रुठे को मनाना

1970
उस वक्त मेरी उम्र सात वर्ष की थी और संकरात पर मां हम तीनों बहन भाइयों को अल सुबह उठा देती थी हारे पर गर्म पानी की डेगची तैयार रहती थी। सूर्योदय से पहले स्नान आवश्यक था नहीं तो हमे कहा जाता था कि, ” चांडाल बाल रह जायेगा”। और हम डर के मारे तुरंत उठ जाते थे। नहा धोकर बाहर ताऊ द्वारा जलाये हुए अलाव के सामने बैठ जाते और उसमें मूंगफली और तिल अर्पित करते। साथ में मां द्वारा बनाए हलवे का भी भोग अग्नि देवता को लगाते थे। आंच के पास बैठकर खेत से लाए गन्ने चूघंते थे। फिर हलवा खाकर रजा़ई मैं बैठकर बातें करते थे। बड़ी बहन बताती कि आज़ तो दिन में बहुत रौनक होने वाली है। हमारी उत्सकुता बढ़ जाती थी।

खेत क्यार का काम करके सब लोग अपने घरों को जल्दी लौट आते थे। दोपहर से ही महिलाओं की टोली गीत गाती हुई अपने घर के बुजुर्गों को मनाने के लिए नयी बहू के साथ जाते थे। घाघरा, कुर्ता और सितारों व गोठ से चमकदार ओढ़नी ओढ़े ये बहूएं सबको आकृषित करती थी। उनकी झनझन करती पायल की झंकार एक अलग ही किस्म की मनमोहक धुन लिए होती थी। हाथों में खनकती चूडिय़ां व सुंदर हथफूल हम बच्चों को तो बहुत आकर्षक लगते थे। लगभग घुटनों तक पहने हुए कडूले व गले में मटरमाला और कंठी, इन बहूओं की सुंदरता में चार चांद लगा देती थी।गांव में खूब चहल पहल शुरू हो जाती और पूरे वातावरण में स्नेह की महक फैली होती थी।

परांत में तील लेकर ये नयी बहूएं अपने, जेठ, ससुर ,सास व दादी सास को मनाने जाती थी। बुजुर्ग तो कहीं दूसरी बैठक में बैठ जाते थे और बच्चों की डयूटी लगती थी ढूंढने की कहां रूठकर बैठे हैं। फिर सब महिलाएं गीत गाती हुई उन्हें गर्म कम्बल व नेग देकर मना कर घर लिवा लाती थी। दादी ताईयां भी छुप कर बैठ जाती जिन्हें हम बच्चे ढूंढ लेते और एक जासूस की तरह आकर अपनी नयी काकी मां को बता देते। बहुत आंनद आता था। महिलाओं की टोली फिर इन बुजुर्ग महिलाओं को मना कर घर लिवा लाती। हम बच्चे तो उस दिन खूब मस्ती करते थे और जहां भी महिलाओं की टोली दिखती शामिल हो लेते थे। शाम होते होते सभी रुठे लोगों को मना लिया जाता था व बहूओं को दूधो नहाओं पूतों फलों का आशिर्वाद मिल जाता था। इस तरह संकरात का त्योहार सकारात्मक ऊर्जा से भरा होता था। आपस की चुहलबाज़ी में पिछले सारे गिले शिकवे दूर हो जाते थे और आशीर्वादों की झड़ी लग जाती थी।

2019
संकरात मनाना अब मात्र औपचारिकता भर रह गई है खासकर परिवार में। संगी साथी वटस अप पर विश कर लेतें हैं। बुजुर्गों से फोन पर बात हो जाती है कुछ अपवादों को छोड़कर। बहूओं द्वारा दी गई तील अब पंसद नहीं आती है। नुक्ताचीनी से मन में खटास होती है। थोड़ी समृद्धि ने भी संकरात की रौनक को छीन लिया है। मैं तो पिछले तीस साल से अपने यहां बाई, माली, चौकीदार व विधवा चपरासी को संकरात देकर ये त्योहार मना लेती हूं। मेरे ससुर ने तीस साल पहले कह दिया था, ” किसी गरीब को दे दिया करो, मोटली(सास) के पास बहुत हैं”। मुझे मालूम था कि मेरी सास को कभी मेरी लाई तील पंसद नहीं आयी जो मैं हमेशा नयी खरीद कर लाती थी। मेरा तो यही मानना है कि, ” रिश्तों की मिठास जब दोनों ओर से हो तभी सुंगधित पुष्प खिलते हैं”।

✍️©®” जोया”14/01/2019

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