Monthly Archives: January 2019

हुंकार

युवाओं
पथ अपना प्रशस्त करो
सपने सजा़ए आंखो में
उन्हें ना बोझिल करो
शक्ति को पहचान
जिंदगी से जंग करो।

इंटरनेट
एक आभासी दुनिया
समय ना व्यर्थ करो
कौशल को तराशो
जीविका सुरक्षित करो।

काम
कोई नहीं होता छोटा
क्षमता अनुसार राह चुनो
निपुणता भी होगी हासिल
हुनर को तराशते चलो।

छोटी छोटी मंजिले
पथ पर तुम डट चलो
हौंसलों को बुलंद कर
मिला कर कदम तुम चलो।

कम्प्यूटर का
ज्ञान जरूरी
गति पकड़
दिनचर्या होती पूरी
सीख बारिकियों को
राह अपनी आसान करो।

ईश्वर ने
सभी को नवाजा है
एक गुण विशेष
पहचान कर उसे
सही उपयोग करो।

दूसरों से कर तुलना
कभी ना हीन भावना भरो
प्रत्येक व्यक्ति की
अपनी जीवन किताब
कोई प्रथम सीढ़ी पर
कोई चमके बन महताब।

✍️©® “जोया” 31/01/2019

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मेहरबान लम्हें

हरियाणा राज्य का एक छोटा सा गांव चिमनी जहां अधिकतर परिवार खेती से अपनी गुज़र बसर करते हैं। कुछ युवा पुलिस व आर्मी में भी हैं। लड़कियों की शिक्षा पर थोड़ा ध्यान दिया जा रहा है। रेनू का परिवार भी खेती पर निर्भर है। दो बहनें और एक भाई है। पिता शराब पीने का आदी। मां शराबी पति से परेशान। आए दिन कोई ना कोई फसाद खड़ा ही रहता है। लड़कियां लेकिन होश संभालने के बाद से ही परिवार की रीढ़ बनने को तत्पर। पढ़ाई में दोनों बहनें बहुत होशियार। गांव के सरकारी स्कूल से दोनों ने बारहवीं कक्षा पास की। बड़ी बहन रेनु ने पांचवीं कक्षा के बाद से ही छोटे बच्चों को टूयशन पढ़ा कर अपनी और बहन की पढ़ाई का खर्च उठा रखा है और कुछ पैसे जमा भी करती रहती है। छोटी बहन अनु घर के कामकाज में मां की सहायता करती है। भाई को पढ़ाई में कोई रुचि नहीं और बारहवीं कक्षा के बाद आवारागर्दी में रहता है।

समय बीता ..रेनू ने अंग्रेजी विषय से एम ए करने के बाद बी. एड़ किया और एक प्राईवेट स्कूल में नौकरी पकड़ ली। अपनी मेहनत के दम पर एम फिल भी किया और फिर एक संस्था के महाविद्यालय में अडहोक पर प्रोफ़सर की नौकरी मिल गई.. एक दो साल वहां काम करने के पश्चात रेनू ने काफी पैसे जमा कर लिए थे। रहन सहन बिल्कुल सादा रखा लेकिन सलीका बहुत था हर काम करने का। इधर बहन अनु को भी पढ़ाती रही जिसने एम ए. गणित से किया और वह भी एम बी ए की प्रवेश परीक्षा की तैयारी में जुट गई। लड़कियां जवान हो रही थी तो गांव में लोगों ने उसके पिता को चैन से नहीं बैठने दिया। रिश्तों के लिए भागदौड़ शुरु हो गई लेकिन रेनू के पैर में लकवे की वजह से थोड़ी चाल में फर्क था जो ज्यादा दिखाई भी नहीं देता था। लेकिन ये बेरहम समाज हमेशा नुक्ताचीनी करके उसके रिश्ते को मना कर देते।

इस बीच रेनू ने रेगुलर जॉब गुरुग्राम के आवासीय इंजीनियरिंग कॉलेज में नौकरी मिल गई। तंख्वाह भी चालीस हज़ार मिलने लग गई। रेनू के पिता ने सैंकड़ों लड़के देखे लेकिन हर कोई कोई न कोई कमी निकाल ही देता। उसके पिता इस कदर परेशान हो गए कि बेटी के लिए विधुर के रिश्ते के लिए भी तैयार हो गए। लेकिन रेनू ने यहां अपना पक्ष रखा और रिश्ते को नामंजूर कर दिया। रेनु ने ये भी कह दिया कि, ” पापा आप अनु की शादी पहले कर दो। मुझे कोई जल्दी नहीं है”। अनुजा सुंदर थी, रिश्ता मिल गया। खेती से तो गुजर बसर ही होती थी। रेनु ने तीन लाख रुपये जमा किए थे, सब बहन की शादी में लगा दिए। रेनू की हर चीज़ की च्वॉइस क्लासिक थी। ये आवश्यक नहीं जो महंगा हो वही बढ़िया होता है। रेनू के पापा ने तो बस एक लाख शादी में लगाए थे। अनुजा की शादी अच्छी हो गई। देहज़ की कोई मांग नहीं थी। रेनू को माता पिता का आशीर्वाद मिलता रहता था जो बेटी होकर एक बेटे की भूमिका निभा रही थी और बाप का भी दायित्व संभाल रही थी।

समय बीता …रेनु के पिता व गांव के सरपंच अपने हल्के के एम एल ए से मिले और सरकारी स्कूलों के लिए जब वेकेंसी आई तो रेनू को पलस टू में लेक्चरर की जॉब मिल गई। तीन साल बीत गए। रेनू के लिए कोई रिश्ता नहीं मिल रहा था। पी. जी. में रहती रहते वह परेशान हो गई थी। मेरे पास आ जाती थी। एक आत्मीयता थी हमारे बीच। अपनी सब परेशानी मुझसे सांझा करती थी। मेरे कॉलेज में दो साल एडहॉक पर आयी थी। तभी से मेरा लगाव रहा है उसके साथ। दोनों बहनें एक साल मेरे घर भी रही थी। अनुजा तैयारी कर रही थी और रेनू उस समय एक पॉलीटेक्निक में जॉब कर रही थी। इसी दौरान उन दोनों बहनों से जुड़ाव रहा है। रेनू कभी कभी भावुक होकर कहती थी, ” मैम, अब मैं थक चुकी हूं सब संभालते संभालते। मैं भी चाहती हूं कोई मेरा भी ख्याल रखे। घर जाती हूं तो मां की अपनी परेशानी होती हैं।” मेरे हृदय से उसके लिए दुआएं ही निकलती थी। अब वह तैंतीस वर्ष की हो चुकी थी। निस्संदेह उसे भी एक सकून की तलाश थी..एक घर जिसे वह अपना कह सके… जहां जिंदगी चहल पहल कर रही हो..जहां जीवन रंगों से भरा हो।

ईश्वरीय विधान अपने हिसाब से नेमत बरसाता है। पिछले साल रेनु की शादी को एक साल हो गया है। उसी के स्कूल में एक हम उम्र महिला मित्र ने अपने भाई के लिए हाथ मांगा था और बिना दहेज़ की शादी कर उसे अपने घर की बहू बना कर ले गए। सीमित बारात आयी थी। रेनू ने अपनी एक से एक बढ़िया खरीदारी की थी। शादी में शामिल हुई थी मैं यद्मपि मुझे शादीयों में जाना खास अच्छा नहीं लगता। रेनू के फोन बराबर आते रहते थे। वह कहती है, ” मैम, मेरी सास बहुत अच्छी है। बहुत ध्यान रखती है। खुद भी अच्छा पहनती है और मुझे भी अच्छे सूट साड़ी भेंट करती रहती है.. मैम, मेरी तंख्वाह भी नहीं लेते मेरे सास ससुर..मेरी सास कहती है अपने लिए सोने के गहने बना ले …मैम मैंने बीस तोला सोने के नये गहने तैयार करवा लिए हैं…हर रोज़ गाड़ी पूल से स्कूल जाती हूं.. मैम अब में खुश हूं।”।

एक महीने पहले ही तो फोन आया था, ” मैम, बेटा हुआ है..” मेरा सिर उस दिन ईश्वरीय विधान के आगे श्रद्धा से झुक गया। रेनू की झोली में रब मेहरबानी के लम्हें डाल रहा था। कल ही तो बताया था ,” मैम, अनु की भी सरकारी नौकरी लग गई है.. लेक्चरार मैथ”। सच ही कहा है भगवान के घर देर है अंधेर नहीं।

✍️©® ” जोया” 26/01/2019

औरत की कहानी

पहला परिदृश्य

औरत की ये अज़ब कहानी

दुनिया करती आई मनमानी।

दोयम दर्जा दिया पुरुषों ने

नित किया अपमान नये हथकंडों ने।

लक्ष्मण रेखा की पहेरेदारी
कभी ना की सुखों की सवारी।
सुबह से हो जाती शाम
कभी ना होते खत्म घर के काम।

खेत खलिहान को भी जोतती

कष्टों को नित वह भोगती।

खाकर रुखी सूखी सो जाती

कभी कभी तो रह जाती भूखी।

परिवार पर रहती हरदम न्यौछावर

सिर पर ढ़ोती नीर सरोवर।

ईर्ष्या उसकी को खूब भुनाया

औरत को औरत से टकराया।

नारी को नारी के खिलाफ किया खड़ा

इस तरह पुरुष बना रहा बहुत बड़ा।

होती रही वासना का शिकार

पीडा़ का नहीं कोई पारावार।

दूसरा परिदृश्य

परंपराओं की जंजीर से जकड़ी
सपनों की डोर फिर भी पकड़ी।
शिक्षित होने वह अब निकली
नहीं ओढ़ती नकाब वो नकली।
खेल जगत में मुकाम बनाया
देश का गौरव नित बढ़ाया।
छूती अब गगन तारिकाएं
झंडा देश का चोटी पर लहराएं।
बन फौजी देश का गौरव बढा़ती
बाधाओं से नहीं अब घबराती।
बन पायलट वह विमान उड़ाती

दुश्मनों के छक्के अब छुड़ाती।

बनकर आई एस अधिकारी

योजनाएं बनाती न्यारी न्यारी।

सी.ई.ओ बन योग्यता का परचम फहराती

डिजिटल भारत का तिरंगा लहराती।

शिक्षाजगत की दुनिया उसकी अनोखी

महिला शिक्षादिक्षा में महारत उसकी चोखी।

बढ़े कदम बनाते नित नयी डगर

मिट जाएगा अब मन का तिमिर।

✍️©® “जोया” 22/01/2019

जाल

“हैलो हैलो, क्या मैं नूर की मम्मा से बात कर रही हूं?” मुम्बई से फोन पर कोई महिला बोल रही थी।
“हां, हां, क्या हुआ मैं नूर की मां बोल रही हूं” शिखा का माथा ठनका। शिखा की बेटी नूर मुम्बई में यैश बैंक में मैनेजर नियुक्त थी पिछले दो साल से।
” मैम, मैं कह रही थी कि नूर मुम्बई में बिल्कुल अकेली है और उसकी तबीयत ठीक नहीं है” ये नूर की यैश बैंक की सीनियर मोनिका बोल रही थी। इतना कहकर मोनिका ने फोन काट दिया। मुम्बई के लोग बहुत प्रोफेशनल होते हैं। अब शिखा की तो आंखो से नींद गायब हो गई। रात के ग्यारह बज रहे थे। घर में कैंसर से जूझ रहे पति के साथ क्या शेयर करे। मन में उल्टे सीधे ख्याल आते रहे। नूर का फोन भी सिविच ऑफ आ रहा था। फ्लैट की बाकी दो लड़कियां भी अपने घर गई थी। एक नेहा शर्मा की तो शादी तय हो चुकी थी और दूसरी शिवानी एक सप्ताह के लिए घर दशहरा मनाने गयी थी। पिछले इतवार को ही तो नूर ने मां को बताया था ये सब। शिवानी हिमाचल प्रदेश से थी जहां का दशहरा विश्व प्रसिद्ध है। शिखा का बेटा आई आई टी पढ़ने कानपुर गया था। पिछले सात साल से शिखा गृहस्थी की गाड़ी अकेले खींच रही थी। शिखा के पति रोहन के इलाज पर लगभग जमा पूंजी खर्च हो गई थी। अमीर भाई बंधुओं ने दूरी बना ली। हालचाल पूछते और चले जाते। फिर धीरे धीरे आना भी बंद कर दिया। ये तो रोहन की जिजीविषा थी ठीक होने की, कि उन्होंने कैंसर जैसी बीमारी को हरा दिया था लेकिन शिखा कोई भी चिंताजनक बात रोहन से शेयर नहीं करती थी।

शिखा ने अपने भाई को फोन किया , “कि भतीजे को मुम्बई भेज दो” नूर की चिंता हो रही है। शिखा का भाई उदयपुर में रहता था। उसने कहा , ” एक सप्ताह का समय दो। उसके बाद देखते हैं किसको भेजना है”। शिखा के लिए तो एक एक पल भारी हो रहा था। शिखा ने फिर अपनी बहन से बात की। बहन ने कहा, ” तुम बिल्कुल चिंता मत करो। मैं मुम्बई कल दोपहर की फ्लाइट से निकल जाऊंगी”। शिखा की बहन, सरिता,एक रेजिडेंशियल स्कूल में प्रिंसिपल कार्यरत हैं। शिखा को अब थोड़ी तसल्ली हुई। सरिता को मालूम था कि शिखा डिप्रेशन से जूझ रही है।पति की लम्बी और जानलेवा बीमारी और बच्चों की उच्च शिक्षा, गृहस्थी के अन्य खर्च अब शिखा के कंधों पर थे। शिखा, स्वावलंबी तो थी ही, साथ में बहुत स्वाभिमानी भी थी। इतने वर्षों में शिखा की कोशिश थी कि किसी से पैसा लेना ना पड़े। इसलिए बहुत सोच समझकर खर्च करती थी। अपने सपने तो दफ़न कर दिए थे। बेटी नूर ने जिद्द की थी कि, ” कैम्पस प्लेशमेंट मिल रही है। पैकेज भी अच्छा है। मुझे मुम्बई जाने दो मां”। शिखा थोड़ा डरी हुई थी। अकेली लड़की, इतनी दूर। वह चाहती थी कि दिल्ली पोस्टिंग ले ली जाए। लेकिन नयी पीढ़ी में जोश खूब होता है, नूर भी नहीं मानी। शिखा की दो भानजी विदेश मे पढ़ रही थी। उन्होंने भी कहा, ” मौसी, आप घबरोओ नहीं, नूर समझदार है”। शिखा लेकिन जानती थी नूर दिल से बहुत मासूम है। उसकी तरहं ही लोगों पर जल्दी विश्वास कर लेती है। बेटी के ख्यालों में डूबते डूबते सुबह हो गई। सुबह फिर फोन मिलाया, नूर का फोन अभी भी सिविच ऑफ था। शिखा ने उस दिन कालेज़ से छुट्टी ली। उसका कहीं मन नहीं लग रहा था। सरिता, नूर की मौसी, शाम चार बज़े तक मुम्बई नूर के फ्लैट पर पहुंच गई थी। नूर कमरे में अकेली बिस्तर पर उदास लेटी हुई थी। ऐसा लग रहा था कुछ दिनों से ढंग से खाया भी नहीं है। अचानक मौसी को देखकर आंसुओं की धारा बह निकली। अगली फ्लाइट से मौसी नूर को लेकर रोहतक पहुंच चुकी थी। नूर जो हमेशा चहकती रहती थी, आज उदासीयों के बादल उसके ‘स्माईली फेस’ पर उमड़ घुमड़ रहे थे।

रोहन भी आश्चर्य में थे कि अचानक नूर , मौसी के साथ कैसे आई है। शिखा ने उन्हें कुछ नहीं बताया था। बस थोड़ा सा इशारा किया था कि नूर की तबीयत ठीक नहीं है इसलिए घर बुला लिया है। शाम को शिखा, सरिता व नूर के साथ बैठी और उसकी इस गहरी उदासी का का कारण जानना चाहा। नूर के होंठ कांप रहे थे, आंखों में आंसू अवरिल रुप से बह रहे थे, रोते, रोते हिचकी बंध गई थी। शिखा ने उसे अपनी गोद में ऐसे ही लेटा लिया जैसे वह बचपन में लिटा लेती थी और कहा कि, ” बेटा जो भी बात है बेझिझक होकर बताओ। कोई भी तुम्हें कुछ नहीं कहेगा”।
मां का आश्वासन भरा हाथ सिर पर पाकर नूर ने बताना शुरु किया। ” मम्मा, मेरे बैंक में मेरी सीनियर हैं, मोनिका उनके हसंबैड़ क्यू नेट की सकीम चलाते हैं जिसमें उन्होंने मेरा बारह लाख रुपया लगवा दिया है। पांच लाख रुपया एक बैंक से व्यक्तिगत लोन लिया था मैंने, उनके कहने पर। चार लाख मेरा बोनस आया था। तीन लाख मेरे कहने पर तीन सहेलियों ने मुझे लगाने के लिए दिए थे। ये चैन सिस्टम जैसा कुछ है। उन्होंने मुझे आश्वस्त किया था कि पैसा सेफ है और छ: महीने में ही तुम बहुत पैसा बना लोगी। उन्होंने ये भी कहा था कि जब तुम अच्छा पैसा इससे कमा लो तभी घर पर बताना। मैंने उन पर भरोसा कर लिया। मैंने सोचा था कि आपकी मदद कर दूंगी। लेकिन मम्मा मैं इस सिस्टम से और लोगों की चैन नहीं बना पाई। मेरी सीनियर मोनिका से मैंने पापा को बीमारी और आपके डिप्रेशन की बातें शेयर की थी। अब मेरा सारा पैसा डूब गया है। मुझे बहुत बुरे ख्याल आ रहे थे। मैंने सुसाइड के बारे में भी सोचा था लेकिन आपका चेहरा घूम जाता था…”। शिखा और बहन सरिता उसकी बात को ध्यान से सुन रहे थे। शिखा ने समझाते हुए कहा कि, ” बेटा, जो हो गया , उसे छोड़ो। पैसा हमने ही बनाया था। दुबारा बन जायेगा लेकिन तुम इतनी कमजोर क्यों बनी कि सुसाइड जैसी बात तुम्हारे दिमाग में आई। बेटी पैसा एक माध्यम है जीवन चलाने के लिए, सब कुछ नहीं है। इंसान बना रहना चाहिए। हौंसला है तो जो बिखरा है फिर से समेटा जा सकता है लेकिन इंसान एक बार मृत्यु को प्राप्त हो जाए तो कभी वापिस लौट कर नहीं आता। आइंदा, इतनी बात गांठ बांध लो कि, माता पिता से बढ़कर दुनिया में कोई सच्चा हितैषी नहीं होता। इसलिए हमेशा उनसे सलाह लेकर कोई भी काम शुरु करना चाहिए। तुम्हारे पापा की इतनी बढिया जॉब से त्यागपत्र भी मैंने ही तो दिलवाया था। सबसे पहले सेहत रुपी खज़ाना है बाकी सब तो बाद मे आता है। ये सारा लोन और तुम्हारी सहेलियों का पैसा हम मिलकर चुका देंगे। बिल्कुल भी चिंता नहीं करनी है…।” मां की गोद में लेटे लेटे नूर को नींद आ गई। शायद कुछ दिन से ढंग से सोयी भी नहीं थी। शिखा और सरिता काफी देर तक विचार विमर्श करती रहीं। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि अब नूर को मुम्बई नहीं भेज़ना है। शिखा ने अगले दिन नूर के बॉस से बात की और रिक्वेस्ट की, कि नूर को एक सप्ताह में ही रिलीव कर दें। कुछ पारिवारिक मज़बूरी है। नूर के बॉस को भी उसकी पारिवारिक परेशानी पता थी । इसलिए उन्होंने बात मान ली। तीन दिन बाद शिखा ने अपनी बहन सरिता को नूर के साथ भेजा और नूर को एक सप्ताह चार्ज देने में लगा। मौसी बेटी मुम्बई को बॉय करके वापिस अपने स्टेट में आ गई। शिखा मेरी खास सहेली है, हम बचपन से ही साथ रहे हैं । किस्मत से शादी के बाद भी मकान एक ही शहर में बना लिया था तो हमारा लगभग सप्ताह में एक बार मिलना जरूर हो जाता है।

नूर अब मां की देखरेख में रह रही है। मानसिक तनाव के लक्षण देखे तो शिखा अपने साईकेटेरिसट के पास उसे ले गई। नूर पहले तो मानने को तैयार ही नहीं थी कि उसे चिकित्सा की आवश्यकता है लेकिन शिखा तो इस बीमारी से वाकिफ थी। नूर को मना कर उसकी चिकित्सा करवाई और बहुत ममता उडे़ली, तब कहीं जाकर नूर दस महीने में बिल्कुल ठीक हुई। उसे गहरा सदमा लगा था, कहीं आत्मग्लानि भी थी कि मां पर अनआवश्यक बोझ डाला। लेकिन जिस तरहं से शिखा अपनी हर समस्या को खुद डिप्रेशन की दवा लेते हुए सुलझाती है, मेरा मन उसे हमेशा नमन करता है। मैंनें तो उसे बहुत करीब से जाना है। उसकी विल पावर बहुत दृढ़ है। नूर ने भी ठीक होने के बाद गुरुग्राम में दुबारा से जॉब ज्वाइन कर ली है। अब वह हर पंद्रह दिन में घर आ जाती है और सभी बातें अपनी मां से सांझा करती है।

मैंने तो कहा भी था कि मोनिका और उसके पति पर कोर्ट कैस करते हैं लेकिन शिखा का कहना है कि मेरी बेटी सुरक्षित घर आ गई है। मुझे कोई कोर्ट कचहरी के चक्कर में नहीं पड़ना। इतनी दूर बार बार फ्लाइट इत्यादि पर खर्च नहीं कर सकती। फिर कोर्ट में कैस सालों साल चलते रहते हैं। मैं अकेली क्या क्या संम्भालूगी। नूर के साथ मोनिका व उसके पति ने जो किया है उन्हें वह एक दिन जरूर किसी न किसी रुप में चुकाना पड़ेगा। निर्मल मन वालों की आह पत्थर को भी भेद जाती है।

✍️©®” जोया” 19/01/2019

रुठे को मनाना

1970
उस वक्त मेरी उम्र सात वर्ष की थी और संकरात पर मां हम तीनों बहन भाइयों को अल सुबह उठा देती थी हारे पर गर्म पानी की डेगची तैयार रहती थी। सूर्योदय से पहले स्नान आवश्यक था नहीं तो हमे कहा जाता था कि, ” चांडाल बाल रह जायेगा”। और हम डर के मारे तुरंत उठ जाते थे। नहा धोकर बाहर ताऊ द्वारा जलाये हुए अलाव के सामने बैठ जाते और उसमें मूंगफली और तिल अर्पित करते। साथ में मां द्वारा बनाए हलवे का भी भोग अग्नि देवता को लगाते थे। आंच के पास बैठकर खेत से लाए गन्ने चूघंते थे। फिर हलवा खाकर रजा़ई मैं बैठकर बातें करते थे। बड़ी बहन बताती कि आज़ तो दिन में बहुत रौनक होने वाली है। हमारी उत्सकुता बढ़ जाती थी।

खेत क्यार का काम करके सब लोग अपने घरों को जल्दी लौट आते थे। दोपहर से ही महिलाओं की टोली गीत गाती हुई अपने घर के बुजुर्गों को मनाने के लिए नयी बहू के साथ जाते थे। घाघरा, कुर्ता और सितारों व गोठ से चमकदार ओढ़नी ओढ़े ये बहूएं सबको आकृषित करती थी। उनकी झनझन करती पायल की झंकार एक अलग ही किस्म की मनमोहक धुन लिए होती थी। हाथों में खनकती चूडिय़ां व सुंदर हथफूल हम बच्चों को तो बहुत आकर्षक लगते थे। लगभग घुटनों तक पहने हुए कडूले व गले में मटरमाला और कंठी, इन बहूओं की सुंदरता में चार चांद लगा देती थी।गांव में खूब चहल पहल शुरू हो जाती और पूरे वातावरण में स्नेह की महक फैली होती थी।

परांत में तील लेकर ये नयी बहूएं अपने, जेठ, ससुर ,सास व दादी सास को मनाने जाती थी। बुजुर्ग तो कहीं दूसरी बैठक में बैठ जाते थे और बच्चों की डयूटी लगती थी ढूंढने की कहां रूठकर बैठे हैं। फिर सब महिलाएं गीत गाती हुई उन्हें गर्म कम्बल व नेग देकर मना कर घर लिवा लाती थी। दादी ताईयां भी छुप कर बैठ जाती जिन्हें हम बच्चे ढूंढ लेते और एक जासूस की तरह आकर अपनी नयी काकी मां को बता देते। बहुत आंनद आता था। महिलाओं की टोली फिर इन बुजुर्ग महिलाओं को मना कर घर लिवा लाती। हम बच्चे तो उस दिन खूब मस्ती करते थे और जहां भी महिलाओं की टोली दिखती शामिल हो लेते थे। शाम होते होते सभी रुठे लोगों को मना लिया जाता था व बहूओं को दूधो नहाओं पूतों फलों का आशिर्वाद मिल जाता था। इस तरह संकरात का त्योहार सकारात्मक ऊर्जा से भरा होता था। आपस की चुहलबाज़ी में पिछले सारे गिले शिकवे दूर हो जाते थे और आशीर्वादों की झड़ी लग जाती थी।

2019
संकरात मनाना अब मात्र औपचारिकता भर रह गई है खासकर परिवार में। संगी साथी वटस अप पर विश कर लेतें हैं। बुजुर्गों से फोन पर बात हो जाती है कुछ अपवादों को छोड़कर। बहूओं द्वारा दी गई तील अब पंसद नहीं आती है। नुक्ताचीनी से मन में खटास होती है। थोड़ी समृद्धि ने भी संकरात की रौनक को छीन लिया है। मैं तो पिछले तीस साल से अपने यहां बाई, माली, चौकीदार व विधवा चपरासी को संकरात देकर ये त्योहार मना लेती हूं। मेरे ससुर ने तीस साल पहले कह दिया था, ” किसी गरीब को दे दिया करो, मोटली(सास) के पास बहुत हैं”। मुझे मालूम था कि मेरी सास को कभी मेरी लाई तील पंसद नहीं आयी जो मैं हमेशा नयी खरीद कर लाती थी। मेरा तो यही मानना है कि, ” रिश्तों की मिठास जब दोनों ओर से हो तभी सुंगधित पुष्प खिलते हैं”।

✍️©®” जोया”14/01/2019

मन का हिरण

अधूरी प्रेम कहानी की टीस जब हृदय में उठती है तो मन का हिरण कुलांचे भरते हुए यौवन की दहलीज़ पर पहुंच जाता है और अतीत के झरोखों से आनेवाली खुशबूएं दिल के आंगन को महकाने को आतुर हो जाती है।

ऐसी ही एक कहानी है आशिफ़ और सुरभी की जो एक साथ मल्टीनेशनल कंपनी में ऊंचे पदों पर विराजमान हैं। आई आई एम अहमदाबाद से एम बी ए की डिग्री हासिल करने के पश्चात दोनों ने तय किया था कि अपने परिवारजनो की सहमति से अपने इश्क पर मोहर लगा कर गृहस्थ जीवन में कदम रखेंगे।

एम बी ए के दौरान आसिफ़ और सुरभी एक दूसरे के करीब उस वक्त आए जब दोनों एक प्रोजेक्ट पर साथ साथ काम कर रहे थे। आशिफ़ का व्यक्तित्व एक चुम्बकीय आकर्षण लिए था। उसकी बौद्धिक क्षमता व सहपाठी लड़कियों के प्रति सम्मानजनक व्यवहार की वज़ह से सुरभी के दिल में उसने एक विशेष स्थान बना लिया था। उधर आशिफ़, सुरभी की वाकपटुता, सकारात्मक ऊर्जा व जिंदादिली से प्रभावित था। प्रोजेक्ट पर काम करते हुए एक दूसरे को समझने का अवसर भी मिला और कोर्स के आखिरी सैमस्टर तक आते आते दोनों ने जीवनसाथी बनना तय कर लिया था और हम सब साथियों को इज़हार पार्टी भी थी।हम सब खुश थे कि उनका प्यार परवान चढ़ रहा था।

सभी साथी अच्छे पदों पर नियुक्त हो गए थे। आशिफ़ और सुरभी भी मल्टीनेशनल कंपनी में प्लेसमेंट पा चुके थे। एक महीने बाद दोनों को ज्वाइन करना था। घर जाकर दोनों ने अपने अपने माता पिता को एक दूसरे के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि, “ हम जीवनसाथी बनकर अपने प्रेम पर मोहर लगाना चाहते हैं। आपका आशीर्वाद चाहिए“। लेकिन इश्क़ की डगर बहुत कंटीली होती है। वे खुशनसीब होते हैं जिन्हें यह मुकाम हासिल हो जाता है। नहीं तो जीवन अनुभव यही कहता है कि इस राह में बाधाएं बहुत हैं। ऊंची ऊंची दीवारें हैं जिनको लांघना आसान नहीं होता है। आशिफ़ और सुरभी के केस में तो महज़ब की इतनी ऊंची दीवार खड़ी हो गई कि अति आधुनिक कहे जाने वाले परिवारों में जात पात, धर्म, बिरादरी व समाज की भूलभूलैया में इश्क़ और इंसानियत को रास्ता नज़र नहीं आया और दोनों को परिवार की साख के लिए मोहब्बत को अतीत की कब्र में दफनाना पड़ा।

कुछ साल बीते और आशिफ़ और सुरभी की शादी उनके परिवारों के रितिवाज़ के मुताबिक हो गई। मैं चूंकि दोनों की ही दोस्त थी, उनकी शादियों में सम्मलित हुई थी। खुश लग रहे थे दोनों लेकिन उदासी की एक परत फिर भी मुझे दिखाई दे गई थी। जिंदगी में आप ठहर नहीं सकते। उसके कदम के साथ कदम मिलाना होता है नहीं तो उलझनों के थागे कभी नहीं सुलझते , उन्हें सुलझाना होता है धैर्यशीलता के साथ ,फर्ज़ को ध्यान में रखते हुए। जो लोग सुलझाने की कोशिश नहीं करते वे भावनाओं के मकडज़ाल में उलझ कर रह जाते हैं। आशिफ़ और सुरभी ने अपने मन के हिरण को निंयत्रण में कर लिया था और अपनी शैक्षणिक योग्यता के दम पर आज़ बीस बर्ष बाद इतनी आर्थिक संपन्नता हासिल कर ली है कि हुनरमंद लेकिन आर्थिक रूप से कमज़ोर युवाओं के लिए मिलकर एक कालेज़ की स्थापना की है जहां विभिन्न कौशल के आयामों की शिक्षा दी जाती है। एम बी ए प्रवेश परीक्षा का भी कोचिंग संस्थान खोला है जहां विद्धार्थीयों को नि:शुल्क तैयारी करवाई जाती है। उन्हें इस बात की तसल्ली है कि वे एक विकास कार्य में योगदान दे रहे हैं। देश के भविष्य को उज्जवल बनाने में उठा उनका ये एक छोटा सा कदम आने वाले समय में मील का पत्थर साबित होगा।

फिर भी कभी मैं उनका मन टटोलती हूं तो आशिफ़ और सुरभी की आंखे नम हो जाती हैं। इश्क़ का तार आत्मिक रुप से अभी भी जुड़ा है और यादें सावन की बदली की तरहं बरसने लगती हैं।

✍️©®” जोया” 11/12/2019