मेहरबान लम्हें

हरियाणा राज्य का एक छोटा सा गांव चिमनी जहां अधिकतर परिवार खेती से अपनी गुज़र बसर करते हैं। कुछ युवा पुलिस व आर्मी में भी हैं। लड़कियों की शिक्षा पर थोड़ा ध्यान दिया जा रहा है। रेनू का परिवार भी खेती पर निर्भर है। दो बहनें और एक भाई है। पिता शराब पीने का आदी। मां शराबी पति से परेशान। आए दिन कोई ना कोई फसाद खड़ा ही रहता है। लड़कियां लेकिन होश संभालने के बाद से ही परिवार की रीढ़ बनने को तत्पर। पढ़ाई में दोनों बहनें बहुत होशियार। गांव के सरकारी स्कूल से दोनों ने बारहवीं कक्षा पास की। बड़ी बहन रेनु ने पांचवीं कक्षा के बाद से ही छोटे बच्चों को टूयशन पढ़ा कर अपनी और बहन की पढ़ाई का खर्च उठा रखा है और कुछ पैसे जमा भी करती रहती है। छोटी बहन अनु घर के कामकाज में मां की सहायता करती है। भाई को पढ़ाई में कोई रुचि नहीं और बारहवीं कक्षा के बाद आवारागर्दी में रहता है।

समय बीता ..रेनू ने अंग्रेजी विषय से एम ए करने के बाद बी. एड़ किया और एक प्राईवेट स्कूल में नौकरी पकड़ ली। अपनी मेहनत के दम पर एम फिल भी किया और फिर एक संस्था के महाविद्यालय में अडहोक पर प्रोफ़सर की नौकरी मिल गई.. एक दो साल वहां काम करने के पश्चात रेनू ने काफी पैसे जमा कर लिए थे। रहन सहन बिल्कुल सादा रखा लेकिन सलीका बहुत था हर काम करने का। इधर बहन अनु को भी पढ़ाती रही जिसने एम ए. गणित से किया और वह भी एम बी ए की प्रवेश परीक्षा की तैयारी में जुट गई। लड़कियां जवान हो रही थी तो गांव में लोगों ने उसके पिता को चैन से नहीं बैठने दिया। रिश्तों के लिए भागदौड़ शुरु हो गई लेकिन रेनू के पैर में लकवे की वजह से थोड़ी चाल में फर्क था जो ज्यादा दिखाई भी नहीं देता था। लेकिन ये बेरहम समाज हमेशा नुक्ताचीनी करके उसके रिश्ते को मना कर देते।

इस बीच रेनू ने रेगुलर जॉब गुरुग्राम के आवासीय इंजीनियरिंग कॉलेज में नौकरी मिल गई। तंख्वाह भी चालीस हज़ार मिलने लग गई। रेनू के पिता ने सैंकड़ों लड़के देखे लेकिन हर कोई कोई न कोई कमी निकाल ही देता। उसके पिता इस कदर परेशान हो गए कि बेटी के लिए विधुर के रिश्ते के लिए भी तैयार हो गए। लेकिन रेनू ने यहां अपना पक्ष रखा और रिश्ते को नामंजूर कर दिया। रेनु ने ये भी कह दिया कि, ” पापा आप अनु की शादी पहले कर दो। मुझे कोई जल्दी नहीं है”। अनुजा सुंदर थी, रिश्ता मिल गया। खेती से तो गुजर बसर ही होती थी। रेनु ने तीन लाख रुपये जमा किए थे, सब बहन की शादी में लगा दिए। रेनू की हर चीज़ की च्वॉइस क्लासिक थी। ये आवश्यक नहीं जो महंगा हो वही बढ़िया होता है। रेनू के पापा ने तो बस एक लाख शादी में लगाए थे। अनुजा की शादी अच्छी हो गई। देहज़ की कोई मांग नहीं थी। रेनू को माता पिता का आशीर्वाद मिलता रहता था जो बेटी होकर एक बेटे की भूमिका निभा रही थी और बाप का भी दायित्व संभाल रही थी।

समय बीता …रेनु के पिता व गांव के सरपंच अपने हल्के के एम एल ए से मिले और सरकारी स्कूलों के लिए जब वेकेंसी आई तो रेनू को पलस टू में लेक्चरर की जॉब मिल गई। तीन साल बीत गए। रेनू के लिए कोई रिश्ता नहीं मिल रहा था। पी. जी. में रहती रहते वह परेशान हो गई थी। मेरे पास आ जाती थी। एक आत्मीयता थी हमारे बीच। अपनी सब परेशानी मुझसे सांझा करती थी। मेरे कॉलेज में दो साल एडहॉक पर आयी थी। तभी से मेरा लगाव रहा है उसके साथ। दोनों बहनें एक साल मेरे घर भी रही थी। अनुजा तैयारी कर रही थी और रेनू उस समय एक पॉलीटेक्निक में जॉब कर रही थी। इसी दौरान उन दोनों बहनों से जुड़ाव रहा है। रेनू कभी कभी भावुक होकर कहती थी, ” मैम, अब मैं थक चुकी हूं सब संभालते संभालते। मैं भी चाहती हूं कोई मेरा भी ख्याल रखे। घर जाती हूं तो मां की अपनी परेशानी होती हैं।” मेरे हृदय से उसके लिए दुआएं ही निकलती थी। अब वह तैंतीस वर्ष की हो चुकी थी। निस्संदेह उसे भी एक सकून की तलाश थी..एक घर जिसे वह अपना कह सके… जहां जिंदगी चहल पहल कर रही हो..जहां जीवन रंगों से भरा हो।

ईश्वरीय विधान अपने हिसाब से नेमत बरसाता है। पिछले साल रेनु की शादी को एक साल हो गया है। उसी के स्कूल में एक हम उम्र महिला मित्र ने अपने भाई के लिए हाथ मांगा था और बिना दहेज़ की शादी कर उसे अपने घर की बहू बना कर ले गए। सीमित बारात आयी थी। रेनू ने अपनी एक से एक बढ़िया खरीदारी की थी। शादी में शामिल हुई थी मैं यद्मपि मुझे शादीयों में जाना खास अच्छा नहीं लगता। रेनू के फोन बराबर आते रहते थे। वह कहती है, ” मैम, मेरी सास बहुत अच्छी है। बहुत ध्यान रखती है। खुद भी अच्छा पहनती है और मुझे भी अच्छे सूट साड़ी भेंट करती रहती है.. मैम, मेरी तंख्वाह भी नहीं लेते मेरे सास ससुर..मेरी सास कहती है अपने लिए सोने के गहने बना ले …मैम मैंने बीस तोला सोने के नये गहने तैयार करवा लिए हैं…हर रोज़ गाड़ी पूल से स्कूल जाती हूं.. मैम अब में खुश हूं।”।

एक महीने पहले ही तो फोन आया था, ” मैम, बेटा हुआ है..” मेरा सिर उस दिन ईश्वरीय विधान के आगे श्रद्धा से झुक गया। रेनू की झोली में रब मेहरबानी के लम्हें डाल रहा था। कल ही तो बताया था ,” मैम, अनु की भी सरकारी नौकरी लग गई है.. लेक्चरार मैथ”। सच ही कहा है भगवान के घर देर है अंधेर नहीं।

✍️©® ” जोया” 26/01/2019

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