अनोखा मिलन

रेलगाड़ी अपनी पूरी गति से उस स्थान की ओर बढ़ रही थी जहां सुलक्षणा का बचपन का इश्क उसके पहुंचने का इंतजार कर रहा था। दो दिन के लम्बे सफर के बाद सुलक्षणा की रेलगाड़ी गोवा जाकर रुक जाती है। मंयक , सुलक्षणा को स्टेशन लेने आया था। वह दौड़ता हुआ सुलक्षणा के डिब्बे की तरफ बढा। दोनों एक दूसरे से अठारह साल के इंतजार के बाद मिल रहे थे। दिलों की धड़कने बढ़ रही थी। सुलक्षणा के पिता ने सुलक्षणा के लिए एक लक्ष्मण रेखा खींच दी थी। दोनों ने फिर कभी परिवार व समाज द्वारा निर्धारित सीमाएं नहीं लाघीं। दोनों इकट्ठे ही बोर्डिंग स्कूल में एक दूसरे को आंखों की भाषा में ही प्यार करते थे। कभी उन्होंने लफ़्जों में प्रेम की अभिव्यक्ति नहीं की थी। लेकिन उनकी आत्मा एक दूसरे में समा चुकी थी।

समय बीतता गया और सुलक्षणा की शादी हो गयी और वह अपने परिवार की जिम्मेदारी पूरी करने मे व्यस्त हो गई ।लेकिन एक भी दिन ऐसा नहीं बीता जब उसने अपने प्यार को याद नहीं किया। ऐसा नहीं था कि पति से स्नेह नहीं था बल्कि दोनों में अच्छी समझ विकसित हो चुकी थी सुलक्षणा अपने बच्चों व संयुक्त परिवार के प्रति भी सब पारिवारिक जिम्मेदारी निभा रही थी। सोलह साल बाद बड़ी कोशिश के बाद मंयक का पता लगा और वह चल पडी़ अपने इश्क़ से मिलने। पति ने विशाल हृदय का परिचय देते हुए सुलक्षणा को जाने दिया था। उसे अपने ऑफिस की तरफ से गोवा में एक कार्पोरेट मिटिंग के लिए जाना था। इसी अवसर को उसने अपने इश्क़ से मिलने के लिए यादगार क्षण बनाया।

आज़ दोनों एक दूसरे के सामने थे और बिना किसी लोकलाज़ के स्टेशन की भीड़ मे आलिंगनबद्ध हो जाते हैं और दोनो ओर से अश्रुधारा बह निकलती है। इस क्षण के लिये दोनों ने अपने जीवन के चालीस बसंत प्रेम अग्नि में जला दिए। सुलक्षणा ने स्कूल में कभी भी मंयक की आंखों में आंसू नहीं देखे थे।आज वह स्तब्ध थी कि पुरुष भी कितने भावुक हो सकतें हैं। मंयक का प्यार हमेशा प्रतिकों मे व्यक्त होता रहा था।

जीवन के इन अनमोल पलों को जीने के लिए दोनों मुम्बई के लिए निकल जाते हैं और दो दिन पूरी जिन्दगी जी लेते हैं। उस जिन्दगी को जीतें हैं जो समाजिक अवरोधों की वजहों से जी नहीं पाए थे। तीसरे दिन विदाई की वेला के भावुक क्षणों की यादें संजोए सुलक्षणा घर वापिस लौट आती है ये उम्मीद लेकर कि जिन्दगी फिर किसी मोड़ पर अवश्य मिलाएगी। दोनो के अपने अपने परिवार थे जिनके प्रति वे अपनी जिम्मेदारी समझते थे।लेकिन एक दूसरे में प्रत्येक दिन सूक्ष्म आत्मा के माध्यम से अनोखे मिलन की अनुभूति के साथ स्वप्निलीआगोश में समा जाते थे। सच्चे इश्क़ को संसार की कोई ताकत नहीं भेद सकती।

✍️©®” जोया” 2018

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