औरत की कहानी

पहला परिदृश्य

औरत की ये अज़ब कहानी

दुनिया करती आई मनमानी।

दोयम दर्जा दिया पुरुषों ने

नित किया अपमान नये हथकंडों ने।

लक्ष्मण रेखा की पहेरेदारी
कभी ना की सुखों की सवारी।
सुबह से हो जाती शाम
कभी ना होते खत्म घर के काम।

खेत खलिहान को भी जोतती

कष्टों को नित वह भोगती।

खाकर रुखी सूखी सो जाती

कभी कभी तो रह जाती भूखी।

परिवार पर रहती हरदम न्यौछावर

सिर पर ढ़ोती नीर सरोवर।

ईर्ष्या उसकी को खूब भुनाया

औरत को औरत से टकराया।

नारी को नारी के खिलाफ किया खड़ा

इस तरह पुरुष बना रहा बहुत बड़ा।

होती रही वासना का शिकार

पीडा़ का नहीं कोई पारावार।

दूसरा परिदृश्य

परंपराओं की जंजीर से जकड़ी
सपनों की डोर फिर भी पकड़ी।
शिक्षित होने वह अब निकली
नहीं ओढ़ती नकाब वो नकली।
खेल जगत में मुकाम बनाया
देश का गौरव नित बढ़ाया।
छूती अब गगन तारिकाएं
झंडा देश का चोटी पर लहराएं।
बन फौजी देश का गौरव बढा़ती
बाधाओं से नहीं अब घबराती।
बन पायलट वह विमान उड़ाती

दुश्मनों के छक्के अब छुड़ाती।

बनकर आई एस अधिकारी

योजनाएं बनाती न्यारी न्यारी।

सी.ई.ओ बन योग्यता का परचम फहराती

डिजिटल भारत का तिरंगा लहराती।

शिक्षाजगत की दुनिया उसकी अनोखी

महिला शिक्षादिक्षा में महारत उसकी चोखी।

बढ़े कदम बनाते नित नयी डगर

मिट जाएगा अब मन का तिमिर।

✍️©® “जोया” 22/01/2019

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