जाल

“हैलो हैलो, क्या मैं नूर की मम्मा से बात कर रही हूं?” मुम्बई से फोन पर कोई महिला बोल रही थी।
“हां, हां, क्या हुआ मैं नूर की मां बोल रही हूं” शिखा का माथा ठनका। शिखा की बेटी नूर मुम्बई में यैश बैंक में मैनेजर नियुक्त थी पिछले दो साल से।
” मैम, मैं कह रही थी कि नूर मुम्बई में बिल्कुल अकेली है और उसकी तबीयत ठीक नहीं है” ये नूर की यैश बैंक की सीनियर मोनिका बोल रही थी। इतना कहकर मोनिका ने फोन काट दिया। मुम्बई के लोग बहुत प्रोफेशनल होते हैं। अब शिखा की तो आंखो से नींद गायब हो गई। रात के ग्यारह बज रहे थे। घर में कैंसर से जूझ रहे पति के साथ क्या शेयर करे। मन में उल्टे सीधे ख्याल आते रहे। नूर का फोन भी सिविच ऑफ आ रहा था। फ्लैट की बाकी दो लड़कियां भी अपने घर गई थी। एक नेहा शर्मा की तो शादी तय हो चुकी थी और दूसरी शिवानी एक सप्ताह के लिए घर दशहरा मनाने गयी थी। पिछले इतवार को ही तो नूर ने मां को बताया था ये सब। शिवानी हिमाचल प्रदेश से थी जहां का दशहरा विश्व प्रसिद्ध है। शिखा का बेटा आई आई टी पढ़ने कानपुर गया था। पिछले सात साल से शिखा गृहस्थी की गाड़ी अकेले खींच रही थी। शिखा के पति रोहन के इलाज पर लगभग जमा पूंजी खर्च हो गई थी। अमीर भाई बंधुओं ने दूरी बना ली। हालचाल पूछते और चले जाते। फिर धीरे धीरे आना भी बंद कर दिया। ये तो रोहन की जिजीविषा थी ठीक होने की, कि उन्होंने कैंसर जैसी बीमारी को हरा दिया था लेकिन शिखा कोई भी चिंताजनक बात रोहन से शेयर नहीं करती थी।

शिखा ने अपने भाई को फोन किया , “कि भतीजे को मुम्बई भेज दो” नूर की चिंता हो रही है। शिखा का भाई उदयपुर में रहता था। उसने कहा , ” एक सप्ताह का समय दो। उसके बाद देखते हैं किसको भेजना है”। शिखा के लिए तो एक एक पल भारी हो रहा था। शिखा ने फिर अपनी बहन से बात की। बहन ने कहा, ” तुम बिल्कुल चिंता मत करो। मैं मुम्बई कल दोपहर की फ्लाइट से निकल जाऊंगी”। शिखा की बहन, सरिता,एक रेजिडेंशियल स्कूल में प्रिंसिपल कार्यरत हैं। शिखा को अब थोड़ी तसल्ली हुई। सरिता को मालूम था कि शिखा डिप्रेशन से जूझ रही है।पति की लम्बी और जानलेवा बीमारी और बच्चों की उच्च शिक्षा, गृहस्थी के अन्य खर्च अब शिखा के कंधों पर थे। शिखा, स्वावलंबी तो थी ही, साथ में बहुत स्वाभिमानी भी थी। इतने वर्षों में शिखा की कोशिश थी कि किसी से पैसा लेना ना पड़े। इसलिए बहुत सोच समझकर खर्च करती थी। अपने सपने तो दफ़न कर दिए थे। बेटी नूर ने जिद्द की थी कि, ” कैम्पस प्लेशमेंट मिल रही है। पैकेज भी अच्छा है। मुझे मुम्बई जाने दो मां”। शिखा थोड़ा डरी हुई थी। अकेली लड़की, इतनी दूर। वह चाहती थी कि दिल्ली पोस्टिंग ले ली जाए। लेकिन नयी पीढ़ी में जोश खूब होता है, नूर भी नहीं मानी। शिखा की दो भानजी विदेश मे पढ़ रही थी। उन्होंने भी कहा, ” मौसी, आप घबरोओ नहीं, नूर समझदार है”। शिखा लेकिन जानती थी नूर दिल से बहुत मासूम है। उसकी तरहं ही लोगों पर जल्दी विश्वास कर लेती है। बेटी के ख्यालों में डूबते डूबते सुबह हो गई। सुबह फिर फोन मिलाया, नूर का फोन अभी भी सिविच ऑफ था। शिखा ने उस दिन कालेज़ से छुट्टी ली। उसका कहीं मन नहीं लग रहा था। सरिता, नूर की मौसी, शाम चार बज़े तक मुम्बई नूर के फ्लैट पर पहुंच गई थी। नूर कमरे में अकेली बिस्तर पर उदास लेटी हुई थी। ऐसा लग रहा था कुछ दिनों से ढंग से खाया भी नहीं है। अचानक मौसी को देखकर आंसुओं की धारा बह निकली। अगली फ्लाइट से मौसी नूर को लेकर रोहतक पहुंच चुकी थी। नूर जो हमेशा चहकती रहती थी, आज उदासीयों के बादल उसके ‘स्माईली फेस’ पर उमड़ घुमड़ रहे थे।

रोहन भी आश्चर्य में थे कि अचानक नूर , मौसी के साथ कैसे आई है। शिखा ने उन्हें कुछ नहीं बताया था। बस थोड़ा सा इशारा किया था कि नूर की तबीयत ठीक नहीं है इसलिए घर बुला लिया है। शाम को शिखा, सरिता व नूर के साथ बैठी और उसकी इस गहरी उदासी का का कारण जानना चाहा। नूर के होंठ कांप रहे थे, आंखों में आंसू अवरिल रुप से बह रहे थे, रोते, रोते हिचकी बंध गई थी। शिखा ने उसे अपनी गोद में ऐसे ही लेटा लिया जैसे वह बचपन में लिटा लेती थी और कहा कि, ” बेटा जो भी बात है बेझिझक होकर बताओ। कोई भी तुम्हें कुछ नहीं कहेगा”।
मां का आश्वासन भरा हाथ सिर पर पाकर नूर ने बताना शुरु किया। ” मम्मा, मेरे बैंक में मेरी सीनियर हैं, मोनिका उनके हसंबैड़ क्यू नेट की सकीम चलाते हैं जिसमें उन्होंने मेरा बारह लाख रुपया लगवा दिया है। पांच लाख रुपया एक बैंक से व्यक्तिगत लोन लिया था मैंने, उनके कहने पर। चार लाख मेरा बोनस आया था। तीन लाख मेरे कहने पर तीन सहेलियों ने मुझे लगाने के लिए दिए थे। ये चैन सिस्टम जैसा कुछ है। उन्होंने मुझे आश्वस्त किया था कि पैसा सेफ है और छ: महीने में ही तुम बहुत पैसा बना लोगी। उन्होंने ये भी कहा था कि जब तुम अच्छा पैसा इससे कमा लो तभी घर पर बताना। मैंने उन पर भरोसा कर लिया। मैंने सोचा था कि आपकी मदद कर दूंगी। लेकिन मम्मा मैं इस सिस्टम से और लोगों की चैन नहीं बना पाई। मेरी सीनियर मोनिका से मैंने पापा को बीमारी और आपके डिप्रेशन की बातें शेयर की थी। अब मेरा सारा पैसा डूब गया है। मुझे बहुत बुरे ख्याल आ रहे थे। मैंने सुसाइड के बारे में भी सोचा था लेकिन आपका चेहरा घूम जाता था…”। शिखा और बहन सरिता उसकी बात को ध्यान से सुन रहे थे। शिखा ने समझाते हुए कहा कि, ” बेटा, जो हो गया , उसे छोड़ो। पैसा हमने ही बनाया था। दुबारा बन जायेगा लेकिन तुम इतनी कमजोर क्यों बनी कि सुसाइड जैसी बात तुम्हारे दिमाग में आई। बेटी पैसा एक माध्यम है जीवन चलाने के लिए, सब कुछ नहीं है। इंसान बना रहना चाहिए। हौंसला है तो जो बिखरा है फिर से समेटा जा सकता है लेकिन इंसान एक बार मृत्यु को प्राप्त हो जाए तो कभी वापिस लौट कर नहीं आता। आइंदा, इतनी बात गांठ बांध लो कि, माता पिता से बढ़कर दुनिया में कोई सच्चा हितैषी नहीं होता। इसलिए हमेशा उनसे सलाह लेकर कोई भी काम शुरु करना चाहिए। तुम्हारे पापा की इतनी बढिया जॉब से त्यागपत्र भी मैंने ही तो दिलवाया था। सबसे पहले सेहत रुपी खज़ाना है बाकी सब तो बाद मे आता है। ये सारा लोन और तुम्हारी सहेलियों का पैसा हम मिलकर चुका देंगे। बिल्कुल भी चिंता नहीं करनी है…।” मां की गोद में लेटे लेटे नूर को नींद आ गई। शायद कुछ दिन से ढंग से सोयी भी नहीं थी। शिखा और सरिता काफी देर तक विचार विमर्श करती रहीं। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि अब नूर को मुम्बई नहीं भेज़ना है। शिखा ने अगले दिन नूर के बॉस से बात की और रिक्वेस्ट की, कि नूर को एक सप्ताह में ही रिलीव कर दें। कुछ पारिवारिक मज़बूरी है। नूर के बॉस को भी उसकी पारिवारिक परेशानी पता थी । इसलिए उन्होंने बात मान ली। तीन दिन बाद शिखा ने अपनी बहन सरिता को नूर के साथ भेजा और नूर को एक सप्ताह चार्ज देने में लगा। मौसी बेटी मुम्बई को बॉय करके वापिस अपने स्टेट में आ गई। शिखा मेरी खास सहेली है, हम बचपन से ही साथ रहे हैं । किस्मत से शादी के बाद भी मकान एक ही शहर में बना लिया था तो हमारा लगभग सप्ताह में एक बार मिलना जरूर हो जाता है।

नूर अब मां की देखरेख में रह रही है। मानसिक तनाव के लक्षण देखे तो शिखा अपने साईकेटेरिसट के पास उसे ले गई। नूर पहले तो मानने को तैयार ही नहीं थी कि उसे चिकित्सा की आवश्यकता है लेकिन शिखा तो इस बीमारी से वाकिफ थी। नूर को मना कर उसकी चिकित्सा करवाई और बहुत ममता उडे़ली, तब कहीं जाकर नूर दस महीने में बिल्कुल ठीक हुई। उसे गहरा सदमा लगा था, कहीं आत्मग्लानि भी थी कि मां पर अनआवश्यक बोझ डाला। लेकिन जिस तरहं से शिखा अपनी हर समस्या को खुद डिप्रेशन की दवा लेते हुए सुलझाती है, मेरा मन उसे हमेशा नमन करता है। मैंनें तो उसे बहुत करीब से जाना है। उसकी विल पावर बहुत दृढ़ है। नूर ने भी ठीक होने के बाद गुरुग्राम में दुबारा से जॉब ज्वाइन कर ली है। अब वह हर पंद्रह दिन में घर आ जाती है और सभी बातें अपनी मां से सांझा करती है।

मैंने तो कहा भी था कि मोनिका और उसके पति पर कोर्ट कैस करते हैं लेकिन शिखा का कहना है कि मेरी बेटी सुरक्षित घर आ गई है। मुझे कोई कोर्ट कचहरी के चक्कर में नहीं पड़ना। इतनी दूर बार बार फ्लाइट इत्यादि पर खर्च नहीं कर सकती। फिर कोर्ट में कैस सालों साल चलते रहते हैं। मैं अकेली क्या क्या संम्भालूगी। नूर के साथ मोनिका व उसके पति ने जो किया है उन्हें वह एक दिन जरूर किसी न किसी रुप में चुकाना पड़ेगा। निर्मल मन वालों की आह पत्थर को भी भेद जाती है।

✍️©®” जोया” 19/01/2019

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