Monthly Archives: February 2019

जिंदगी क्षणिकाएं

इश़्क
अधूरा फ़साना
जाज़िबा लफ्ज़ तराना
पाकिज़ा मोहब्बत की मुसाफ़त
हसीं दिलों की दिलकश नज़ाफत।
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फिज़ा
की सुवास
ख्वाबों का मधुरमास
जरस-ए-दिल में दर्द भरे नग्में।
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शिकस्त
ऐ जिंदगी
कसल की तहें
उम्मीदों के अंकुशित गणित।
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अरमानों
के बीज
अंतर्मन की गूंज
जुनून-ए-मसाफ़त का दृढ़संकल्प
कागज़ के दामन पर हौंसलों के मोती।
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✍️©® डा.सन्तोष चाहार “जोया” 27/02/2019
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जाजिब़ा* मनमोहक
नज़ाफत*शुद्धता
कसल * आलस्य
मसाफ़त* ज़रनी
जरस* घंटियां

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क्षणिकाएं

इश़्क
की कलम
ख़्वाब-ए-गुल की स्याही
लफ़्जों की फुलवारी का उपवन।
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उम्र
के काग़ज
नसीब-ए-सितम
ठहर गई तमन्नाओं की मंजिल।
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हुस्न
का ज़ाल
रफ़ाकतों का भ्रम
अहम और अंहकार के ऊंट।
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अंतर्दद्व
को झटक कर
थाम हौंसले की डोर
कागज़, कलम और दवात का
विस्तृत, रोमांचक व अद्भुत संसार।

✍️ ©® डा. सन्तोष चाहार ” जोया” 26/02/2019

रफ़ाकतों* मेलजोल

परस्तिश

प्रिय मेज़र, आज़ तुम्हारी शहादत को पूरे अठ्ठाईस वर्ष हो गए हैं। देशप्रेम की तुम्हारी भावना मुझसे ज्यादा कौन जानता है। देश पर मर मिटने का जनून हमेशा तुम्हारे हौंसलों को बुलंद करता रहा था। दुश्मन देश के साथ युद्ध का बिगुल बज चुका था और तुम अपनी छुट्टी कैंसिल करके अपनी कमान संभालने मोर्चे पर डट गए थे। तुम्हें तो याद होगा उस वक्त हमारे प्रेम की निशानी मेरे गर्भ में पल रही थी। विजयी भव का आशिर्वाद लेकर तुम मुझे मां पिताजी के पास छोड़कर चले गए थे। बीस दिन के भीषण युद्ध के बाद युद्ध विराम की घोषणा हम सबने रेडियो व टेलीविजन पर सुनी थी। पिताजी तो हर वक्त टेलीविजन के सामने ही बैठे रहते थे और मां अपने मंदिर में ईश्वर से तुम सबकी दुआ मांगती रहती थी। मेरा हृदय जब भी किसी आंशका से घिर जाता था तो मां व पिताजी मेरा संबल बन जाते थे। तुम्हारी बहन तब दसवीं कक्षा में पढ़ रही थी। फिर एक दिन वही हुआ जिसकी आशंका थी। तुम अपने वतन पर जांबाजी से लड़ते हुए शहीद हो गए थे और तुम्हारे साथी तिरंगे में लपेटकर गांव , तुम्हारी पार्थिव देह को ससम्मान लाए थे। तुम्हें पता है उस वक्त एकबारगी तो दिल में ख्याल आया कि धरती फट जाए और मैं तुम्हारी निशानी के साथ उसमें समा जाऊं। लेकिन नहीं , तुरंत मैंने खुद को सम्भालते हुए मन ही मन प्रण किया था कि तुम्हारी शहादत पर आंच नहीं आने दूंगी।

आज़ इतने साल बाद तुम्हें ये बताने के लिए पत्र लिख रही हूं कि, तुम्हारा बेटा, बिल्कुल तुम्हारे जैसा वीर अफ़सर बन गया है। आज़, मां व पिताजी के साथ पासिंग आऊट परेड़ का हिस्सा बनी थी। हमारा, अमन, हबहू तुम्हारे की तरह रूआब लिए है। उसने कसम खाई है कि देश पर अपनी जान न्यौछावर करने से पहले तुम्हारी शहादत का बदला दुश्मन के खून से लेगा। तुम्हारी बहन की शादी भी आर्मी आफिसर से हो गई थी और वह अपनी जिंदगी में खुश है। अब, मेरी उम्र भी पचास की हो गई है। बालों पर चांदी चढ़ गई है। उम्र के कागज़ पर मोहब्बत का फूल अब भी खिला है। तुम्हारा मोहब्बत भरा आखिरी खत भी अन्य पत्रों के साथ दराज़ में सुरक्षित है। लाल गुलाब जो तुम हमेशा मेरे जुड़े में लगा दिया करते, उनको भी मैंने अपने दिल की किताब के पन्नों में छुपा कर रखा है जहां से मुझे हर वक्त तुम्हारे पास होने का अहसास बना रहता है। तुम्हारी शहादत के बाद मैंने अपनी पढ़ाई पूरी करके कालेज़ प्रोफेसर की नियुक्ति प्राप्त कर ली थी। जब भी युवाओं के बीच होती हूं तो एक उर्जा का संचार बना रहता है।

2019
देश के हालात पड़ोसी देश के साथ फिर तल्ख़ होते जा रहे हैं। अमन भी अब मेज़र बन गया है और उसकी पोस्टिंग बोर्डर पर है। आज़ दिल फिर बैठ रहा है लेकिन अमन तो जाबांज अफ़सर है और तुम्हारी तरहं खतरों से खेलना उसकी आदत है। आंतकवाद देश की जड़ों पर प्रहार कर रहा है और दुश्मन देश इनको पालता है। पुलवामा में बयालीस जवान एक फियादीन विस्फोट में जान गवां बैठे। देश का जन जन बदला चाहता है। पूरा देश आक्रोश में है और इस बार आर पार की जंग से दुश्मनों को नेस्तनाबूद करने का पक्षधर है। देश के भीतर के विभीषणों को भी सबक सीखाने की चर्चा जोरों पर है। पता नहीं क्या होगा। मेरी तो ईश्वर से यही प्रार्थना है कि आंतकवाद जड़ से खत्म हो जाए। देश की सुरक्षा के लिए मैं अपने अमन को भी न्यौछावर कर सकती हूं लेकिन दुश्मन का नामोनिशान मिट जाए तभी।

आज़ एक बात तो बताना भूल ही गई। तुम चार साल के निखिल के दादा बन गए हो। निखिल को लड़ाकू विमानों व गन का बहुत शौक है। उसके खिलौनों में नये नये टैंक और मशीनगन शामिल है। वह कहता है, ” दादी, बड़ा होकर मैं भी दुश्मन के छक्के छुड़ा दूंगा”। देश के लिए मेरी परस्तिश जारी रहेगी… शहीद की पत्नी होने का पूरा फर्ज़ निभाऊंगी।

तुम्हारी
कणमर्णिका
✍️ ©® डा. सन्तोष चाहार ” जोया” 25/02/2019

लक्षित राहें

हसरतों का चवंर
भावनाओं का ज्वर
खामोशी के स्वर
समाज के कुंठित तेवर।

सिसकती उमंगें
दमित मन तरंगें
उड़ान भूलती विहंगे
परंपरा की अंधेरी सुरंगें।

जुगनुओं का प्रकाश
हृदय में भरता उजास
मंद मंद बिखरती सुवास
सड़ती रुढ़ीयों का प्रवास।

शिक्षित नारी की सनक
उमंगों के ऊंचे मानक
कौशल की विलक्षण दमक
कलम की तीक्ष्ण चमक।

हौंसले से लबरेज उड़ाने
लक्ष्य पर सटीक निशाने
राह ना होंगीं अब वीराने
नाज़ करेंगे ओजस्वी घराने।

✍️©® डा. सन्तोष चाहार ” जोया” 25/02/2019

यादों की ईद

यादों की ईद
पूनम की रात
मीठे जज्बात
उनींदे ख्वाब
रंगीन हिजाब
हुस्न व शबाब
हसीं महताब
जीते खिताब
जीवन किताब
खुदा का रकाब।

✍️©® डा. सन्तोष चाहार ” जोया” 25/02/2019

ख़ता की ख़लीश

ख़ता की ख़लीश कज़ा बन गई
खुदा से फिर मेरी ठन गई।

दर्द के काफिले बढ़ते गए
तमन्ना के आफ़ाक सिमटते गए।

जिंदगी-ए-ख़ियाबा में ख़जा़ रही
क़िस्सा-ए- इश़्क पर क़यामत ढही।

सज्दा-ए-हक अत्फ़ ना कर पाए
क़मर अपना क़ौल निभा ना पाए।

ख़ुमार-ए-इश़्क कागज़ बन उड़ा
इस्बात प्रेम का मौन बन रहा खड़ा।

इब्रत है, इश़्क-ए-राह अब्र से है लदी
गुज़ारिश, इश़्क में ख़ाक ना करो जिंदगी।

इक़ित्ज़ा, आफ़ताब बन शुक्र की शाखें झूलो
ख़ियाबा-ए- जिंदगी में हमेशा फलो फूलो।

✍️©® डा. सन्तोष चाहार “जोया” 23/02/2019
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शब्दार्थ अगले पेज़ पर
ख़ता* भूल
क़जा* ईश्वरीयदंड़
ख़लीश* चुभन
अत्फ़* भेंट
आफ़ाक* क्षितिज
ख़ियाबा* पुष्प वाटिका
ख़जा़* पतझड़
क़यामत* उथल-पुथल
अत्फ़* भेंट
क़मर* चाँद
कौल* वायदा
ख़ुमार* नशा
इस्बात* साक्ष्य
इब्रत* चेतावनी
अब्र* बादल
ख़ाक* राख
इक़ित्जा* आवश्यकता
आफ़ताब* सूर्य
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दिल की राह

ख़्वाबो- ख़्वाब में आश्ना का तव्वसुर
आब-ए-हयात का गहरा समुंदर
इंतजार-ए-मुद्दत एक ठहरा पड़ाव
दिल की राह में अकसर आज़ाब।

आब-ए-चश्म का अज़ल सैलाब
अफ़सुर्दा है राह-ए-जिंदगी
आशुफ़्ता रही तुम्हारी बंदगी
इख्लास गर सच्चा तो हंसे जिंदगी।

✍️©® डा.सन्तोष चाहार “जोया”23/02/2019
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आब ए हयात* exilr, nectar
आशुफ़्ता* भ्रमित
आज़ाब* पीड़ा
आब-ए-चश्म* आंसू
आश्ना* प्रेमी
अज़ल* अनंत
अफ़सुर्दा* उदास
इख्लास* प्रेम
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रुठी जन्नत

ऐ जिंदगी

मयस्सर ना हुई कायनात
संघर्षों के बादल बरसे दिन रात
सपनों की क्यारियों में रोपे खूब गुलाब
उम्र की ढ़लान पर भी शूल बेहिसाब।

रुठ गई है जन्नत
अधूरी रही हर मन्नत
हारे हुए अल्फ़ाज़ों की फ़ौजें
प्राप्त नहीं जिंदगी में मौज़ें।

फ़जा-ए-गम की चादर
होता रहा हमेशा निरादर
आंगन से धूप ने ली विदाई
सुनहरे ख़्वाबों की रुसवाई।

सदीयों से उठती ऊंची फ़सीलें
ठोकती रही हृदय में कीलें
जख़्म बनते रहे रिसते नासूर
इसमें नारी का ही था कसूर।

ख़्वाबों-तस्वीर में
एक अक्स है उभारना
अबला नारी का मुगालता तोड़ना
मंजिलों की धारा का रुख है मोड़ना।

हौंसलों का श्ज़र कर खड़ा
कदमों को करना है अति बड़ा
अद्भुत क्षमता को कर धारण
मील के पत्थर रचो असाधारण।

✍️ ©® डा. सन्तोष चाहार ” जोया” 22/02/2019

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श्ज़र* पेड़
फ़सीलें* चारहदीवारी
मुगालता* भ्रम

कुव्वत

मेरी क़ुव्वत को ना आंक
जमीनी तहरीरें की हैं ख़ाक
जज़्बा-ए-बेदार है ज़रकार
दुनिया की रिवायतें से गुरेज़।

✍️©®डा.सन्तोष चाहार 20/02/2019

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ज़रकार–स्वणिर्म
तहरीरें– लिखी बातें
रिवायतें–सुनी सुनाई बातें
बेदार- जागरूक, चौकन्ना।
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तिरंगे की मन की बात

मां भारती के चरणों में बैठकर
तिरंगे ने की करुण पुकार
शहीदों के परिजनों की सुनी है
मां, मैंने हृदयभेदी चीख पुकार।

देखा है
बिलखते बच्चों का जज्बा
मां बाप की सहनशक्ति का रुतबा
विधवा की रुदन चीत्कार
उमड़े जन सैलाब की गगनभेदी पुकार।

तिरंगा मां भारती से करता है अर्ज़
क्या शहीदों का कफन बनना ही फर्ज़?
क्यों नहीं बन पाता शूरवीरों की आन?
क्यों नहीं रख पाता रणबांकुरों की बान?

कब तक
सत्ता के लालच में नेता रहेंगे लिप्त
महागठबंधन से करेंगे सिंहासन प्राप्त
फिर भूल जाएंगे शहादतें बन निर्लिप्त?

कब तक
शहीदों की चिताओं पर साहस होगा चूर
फिकरापरस्ती में आतंकवाद बनेगा नासूर
क्या है आम भारतीय का कसूर?
कब तक विदेशी आकाओं का रहेगा फितूर?

क्यों नहीं
काटने देते दुश्मनों की बोटियां
आंतक परस्त फिर तरसे रोटियां
क्यों नहीं
आदेश देते फतह करें दुश्मनों की चोटियां?

मां भारती
सुनो मेरी आंतर्नाद
बजने दो रणभेरी व शंखनाद
आतंकी सर जमीं बने कब्रगाह
आंतकी सपोलों का तभी होगा दाह।

तिरंगा
करता है मां भारती से दरख्वास्त
शूरवीरों का बल कभी ना हो परास्त
प्रचंड प्रहार कर सेना,दुश्मन को करे त्रस्त
भारतीय जन हर कला में है सिद्धहस्त।

मां भारती
चाहता हूं शान से फहराया जाऊं
कभी शहीद का कफ़न ना बनकर आऊं
दुश्मन की जमीं तलक फहराया जाऊं
कभी किसी शहीद का कफ़न बन कर ना आऊं।

✍️ डा. सन्तोष चाहार” जोया”17/02/2019
[रोहतक- हरियाणा]