़ उसके कदमों में है। सोचती है एक कच्चे घर से गृहस्थी का सफर शुरू किया था। धैर्य रखा तो इश्वरीय शक्ति भी साथ रही और आज़ वह भरे पूरे घर में तीन मंज़िला कोठी की मालकिन बन गई है। एक मकान तो लखीराम ही बना गए थे गांव वाले मकान मे बैंक खोल दिया है।कभी इस बात का किसी को कोई अहम भी नहीं। भगवान को हर पल धन्यवाद देती हुई इन्द्र प्रभु भक्ति में लीन रहती है।
” मां सोई नहीं” अब बेटा भी सारे मेहमानों के ठहरने की व्यवस्था करके मां से आशिर्वाद लेने बैठ गया।… शहनाई की गूंज से सभी आनंद विभोर हो गए…नयी पीढ़ी का पदार्पण हो चुका था।
✍️© “जोया” ( सन्तोष मलिक चाहार) 20/11/2018

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